बात उस समय की है जब मगध साम्राज्य की पूरी दुनिया में तूती बोलती थी। तब पाटलीपुत्र पूरी दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। अन्य देश बड़ी उत्सुकता से मगध साम्राज्य के साथ संबंध स्थापित करने को लालायित रहते थे। घटना छठी शताब्दी के पूर्वार्द्ध की है। उस समय मगध के सम्राट बिंबिसार थे। पाटलीपुत्र में अगम कुआँ और गंगा नदी के बीच में राजमहल हुआ करता था। महल से थोड़ी ही दूरी पर केशव नाम का मल्लाह अपनी इकलौती बेटी रूपवती के साथ रहता था। रूपवती जितनी सुंदर थी उतनी ही गुणवती भी थी। केशव को कोई पुत्र नहीं था, इसलिए जब वह मछलियाँ पकड़ने गंगा नदी में जाया करता था तो रूपवती भी उसके साथ जाती थी।
जैसे-जैसे समय बीत रहा था रूपवती भी बड़ी हो रही थी और वह मछली पकड़ने की कला में भी निपुण होती जा रही थी। वह जाल फेंक लेती थी, मछली की जगह की पहचान कर लेती थी, पानी की गहराई का अंदाज़ा लगा लेती थी और हवा के रुख के अनुसार पाल को भी लहरा देती थी। समय के साथ वह इतनी समझदार हो गई थी कि उसके पिता को भी नदी में मछली पकड़ने में उससे काफ़ी मदद मिलती थी। कभी-कभी वह अपने पिता को छोड़ अकेली ही नदी में दूर तक निकल जाती थी और जाल फेंककर मछली भी पकड़ने लगती थी। इसी क्रम में उसकी एक साँप से दोस्ती भी हो गई।
एक दिन हुआ ऐसा कि मछली पकड़ते समय उसके जाल में एक साँप फँस गया। वह बुरी तरह से घायल हो गया था। भागना तो दूर की बात है, वह सरक भी नहीं सकता था। भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो रही थी। रूपवती ने उसकी मरहम-पट्टी की, उसे खाने के लिए मछलियाँ दीं और फिर उसे नदी के दह में छोड़ दिया। दूसरे दिन फिर वह उस इलाक़े में गई साँप को देखने के ख़याल से। अब वह भला-चंगा हो रहा था। उस दिन भी वह खाने को ढेर सारी मछलियाँ, मेंढक और अन्य जीव वहाँ छोड़ आई। वह अब रोज़ ही उसके पास जाने लगी और उसके लिए भोजन पहुँचाने लगी। थोड़े ही दिनों में साँप बिल्कुल स्वस्थ हो गया। दोनों में गाढ़ी दोस्ती हो गई। भोजन के बाद साँप जब फन फैलाकर नाचता तो रूपवती को बहुत ख़ुशी होती थी। नदी जल में तैरते तैरते दोनों काफ़ी दूर निकल जाते थे।
देखते-ही-देखते समय आगे निकल गया। रूपवती अब विवाह के योग्य हो गई। उसके माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। माता-पिता अत्यंत निर्धन थे। किसी तरह से बस उनका गुज़ारा चल रहा था। ग़रीबी के कारण शादी के लिए ज़रूरी पैसे जुटाने में भी वे असमर्थ थे। रोज़ मछली पकड़ने और बेचने से जो पैसे आते थे, उनसे तो घर-ख़र्च भी पूरा नहीं हो पाता था। इन सब बातों को रूपवती भी समझने लगी थी। वह उदास रहने लगी। इसी कारण वह कई दिनों तक मछली पकड़ने भी नहीं गई अपने बापू के साथ। उधर साँप भी रूपवती को न पाकर चिंतित और उदास रहने लगा था। कई बार वह भी बिना कुछ खाए-पिए ही सो जाता था। इस तरह कई दिनों तक रूपवती मछली पकड़ने नहीं गई और साँप से उसकी मुलाक़ात भी नहीं हुई।
इधर केशव भी अधिक मेहनत करने के कारण अस्वस्थ रहने लगा था। घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि बिना मछली पकड़े काम चल सकता था। मजबूरन रूपवती को नाव लेकर मछली पकड़ने अकेली घर से निकलना पड़ गया। कुछ मछलियाँ पकड़ने के बाद अचानक उसे साँप की याद आई और उसे आभास हुआ कि उसका भाई कई दिनों से भूखा है और वह भोजन के लिए बड़ी बेताबी से उसकी बाट जोह रहा है। ऐसे में वह यह भूल गई कि घर में एक दाना भी नहीं है और पिता अस्वस्थ हैं। जितनी मछलियाँ उसने पकड़ी थी सारी साँप को खाने के लिए दे दी। साँप सारी की सारी मछलियाँ खा भी गया। रूपवती उसे खाते हुए देखती और मुस्कुराती रही। साँप की भूख के समक्ष वह अपनी भूख भूल गई। साँप को तृप्त देखकर वह भी तृप्त हो गई। इससे मित्रता की शुचिता और विश्वसनीयता का पता चलता है।
