ये कोई अच्छी बातें हैं भला... ज़बान के हवाले से
नईम सरमद
15 जुलाई 2026
कुछ-एक रोज़ पहले एक लौंडे को फ़ेसबुक पर ज़बान के हवाले से एक तहरीर लिखकर लोगों को लताड़ते हुए देखा। जी बेचैन हो गया देखकर। सोचने लगा कि ऐसी फ़िक्र तो ज़बान की शायद उन्हें भी न हुई होगी जो संस्कृत के मुहाफ़िज़ होने का दावा करते थे (ये और बात है कि उन्हीं मुहाफ़िज़ों ने संस्कृत को खा लिया और आजकल उन्हीं की दाढ़ से कभी-कभार कुछ रेशे संस्कृत के बरामद होते हैं। बाक़ियों को तो सिर्फ़ चचोड़ी हुई हड्डियाँ ही देखने को मिलीं।)
उसकी तहरीर पढ़कर बहुत बेचैनी इसलिए भी हुई कि ज़बान के हवाले से बात करते हुए दूसरों को औल-फ़ौल बकते हुए ये अति-उन्मादी लफ़ंडर अपनी ही तहरीर से प्रूफ़ की ग़लतियाँ तक न दूर कर सका।
उधर अब्बास ताबिश कहते हैं कि “शाइरी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो जाए” और इधर (उधर भी) ये लौंडे-लपाड़े ज़बान को ऐसे ट्रीट कर रहे हैं, जैसे ये कोई मज़हब हो और अगर ज़रा कुछ इधर-उधर कर दिया तो अल्लाह की तरफ़ से अबाबीलों का लश्कर अब आया और तब आया... और ये लौंडे या लपाड़े जिन बुड्ढों के समझाए हुए हैं, उन्हें भी कोई ख़ुदा ही समझे (अगर हो तो)। सुख़नाबाद से इन्हें ग़ज़ल के वालिद ने नंगा करके गधे पे बैठा के निकाला था और आज तक ज़िल्लत की सियाही का रंग मुँह पर कुछ-कुछ नज़र आता है जिसे नज़्म के चचा ने इनके मुँह पर मला था। सुनते हैं कि ग़ज़ल को ये लोग ज़बरदस्ती बुर्क़ा पहनाना चाहते थे और नज़्म से जब जी चाहता फ़ुहश बातें किया करते थे और जब मन करता उसे वाज़-ओ-नसीहत के पुलंदे थमा दिया करते थे।
ये कोई अच्छी बातें हैं भला...
मुझे समझ नहीं आता कि इस भीड़ को हुआ क्या है, मीर को ख़ुदा-ए-सुख़न का नाम भी इन्होंने ही दिया है (हमारे क़बीले के लोग किसी को ख़ुदा बनाने में यक़ीन नहीं करते।) और यही लोग हैं जो मीर की रिवायत (रिवायत की धज्जियाँ उड़ा देना) को पस-ए-पुश्त डालकर उसी दो सौ, चार सौ, आठ सौ साल पुरानी ज़बान के तहफ़्फ़ुज़ पर आमादा हैं। इन्हें कौन बताए या किस तावीज़ के घोल के पिलाने से इन्हें समझ आएगा कि ज़बान का अस्ल तहफ़्फ़ुज़ उसका एवॉल्यूशन है, हर साल उसमें शामिल होने वाले चंद अल्फ़ाज़ हैं, उसके मुहावरों में होने वाली तरमीम है, उसे अपने हिसाब से बरतने वाले लोग हैं।
ज़बान और मुहावरे तोड़ने-मरोड़ने के लिए ही होते हैं। यही हमारे असातेज़ा का तौर था। मीर ने ज़बान के साथ यही तोड़-फोड़ की और ग़ालिब ने भी, ज़ौक़-ओ-मोमिन ने भी और शाकिर नाजी और ज़ुहूरुद्दीन हातिम ने भी। क़ुली क़ुतुब शाह का नाम भी रख लीजे इसी फ़ेहरिस्त में और मेरे पसंदीदा शाइर मीर अनीस का इस्म-ए-गिरामी भी।
