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रूपवती और प्रजावत्सल बिंबिसार

rupavti aur prjavatsal bimbisar

बात उस समय की है जब मगध साम्राज्य की पूरी दुनिया में तूती बोलती थी। तब पाटलीपुत्र पूरी दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। अन्य देश बड़ी उत्सुकता से मगध साम्राज्य के साथ संबंध स्थापित करने को लालायित रहते थे। घटना छठी शताब्दी के पूर्वार्द्ध की है। उस समय मगध के सम्राट बिंबिसार थे। पाटलीपुत्र में अगम कुआँ और गंगा नदी के बीच में राजमहल हुआ करता था। महल से थोड़ी ही दूरी पर केशव नाम का मल्लाह अपनी इकलौती बेटी रूपवती के साथ रहता था। रूपवती जितनी सुंदर थी उतनी ही गुणवती भी थी। केशव को कोई पुत्र नहीं था, इसलिए जब वह मछलियाँ पकड़ने गंगा नदी में जाया करता था तो रूपवती भी उसके साथ जाती थी।

जैसे-जैसे समय बीत रहा था रूपवती भी बड़ी हो रही थी और वह मछली पकड़ने की कला में भी निपुण होती जा रही थी। वह जाल फेंक लेती थी, मछली की जगह की पहचान कर लेती थी, पानी की गहराई का अंदाज़ा लगा लेती थी और हवा के रुख के अनुसार पाल को भी लहरा देती थी। समय के साथ वह इतनी समझदार हो गई थी कि उसके पिता को भी नदी में मछली पकड़ने में उससे काफ़ी मदद मिलती थी। कभी-कभी वह अपने पिता को छोड़ अकेली ही नदी में दूर तक निकल जाती थी और जाल फेंककर मछली भी पकड़ने लगती थी। इसी क्रम में उसकी एक साँप से दोस्ती भी हो गई।

एक दिन हुआ ऐसा कि मछली पकड़ते समय उसके जाल में एक साँप फँस गया। वह बुरी तरह से घायल हो गया था। भागना तो दूर की बात है, वह सरक भी नहीं सकता था। भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो रही थी। रूपवती ने उसकी मरहम-पट्टी की, उसे खाने के लिए मछलियाँ दीं और फिर उसे नदी के दह में छोड़ दिया। दूसरे दिन फिर वह उस इलाक़े में गई साँप को देखने के ख़याल से। अब वह भला-चंगा हो रहा था। उस दिन भी वह खाने को ढेर सारी मछलियाँ, मेंढक और अन्य जीव वहाँ छोड़ आई। वह अब रोज़ ही उसके पास जाने लगी और उसके लिए भोजन पहुँचाने लगी। थोड़े ही दिनों में साँप बिल्कुल स्वस्थ हो गया। दोनों में गाढ़ी दोस्ती हो गई। भोजन के बाद साँप जब फन फैलाकर नाचता तो रूपवती को बहुत ख़ुशी होती थी। नदी जल में तैरते तैरते दोनों काफ़ी दूर निकल जाते थे।

देखते-ही-देखते समय आगे निकल गया। रूपवती अब विवाह के योग्य हो गई। उसके माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। माता-पिता अत्यंत निर्धन थे। किसी तरह से बस उनका गुज़ारा चल रहा था। ग़रीबी के कारण शादी के लिए ज़रूरी पैसे जुटाने में भी वे असमर्थ थे। रोज़ मछली पकड़ने और बेचने से जो पैसे आते थे, उनसे तो घर-ख़र्च भी पूरा नहीं हो पाता था। इन सब बातों को रूपवती भी समझने लगी थी। वह उदास रहने लगी। इसी कारण वह कई दिनों तक मछली पकड़ने भी नहीं गई अपने बापू के साथ। उधर साँप भी रूपवती को पाकर चिंतित और उदास रहने लगा था। कई बार वह भी बिना कुछ खाए-पिए ही सो जाता था। इस तरह कई दिनों तक रूपवती मछली पकड़ने नहीं गई और साँप से उसकी मुलाक़ात भी नहीं हुई।

इधर केशव भी अधिक मेहनत करने के कारण अस्वस्थ रहने लगा था। घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि बिना मछली पकड़े काम चल सकता था। मजबूरन रूपवती को नाव लेकर मछली पकड़ने अकेली घर से निकलना पड़ गया। कुछ मछलियाँ पकड़ने के बाद अचानक उसे साँप की याद आई और उसे आभास हुआ कि उसका भाई कई दिनों से भूखा है और वह भोजन के लिए बड़ी बेताबी से उसकी बाट जोह रहा है। ऐसे में वह यह भूल गई कि घर में एक दाना भी नहीं है और पिता अस्वस्थ हैं। जितनी मछलियाँ उसने पकड़ी थी सारी साँप को खाने के लिए दे दी। साँप सारी की सारी मछलियाँ खा भी गया। रूपवती उसे खाते हुए देखती और मुस्कुराती रही। साँप की भूख के समक्ष वह अपनी भूख भूल गई। साँप को तृप्त देखकर वह भी तृप्त हो गई। इससे मित्रता की शुचिता और विश्वसनीयता का पता चलता है।