साँप ने अचानक अपना फन फैलाया और ज़ोरों से फुफकार छोड़ी, फिर उसने एक दिव्य मणि रूपवती के सामने उगल दी। उस मणि से एक दिव्य आभा निकल रही थी। इससे रूपवती की आँखें चौंधियाँ रही थीं। वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। तभी साँप ने कहा, “बहन! तुम घबराओ नहीं और न ही किसी तरह की चिंता करो। यह नागमणि है। एक दिव्य और अलौकिक रत्न! यह तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करेगा। श्रद्धा-भक्ति से इसकी पूजा-अर्चना करना। इसे अपनी नाव में छिपा देना और घर में भी छिपाकर रखना।” इतना कहकर वह साँप अंतर्ध्यान हो गया। रूपवती मणि के साथ अपनी नाव में लौट आई।
रूपवती मणि को जब अपनी नाव के बालू में छिपाने लगी तो उसके सुखद आश्चर्य की सीमा न रही। नाव में ढेर सारी मछलियाँ छल-छल कर रही थीं। वह ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट गई। घर आकर अपने माता-पिता को सारी घटना कह सुनाई। उसने हाथ जोड़कर मणि से कहा, “हे दिव्य मणि! हमारी स्थिति आपसे छिपी नहीं है। यद्यपि हमें कोई लालच नहीं है, फिर भी आप कुछ ऐसा करें जिससे माँ-पिताजी का विश्वास पुख़्ता हो सके।”
रूपवती ने जैसे ही अपनी बात समाप्त की, उसके घर की रंगत ही बदल गई। चारों तरफ साफ़-सफ़ाई। घर के सारे सामान अपनी जगह और ज़रूरत भर जितने सामान चाहिए थे, खाने-पीने और अन्य सुख-सुविधाओं के लिए, वे सभी सामान मौजूद थे। सबके सब बेहद ख़ुश हुए।
रात में ख़ुशी-ख़ुशी भोजन कर सब सोने चले गए, पर रूपवती को नींद नहीं आ रही थी। उसे ऐसा आभास हुआ कि यह तो राजकीय संपत्ति है। इसे राजकोष में होना चाहिए । यही बात उसने सुबह अपने माँ-बाबूजी को बताई तो आश्चर्य से सभी एक-दूसरे को निहारने लगे। अंत में यही निर्णय लिया गया कि क्यों न इसे हम राजा के पास पहुँचा दें। राजा प्रजावत्सल हैं। वे अपनी समझदारी से प्रजा के हित में इसका सदुपयोग करेंगे।
समय से दोनों बाप-बेटी राजमहल पहुँच गए। रूपवती ने द्वारपाल से आने का कारण बताया और राजा से मिलने की इच्छा जताई। द्वारपाल से संदेश पाकर महाराज बिंबिसार भी आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने उन दोनों को दरबार में उपस्थित करने का आदेश दिया।
महाराज बिंबिसार बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल सम्राट थे। वे प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनकी धर्मप्रियता जगज़ाहिर थी। उनके भव्य-विराट व उज्ज्वल व्यक्तित्व को लेकर राज्य में कई-कई तरह की लोककथाएँ प्रचलित थीं।
राजदरबार सजा था। रूपवती अपने पिता के साथ पहले से ही वहाँ उपस्थित थी। वे दोनों राजदरबार की शोभा देखते नहीं अघाते थे। उनकी आँखें जिधर जातीं, उधर ही अटक जातीं। पर रूपवती का ध्यान तो बार-बार माथे की टोकरी में रेत से ढंकी ‘नागमणि’ की ओर दौड़ पड़ता था। दूसरे, वह हर पल राजसभा में महाराज के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी सबने महाराज का अभिवादन किया। उन्होंने राज सिंहासन पर आसीन होते ही आदेश दिया, “रूपवती और केशव मल्लाह को दरबार में पेश किया जाए।” आदेश पाते ही सिपाही ने दोनों को दरबार के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया। दोनों ने सिर झुकाकर महाराज का अभिवादन किया। तभी महाराज ने पूछा, “युवती तुम कौन हो और क्यों मुझसे मिलना चाहती थी?”