कितने ऐसे जुमले अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी अदब के शोअरा ने दुनिया को दिए जो बाद में मुहावरों और कहावतों की तरह इस्तेमाल हुए और शोअरा की हिस्सेदारी इसमें आटे में नमक जितनी है, आटा अवाम के हिस्से में है। नमक आता है सुख़नवरों के हिस्से में जिसे वो हथेली पे रख के चाटने भर से मशहूर हो जाते हैं। नमक जितनी इसलिए कह रहा हूँ कि बहुत कम लोग थे या हैं जिन्होंने ज़बान को देवी समझकर उसके आगे नतमस्तक होने के बजाय उसे अपनी महबूबा बनाया, उसे प्यार किया, उसे वो करने दिया जो वो करना चाहती थी, उस पर मर्दाना जब्र नहीं किए। ऐसे ज़बीरों से ज़बान प्यार नहीं कर पाती और उन्हें नासिख़ बना के छोड़ती है। कोई मुहब्बत करने वाला हो ज़बान से तो ज़बान उसे मीर बनाती है, नज़ीर बनाती है, कबीर बनाती है।
हाँ, तो मैं फ़रमा रहा था (अर्ज़ भी करूँगा मैं आगे चलकर) कि इसी अमल से ज़बान में इज़ाफ़ा हुआ। कुछ तोड़-मरोड़ वक़्त ने क़ुबूल की और कुछ रद्द कर दी। यही अरबी के साथ हुआ, यही फ़ारसी और यही अँग्रेज़ी के साथ। (यक़ीनन दुनिया की दीगर जबानों के इवॉल्व होने का भी यही तर्ज़ रहा होगा) ज़बान ऐसे ही इवॉल्व होती है। न उर्दू की वो शक्ल आज हम पाते हैं जो हज़ार साल पहले थी और न वो जो तीन सौ साल पहले थी। यक़ीनन हमारे बाद वाले ऐसी उर्दू न बोलते होंगे, जिसमें हम कलाम करते हैं।
हम उस दौर में हैं जहाँ किताबें ही किताबें हैं। हम लफ़्ज़, बल्कि हर्फ़ की तारीख़ पढ़ना चाहें तो वो भी दस्तयाब है (मुश्किल से या आसानी से) हम जानते हैं कि कैसे इशारे तसावीर में और तस्वीरें हुरूफ़ में बदलीं (इवॉल्व हुईं)। हम जानते हैं कि कैसे मुहावरे बदले...
ये बदलाव अवाम ने किए, शोअरा ने क़ुबूल किया इन तब्दीलियों को और अपने कलाम में उतनी ही फ़राख़दिली से जगह दी जैसे अवाम ने अपने रोज़मर्रा की ज़बान में। मीर दिल्ली की ज़बान को वेलिडेशन न देते अपने ग़ैर-मामूली सुख़न से तो इस ज़बान को भी कोई छुटभइया नक़्क़ाद का खोदा ग़ैर-फ़सीह और फूहड़ ज़बान कहता मिल जाता। जैसे ये किसी लखनऊ की ज़बान हो (हाँ, किसी लखनऊ की ज़बान)। लखनऊ की ज़बान से याद आया की एक नव्वाब साहब मुझे एक रोज़ बता रहे थे ज़बान के बारे में कि “ज़बान हो तो ऐसी शाइस्ता सरमद मियाँ की गाली भी गिलौरी जैसी लगे...” फिर बताने लगे कि हमारे यहाँ जब किसी को गाली देनी होती है तो हम कहते हैं कि “मियाँ आप तो बालाई दर्जे के आदमी हैं।”
मैंने पूछा, “ये कौन-सी गाली है?” तो फ़रमाया कि “इसका मतलब है कि आप रंडी के बच्चे या भड़वे हैं।”
मैंने फिर अर्ज़ किया कि “तफ़सील से बताएँ।”
तो फरमाया कि “बालाई दर्जा यानी कोठा और कोठे का आदमी भड़वा ही तो होता है।”
जी तो चाहा कि कम से कम दो चार गिलौरियाँ नवाब साहब को देकर रुख़्सत हो लूँ, लेकिन ज़ब्त से काम लिया और चुपचाप निकल आया।
मैं उसी दिन समझ गया कि लखनऊ वालों से फूहड़, नक़ली और घटिया ज़बान तो उन पंजाबियों की भी नहीं है जो सरकारी लट्ठ के ज़ोर पे उर्दू बोलते पाए जाते हैं।
ख़ैर, मुहावरे के बारे में कुछ बात चल रई थी...
