वसंत का प्रताप
आशीष कुमार शर्मा
10 अप्रैल 2026
वसंत। अहा! शब्द कान के पर्दों पर पड़ते ही हृदय को आह्लादित कर देता है। शरद की तीक्ष्ण शीतलहर प्रस्थान कर चुकी है। ग्रीष्म के आगमन की आहट भी अभी निकट नहीं है। न ठिठुरन है, न पसीने से भीगता बदन ही। अलाव के ताप की इच्छा नहीं रही और लू से देह तपना शुरू अभी नहीं हुआ है। खेत-खलिहान हरी चादर उतारने को तैयार हैं। स्वर्णिम बालियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। सब आनंदमय है। भाँति-भाँति के कुसुमदल वातावरण को मादक बनाए दे रहे हैं। भिन्न-भिन्न कोटि के फल द्रुमदलों पर लदकर उन्हें विनम्र किए जा रहे हैं। सरसों, गेंदा, सेमल, टेसू, अमलतास, कचनार आदि पुष्पगुच्छ, आम्रमंजिरियों के साथ वसंत को सुशोभित कर रहे हैं। क्या ही कहने!
भारतीय ज्ञान परंपरा [इंडियन नॉलेज सिस्टम] में वसंत पर क्या कुछ नहीं लिखा गया। क्या कुछ है जो मनीषियों ने, कवियों ने, रचनाकारों और विचारकों ने वसंत की प्रशस्ति में नहीं कह डाला। प्रतीत होता है कि कुछ भी टिप्पणी करना कदाचित अतिरेक होगा। ऋग्वेद में सृष्टि को यज्ञ मानकर वसंत को उसका घी कहा गया है। रामायण में राम वसंत को मन्मथस्य वर्धनम्, कामदेव की शक्ति की वृद्धि करने वाला कह रहे हैं। वसंत के साक्षात्कार से विरह की पीड़ा से विह्वल हो जा रहे हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान स्वयं को ऋतुओं में कुसुमाकर कहकर संबोधित कर रहे हैं। महाकवि कालिदास तो फिर ‘ऋतुसंहार’ ही रच दे रहे हैं। वसंत को वह कामदेव का योद्धा बता रहे हैं, जो प्रकृति पर विजय को आतुर है।
कितनी ही कविताएँ एवं गद्य आदि ऋतुराज को समर्पित कर के रचे गए। परंतु ये अत्यंत सहज ही है। वसंत का समय ही कदाचित वर्ष में ऐसा है, जो सभी ज्ञानेन्द्रियों को प्राकृतिक भेंटों से संतुष्ट करता है। सुमधुर फल, मनोहर पुष्प, सुरम्य खग-कलरव, त्रिबिध समीर और देह को कष्ट न देने वाला वातावरण। सभी तो उपस्थित है वसंत में। इसी कारण यह ऋतु कामोत्तजना का काल भी है। मलयजगंध युक्त पवन कामोद्दीपक मानी गई है। जीव-जंतु तो क्या पेड़-पौधे भी प्रेममग्न हो उठते हैं।
वसंत के ये सारे वर्णन कुछ-कुछ किसी सुदूर स्मृति का अंश मात्र हैं। जो बीत गई, सो बात गई। ये सब तो बीत गया। ये तो अब कल की बात है। अब तो समय बदल गया है। कल के रोज़ जब रचनाकार स्मृति को भोगते हुए रचना का मंतव्य बनाएँगे तो वसंत को कैसे याद करेंगे? पल्लवित वसंत की अनुपस्थिति में चिंतालीन मैं, विश्वविद्यालय में भटकने लगा। भटकते हुए मेरा साक्षात्कार हर विभाग के बाहर लगे हुए अनगिनत पोस्टरों से होता जा रहा था। कितने संस्थान, कितने संकाय, कितने ही विभाग। सब पोस्टरों से रंगे हुए। हर नुक्कड़-चौराहे पर बैनर लगे हुए हैं। हर व्हाट्सएप स्टोरी पर पोस्टर वसंत के पुष्पगुच्छों जैसे सुशोभित हो रहे हैं। हर स्थान पर कॉन्फ़्रेंस हो रहा है। मुझे ज्ञात हुआ कि मधुमास का कामोत्तेजित काल और भारतीय अकादमिया का कॉन्फ़्रेंस काल सर्वांगसम हैं। संरेखित हो रहे हैं। परस्पर अलाइन कर रहे हैं। वसंत की मेरी चिंता का बोझ कुछ जाता रहा।