“महाराज, रूपवती ने माथे पर टोकरी सँभाले ही दोनों हाथ जोड़कर महाराज को प्रणाम किया, फिर कहना शुरू किया, “मैं आपके महल से थोड़ी ही दूरी पर स्थित माधोपुर गाँव की रहने वाली आपकी ही प्रजा हूँ। ये मेरे पिताश्री केशव मल्लाह हैं। मैं नियमित अपने पिता के साथ नाव लेकर गंगा नदी में मछली पकड़ने जाया करती हूँ।... कल नदी के दह में हरे नाग से मुझे एक मणि मिली है। यह एक दुर्लभ रत्न है और मनोवांछित फल देने में समर्थ है। इसलिए मैं चाहती हूँ कि दिव्य, दुर्लभ मणि राजकोष में रहे ताकि आप इससे मनोवांछित धन-दौलत प्राप्त कर अपनी प्रजा का कल्याण कर सकें!” महाराज ने बड़े ध्यान से रूपवती की बातें सुनीं, फिर कहा, “क्या हम अपने राजदरबारियों के साथ इस दिव्य मणि के दर्शन कर सकते हैं?”
“नहीं महाराज! यह एक अलौकिक रत्न है। केवल आप इसके दर्शन कर सकते हैं।” - और रूपवती ने टोकरी को महाराज के पास ले जाकर उन्हें ‘नागमणि’ के दर्शन करा दिए। तभी राजा ने पूछा, “लेकिन यह कैसे मान लिया जाए कि यह मणि मनोवांछित फल देती है?”
“दैवी शक्तियाँ कभी झूठ नहीं होतीं महाराज और न ही आज तक मैंने झूठ बोला है । आप चाहें तो अभी इसकी परीक्षा ले सकते हैं।”
“तुम ही कुछ ऐसा करो जिससे हम सबका विश्वास पुख़्ता हो सके। पूरे राज्य में सूखा पड़ा था जिससे अकाल की स्थिति बन रही थी। रूपवती ने श्रद्धा और भक्ति के साथ नागमणि से प्रार्थना की कि वह जनकल्याण हेतु पूरे राज्य में बारिश कर दें...”
फिर क्या था? हवा चलने लगी। बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे। फिर देखते ही देखते बारिश भी शुरू हो गई। उमस से लोगों को राहत मिली। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे सबके सब हर्षातिरेक में झूम उठे, गा उठे... नाच उठे। महाराज की ख़ुशी की सीमा नहीं थी। उन्होंने रूपवती को अपने पास बुलाया। प्यार से उसकी पीठ थपथपाई, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, बेटी। तुम अपने राज्य और राजा के बारे में इतना सोच सकती हो—यह मेरे लिए गर्व की बात है। तुमने अपने राज्य के लिए वह काम किया है जो आज तक किसी ने नहीं किया। आज से यह ‘नागमणि’ और ‘तुम’ दोनों राज्य की परिसंपत्ति हुई। तुम अपने माता-पिता के साथ राजमहल में ही रहोगी। यह दिव्य ‘नागमणि’ भी तुम्हारे ही पास रहेगी। राजहित में, तुम जैसा उचित समझना, उससे मनोवांछित फल प्राप्त कर राज्य का सम्मान बढ़ाना। मैं इस राज्य के प्रतिनिधि के रूप में इस राजमहल में तुम्हारा और अलौकिक नागमणि का हृदय से स्वागत करता हूँ।” महाराज के निर्णय का राजदरबारियों ने भी स्वागत किया। पूरी राजसभा करतल ध्वनियों से गूँज उठी। उस रात पूरे राज्य में दीपावली मनाई गई, मिठाइयाँ भी बाँटी गईं और जमकर ख़ुशियाँ मनाई गईं। रूपवती को रथ पर बैठाकर पूरे राज में सम्मान के साथ घुमाया गया। लोग उसके रथ के आगे-पीछे नाचते-गाते रहे। कई दिनों तक राज में जश्न का माहौल बना रहा।
कहते हैं, युवराज अजातशत्रु उस ‘नागमणि’ को हथियाना चाहता था किंतु महाराज बिंबिसार के सामने उसकी एक नहीं चल पाती थी। इसलिए अपनी माता छलना के बहकावे में आकर उसने महाराज को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। पर इससे पहले कि वह ‘नागमणि’ को अपने क़ब्ज़े में कर पाता, वह दिव्य रत्न अंतर्ध्यान हो गया और रूपवती ने उसी समय आत्महत्या कर ली।
baat us samay ki hai jab magadh samrajya ki puri duniya mein tuti bolti thi. tab patliputr puri duniya ke logon ke liye akarshan ka kendr hua karta tha. anya desh baDi utsukta se magadh samrajya ke saath sambandh sthapit karne ko lalayit rahte the. ghatna chhathi shatabdi ke purvarddh ki hai. us samay magadh ke samrat bimbisar the. patliputr mein agam kuan aur ganga nadi ke beech mein rajamhal hua karta tha. mahl se thoDi hi duri par keshav naam ka mallah apni iklauti beti rupavti ke saath rahta tha. rupavti jitni sundar thi utni hi gunavti bhi thi. keshav ko koi putr nahin tha, isliye jab wo machhliyan pakaDne ganga nadi mein jaya karta tha to rupavti bhi uske saath jati thi.