हम जानते हैं कि इन मुहावरों का अस्ल क्या था और राइज क्या है और ये मुहावरे और कहावतें हमारे असातेज़ा के यहाँ मुस्तअमल भी हैं।
हम जानते हैं कि कैसे अल्फ़ाज़ एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े के सफ़र में यक्सर बदल जाते हैं, एक शह्र से दूसरे शह्र पहुँचते हैं तो शक्ल बदल जाती है, एक समय से दूसरे समय में मुंतक़िल होते हैं तो रूप बदल लेते हैं। जैसे यौवन जोबन हो जाता है, अयोध्या अजोध्या हो जाता है, विद्या बंगाल पहुँच के बिद्या, स्कूल पंजाब पहुँचकर सकूल, खंड-कैंडी बनता है, मुश्क-मस्क हो जाता है, अकैडमी से अकादेमी या अकादमी बनती है, हॉस्पिटल से हस्पताल या अस्पताल, साँय से साँझ या शाम, टेक्निक से तकनीक, जगन्नाथ से जगरनॉट और ये फ़ेहरिस्त इतनी लंबी है कि चार-छह नईम सरमदों की उम्रें लग जाएँगी अगर सारी ज़बानों से तमाम अल्फ़ाज़ यक्जा किए जाएँ तो...
मुहावरों की भी ख़ूब मिसालें हैं, जैसे : शेर को सवा शेर मिलना, जबकि मुहावरे में ‘सेर’ है शेर नहीं। लेकिन राइज क्या है, हम ये जानते ही हैं।
जैसे ख़ुदा मेह्रबान तो गधा पहलवान, जबकि दुरुस्त लफ़्ज़ है—‘गदा’।
जैसे अक़्ल बड़ी या भैंस में भैंस है ही नहीं, बल्कि वयस (उम्र) है।
सादी ने भी कहा ही है इसी हवाले से :
“तवंगरी ब-हुनर अस्त, न ब-माल
बुज़ुर्गी ब-अक़्ल अस्त, न ब-साल।”
साम दाम दंड भेद में दाम है ही नहीं, बल्कि दान है।
झक मारना में झक जिसका शुद्ध रूप ‘झष’ है, जिसका अर्थ मछली होता है... यह कैसे और कब और कितने लंबे सफ़र के बाद बदला होगा!
बहरहाल, लौंडे ने तहरीर में अपने असातेज़ा का भी ख़ूब हौसला बढ़ाया है। अल्लाह ही जाने कौन बशर है ये आदमी (या आदमियों की जमात) जो उस्ताद रहे इन बालकों के और जिन्होंने ये कहा कि मुहावरों के साथ छेड़-छाड़ न करनी चाहिए या ज़बान को यूँ कर लो और वूँ कर लो या ये खुरदरा लफ़्ज़ ज़बान से बाहर कर दो और वो चिकना वाला अंदर ले लो... लेकिन यक़ीनन जो भी होंगे निरे अनपढ़ और अहमक़ रहे होंगे और इनका ताल्लुक़ पढ़ने-लिखने या ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने से हरगिज़ न रहा होगा, अगर होता तो ऐसी बातें न करते। (लौंडे की तहरीर और उस पर आए कमेंट्स देखकर तो यक़ीन और भी पुख़्ता हो गया।)
बाले ने शिबली की सना-ख़्वानी भी की थी तहरीर में और बताया था कि कैसे सहरा और जंगल के अलग-अलग इस्तेमाल से फ़साहत की टाँग तोड़ी जाती है।
जाने कैसे शिबली हुज्जत हो गए, जबकि अनीस-ओ-दबीर का मवाज़ना तक ईमानदारी से न कर सके। ऐसे बेईमान शख़्स की किसी बात का क्या ऐतबार जिसने ऐसी ज़ख़ीम किताब लिख मारी सिर्फ़ दबीर को ज़ेर करने के लिए और अनीस को उनसे बड़ा शाइर साबित करने के लिए। (हालाँकि अनीस यक़ीनन दबीर से बड़े शाइर हैं और शिबली उनकी क़सीदा-ख़्वानी न भी करते तब भी वो बड़े ही रहते, लेकिन जिस तरह अनीस के फ़साहत-ओ-बलाग़त से लबरेज़ कलाम के सामने दबीर का क़दरे मामूली कलाम जानबूझ के रखा है, वो नज़र-ए-सानी हर एक पढ़ने वाले की चाहता है।)