मार्च की आख़िरी तारीख़ वित्तीय वर्ष की अवसान तिथि होती है। 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस के पावन अवसर पर वित्तीय वर्ष ‘न्यू डे, न्यू मी’ की घोषणा करता है। दूसरे शब्दों में, 31 मार्च तक जितना बजट निपटाया जा सकता है, निपटाया जाता है। अगले दिन से सब कुछ नया तैयार होता है। इस कारण वसंत ऋतु में यह मार्च कॉन्फ़्रेंस काल होता है। देश भर के विभिन्न संस्थान अपने अकादमिक और शोधपरक उत्तरदायित्व से उद्दीपित हो उठते हैं। अनुसंधान और अन्वेषण की अदम्य उत्तेजना जागृत हो उठती है। वसंत 21वीं शताब्दी के विकसित भारत की स्मृतियों के निर्माण को लेकर संतुष्ट प्रतीत होता है। अहा! क्या सुखद दृश्य है।
खग कलरव अब बोझिल हुआ। अब विश्वविद्यालयी जीवन में व्यस्त विद्यार्थियों-शोधार्थियों के दल कलरव कर रहे हैं। लड़के रात भर जागते हुए ‘पोस्टर बॉय’ के रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र पोस्टर चेप रहे हैं। चतुरंगिणी सेना तैयार की जा रही है। कन्याएँ मनोहर अल्पनाओं का, रंगोलियों का, बेलबूटेदार चित्रकारियों का सर्जन कर रही हैं। अनिद्रा मिश्रित बेगारी के कारण इन सबकी आँखें बोझिल हुई जा रही हैं। परंतु वे मादक दिखाई पड़ती हैं। हम सर्वसम्मति से वसंत पर इसका दोषारोपण कर सकते हैं।
ये आधुनिक खगवृन्द अब अपने प्रदर्शन पर ध्यान देंगे। अपने परों को प्रसारित करना होगा। लड़के कोटि-कोटि के कुर्ते दर्जी को सिलने को दे आए हैं। कुछ देशद्रोही हैं। कोट पहनेंगे। कुछ गांधी के उपासक हैं। वे लोग खादी, या कुछ नहीं तो नेहरू जैकेट पहनेंगे। नवाचारी इसे सदरी कहेंगे। नेहरू ने जैकेट कौन-सा अपने घर बनाई थी? कुछ हज़ामत की दुकानें अच्छा व्यापार कर रही हैं। नाई, दर्जी, कपड़े के व्यापारी किसी देवता को रह-रहकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं। ये देवता निश्चित ही वसंत ही होगा। बालिकाएँ नई साड़ियाँ ख़रीद रही हैं। पीको, फ़ॉल, अस्तर सबका बाज़ार उछल गया है। ब्यूटी पार्लर संचालिकाएँ एक्सट्रा-टाइम कर रही हैं। सब वसंत का प्रताप है। बाज़ार में रोचक से रोचक जूट के बस्ते चले आ रहे हैं। इंस्टाग्राम पर देश का भावी बुद्धिजीवी वर्ग आत्मविश्वास के साथ उतरा रहा है। हे ऋतुराज! तेरी कोटि-कोटि जय हो।
सारे विभाग बंदनवारों से सुसज्जित हैं। ताजा आम्रपत्रों से बने बंदनवार। सारी की सारी अमराई आज तो विभाग में उतर आई है। भाँति-भाँति के पुष्प लगे हैं। गुलदस्ते तैयार हैं। ऐसा जान पड़ता है कि त्रिकालदर्शी ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो इस सुखद काल के ज्ञान के कारण ही प्रकृति को पुष्पों से, पत्रों से परिपूर्ण बनाया। ताकि आमंत्रित बुद्धिजीवियों के स्वागत में कमी न रहे।
एक विभाग में फलाना संस्थान के फलाने विभाग के फलाने जी आ रहे हैं। उनका स्वागत होना है। फलाने जी भाईसाहब बहुत विद्वान हैं। दूसरे विभाग में लाल पतंगे लग गए हैं। लाल झंडे तैयार हैं। सुबह से केवल माचा लाते पीकर कॉन्फ़्रेंस में समर्पित एक युवती चिंतित है कि सब ईको फ़्रेंडली है कि नहीं? कॉमरेड फलाने आकर महत्त्वपूर्ण व्याख्यान देंगे। इस वसंत काल में मदमस्त जीव-जंतु ज्यों उपवन में अपने-अपने क्षेत्र में मस्त रहते हैं। उसी प्रकार ये अकादमिक जीव-जगत अपनी सीमाओं में आनंदित हैं।