jaise jaise samay beet raha tha rupavti bhi baDi ho rahi thi aur wo machhli pakaDne ki kala mein bhi nipun hoti ja rahi thi. wo jaal phenk leti thi, machhli ki jagah ki pahchan kar leti thi, pani ki gahrai ka andaza laga leti thi aur hava ke rukh ke anusar paal ko bhi lahra deti thi. samay ke saath wo itni samajhdar ho gai thi ki uske pita ko bhi nadi mein machhli pakaDne mein usse kafi madad milti thi. kabhi kabhi wo apne pita ko chhoD akeli hi nadi mein door tak nikal jati thi aur jaal phenkkar machhli bhi pakaDne lagti thi. isi kram mein uski ek saanp se dosti bhi ho gai.
ek din hua aisa ki machhli pakaDte samay uske jaal mein ek saanp phans gaya. wo buri tarah se ghayal ho gaya tha. bhagna to door ki baat hai, wo sarak bhi nahin sakta tha. bhookh ke mare uski haalat kharab ho rahi thi. rupavti ne uski marham patti ki, use khane ke liye machhliyan deen aur phir use nadi ke dah mein chhoD diya. dusre din phir wo us ilaqe mein gai saanp ko dekhne ke khayal se. ab wo bhala changa ho raha tha. us din bhi wo khane ko Dher sari machhliyan, menDhak aur anya jeev vahan chhoD aai. wo ab roz hi uske paas jane lagi aur uske liye bhojan pahunchane lagi. thoDe hi dinon mein saanp bilkul svasth ho gaya. donon mein gaDhi dosti ho gai. bhojan ke baad saanp jab phan phailakar nachta to rupavti ko bahut khushi hoti thi. nadi jal mein tairte tairte donon kaphi door nikal jate the.
dekhte hi dekhte samay kafi aage nikal gaya. rupavti ab vivah ke yogya ho gai. uske mata pita ko uski shadi ki chinta satane lagi. mata pita atyant nirdhan the. kisi tarah se bas unka guzara chal raha tha. gharibi ke karan shadi ke liye zaruri paise jutane mein bhi ve kafi asmarth the. roz machhli pakaDne aur bechne se jo paise aate the, unse to ghar kharch bhi pura nahin ho pata tha. in sab baton ko rupavti bhi samajhne lagi thi. wo udaas rahne lagi. isi karan wo kai dinon tak machhli pakaDne bhi nahin gai apne bapu ke saath. udhar saanp bhi rupavti ko na pakar chintit aur udaas rahne laga tha. kai baar wo bhi bina kuch khaye piye hi so jata tha. is tarah kai dinon tak rupavti machhli pakaDne nahin gai aur saanp se uski mulaqat bhi nahin hui.
idhar keshav bhi adhik mehnat karne ke karan asvasth rahne laga tha. ghar ki mali haalat aisi nahin thi ki bina machhli pakDe kaam chal sakta tha. majburan rupavti ko naav lekar machhli pakaDne akeli ghar se nikalna paD gaya. kuch machhliyan pakaDne ke baad achanak use saanp ki yaad aai aur use abhas hua ki uska bhai kai dinon se bhukha hai aur wo bhojan ke liye baDi betabi se uski baat joh raha hai. aise mein wo ye bhool gai ki ghar mein ek dana bhi nahin hai aur pita asvasth hain. jitni machhliyan usne pakDi thi sari saanp ko khane ke liye de di. saanp sari ki sari machhliyan kha bhi gaya. rupavti use khate hue dekhti aur muskurati rahi. saanp ki bhookh ke samaksh wo apni bhookh bhool gai. saanp ko tript dekhkar wo ho gai. isse mitrata ki shuchita aur vishvasniyata ka pata chalta hai.