शिबली बेचारे को तो ये तक नहीं पता था कि जंगल संस्कृत के मूल शब्द जाङ्गल (जाङ्गल) से विकसित होकर बना है और इसका मतलब होता है वन या घने पेड़ों वाला इलाक़ा और सहरा अरबी का शब्द है, जिसका मतलब होता है मरुस्थल, रेगिस्तान, बियाबान और वसीअ मैदान। दोनों शब्दों के मानी ही अलग हैं। शिबली को लगता है कि दोनों के मा’नी एक हैं। अब ऐसे बूढ़ों की क्या इज़्ज़त की जाएगी।
मुझे याद आता है कि एक मर्तबा और दो चार साल पहले एक ख़ातून को इसी तरह की ज़बानदानी का कीड़ा काट गया था। फ़रमाती थीं कि फ़लाँ शख़्स बड़ा जाहिल है कि अल्फ़ाज़ की जगह ‘अल्फ़ाज़ों’ इस्तेमाल कर रहा है।
अमाँ करने दो बहन कर रहा है तो। क्यूँ बेचारे की गर्दन मार रही हैं आप...
हाँ, ग़लत है लुग़त के एतिबार से। हाँ, फ़सीह नहीं मालूम पड़ता। हाँ, नहीं बोलना चाहिए किसी पढ़े-लिखे को ऐसे, लेकिन क्यों नहीं बोलना चाहिए? क्या ये सवाल नहीं है? इसका जवाब ये तो नहीं हो सकता कि ज़बान ख़राब हो रही है या हो जाएगी। अमाँ ज़बान है ये ज़बान; ये हिंदुस्तान की हालत नहीं है कि जो भी सरकार आएगी, जितना चाहेगी ख़राब कर के चली जाएगी।
हम जानते हैं कि अक्सर औक़ात ऐसे ग़लत अल्फ़ाज़ इस दर्जा राइज हो जाते हैं कि ग़लत-उल-आम का दर्जा पा लेते हैं। मसलन :
क़ायम (ग़लत-उल-आम) = क़ाइम (दुरुस्त लफ़्ज़)
दोयम (ग़लत-उल-आम) = दोव्वुम (दुरुस्त)
सही (ग़लत-उल-आम) = सहीह (दुरुस्त)
रात (ग़लत-उल-आम) = रात्रि (दुरुस्त)
बरस (ग़लत-उल-आम) = वर्ष (दुरुस्त)
अनेकों, ढेरों, कइयों, बहुतों और इस जैसे दीगर अल्फ़ाज़ अपने आपमें इलाक़ाई ख़ूबसूरती और रचाव लिए हुए होते हैं और ये ख़ूबसूरती इन्हें उन लोगों ने बख़्शी है जो कसरत से इन्हें इस्तेमाल करते हैं। किताब और लुग़त इनके साथ शायद वफ़ा नहीं कर सकती। इन अल्फ़ाज़ को ‘ग़लत’ के ज़ुमरे में रखकर हम कबीर, रैदास, जायसी और ख़ुसरो जैसे कितने ही लोगों को ग़लत ज़बान बोलने वालों के दायरे में ला खड़ा करेंगे।
हम जानते हैं कि ‘ग़लत-उल-आम’ का मतलब है ऐसे अल्फ़ाज़ या मुरक्कबात जो अस्ल में किताब या डिक्शनरी के एतिबार से तो ग़लत हैं, लेकिन अवाम उन्हें दुरुस्त समझती और बरतती है।
इसी वजह से शोअरा और नस्र-निगार उन अल्फ़ाज़ को अवाम की नज़र से देखते हुए (न कि लुग़त के एतिबार से) क़ुबूल करते हैं और वैसे ही बरतते हैं जैसे उन्हें आम लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। ज़बान के हवाले से बात करते हुए ‘ग़लत-उल-आम’ और ‘ग़लत-उल-अवाम’ की तफ़रीक़ का ख़याल रखना यक़ीनन ज़रूरी है।
