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तू साडे नाऴ वरत के देख

मेरे बारे में मेरे साथियों की राय बहुत हास्यास्पद है। यात्राओं की योजना पर तो और भी ज़्यादा। मैं जब भी आगे बढ़कर योजना बनाता हूँ तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते, इसके बावजूद मैंने पंजाब यात्रा की योजना बना ली। पंजाब मैं अरसे से जाना चाहता था, लेकिन वहाँ मेरा कोई मित्र नहीं था और बिना मित्र के मैं ज़्यादातर कहीं अकेला जाने के पक्ष में नहीं हूँ। इधर रेख़्ता के भाषायी कार्यक्रमों में नया काम-काज पंजाबी का शुरू हुआ है—सो इमरोज़ मान उर्फ़ मालविंदर मान और परगट सिंह औलख मेरे नए मित्र बन गए हैं। इमरोज़ मान मानसा के रहवासी हैं और पढ़ाई-लिखाई पंजाब यूनिवर्सिटी में हुई है, सो चंडीगढ़ उनका स्थायी पता है। भूमिका को मैं संक्षिप्त कर अपनी पंजाब यात्रा को उनके साथ शुरू करता हूँ।

यह इस दिसंबर अंत के दिनों की बात है, जब मैं एक दिन अचानक से चंडीगढ़ की बस पकड़कर मान सा’ब से मिलने चला गया। मेरी योजना में केवल यह था कि चंडीगढ़ देखा जाएगा और मान सा’ब के मार्फ़त बने हमारे नए मित्र भजन सिंह ढिल्लों और गुरलाल गिल के मशहूर गाँव भैणीसाहिब जाया जाएगा। चंडीगढ़ पहुँचा तो साथी भजन बस अड्डे पर लेने आ गए। वह मुकंदपुर में स्थित एक महाविद्यालय में पंजाबी का अध्यापन करते हैं। अपनी प्राचीन मोटरसाइकिल से वह जब बस अड्डे पर पहुँचे तो मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इतनी हाड़तोड़ू ठंड में भजन कैसे आ गए, हालाँकि बाद में मुझे प्रत्यक्ष ज्ञात हुआ कि वह जुर्राबों और गर्म पजामों की त्रि-स्तरीय अवस्था में थे।

ख़ैर, दिन में पंजाब विश्वविद्यालय के साथियों से मुलाक़ातें हुई और रात में मान साब की मित्र प्रदीप कौर गिल के यहाँ हम सब हथाई के लिए जुटे। प्रदीप जी के आतिथ्य में वहाँ एक और साथी से मिलना हुआ, जिनका नाम बरिंदरजीत सिंह शेरगिल था। आचमन गोष्टी के बाद हमारे कल के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार हो रही थी। हमारा मतलब मेरा और मान सा’ब का कार्यक्रम भैणीसाहिब जाने का था। इस बीच शेरगिल का भी मन बन गया और हमारा एक और गंतव्य जुड़ गया, वह गंतव्य अमृतसर था। और यह कार्यक्रम अमृतसर वाया भैणीसाहिब तय हुआ।

भरी दुपहर हम भैणीसाहिब पहुँचे। भैणीसाहिब नामधारी सम्प्रदाय का गढ़ है। नामधारी सम्प्रदाय का अपना एक संक्षिप्त इतिहास रहा है, जिसमें सबसे अलग यह कि वे अभी तक अपना गुरु मानते आ रहे हैं—जबकि मूल सिख धर्म में अंतिम गुरु, गुरु ग्रंथ साहिब हैं। नामधारी सम्प्रदाय की स्थापना सतगुरु राम सिंह ने बरस 1857 में भैणीसाहिब में की। नामधारी अपने लिखित इतिहास में ख़ुद को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब की धरती पर नायक के तौर पर देखते हैं। ब्रिटिश हुकूमत में कुछ घटनाओं में नामधारियों ने अपनी जान दी—वे शहीद कहलाए।

प्रमुख घटनाओं में मलेरकोटला की 1872 में घटी वह ख्यात घटना भी शामिल है, जहाँ एक बूचड़ख़ाने पर हमला करने के कारण 66 नामधारियों को तोपों से मार दिया गया। इस तरह उस दौर में नामधारी एक अलग क़िस्म के प्रतिरोध की कूक बने और यही कारण है कि वहाँ की लोक-भाषा में नामधारियों को ‘कूके’ और इस पूरी लहर को ‘कूका-मूवमेंट’ कहा जाता है।