saanp ne achanak apna phan phailaya aur joron se phuphkar chhoDi, phir usne ek divya mani rupavti ke samne ugal di. us mani se ek divya aabha nikal rahi thi. isse rupavti ki ankhen chaundhiyan rahi theen. wo kuch bhi samajh nahin pa rahi thi. tabhi saanp ne kaha, “bahan! tum ghabrao nahin aur na hi kisi tarah ki chinta karo. ye nagamani hai. ek divya aur alaukik ratn! ye tumhari sari ichchhayen puri karega. shraddha bhakti se iski puja archna karna. ise apni naav mein chhipa dena aur ghar mein bhi chhipakar rakhna. ” itna kahkar wo saanp antardhyan ho gaya. rupavti mani ke saath apni naav mein laut aai.
rupavti mani ko jab apni naav ke balu mein chhipane lagi to uske sukhad ashcharya ki sima na rahi. naav mein Dher sari machhliyan chhal chhal kar rahi theen. wo khushi khushi ghar laut gai. ghar aakar apne mata pita ko sari ghatna kah sunai. usne haath joDkar mani se kaha, “he divya mani! hamari sthiti aapse chhipi nahin hai. yadyapi hamein koi lalach nahin hai, phir bhi aap kuch aisa karen jisse maan pitaji ka vishvas pukhta ho sake. ”
rupavti ne jaise hi apni baat samapt ki, uske ghar ki rangat hi badal gai. charon taraph saaf safai. ghar ke sare saman apni jagah aur zarurat bhar jitne saman chahiye the khane pine aur anya sukh suvidhaon ke liye, ve sabhi saman maujud the. sabke sab behad khush hue.
raat mein khushi khushi bhojan kar sab sone chale ge. par rupavti ko neend nahin aa rahi thi. use aisa abhas hua ki ye to rajakiy sampatti hai. ise rajakosh mein hona chahiye. yahi baat usne subah apne maan babuji ko batai to ashcharya se sabhi ek dusre ko niharne lage. ant mein yahi nirnay liya gaya ki kyon na ise hum raja ke paas pahuncha den? raja prjavatsal hain. ve apni samajhdari se praja ke hit mein iska sadupyog karenge.
samay se donon baap beti rajamhal pahunch ge. rupavti ne dvarpal se aane ka karan bataya aur raja se milne ki ichchha jatai. dvarpal se sandesh pakar maharaj bimbisar bhi ashcharyajnak roop se bahut khush hue. unhonne un donon ko darbar mein upasthit karne ka adesh diya.
maharaj bimbisar bahut hi nyayapriy aur prjavatsal samrat the. ve praja mein bahut lokapriy the. unki dharmapriyta jag jahir thi. unke bhavya virat va ujjval vyaktitv ko lekar rajya mein kai kai tarah ki lokakthayen prachalit theen.
rajadarbar saja tha. rupavti apne pita ke saath pahle se hi vahan upasthit thi. ve donon rajadarbar ki shobha dekhte nahin aghate the. unki ankhen jidhar jati udhar hi atak jati. par uska dhyaan to baar baar mathe ki tokari mein ret se Dhanki ‘nagamani’ ki or dauD paDta tha. dusre, wo har pal rajasbha mein maharaj ke aane ki prtiksha kar rahi thi. tabhi sabne maharaj ka abhivadan kiya. unhonne raaj sinhasan par asin hote hi adesh diya, “rupavti aur keshav mallah ko darbar mein pesh kiya jaye. ” adesh pate hi sipahi ne donon ko darbar ke madhya mein lakar khaDa kar diya. donon ne sir jhukakar maharaj ka abhivadan kiya. tabhi maharaj ne puchha, “yuvati tum kaun ho aur kyon mujhse milna chahti thee?”
“maharaj, rupavti ne mathe par tokari sanbhale hi donon haath joDkar maharaj ko prnaam kiya, phir kahna shuru kiya, “main aapke mahl se thoDi hi duri par sthit madhopur gaanv ki rahne vali apaki hi praja hoon. ye mere pitashri keshav mallah hain. main niymit apne pita ke saath naav lekar ganga nadi mein machhli pakaDne jaya karti hoon. . . . kal nadi ke dah mein hare naag se mujhe ek mani mili hai. ye ek durlabh ratn hai aur manovanchhit phal dene mein samarth hai. isliye main chahti hoon ki divya, durlabh mani rajakosh mein rahe taki aap isse manovanchhit dhan daulat praapt kar apni praja ka kalyan kar saken!” maharaj ne baDe dhyaan se rupavti ki baten sunin, phir kaha, “kya hum apne rajadarbariyon ke saath is divya mani ke darshan kar sakte hain?”
