Font by Mehr Nastaliq Web

तिग्मांशु धूलिया : मोटिवेशन के दौर में

तिग्मांशु धूलिया बॉलीवुड में जब पहचाने गए, जब चमके, उससे बहुत पहले से वह बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स में पर्दे के पीछे की बहुत भूमिकाओं में सक्रिय रहे। उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी पर नज़र डालें तो हैरत होती है। उन्होंने कितने अलग-अलग माध्यमों पर कितना विविध काम किया है, टीवी से लेकर नाटकों तक और कास्टिंग डायरेक्टर से लेकर अवॉर्ड विनिंग फ़िल्म डायरेक्टर तक। 

तिग्मांशु के दो सबसे लोकप्रिय किरदारों में से एक में वह शहर से लौटे युवा की प्रगतिशीलता का थप्पड़ों से स्वागत करते हैं और दूसरे में अपने ही बेटे को “बेटा तुमसे न हो पाएगा” कहते पाए जाते हैं। ‘ज़ीरो’ में भी वह अपने बेटे के लगभग शत्रु हैं। इससे पता चलता है कि उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा है जो उन्हें इस तरह की भूमिकाओं के लिए उपयुक्त बनाता है—भयानक क़िस्म की ऑडियो-विज़ुअल स्क्रीन प्रेज़ेंस। वह जिस दृश्य में हों, वहाँ उनके अलावा किसी और को देखने का मन नहीं करता। इसका एहसास मुझे ‘ज़ीरो’ देखते हुए हुआ था, जहाँ हीरो पर वह अभिनय की कई परतों में भारी पड़ते हैं। यहाँ अभिनय की बारीकियाँ न जानने वाले लोग भी यह तो महसूस कर ही जाते हैं कि हीरो से ज़्यादा रीयल तो उसका बाप लग रहा है।

“मेरी वज़ह से तेरी हाइट कैसे कम हो गई?” (फ़िल्म : ज़ीरो)

“बेटा, तुमसे न हो पाएगा।” (फ़िल्म : गैंग्स ऑफ़ वासेपुर)

“बबुआ! हम तुमको पहचाने नहीं।” (फ़िल्म : माँझी—द माउंटेन मैन)

ये टॉक्सिक फ़ादर/फ़ादर फ़िगर के तीन स्टेप हैं, जिन पर चलते हुए ही अक्सर हिंदुस्तानी बाप अपने बेटों को पीटने के परम अनुष्ठान तक सालों से पहुँचते रहे हैं। दुनिया की बात न भी करूँ तो कम-से-कम मेरा अनुभव तो यही रहा है। ऐसे में वही तरीक़ा काम आता है जो ‘माँझी—द माउंटेन मैन’ में नवाज़ुद्दीन के किरदार ने अपनाया—थप्पड़ खा के बाल सीधे कर लो और अगले थप्पड़ का इंतिज़ार करो, या फिर जो मेरा दोस्त करता था—भाग जाओ। एक तीसरा तरीक़ा अनुराग कश्यप का भी था, जो ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के जेपी सिंह ने अपनाया।

तिग्मांशु की डराने वाली उपस्थिति और हड़काने वाली भाषा हमें पर्दे पर अब तक युवाओं को डिमोटिवेट करते ही दिखी है। इस बार ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ के दूसरे संस्करण में वह अपनी फ़िल्म ‘हासिल’ के इलाहाबाद में विशेष अतिथि होंगे। उनकी उपस्थिति का उद्देश्य नई पीढ़ी के कवियों और श्रोताओं का उत्साहवर्धन है और फ़िलहाल सोशल मीडिया का माहौल देखकर यही लग रहा है कि उत्साह अब वर्धन की सीमा के पार जा चुका है। यह शायद इस महान् शहर का ही चरित्र है कि यह हमेशा एक अति पर रहता है। 

ख़ैर, तिग्मांशु अपनी फ़िल्मोग्राफ़ी के सबसे महान् मोटिवेशन स्पीकरों गौरीशंकर पांडेय और रणविजय सिंह और ख़ुद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने छात्र युवा तिग्मांशु की ज़मीन पर आ रहे हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि वह किस शैली में उत्साहवर्धन करेंगे! क्या वह गौरीशंकर पांडे की शैली में उत्साहवर्धन करेंगे :

“तुम इलेक्शन जीतने में इंटरेस्टेड नहीं लगते हो हमको, सिर्फ़ इसी लड़की का वोट मिल जाए, यही बहुत है तुम्हारे लिए...” 