बहरहाल, व्याख्यान भी चल रहे हैं। एक स्थान से चोरी किया तो चोरी है; दस स्थान से किया तो शोध। शोध के निमित्त नव देवताओं की स्तुति शुरू होती है। चैटजीपीटी, जेमिनाई, परप्लेक्सिटी आदि पूजे जा रहे हैं। इसी बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नैसर्गिक मूर्खता परस्पर सम्मुख हैं। द्वंद्व शुरू हो चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नैसर्गिक मूर्खता के समक्ष इस मल्लयुद्ध में निर्बल दिखाई पड़ रही है। उसका तो मल ही छूटा जा रहा है। एआई पराजित हुआ जाता है। परमात्मा प्रसन्न है कि एआई की भावनात्मक बुद्धि का विकास नहीं हुआ है। अन्यथा वह स्वयं के अस्तित्व की प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़ा करता, पर इसके लिए विवेक चाहिए। जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पास नहीं है। पर वो विवेक तो प्राकृतिक मूर्खता के निकट भी अनुपस्थित है। ख़ैर हम इसे मादक स्थिति में होने के कारण भी मानेंगें। इसके लिए हम पुनः सर्वसम्मति से वसंत को दोष दे सकते हैं।
व्याख्यानमाला का प्रारंभ होता है। फलाने जी चौपहिया वाहन के काफ़िले से आए हैं। फलाने जी वाहन से उतरते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि स्वयं कामदेव अपने रथ से उतर रहे हैं। पुष्पगुच्छ भेंट किया जाता है। तस्वीरें, अभिवादन, कलरव। मधुमास का सुरम्य दृश्य प्रकट होता है। पुष्पवर्षा हो रही है। स्वर्गलोक से कदाचित। पुष्प की अभिलाषा पूर्ण हुई। फलाने जी अति महत्त्वपूर्ण विचारक हैं। विकिपीडिया पेज का वाचन कर रहे हैं। अति उत्कृष्ट व्याख्यान सम्मुख रखा गया है। श्रोता समझ नहीं पा रहे हैं। श्रोता स्वयं को अबोध मान चुके हैं। प्रायश्चित के लिए इंस्टाग्राम रील्स स्क्रॉल कर ले रहे हैं। पीछे एक प्रेमी युगल सेल्फ़ी ले रहा है। सब मदमस्त हैं। वाचक, श्रोता, आयोजक। सब मदमस्त। वसंत है न। व्याख्यान समाप्त हुआ। तालियों की गड़गड़ाहट। अहा! क्या सुभग दृश्य है। व्याख्याता के चेहरे पर विजयी मुस्कान। उन्होंने मंच से प्रकृति पर विजय प्राप्त की। अरे! ये तो साक्षात कामदेव ही हैं।
श्रोतागण कॉन्फ़्रेंस की सार्थकता पर विमर्श कर रहे हैं। व्याख्यानमाला समाप्त हुई। भोजन का समय आ गया। श्रोतागण गंतव्य पर पहुँचते हैं।
आगंतुकों की संख्या श्रोताओं की संख्या से अधिक हो गई। आयोजक भयभीत हैं। भोजन सामने है। तीन प्रकार की सब्ज़ी, दाल, पापड़, रायता, तंदूरी बटर रोटी, ज़ीरा राइस, अचार और छैना। तहरी खाकर दिन व्यतीत करने वाला शोधार्थी प्रसन्न है। कॉन्फ़्रेंस सार्थक रहा। अकादमिक जगत धन्य हुआ। कुछ महाराज नल के वंशज, पाकशास्त्र के ज्ञाता भी सम्मिलित हैं। पनीर मुलायम नहीं है। रोटी कच्ची है। दाल में नमक अधिक है। चाचा की बारात में आए हैं। भूल गए हैं। कदाचित उत्तेजना के कारण मस्त हैं। वसंत है न। कल फिर आना है।
मार्च ख़त्म हो गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की गाय को कुछ सैकड़ा करोड़ से दुह लिया गया। अभी वो ग्याभन थी। अप्रैल आ गया है। नए बजट के बछड़े का जन्म हुआ है। अगले मार्च में फिर उसके थनों को निचोड़ा जाएगा। पेड़ कट जाएँ। पक्षी विलुप्त जाएँ। तमाम पुष्प, फल, पेड़ नष्ट हो जाएँ। बाग़-बग़ीचे बंजर हो जाएँ। पर हम प्रसन्न हैं। कलरव बना रहेगा। विश्वविद्यालयी खगवृन्द बने रहेंगे। उद्दीपन बना रहेगा। उत्तेजना बनी रहेगी। नववसंत की स्मृतियाँ सुरक्षित रहेगीं। भारतभूमि की जय हो। विश्वगुरु अकादमिया की जय हो। रतिनाथ की जय हो। मधुमास वसंत की जय हो।
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बेला पॉपुलर
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