“nahin maharaj! ye ek alaukik ratn hai. keval aap iske darshan kar sakte hain. ” aur rupavti ne tokari ko maharaj ke paas lekar unhen ‘nagamani’ ke darshan kara diye. tabhi raja ne puchha, “lekin ye kaise maan liya jaye ki ye mani manovanchhit phal deti hai?”
“daivi shaktiyan kabhi jhooth nahin hotin maharaj aur na hi aaj tak mainne jhooth bola hai. aap chahen to abhi iski pariksha le sakte hain. ”
“tum hi kuch aisa karo jisse hum sabka vishvas pukhta ho sake. pure rajya mein sukha paDa tha jisse akal ki sthiti ban rahi thi. rupavti ne shraddha aur bhakti ke saath nagamani se pararthna ki ki wo jankalyan hetu pure rajya mein barish kar den. . . . ”
phir kya tha? hava chalne lagi. badal umaDne ghumaDne lage. phir dekhte hi dekhte barish bhi shuru ho gai. umas se logon ko rahat mili. manushya hi nahin, pashu pakshi, jeev jantu, peD paudhe sabke sab harshatirek mein jhoom uthe, ga uthe. . . naach uthe. maharaj ki khushi ki sima nahin thi. unhonne rupavti ko apne paas bulaya. pyaar se uski peeth thapthapai, phir uske sir par haath pherte hue kaha, “main tumse bahut prasann hoon, beti. tum apne rajya aur raja ke bare mein itna soch sakti ho—yah mere liye garv ki baat hai. tumne apne rajya ke liye wo kaam kiya hai jo aaj tak kisi ne nahin kiya. aaj se ye ‘nagamani’ aur ‘tum’ donon rajya ki parisampatti hui. tum apne mata pita ke saath rajamhal mein hi rahogi. ye divya ‘nagamani’ bhi tumhare hi paas rahegi. rajahit mein, tum jaisa uchit samajhna, usse manovanchhit phal praapt kar rajya ka samman baDhana. main is rajya ke pratinidhi ke roop mein is rajamhal mein tumhara aur alaukik nagamani ka hriday se svagat karta hoon. ” maharaj ke nirnay ka rajadarbariyon ne bhi svagat kiya. puri rajasbha kartal dhvaniyon se goonj uthi. us raat pure rajya mein dipavali manai gai, mithaiyan bhi banti gain aur jamkar khushiyan manai gain. rupavti ko rath par baithakar pure raaj mein samman ke saath ghumaya gaya. log uske rath ke aage pichhe nachte gate rahe. kai dinon tak raaj mein jashn ka mahaul bana raha.
kahte hain, yuvaraj ajatashatru us ‘nagamani’ ko hathiyana chahta tha kintu maharaj bimbisar ke samne uski ek nahin chal pati thi. isliye apni mata chhalna ke bahkave mein aakar usne maharaj ko bandi banakar karagar mein Daal diya. par isse pahle ki wo ‘nagamani’ ko apne qabze mein kar pata, wo divya ratn antardhyan ho gaya aur rupavti ne usi samay atmahatya kar li thi.
baat us samay ki hai jab magadh samrajya ki puri duniya mein tuti bolti thi. tab patliputr puri duniya ke logon ke liye akarshan ka kendr hua karta tha. anya desh baDi utsukta se magadh samrajya ke saath sambandh sthapit karne ko lalayit rahte the. ghatna chhathi shatabdi ke purvarddh ki hai. us samay magadh ke samrat bimbisar the. patliputr mein agam kuan aur ganga nadi ke beech mein rajamhal hua karta tha. mahl se thoDi hi duri par keshav naam ka mallah apni iklauti beti rupavti ke saath rahta tha. rupavti jitni sundar thi utni hi gunavti bhi thi. keshav ko koi putr nahin tha, isliye jab wo machhliyan pakaDne ganga nadi mein jaya karta tha to rupavti bhi uske saath jati thi.
jaise jaise samay beet raha tha rupavti bhi baDi ho rahi thi aur wo machhli pakaDne ki kala mein bhi nipun hoti ja rahi thi. wo jaal phenk leti thi, machhli ki jagah ki pahchan kar leti thi, pani ki gahrai ka andaza laga leti thi aur hava ke rukh ke anusar paal ko bhi lahra deti thi. samay ke saath wo itni samajhdar ho gai thi ki uske pita ko bhi nadi mein machhli pakaDne mein usse kafi madad milti thi. kabhi kabhi wo apne pita ko chhoD akeli hi nadi mein door tak nikal jati thi aur jaal phenkkar machhli bhi pakaDne lagti thi. isi kram mein uski ek saanp se dosti bhi ho gai.