“सुनो रणविजय सिंह, ये तुम अपनी नेतागीरी कौनो और क्षेत्र में जाके करो, हमारा आशीर्वाद है बहुत आगे जाओगे...”

या फिर रणविजय सिंह की तरह :

“मारो और मारो और जान से मार देना बेटा, हम रह गए न, हम मारने में देर न लगाएँगे भगवान क़सम...”

“किया जाएगा गुरिल्ला वार किया जाएगा! हम क्रांतिकारी हैं, ये साले सरकारी ग़ुंडे हैं...”

हालाँकि मोटिवेशन के बारे में स्टैंड-अप कॉमेडियंस के पितृ-पुरुष जॉर्ज कार्लिन ने कहा था, “मोटिवेशन कोई कमाल की चीज़ नहीं है, बल्कि बहुत ख़राब चीज़ है।” उदाहरण देते हुए वह कहा करते थे, “दुनिया में जितना भी ख़ून-ख़राबा, मारकाट, हिंसा, लूट, चरमपंथ है, वह सब हाईली मोटिवेटेड लोगों का किया हुआ है। एक डिमोटिवेटेड आदमी कभी बम-धमाका नहीं कर सकता, न बैंक-रॉबरी, न हत्या, न लूट...”

जॉर्ज कार्लिन ने ये बातें एक स्टैंड-अप कॉमेडी में कही थीं, जिनके कहने और समझने और सुनने और सराहने की एक सीमा है; लेकिन मोटिवेशन ने सिर्फ़ विध्वंस ही दिया हो, ऐसा नहीं है—दुनिया में जो कुछ भी सुंदर है, कलात्मक है, वह भी हाईली मोटिवेटेड लोगों का किया हुआ है। वह कौन-सा मोटिवेशन था जिस कारण एक व्यक्ति तियानआनमन चौक पर टैंक के आगे खड़ा हो जाता है, वह कौन-सा मोटिवेशन है जो आंदोलनकारियों को इतना साहस देता है कि बर्बर व्यवस्थाओं की चूलें हिल जाती हैं, पुलिस की लाठियाँ लकड़ी के टुकड़ों में और गोले गेंदों का खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।

मैं इन दोनों तरह के मोटिवेशन का अंतर भी जॉर्ज कार्लिन के यहाँ पाता हूँ, जहाँ वह कहते हैं कि अगर आप मोटिवेट होने के लिए सेल्फ़-हेल्प बुक पढ़ते हो, जो कि ज़ाहिर है दूसरों की लिखी हुई होती हैं; तो यह सेल्फ़-हेल्प नहीं है, बल्कि हेल्प है।

यही वह अंतर है जो हेल्प और सेल्फ़-हेल्प यानी मोटिवेशन और अंतःप्रेरणा का अंतर है। इसे बुद्ध ने कहा—“अप्प दीपो भव!” इसे ही कहते हैं—सुर भीतर से नहीं उठ रहा है अभी, जिस दिन यह होगा उस दिन अज्ञेय की ‘असाध्य-वीणा’ के प्रियंवद की वाणी :

ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगड़े-से झर गए, निखर आया था जीवन-कांचन

यही वह अंतर है जो मोटिवेशन और आत्मप्रेरणा में होता है, यही वह अंतर है जो विध्वंसकारियों को सर्जकों और रचनाकारों से अलग करता है।