साँप ने अचानक अपना फन फैलाया और ज़ोरों से फुफकार छोड़ी, फिर उसने एक दिव्य मणि रूपवती के सामने उगल दी। उस मणि से एक दिव्य आभा निकल रही थी। इससे रूपवती की आँखें चौंधियाँ रही थीं। वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। तभी साँप ने कहा, “बहन! तुम घबराओ नहीं और ही किसी तरह की चिंता करो। यह नागमणि है। एक दिव्य और अलौकिक रत्न! यह तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करेगा। श्रद्धा-भक्ति से इसकी पूजा-अर्चना करना। इसे अपनी नाव में छिपा देना और घर में भी छिपाकर रखना।” इतना कहकर वह साँप अंतर्ध्यान हो गया। रूपवती मणि के साथ अपनी नाव में लौट आई।

रूपवती मणि को जब अपनी नाव के बालू में छिपाने लगी तो उसके सुखद आश्चर्य की सीमा रही। नाव में ढेर सारी मछलियाँ छल-छल कर रही थीं। वह ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट गई। घर आकर अपने माता-पिता को सारी घटना कह सुनाई। उसने हाथ जोड़कर मणि से कहा, “हे दिव्य मणि! हमारी स्थिति आपसे छिपी नहीं है। यद्यपि हमें कोई लालच नहीं है, फिर भी आप कुछ ऐसा करें जिससे माँ-पिताजी का विश्वास पुख़्ता हो सके।”

रूपवती ने जैसे ही अपनी बात समाप्त की, उसके घर की रंगत ही बदल गई। चारों तरफ साफ़-सफ़ाई। घर के सारे सामान अपनी जगह और ज़रूरत भर जितने सामान चाहिए थे, खाने-पीने और अन्य सुख-सुविधाओं के लिए, वे सभी सामान मौजूद थे। सबके सब बेहद ख़ुश हुए।

रात में ख़ुशी-ख़ुशी भोजन कर सब सोने चले गए, पर रूपवती को नींद नहीं रही थी। उसे ऐसा आभास हुआ कि यह तो राजकीय संपत्ति है। इसे राजकोष में होना चाहिए यही बात उसने सुबह अपने माँ-बाबूजी को बताई तो आश्चर्य से सभी एक-दूसरे को निहारने लगे। अंत में यही निर्णय लिया गया कि क्यों इसे हम राजा के पास पहुँचा दें। राजा प्रजावत्सल हैं। वे अपनी समझदारी से प्रजा के हित में इसका सदुपयोग करेंगे।

समय से दोनों बाप-बेटी राजमहल पहुँच गए। रूपवती ने द्वारपाल से आने का कारण बताया और राजा से मिलने की इच्छा जताई। द्वारपाल से संदेश पाकर महाराज बिंबिसार भी आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने उन दोनों को दरबार में उपस्थित करने का आदेश दिया।

महाराज बिंबिसार बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल सम्राट थे। वे प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनकी धर्मप्रियता जगज़ाहिर थी। उनके भव्य-विराट उज्ज्वल व्यक्तित्व को लेकर राज्य में कई-कई तरह की लोककथाएँ प्रचलित थीं।

राजदरबार सजा था। रूपवती अपने पिता के साथ पहले से ही वहाँ उपस्थित थी। वे दोनों राजदरबार की शोभा देखते नहीं अघाते थे। उनकी आँखें जिधर जातीं, उधर ही अटक जातीं। पर रूपवती का ध्यान तो बार-बार माथे की टोकरी में रेत से ढंकी ‘नागमणि’ की ओर दौड़ पड़ता था। दूसरे, वह हर पल राजसभा में महाराज के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी सबने महाराज का अभिवादन किया। उन्होंने राज सिंहासन पर आसीन होते ही आदेश दिया, “रूपवती और केशव मल्लाह को दरबार में पेश किया जाए।” आदेश पाते ही सिपाही ने दोनों को दरबार के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया। दोनों ने सिर झुकाकर महाराज का अभिवादन किया। तभी महाराज ने पूछा, “युवती तुम कौन हो और क्यों मुझसे मिलना चाहती थी?”