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idhar keshav bhi adhik mehnat karne ke karan asvasth rahne laga tha. ghar ki mali haalat aisi nahin thi ki bina machhli pakDe kaam chal sakta tha. majburan rupavti ko naav lekar machhli pakaDne akeli ghar se nikalna paD gaya. kuch machhliyan pakaDne ke baad achanak use saanp ki yaad aai aur use abhas hua ki uska bhai kai dinon se bhukha hai aur wo bhojan ke liye baDi betabi se uski baat joh raha hai. aise mein wo ye bhool gai ki ghar mein ek dana bhi nahin hai aur pita asvasth hain. jitni machhliyan usne pakDi thi sari saanp ko khane ke liye de di. saanp sari ki sari machhliyan kha bhi gaya. rupavti use khate hue dekhti aur muskurati rahi. saanp ki bhookh ke samaksh wo apni bhookh bhool gai. saanp ko tript dekhkar wo ho gai. isse mitrata ki shuchita aur vishvasniyata ka pata chalta hai.
saanp ne achanak apna phan phailaya aur joron se phuphkar chhoDi, phir usne ek divya mani rupavti ke samne ugal di. us mani se ek divya aabha nikal rahi thi. isse rupavti ki ankhen chaundhiyan rahi theen. wo kuch bhi samajh nahin pa rahi thi. tabhi saanp ne kaha, “bahan! tum ghabrao nahin aur na hi kisi tarah ki chinta karo. ye nagamani hai. ek divya aur alaukik ratn! ye tumhari sari ichchhayen puri karega. shraddha bhakti se iski puja archna karna. ise apni naav mein chhipa dena aur ghar mein bhi chhipakar rakhna. ” itna kahkar wo saanp antardhyan ho gaya. rupavti mani ke saath apni naav mein laut aai.
rupavti mani ko jab apni naav ke balu mein chhipane lagi to uske sukhad ashcharya ki sima na rahi. naav mein Dher sari machhliyan chhal chhal kar rahi theen. wo khushi khushi ghar laut gai. ghar aakar apne mata pita ko sari ghatna kah sunai. usne haath joDkar mani se kaha, “he divya mani! hamari sthiti aapse chhipi nahin hai. yadyapi hamein koi lalach nahin hai, phir bhi aap kuch aisa karen jisse maan pitaji ka vishvas pukhta ho sake. ”
rupavti ne jaise hi apni baat samapt ki, uske ghar ki rangat hi badal gai. charon taraph saaf safai. ghar ke sare saman apni jagah aur zarurat bhar jitne saman chahiye the khane pine aur anya sukh suvidhaon ke liye, ve sabhi saman maujud the. sabke sab behad khush hue.
raat mein khushi khushi bhojan kar sab sone chale ge. par rupavti ko neend nahin aa rahi thi. use aisa abhas hua ki ye to rajakiy sampatti hai. ise rajakosh mein hona chahiye. yahi baat usne subah apne maan babuji ko batai to ashcharya se sabhi ek dusre ko niharne lage. ant mein yahi nirnay liya gaya ki kyon na ise hum raja ke paas pahuncha den? raja prjavatsal hain. ve apni samajhdari se praja ke hit mein iska sadupyog karenge.
samay se donon baap beti rajamhal pahunch ge. rupavti ne dvarpal se aane ka karan bataya aur raja se milne ki ichchha jatai. dvarpal se sandesh pakar maharaj bimbisar bhi ashcharyajnak roop se bahut khush hue. unhonne un donon ko darbar mein upasthit karne ka adesh diya.
maharaj bimbisar bahut hi nyayapriy aur prjavatsal samrat the. ve praja mein bahut lokapriy the. unki dharmapriyta jag jahir thi. unke bhavya virat va ujjval vyaktitv ko lekar rajya mein kai kai tarah ki lokakthayen prachalit theen.
rajadarbar saja tha. rupavti apne pita ke saath pahle se hi vahan upasthit thi. ve donon rajadarbar ki shobha dekhte nahin aghate the. unki ankhen jidhar jati udhar hi atak jati. par uska dhyaan to baar baar mathe ki tokari mein ret se Dhanki ‘nagamani’ ki or dauD paDta tha. dusre, wo har pal rajasbha mein maharaj ke aane ki prtiksha kar rahi thi. tabhi sabne maharaj ka abhivadan kiya. unhonne raaj sinhasan par asin hote hi adesh diya, “rupavti aur keshav mallah ko darbar mein pesh kiya jaye. ” adesh pate hi sipahi ne donon ko darbar ke madhya mein lakar khaDa kar diya. donon ne sir jhukakar maharaj ka abhivadan kiya. tabhi maharaj ne puchha, “yuvati tum kaun ho aur kyon mujhse milna chahti thee?”