मेरी नज़र में तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन की एक ऐसी ख़ासियत, जिस पर अपेक्षाकृत कम बात हुई है, उनकी फ़िल्मों का ‘भाषाघर’ है। इस भाषाघर की भाषाई विविधता न सिर्फ़ आकर्षक, बल्कि बेहद आथेंटिक भी लगती है। हिंदी बोलियों और दूसरी भाषाओं से खाद-पानी पाकर बनी और बढ़ी हुई भाषा है, जिसके लगभग हर शब्द से एक अलग स्थानीयता की पहचान की जा सकती है। यह उसकी ख़ूबी भी रही है और उसके इतिहास का सबसे जुझारू पक्ष भी। लेकिन बंबइया फ़िल्मों ने नब्बे की दहाई छूते-छूते एक ऐसी भाषा विकसित कर ली थी, जो लगभग सिर्फ़ फ़िल्मों में ही बोली जाती थी। वह एक तरह का अजीब-सा ‘भाषाई कैरिकेचर’ था। बंबइया समझदारी कुछ ऐसी थी कि जैसे पूरा उत्तर भारत एक ही भाषा बोलता हो और वही भाषा इतने बड़े भूगोल की भाव-भंगिमा का प्रतिनिधित्व करती हो... जबकि इसी हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री से ‘नदिया के पार’ जैसी फ़िल्म भी निकली थी, जिसकी भाषा इतनी असली और सहज थी कि कभी लगा ही नहीं कि ये फ़िल्म के लिए लिखे गए संवाद हैं। ‘नदिया के पार’ देखते हुए आज भी ऐसा नहीं लगता।

बहरहाल, नए निर्देशकों की एक पूरी पीढ़ी ने इस भाषाई-बेईमानी को देखा और भोगा था और उन्हें जैसे ही मौक़ा मिला उन्होंने इसमें मज़बूत दख़्ल दिया। इन सारे निर्देशकों-संवाद लेखकों में मुझे तिग्मांशु की फ़िल्मों का भाषाई कैनवस सबसे विस्तृत लगता है। एक तरफ़ बीहड़ बुंदेली की छटा बिखेरती ‘पान सिंह तोमर’ है तो दूसरी तरह ख़ालिस इलाहाबादी छौंक लगाती ‘हासिल’। इस तरह के उदाहरण उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी में भरे पड़े हैं—कंगना से लेके सैफ़ अली ख़ान तक से उन्होंने भाषा की ऑथेंटिसिटी के लिए प्रयास करवाए हैं और यह प्रयास निश्चित ही असाधारण हैं। तिग्मांशु अपनी फ़िल्मों में अपनी मातृभाषा के अलावा अपने पात्रों की मातृभाषा को लेकर भी बहुत ईमानदार दिखे हैं और यह बात प्रतिभाशाली निर्देशकों की इस पीढ़ी में उन्हें सबसे अलग बनाती है।

23 अगस्त 2026 को तिग्मांशु धूलिया हिंदी कविता के 10 एकदम नए कवियों को सुनेंगे। पिछली बार स्वानंद किरकिरे विशेष अतिथि थे। इस मौक़े पर उन्होंने अपने गीत और अपनी कविताएँ भी सुनाई थीं और एक शिकायत भी की थी कि उन्हें इस अवसर पर कोई प्रेम-कविता सुनने को नहीं मिली! 

इस संदर्भ में इस बार देखिए क्या होता है, क्योंकि हिंदी की समकालीन कविता भी तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्मों की तरह प्रेम से ज़्यादा ज़रूरी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में ये दस नए प्रतिनिधि चेहरे—प्रेम और बक़ौल कवि-लेखक पंकज प्रखर, समकालीनता के विकट प्रसंगों में घिरे कवि और प्रेमी—किसी भी तरह के अति-उत्साह और विस्तारवादी दिमाग़ के ख़िलाफ़ खड़े दिखाई देते हैं। इनकी कविता एक सत्याग्रह भी है और समझाइश भी।

•••

सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार-कलाकार तिग्मांशु धूलिया की इस बार के ‘हिन्दवी उत्सव’ के ख़ास सत्र ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता' में विशेष उपस्थिति रहने वाली है। ‘हिन्दवी उत्सव’ से जुड़ी जानकारियों के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट

हिन्दवी उत्सव 2026

रजिस्टर कीजिए