हम दिन में लगभग तीन बजे भैणीसाहिब पहुँचे। एक संभ्रांत क़िस्म के वातावरण से जैसे मेरी औचक मुठभेड़ हुई हो। पुरषों का सफ़ेद झक्क पैरहन और स्त्रियाँ भी लगभग उसी पहनावे में। सामान्य सिखों से अलग-सी पगड़ी। यूँ मैं भैणीसाहिब के बारे में पहले से थोड़ा रोमेंटीसाइज़ था, सो थोड़ा-थोड़ा नशा उतरने लगा। नशे से याद आया कि नामधारी नशे और नशेड़ियों से एक विचित्र क़िस्म की दूरी रखते हैं। ख़ैर, हम गाँव में पहुँचते ही गुरलाल और भजन के मार्गदर्शन में गुरुद्वारे में घूमने लगे, जहाँ एक बड़ा सभागार बना था। यहाँ नामधारियों की शादियाँ उनके गुरु की उपस्थिति में सम्पन्न होती है। उसी परिसर में एक समृद्ध पुस्तकालय भी है, जिसकी देख-रेख गुरलाल और उनके कुछ साथी करते हैं। उस पुस्तकालय में नामधारी सम्प्रदाय के पिछले प्रमुख सतगुरु जगजीत सिंह की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हैं। जगजीत सिंह संगीत मर्मज्ञ थे। हिंदुस्तान के बड़े कलाकारों से उनका गहरा याराना रहा और कई बड़े उस्ताद भैणीसाहिब में संगीत कार्यक्रम करते रहे। यहाँ से नामधारी सम्प्रदाय की एक पत्रिका (सतजुग) भी निकलती है, जो कुछ-कुछ धार्मिक क़िस्म की पत्रिका है और उसमें लगभग इसी सेक्ट पर केंद्रित चीज़ें प्रकाशित होती है। उसके संपादक गुरलाल हैं। भैणीसाहिब अच्छी-ख़ासी कैपिटल वाला गाँव है। कई लोग विदेशों में रहते हैं। सम्प्रदाय की अपनी एक बड़ी पूँजी इस गाँव में सामाजिक कार्यों में लगी दिखती है, जिसमें एक बड़ा जिम, हॉकी का विशाल मैदान और अन्य कुछ काम-काज शामिल है। इससे पहले कि यह लेख एक पिकनिक-गद्य बने, उससे पहले मैं भैणीसाहिब के ब्योरे देने बंद करता हूँ।

रात में भजन के यहाँ ठहरना हुआ। सुबह की चाय का मुझे इंतज़ार नहीं था क्योंकि मुझे यह ज्ञात था कि नामधारी अमूमन चाय नहीं पीते हैं। सो एक बड़े ट्रे में हम तीनों साथियों के लिए ‘चाटा’ लाया गया। हमारी देस-भासा में चाटा मवेशियों को देने वाले भोजन को कहा जाता है। लेकिन यह चाय की तरह एक पेय पदार्थ ही था जिसमें कई तरह के पिसे पदार्थ शामिल होते हैं। सुबह के लगभग नौ बज चुके थे, लेकिन धुंध छटने का नाम नहीं ले रही थी। हम गाँव में हॉकी मैदान की तरफ़ निकल पड़े, जहाँ जिम में हमारी मुलाक़ात एक और नामधारी से हुई—जिनका नाम गुरुदेव सिंह चीमा था। पूरा भैणीसाहिब उन्हें प्रधान जी कहता है, सतगुरु उदय सिंह भी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं। प्रधान जी ने अपना परिचय दिया और मुझसे अपना इंस्टाग्राम खोलने को कहा। जब मैं कुछ समझ नहीं पाया तो उन्होंने मोबाइल मुझसे लेकर अपना नाम सर्च किया और ख़ुद ही ख़ुद को फ़ॉलो कर लिया। जब मैंने उनसे यह कहा कि आप भी वापिस मुझे फ़ॉलो कर लीजिए ताकि हम दोनों का संवाद संभव रहे, लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कह दिया—अस्सी नीं करदे किसे नू फ़ॉलो-फूलू!

