आयल मास अषाढ़
aayal maas ashaDh
(बारहमासा)
आयल मास अषाढ़ बरसा ऋतु सोच भेलै बिरहिन मनमे
सावन सर्द सोहावन बरषा झिंगुर देत झखोरा रे
भादव भवन भयावन रे एक राति अन्हारी
हमहू अभागल नारी रे बिन पुरुषक नारी
आसिन आस लगाओल रे आसो ने पूरल हमार रे
कौन बैरिन बरषा धए राखल राखल नन्द कुमार रे
कातिक कन्त दुरन्त गेल रे लिखै एको नहि पाँती
घर-घर दीप जरै छल रे जतय छल अहिबाती
अगहन मास सोहावन रे सखि सब गौना कए जाय
हमहू अभागल नारी बैसलौं देहरी झमाय
पूसक जाड़ ठाढ़ खसु रे मोरा बुते सहलो न जाय
झरको पलंगा ओछावितौं रे जौं रहितथि मुरारी
माघहि चढ़ल बसन्तहि रे पिया घर नहि आबू
एहि जीवन नहि जीयब रे मरब जहर विष खाय
फागुन फगुआ खेलैतौं रे सखि खेलै दिन राति
चैतहि चित मोरा चंचल रे फूले फूल कचनार
बैसाखक धूप मताओल रे मोरा सहलो न जाय
ऊँचका बंगला छबितौ रे तकितौं बलमजी के बारी
जैठहि मास बरसाइत रे सखि सब बड़ तर जाइ
सुकविदास गौना गाओल रे पूरल बारहो मास
- पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 369)
- संपादक : अणिमा सिंह
- प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 1993
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