विराम-चिह्नों की क्रांति और एम डैश की सत्ता का अंत
मयंक जैन परिच्छा
23 अप्रैल 2026
हाल ही में मेरी मुलाक़ात एम डैश से हुई। बेहद परेशान, दुखी, चिंतित और बेचैन अवस्था में बैठा था। चेहरा भावप्रवण, अश्रु-भरे नयन, जगत के उलाहनों से क्षुब्ध। ख़ुद को भाषा और लेखन के प्रिय साथी से सिर्फ़ साधारण विराम-चिह्न बन जाने का दुख उसे भीतर तक कचोट रहा था।
एम डैश ने कई वर्षों तक राज किया। कॉमा, अर्ध-विराम, यहाँ तक कि पूर्ण-विराम की जगह भी अक्सर उसी ने ले ली। भाषा को सरल बनाना हो या उसे शैलीगत पच्चीकारी से सजाना, वह हर बार एक अडिग और कुशल सेनापति की तरह सामने आया। कभी वही था जो कॉमा को बेकार, अर्धविराम को संदिग्ध और पूर्णविराम को लगभग अशिष्ट घोषित करता था। वाक्य जहाँ साँस लेना चाहते थे, वहाँ वह घुस जाता था—ज़िद्दी, आत्ममुग्ध नॉर्सिसिस्ट की तरह।
सरलता चाहिए? एम डैश। गंभीरता चाहिए? एम डैश। अर्थ नहीं सूझ रहा? दो एम डैश ठेल दो। किसी भी कथन के भीतर अनेक अर्थ-स्तर छिपे होते हैं। भाषा उन्हें समय देती है। अर्थ अपनी एक लय में खुलते हैं, जैसे समझ धीरे-धीरे आकार लेती हो। उस लय को थामने, उसे दिशा देने का सबसे सहज औज़ार कभी एम डैश हुआ करता था।
...लेकिन अटूट सफलता अक्सर दूसरों की आँखों में खटकती है। यहाँ भी यही हुआ है। लेखकों और संपादकों का प्रिय एम डैश—अपनी धार और क़ीमत खो बैठा। लोकप्रियता का यह बोझ एम डैश को डुबोते जा रहा है। लेखकों को अपनी भाषा, उनकी ख़ुद की भाषा सिद्ध करने के लिए कई प्रकार के विराम चिह्नों में विचरण करना पड़ रहा है।
पहले तो कभी किसी लेखक को वाक्य ख़त्म करने की इतनी जल्दी कभी न थी, लेकिन अब है। डर भी जायज़ है—कहीं उनकी भाषा मशीनी न समझ ली जाए। लेखकों को डर है, एआई की छाप उनकी लिखाई पर न पड़े।
विराम-चिह्नों की लाल क्रांति (इसके रंग पर थोड़ा संदेह है, लाल है या पीली/स्लेटी। पीली या स्लेटी होगी जितना मेरा अनुमान है) एम डैश को ख़त्म करती चली गई। विराम-चिह्नों ने नारा दिया कि हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, बस हमारी ज़ंजीरें हैं। हम विराम-चिह्न रूपी मज़दूरों को यूनाइट होना होगा, लेकिन इस क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि विराम चिह्नों ने उत्पादन के संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने के बजाय—भ्रष्टाचार के माध्यम से—पूँजीपतियों से एआई बनवा लिया और एम डैश का मशीनी भाषा में बहुतेरा उपयोग करवाया, जिससे उसकी क़ीमत घटती चली गई।
विराम-चिह्नों की यह क्रांति, मार्क्सवाद का सबसे विकृत रूप रही है; जिसमें विराम-चिह्न जीवन भर मज़दूर पहचान में रहे और जब एम डैश की सत्ता ख़त्म करने की बारी आई तो ख़ुद पूँजीपति के साथ हो लिए। दुख की बात है, लेकिन बहुत साधारण है। अँग्रेज़ दार्शनिक थॉमस हॉब्स सही ही कहते थे, मानव-चरित्र (मैं विराम-चिह्नों को मानव मान रहा हूँ) भय, प्रतिस्पर्धा, अविश्वास, सत्ता की चाह, एक-दूसरे के साथ संघर्ष ही है। मार्क्स यह बात भूल गए कि मज़दूर भी इंसान हैं और पूँजी सत्ता पाने का सबसे बड़ा हथियार। सत्ता बेईमानी को प्रोत्साहित करती है।
एम डैश ने मुझसे कहा, “ऐसे जीवन से मृत्यु भली...”