गुरलाल के यहाँ से नाश्ता करके तक़रीबन 11 बजे हम अमृतसर के लिए रवाना हो गए। बीच में जालंधर के पास फगवाड़ा में प्रोफ़ेसर अवतार सिंह के यहाँ थोड़ी देर के लिए रुकना हुआ। लंबी बातचीत हुई और फिर अमृतसर के जिस मार्ग से हम जा रहे थे, वह दिल्ली-लाहौर का विख्यात मार्ग है। मैं रास्ते भर से टूटी-फूटी पंजाबी बोले जा रहा था। जब मैंने वाक्यों को अति विकृत कर दिया, तो अबकी भजन का सब्र टूट गया—“तू हुण चुप कर, साडी माँ-बोली दी जड़ ना पट्ट।” भारी ट्राफ़िक और कुछ अधिक लंबी यात्रा के बीच आख़िर—‘अमृतसर आ गया है।’ एक बड़े द्वार ने जैसे बांथ भर स्वागत किया हो—जी आया नूं। अमृतसर पहुँचते ही औचक वह मशहूर किंतु अप्रिय घटना याद आ गई, जिसे मार्क टली ने ‘मिसेज़ गांधी’ज़ लास्ट बैटल’ कहा। चूँकि साथ में दो नामधारी थे, सो रात में नामधारी धर्मशाला में रुकना तय हुआ। अमृतसर के हृदय में स्थित कंपनी बाग़ के एक गेट पर बनी यह धर्मशाला अमृतसर में एक घटना में शहीद हुए नामधारियों को समर्पित है। पड़ाव-स्थल पर सामान रख हम अमृतसर घूमने निकल गए। हम एक मशहूर सड़क पर थे, जिसपर लगभग पंक्तिबद्ध तरीक़े से ऐतिहासिक स्थल थे—विशाल विभाजन संग्रहालय, जलियाँवाला बाग़ और विख्यात हरमंदिर साहिब। मैं, भजन और शेरगिल गुरूद्वारे में मत्था टेकने के लिए प्रवेश कर गए। हालाँकि अमूमन धार्मिक जगहों पर मेरी जाने की इच्छा नहीं होती है, लेकिन हरमंदिर साहिब मेरे मग़ज़ में एक बड़ी रूचि का विषय था। सातवें-आठवें दशक में जब पंजाब धू-धू कर जल रहा था, तब हरमंदिर साहिब उस हिंसा का चश्मदीद गवाह था। सो मेरे मन में इस विशाल गुरूद्वारे के प्रति अलग तरह की जिज्ञासाएँ थीं। मैं भजन और शेरगिल से लगातार सवाल किए जा रहा था। आख़िरकार शेरगिल, जो कि प्रार्थना में था, सो एक दो बार मुझे जवाब देने के बाद, उसे उकता कर बोलना ही पड़ा— “ओ खड़ जा देथे, इथे बस मेडिटेशन कर!’’

गुरूद्वारे में बने मशहूर स्वर्णमंदिर का प्रतिबिंब उसके समीप बने सरोवर में हू-ब-हू वैसे ही झलक रहा था। यह वही सरोवर है, जो सन् चौरासी के जून के में एक-दो रोज़ तो ख़ून से भर गया था। सरोवर में बन रहे प्रतिबिंब की आभा को मैं शिशुवत देखता रहा कि अचानक मुझे अकाल तख़्त दिखा। अकाल तख़्त—सिखों के लिए एक तरह से सुप्रीम कोर्ट और सर्वोच्च संस्था जैसा है। यह किसी भी मशहूर-आम आदमी को यहाँ आने का आदेश दे सकता है और निज विधि के मुताबिक़ दंड भी मुक़र्रर कर सकता है। छठवें सिख गुरु हरगोबिंद साहिब ने इस तख़्त की स्थापना की थी और ‘मिरी-पीरी’ का सिद्धांत दिया था। यहाँ मिरी का अर्थ शायद दुनियावी और पीरी का अर्थ आध्यात्मिक से था। ऐसा माना जाता है कि पिछले कई दशकों से अकाल तख़्त की अपनी एक राजनीति है और उस पर अकालियों (दल) का एकाधिकार है। हरमंदिर साहिब के आगे एक बड़ा मार्केट है। उसके भीतर घूमते हुए एक दुकान पर मैं अचानक से रुक गया। इस विशाल दुकान में चार-एक टी-शर्ट टंगे थे।