“maharaj, rupavti ne mathe par tokari sanbhale hi donon haath joDkar maharaj ko prnaam kiya, phir kahna shuru kiya, “main aapke mahl se thoDi hi duri par sthit madhopur gaanv ki rahne vali apaki hi praja hoon. ye mere pitashri keshav mallah hain. main niymit apne pita ke saath naav lekar ganga nadi mein machhli pakaDne jaya karti hoon. . . . kal nadi ke dah mein hare naag se mujhe ek mani mili hai. ye ek durlabh ratn hai aur manovanchhit phal dene mein samarth hai. isliye main chahti hoon ki divya, durlabh mani rajakosh mein rahe taki aap isse manovanchhit dhan daulat praapt kar apni praja ka kalyan kar saken!” maharaj ne baDe dhyaan se rupavti ki baten sunin, phir kaha, “kya hum apne rajadarbariyon ke saath is divya mani ke darshan kar sakte hain?”
“nahin maharaj! ye ek alaukik ratn hai. keval aap iske darshan kar sakte hain. ” aur rupavti ne tokari ko maharaj ke paas lekar unhen ‘nagamani’ ke darshan kara diye. tabhi raja ne puchha, “lekin ye kaise maan liya jaye ki ye mani manovanchhit phal deti hai?”
“daivi shaktiyan kabhi jhooth nahin hotin maharaj aur na hi aaj tak mainne jhooth bola hai. aap chahen to abhi iski pariksha le sakte hain. ”
“tum hi kuch aisa karo jisse hum sabka vishvas pukhta ho sake. pure rajya mein sukha paDa tha jisse akal ki sthiti ban rahi thi. rupavti ne shraddha aur bhakti ke saath nagamani se pararthna ki ki wo jankalyan hetu pure rajya mein barish kar den. . . . ”
phir kya tha? hava chalne lagi. badal umaDne ghumaDne lage. phir dekhte hi dekhte barish bhi shuru ho gai. umas se logon ko rahat mili. manushya hi nahin, pashu pakshi, jeev jantu, peD paudhe sabke sab harshatirek mein jhoom uthe, ga uthe. . . naach uthe. maharaj ki khushi ki sima nahin thi. unhonne rupavti ko apne paas bulaya. pyaar se uski peeth thapthapai, phir uske sir par haath pherte hue kaha, “main tumse bahut prasann hoon, beti. tum apne rajya aur raja ke bare mein itna soch sakti ho—yah mere liye garv ki baat hai. tumne apne rajya ke liye wo kaam kiya hai jo aaj tak kisi ne nahin kiya. aaj se ye ‘nagamani’ aur ‘tum’ donon rajya ki parisampatti hui. tum apne mata pita ke saath rajamhal mein hi rahogi. ye divya ‘nagamani’ bhi tumhare hi paas rahegi. rajahit mein, tum jaisa uchit samajhna, usse manovanchhit phal praapt kar rajya ka samman baDhana. main is rajya ke pratinidhi ke roop mein is rajamhal mein tumhara aur alaukik nagamani ka hriday se svagat karta hoon. ” maharaj ke nirnay ka rajadarbariyon ne bhi svagat kiya. puri rajasbha kartal dhvaniyon se goonj uthi. us raat pure rajya mein dipavali manai gai, mithaiyan bhi banti gain aur jamkar khushiyan manai gain. rupavti ko rath par baithakar pure raaj mein samman ke saath ghumaya gaya. log uske rath ke aage pichhe nachte gate rahe. kai dinon tak raaj mein jashn ka mahaul bana raha.
kahte hain, yuvaraj ajatashatru us ‘nagamani’ ko hathiyana chahta tha kintu maharaj bimbisar ke samne uski ek nahin chal pati thi. isliye apni mata chhalna ke bahkave mein aakar usne maharaj ko bandi banakar karagar mein Daal diya. par isse pahle ki wo ‘nagamani’ ko apne qabze mein kar pata, wo divya ratn antardhyan ho gaya aur rupavti ne usi samay atmahatya kar li thi.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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