“काहे मरोगे! इत्ते सुंदर तो हो...”
“सुंदर! हूह! कटाक्ष करो औरों पर, हमें माफ़ करो...” रूठे हुए स्वर में बोला और रोने लगा।
“अरे सही कह रहे! हम तुम्हारे बिना लिख नहीं पाते -- तुम्हारे बिना जी मचलता है। तुम्हारे न होने से दिल बैठ जाता है!”
एम डैश उठ खड़ा हुआ और एक दे मारा। हम गाल पर हाथ लगाए देखते रहे और दबी आवाज़ में पूछे, “कोनो गलती हो गया?”
एम डैश, मुँह सिकोड़े, हाथ अमिताभ बच्चन के जैसे आगे किए मुझसे बोला, “ओह दो कौड़ी के लेखक, तेरी भैंस भाग जाय साले, तुझे दस्त लगें और पेंट का नाड़ा ना खुले, तू मंच पर बोल रहा हो और छींक आ जाए, सारी नाक से तेरा चेहरा सज जाए, तेरी प्रेमिका को तेरे दुश्मन से प्रेम हो जाए।”
मैं डर के मारे कुछ बोला नहीं। फिर थोड़ी देर बाद रुदन स्वर में ही एम डैश ने बात को आगे बढ़ाया, “तेरे जैसे लेखकों की वजह से ही मेरी सत्ता गई है।”
“मैंने क्या किया?”
“तुम अपनी बात कहने के लिए मेरा विकृत रूप उपयोग कर रहा है, तुझे शर्म आनी चाहिए। एक समय था जब वक़्त-वक़्त पर मेरा उपयोग करके हीरो बनता था।”
“मैं और तुम्हारा विकृत रूप? कब, कहाँ?”
“ऊपर दो हायफन जोड़कर जो एम डैश तूने बनाया, मैं सब देखता हूँ। साले! एक घूसे में मुँह सीधा कर दूँगा... तू खेत में हगने जाए, तेरा पानी ख़त्म हो जाए, तेरे पिछवाड़े पर कोबरा डस जाए।”
“इतनी बद्दुआ और गालियाँ आप दे रहे हो, मैं व्यथित हो गया हूँ...” मैंने दुख के स्वर में कहा।
“मुझे लगता है पिछले जन्म में मैंने किसी ऋषि मुनि की तपस्या भंग की होगी और उन्होंने मुझे शाप दिया कि कलयुग में एक समय आएगा, जब अच्छे लेखक मेरा उपयोग करने से घबराएँगे और मुझे हर कोई सस्ते में उपयोग कर रहा होगा।” एम डैश ने उसी उदास भाव से कहा।
“दुख हुआ, एम डैश जी, समोसा खाओगे -- मस्त हरी चटनी के साथ?” मैंने पूछा।
और उसके बाद एम डैश ने जो दौड़ाया है मुझे। मैं 70 किलो से 65 किलो हो गया।
कुंठित हो बैठा है एम डैश, अब एआई ने उपयोग कर-कर के उसको सस्ता बना दिया तो इसमें मेरा क्या दोष!
मैंने सुना, एम डैश हर उस लेखक को रेल दे रहा है जो एम डैश की जगह दो हाइफ़न एक साथ जोड़ के एम डैश बना लेते हैं। कुछ लेखक एम डैश के डर से एन डैश को एम डैश बना कर उपयोग कर रहे हैं।
कोने में खड़े विराम-चिह्न सबका आनंद ले रहे हैं और अर्धविराम तो नारा भी लगा रहा, “एम डैश तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है।”
अर्धविराम पता नहीं किस घमंड में है! कोई उपयोग करता नहीं था, आज हीरो बना घूम रहा है।
एम डैश को मज़दूर रूप में देखना पड़ रहा है। सच में, कलिकाल है।
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