जिनपर क्रमश: जरनैलसिंह भिंडरावाले, भगत सिंह, सिद्धू मूसेवाला और दिलजीत दोसांझ की तस्वीरें प्रिंट थी। मैं एकबारगी सोचता रह गया कि समाज का यह किस तरह का विवेक है; जहाँ चार अलग धुर्वों पर खड़े लोग, एक साथ बाज़ार का हिस्सा है। लगभग हर दुकान पर जरनैलसिंह भिंडरावाले के एस्थेटिक्स बिक रहे थे। ख़ैर, अगले दिन मैं और भजन पार्टीशन म्यूज़ियम घूमने निकल गए। बाक़ी साथी कहीं और। विभाजन की विभीषिका में बंगाल और पंजाब ने अपने असंख्य लोग गंवाएँ। इस विभीषिका से उपजी सांप्रदायिक आग ने जो कुछ अपने हवाले किया, उसका त्रासद भरा दस्तावेज़ यह संग्रहालय है। मेरा परिवार भी बरस इकहतर (1971) में पाकिस्तान से आए विस्थापितों में से एक है। लेकिन इस तरह की हिंसा और जनहानि हमारे बडेरों ने नहीं झेली। लगभग दस लाख से अधिक लोग यहाँ विभाजन के समय मारे गए। दुपहर में थोड़ी देर हम सुपरिचित नाटककार केवळ धाळीवाळ से भी मिलने चले गए। नामधारियों को एक नाटक को लेकर उनसे बातचीत करनी थी। उनका दफ़्तर ‘विरसा विहार’ एक सरकारी भवन का हिस्सा है। दफ़्तर में एक बड़ी तस्वीर सुरजीत पातर की भी लगी थी। उन्होंने अपने यहाँ तक आने की कहानी बताई। हमने भी इस बीच चाय-पानी कर लिया। आगे की हमारी योजना पुळकंजरी और प्रीतनगर की थी। लगभग 3-4 बजे के आस-पास हम वाया अटारी मार्ग पुळकंजरी पहुँच गए, इसे पुळ-मोरां भी कहा जाता है। ऐसा प्रचलित है कि लाहौर की प्रसिद्ध नृत्यांगना मोरां के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने इसे तैयार किया। सन सैंतालीस और पैंसठ की कार्यवाहियों में यहाँ पुल ध्वस्त हो गया और फिर शायद भारतीय आर्मी ने इसे नष्ट कर दिया। यहाँ एक मशहूर बावड़ीनूमा आकृति का सरोवर-सा है। मैंने गुरलाल से विनोदवश कहा कि ऐसी बावड़ियाँ हमारे यहाँ पग-पग पर है। गुरलाल भी कम नहीं, सो बोल गए— ‘‘हाँ, साडे इथे पाणी दी कमी नीं है!’’ पुळकंजरी से हम प्रीतनगर की ओर बढ़ गए। यहाँ से लाहौर ब-मुश्किल 13-14 किलोमीटर है। एक तार का फ़र्क़—उस पार एक नया संसार। लोक वही। वही ज़मीन। शेष मनुष्यता भी। मन बहुत व्यथित हो उठा। मुल्क के लोग सन् सैंतालीस में मिली जिस आज़ादी को आज़ादी कहते हैं, यहाँ के अधिकांश लोगों के लिए वह तक़सीम ही महसूस होती है, वे उस घटना को तक़सीम ही कहते हैं। आज़ादी और तक़सीम में कितना तो अंतर है और इस अंतर में अकूत करुणा और सियासत के ख़िलाफ़ घृणा निहित है। मेरे लिए यह पहली बार था कि एक विचित्र क़िस्म का उत्तर-भारतीय राष्ट्रवाद मुझे यहाँ देखने को नहीं मिला।