मैंने अपनी गुफ़्तगू में ग़लत-उल-आम और ग़लत-उल-अवाम का ज़िक्र किया है। यानी वो अल्फ़ाज़ जो आम जन बोल रहे थे और भाषा जानने का दावा करने वालों ने उन्हें क़ुबूल कर लिया और वो अल्फ़ाज़ जिन्हें अवाम बोल रही थी और भाषा जानने वालों ने उन्हें क़ुबूल नहीं किया।
लेकिन ये भी हुआ ज़बान के साथ कि जो अल्फ़ाज़ असातेज़ा ने ग़लत-उल-अवाम कहकर टकसाल बाहर किए उन्हीं अल्फ़ाज़ को अवाम ने इस कसरत से इस्तेमाल किया कि वो ग़लत-उल-आम के दायरे में आते चले गए और ज़बान के ठेकेदारों को न सिर्फ़ मुँह की खानी पड़ी, बल्कि उन अल्फ़ाज़ और मुहावरों को क़ुबूल भी करना पड़ा।
बहुवचन पर बहुवचन लगाना और शब्दों के रूप बदलना कुछ हद तक अलग चीज़ें हो सकती हैं, लेकिन देखा जाए तो इतनी अलग भी नहीं हैं।
सबसे अहम बात यह है कि ज़बान कौन बनाता है! ज़बान बनाती है अवाम। कई सालों के बर्ताव के बाद एक ज़बान शक्ल पाती है। गली-मुहल्ले, बाग़-चौबारे, महले-दुमहले, खेल के मैदान, श्मशान, दुकान, हलवाई, नानबाई, फ़क़ीर उसे बनाते हैं... वह लोगों के आँगन में बनती है।
भाषाविद् या ज़बानदाँ उसे समझता है या ऑब्सर्व करता है। ज़बान बनाने में उसका कोई ख़ास योगदान नहीं होता। शाइर, नस्र-निगार, अदीब जैसे लोग इलाक़ाई बोली से फ़ायदा उठाते हैं, इलाक़ाई बोली को शाइरी में बदल के शाइरी में नयापन पैदा करते हैं। (मैं अभी मीर और उन जैसी समझ और सलाहियत वालों के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ।) और भाषाविदों की भीड़ तो महज़ उनकी एंग्ज़ायटी है। ज़बानदाँ अपनी ज़िंदगी के दस-बीस साल देकर ज़बानदाँ बनता है और अवाम और ज़बान का ताल्लुक़ सदियों का होता है। भाषाविद् बुढ़ापे में जाकर यह बात समझ पाता है कि अवाम और भाषा के राजमहल का वो एक अदना सा ख़ादिम है जो लेखा-जोखा रखने का काम करता है, बस!
आज तक मैंने न सुना और न पढ़ा कि डिक्शनरी देखकर लोगों ने बोलना सीखा, हाँ ये ज़रूर देखा/सुना कि लुग़त बनाने वाला चप्पे-चप्पे की ख़ाक छानता है और पता करता है की फ़ुलाँ लफ़्ज़ फ़ुलाँ इलाक़े के लोग कैसे बोलते हैं।
और एक बात, जिसे दोहरा रहा हूँ, ज़बान का इर्तिक़ा अवाम करते हैं, समय करता है। अहमक़ उस इर्तिक़ा को नज़र-अंदाज़ करते हैं और ज़बान को जानने समझने वाले उसका इस्तक़बाल करते हैं। उसे इस्तेमाल करते हैं।
ज़बान की हैसियत और उसका वक़ार अपनी जगह है, लेकिन कोई भी अच्छा शाइर ज़बान (उस ज़बान का जो उस पर थोपी गई हो) का ताबेदार नहीं होता—चाहे वो मीर हो, कबीर हो, मुक्तिबोध हो, शेक्सपियर हो, नज़ीर हो या ख़ुसरो। ये सब के सब वो लोग थे जिनके सामने ज़बान हाथ बाँध के खड़ी होती थी और अर्ज़ करती थी :
ज़ुल्फ़ें मेरी बिखरा दे तू
आँचल मेरा लहरा दे तू
एंड डू व्हाटएवर दा फ़क यू वांट टू डू विथ मी।
डू इट हार्डर, आई विल नेवर गॉन्ना डाई।
यू विल...
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