“महाराज, रूपवती ने माथे पर टोकरी सँभाले ही दोनों हाथ जोड़कर महाराज को प्रणाम किया, फिर कहना शुरू किया, “मैं आपके महल से थोड़ी ही दूरी पर स्थित माधोपुर गाँव की रहने वाली आपकी ही प्रजा हूँ। ये मेरे पिताश्री केशव मल्लाह हैं। मैं नियमित अपने पिता के साथ नाव लेकर गंगा नदी में मछली पकड़ने जाया करती हूँ।... कल नदी के दह में हरे नाग से मुझे एक मणि मिली है। यह एक दुर्लभ रत्न है और मनोवांछित फल देने में समर्थ है। इसलिए मैं चाहती हूँ कि दिव्य, दुर्लभ मणि राजकोष में रहे ताकि आप इससे मनोवांछित धन-दौलत प्राप्त कर अपनी प्रजा का कल्याण कर सकें!” महाराज ने बड़े ध्यान से रूपवती की बातें सुनीं, फिर कहा, “क्या हम अपने राजदरबारियों के साथ इस दिव्य मणि के दर्शन कर सकते हैं?”

“नहीं महाराज! यह एक अलौकिक रत्न है। केवल आप इसके दर्शन कर सकते हैं।” - और रूपवती ने टोकरी को महाराज के पास ले जाकर उन्हें ‘नागमणि’ के दर्शन करा दिए। तभी राजा ने पूछा, “लेकिन यह कैसे मान लिया जाए कि यह मणि मनोवांछित फल देती है?”

“दैवी शक्तियाँ कभी झूठ नहीं होतीं महाराज और ही आज तक मैंने झूठ बोला है आप चाहें तो अभी इसकी परीक्षा ले सकते हैं।”

“तुम ही कुछ ऐसा करो जिससे हम सबका विश्वास पुख़्ता हो सके। पूरे राज्य में सूखा पड़ा था जिससे अकाल की स्थिति बन रही थी। रूपवती ने श्रद्धा और भक्ति के साथ नागमणि से प्रार्थना की कि वह जनकल्याण हेतु पूरे राज्य में बारिश कर दें...”

फिर क्या था? हवा चलने लगी। बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे। फिर देखते ही देखते बारिश भी शुरू हो गई। उमस से लोगों को राहत मिली। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे सबके सब हर्षातिरेक में झूम उठे, गा उठे... नाच उठे। महाराज की ख़ुशी की सीमा नहीं थी। उन्होंने रूपवती को अपने पास बुलाया। प्यार से उसकी पीठ थपथपाई, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, बेटी। तुम अपने राज्य और राजा के बारे में इतना सोच सकती हो—यह मेरे लिए गर्व की बात है। तुमने अपने राज्य के लिए वह काम किया है जो आज तक किसी ने नहीं किया। आज से यह ‘नागमणि’ और ‘तुम’ दोनों राज्य की परिसंपत्ति हुई। तुम अपने माता-पिता के साथ राजमहल में ही रहोगी। यह दिव्य ‘नागमणि’ भी तुम्हारे ही पास रहेगी। राजहित में, तुम जैसा उचित समझना, उससे मनोवांछित फल प्राप्त कर राज्य का सम्मान बढ़ाना। मैं इस राज्य के प्रतिनिधि के रूप में इस राजमहल में तुम्हारा और अलौकिक नागमणि का हृदय से स्वागत करता हूँ।” महाराज के निर्णय का राजदरबारियों ने भी स्वागत किया। पूरी राजसभा करतल ध्वनियों से गूँज उठी। उस रात पूरे राज्य में दीपावली मनाई गई, मिठाइयाँ भी बाँटी गईं और जमकर ख़ुशियाँ मनाई गईं। रूपवती को रथ पर बैठाकर पूरे राज में सम्मान के साथ घुमाया गया। लोग उसके रथ के आगे-पीछे नाचते-गाते रहे। कई दिनों तक राज में जश्न का माहौल बना रहा।

कहते हैं, युवराज अजातशत्रु उस ‘नागमणि’ को हथियाना चाहता था किंतु महाराज बिंबिसार के सामने उसकी एक नहीं चल पाती थी। इसलिए अपनी माता छलना के बहकावे में आकर उसने महाराज को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। पर इससे पहले कि वह ‘नागमणि’ को अपने क़ब्ज़े में कर पाता, वह दिव्य रत्न अंतर्ध्यान हो गया और रूपवती ने उसी समय आत्महत्या कर ली।

स्रोत :
  • पुस्तक : बिहार की लोककथाएँ (पृष्ठ 140)
  • संपादक : रणविजय राव
  • प्रकाशन : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत
  • संस्करण : 2019

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