पुळकंजरी से प्रीतनगर ज़्यादा दूर नहीं है। थोड़ी-सी दूरी पर रावी बहती है। खेतों में सरसों लहलहा रही है। कहीं गुरदास मान गा रहे हैं तो कहीं जॉर्डन संधू। हम लोपोके होकर प्रीतनगर पहुँच चुके। प्रीतनगर पंजाबी भाषा के विख्यात लेखक गुरबख़्श सिंह प्रीतलड़ी का गाँव है। उन्होंने ही इस गाँव को बसाया और इसका नाम रखा प्रीतनगर। यह शायद बीसवीं सदी का पहल-दूसरा दशक रहा होगा जब वे अमेरिका में पढ़ने गए और 1924 के आस-पास वापिस आए और एक दशक विधिवत नौकरी की। इसके बाद उनके अंदर का लेखक हिलोरे लेने लगता है और 1933 में वह नौकरी से इस्तीफ़ा देकर प्रीतलड़ी पत्रिका शुरू करते हैं। यह उस ज़माने में नौशहरा और लाहौर से प्रकाशित होती थी। यहीं से शांति निकेतन की तर्ज़ पर लेखकीय-गाँव का आइडिया उनके मन में आता है। जिसमें वह सोचते हैं कि अमृतसर और लाहौर के सीमावर्ती इलाक़े में कोई ऐसी जगह देखी जाए, जहाँ पर मिलकर एक को-ओपेरेटिव प्रक्रिया में लेखकों का नगर बसाया जाए। यह लगभग 1937 का बरस रहा होगा जब अलग-अलग रचनाकार यहाँ प्लाट ख़रीदते हैं और घर बसाते हैं। इसी के साथ यहाँ प्रेस भी लगती है और एक एक्टिविटी स्कूल भी बनाया जाता है। इसी समय इस तरह के नवाचार को देखने नेहरु भी प्रीतनगर आते हैं। प्रीतनगर पहुँचते ही हम गुरबख़्श सिंह की स्मृति में बनी इमारत में गए। इमारत की देखभाल कर रहे एक भले आदमी ने हमें इस पुस्तकालय का विज़िट करवाया। और हमें छत पर ले गए। जहाँ से पीछे बना एक ओपन थिएटर दिखाई देता है। यह ओपन थिएटर विख्यात अभिनेता बलराज साहनी के नाम से बना हुआ है। बलराज साहनी प्रीतलड़ी के स्नेहपात्र थे। उन्होंने भी इस जगह अपना घर बनाया और जब उन्होंने यहाँ बसने का सोचा, लगभग उसी समय दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। मेरी भाषा में कहूँ तो प्रीतनगर में कुछ ढाणियाँ है। बड़े-बड़े खेतों में बनी ये ढाणियाँ ऐसे प्रतीत होती है कि जैसे कोई बड़ा ‘फ़ार्म-हाउस’ हो। वहाँ से हम खेतों से गुज़रने लगे। साँझ घिर आई। हम प्रीतलड़ी जी के घर की तरफ़ बढ़ने लगे। आस-पास हर घर में अनेकों कुत्ते। बाद में पता चला कि कुत्ते इसलिए रखे गए हैं कि सीमावर्ती इलाक़े के चलते यहाँ नशा बहुत प्रचलन में है। नशेड़ियों से सुरक्षा के लिए चौतरफ़ा श्वान-राग छिड़ी थी। हम एक मशक़्क़त के बाद उनके घर पहुँचे। घर के अहाते में प्रीतलड़ी के बेटे हिरदेपाल थे। मान सा’ब ने अभिवादन कर उन्हें हम सब का परिचय दिया। वह नब्बे पार हैं। फिर भी हालक-चालक। हमें उन्होंने पूछा कि घर देखना चाहते हैं? हमने हाँ में सिर हिलाया और वे हमें घर में ले जाने लगे कि अचानक से रुक गए और नज़दीक बने एक घर की तरफ़ इशारा करते हुए बोले कि यह घर एक मशहूर अभिनेत्री ने हमसे ख़रीदा है, अभी दो बरस पहले। हमने अभिनेत्री का नाम जानना चाहा। वह अभिनेत्री दीप्ति नवल थी।



अब हम उस घर में थे, जहाँ पंजाबी-उर्दू के कई रचनाकारों ने अपना लेखन किया। अमृता ने तो अपना शुरुआती रचनाकर्म ही प्रीतनगर के इसी घर से शुरू किया। लाहौर से उनका प्रीतनगर आना आम-सा था। साहिर लुधियानवी की पहली किताब ‘तल्ख़ियाँ’ तो छपी ही गुरबख़्श सिंह के सौजन्य से। दरअस्ल जब प्रीतलड़ी लाहौर में थी, तब प्रीतनगर बुक शॉप भी बन गया जो लाहौर की निस्बत-रोड पर हुआ करता था। साहिर उस समय ख्यात नहीं हुए थे, और कोई उनकी किताब प्रकाशित करने को राज़ी नहीं था, सो पहली बार प्रीतनगर बुक शॉप ने उनकी पहली किताब छापी। उस वक़्त प्रीतलड़ी हिंदी, उर्दू, अँग्रेज़ी और पंजाबी में छपती थी और पोस्ट-पार्टीशन, थोड़े समय के लिए साहिर प्रीतलड़ी उर्दू के संपादक भी रहे। ख़ैर, घर के बारे में हिरदेपाल हमें क्रम से बता रहे थे कि ये दाजी (गुरबख़्श सिंह) का कमरा है। इस कमरे में हमारी माँ रहती थी। इस कमरे में लालसिंह चड्ढा की शूटिंग हुई है आदि-आदि। जब हम लोग बहुत रूचि से उनकी बातें सुनने लगे तो उन्हें शायद अच्छा लगा और उन्होंने चाय की मनवार करी। अब वे गोलमेज़ के ठीक एक तरफ़ थे और हम सब परिधि में। और मान साब, गुरलाल, शेरगिल और भजन लगातार उनसे सवाल किए जा रहे थे, जिनका वे धीमे-धीमे उत्तर दे रहे थे। इस बीच उनकी पत्नी भी आ गईं। अभिवादन की औपचारिकता के बाद उनसे बातें शुरू हुईं। बातचीत में हमें लगा कि हमारे आने से वह ख़ुश थीं। मैं अपने बड़ों को जब भी विस्थापन की कहानियाँ सुनाते हुए देखता था, वे भावुक नज़र आते थे। हिरदेपाल भी ऐसे ही करुणाशील मनुष्य हैं। विभाजन के समय के क़िस्से सुनाने लगे। जब दंगे-फ़साद अपनी चरम सीमा पर थे, तब उनका परिवार भी दिल्ली आ गया। और सात-आठ साल बाद सब ठीक हुआ तो वापिस प्रीतनगर गए और पाया कि घर के कई हिस्से नष्ट हो गए थे और घर में बना एक समृद्ध पुस्तकालय पूरा जला दिया गया था।



युद्धोन्माद में जिस तरह से देश के अंदरूनी इलाक़े तांडव करते हैं, उन्हें सीमावर्ती इलाक़ों का जीवन शायद कभी समझ नहीं आ सकता। अर्जुन देव चारण अपनी एक कविता में कहते हैं कि अंधी ईर्ष्या संदिग्ध भय उपजाती है, लेकिन यह भय भरी नफ़रत तो निरतंर आग उपजाती है। हिरदेपाल रुंधे गले से अपने हिस्से की कहानियाँ बताए जा रहे थे—‘‘हमारे लाहौर नज़दीक था। अमृतसर दूर।’’ मुझे इस वाक्य की निर्मिती स्नेह और त्रासदी के व्याकरण से बनी लगी। पंजाब के लोग हिंसा और आंतरिक लड़ाई के दौर को अत्तवाद कहते हैं। इस दौर में उनके एक भतीजे की ख़ालिस्तानियों ने क़रीबी क़स्बे लोपोके में हत्या कर दी। किसी काम-काज को लेकर वे लोपोके गए थे। चूँकि वे बाल नहीं रखते थे सो खाड़कूओं ने शायद हिंदू समझकर उनकी हत्या कर दी। यह गुत्थी अभी भी सुलझी नहीं कि क्या उन्हें केवल यही सोचकार मार दिया गया? और यह भी कैसा अचरज भरा दुर्योग है कि उसी दौर में जब वे एकबार दिल्ली से प्रीतनगर आ रहे थे तो हरियाणा के पास हिंसक भीड़ ने उन्हें केवल इसलिए छोड़ दिया कि उन्होंने सामान्य बाल रखे थे और उन्हें वे हिंदू लगे। हिरदेपाल कहते हैं कि जब उन्हें पता चला कि जिसकी हत्या हुई, वह एक सिख है तो उन्होंने अफ़सोस जताया और जब उन्हें यह पता चला कि वह गुरबख़्श सिंह का पोता था तो उनका अफ़सोस थोड़ा कम हुआ कि—ओ भी केड़ा सिख सीगा।

बहरहाल एक लंबे साहचर्य-संवाद के बाद जब हम ख़ुश हो, वापिस भैणी साहिब लौट रहे थे तो मैं एकदम चहकते हुए बोला कि क्या अद्भुत है यहाँ का संसार! गुरलाल यहाँ भी मसख़री से बाज नहीं आए, कहने लगे—तू साडे नाऴ वरत के देख।

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