तर्पण से पहले समर्पण
ममता पंडित
10 अक्तूबर 2026
यह शीर्षक शायद आपको असहज कर सकता है, इसलिए शुरुआत में ही स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि यह आलेख हमारी सनातन परंपरा और श्राद्ध-कर्म के विरोध में क़तई नहीं है। मैं एक संभ्रांत पंडित परिवार से संबंध रखती हूँ। मेरे दादाजी और नानाजी, दोनों ही अपने समय के प्रतिष्ठित और विद्वान पंडित रहे हैं। श्राद्ध-कर्म के आध्यात्मिक महत्त्व और उसकी परंपरा से मैं भली-भाँति परिचित हूँ।
इस आलेख का उद्देश्य केवल अंतरात्मा को झकझोरने वाले एक प्रश्न का उत्तर तलाशना है—जिन बुज़ुर्गों के जाने के बाद हम पूरे विधि-विधान और आडंबर के साथ उनका श्राद्ध करते हैं, उनके जीवित रहते हम उनके हृदय की पुकार क्यों नहीं सुन पाते?
परिवार की सबसे बड़ी बेटी होने के कारण मुझे बड़ों का अगाध स्नेह और आशीर्वाद मिला। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे दादा-दादी और नाना-नानी के साये में एक लंबा और समृद्ध समय बिताने का अवसर मिला। आज जब अपनी बिटिया को देखती हूँ, तो मन में एक टीस उठती है कि वह इस आत्मीय सुख से वंचित है। आज की पीढ़ी बड़ों का आदर तो करती है, लेकिन औपचारिकताओं के बीच वह गहरा और सहज भावनात्मक सेतु नहीं बन पाता, जो कभी हमारे दौर में हुआ करता था।
मेरे बुज़ुर्ग मुझसे दिल खोलकर बातें करते थे। बचपन में उनके क़िस्सों में रोमांच और बीते दिनों की स्मृतियाँ हुआ करती थीं। उम्र के साथ बातचीत के विषय बदलते गए, लेकिन आत्मीयता वही रही। फिर एक ऐसा दौर आया, जब मैं उनसे मिलने जाती, तो उनकी आँखों में कुछ कहने की विकल छटपटाहट दिखाई देती। वे बहुत कुछ कहना चाहते थे, लेकिन उनके पास सुनने वाला कोई नहीं बचा था। मैं उनकी बातें सुनती और सोचती कि उम्र का ढलना कितना अकेला और कठिन होता है। मैं अक्सर योजनाएँ बनाती कि अगली छुट्टी में उनके लिए यह करूँगी, उन्हें तीर्थयात्रा पर ले जाऊँगी... लेकिन व्यस्तताओं के चलते बहुत कुछ अधूरा ही रह गया।
मेरे दादाजी की एक दिली इच्छा थी कि वह जीवन में कम से कम एक बार हवाई जहाज़ की यात्रा करें। हम सभी भाई-बहन बस यही सोचते और योजना बनाते रहे कि अगली छुट्टियों में उन्हें हवाई मार्ग से किसी तीर्थस्थल की यात्रा पर ले जाएँगे। किंतु अगली छुट्टी में जब हम घर पहुँचे, तो वह उनके अंतिम दर्शन का दिन था। उनके अरमान अधूरे रह गए और एक गहरी कसक ताउम्र के लिए सीने में दर्ज हो गई।
किसी ने ठीक ही कहा है—बचपन और बुढ़ापा एक जैसे होते हैं। बस, दोनों के बीच एक कारुणिक अंतर है : बचपन में अपनी ज़िद पूरी कराने के लिए बच्चा ज़मीन पर पैर पटककर रो लेता है और उसकी माँग पूरी हो जाती है; किंतु बुढ़ापे में अपनी अधूरी ख़्वाहिशों के साथ इंसान को तन्हाई में सिसकना पड़ता है। कई बार तो परिवार के लोग उनकी भावनाओं को ‘उम्र का असर’ या ‘सठिया गए हैं’ कहकर टाल देते हैं।
कभी किसी पार्क की बेंच पर या मंदिर की सीढ़ियों पर जीवन की संध्या से जूझ रहे इन बुज़ुर्गों के पास बैठकर देखिए। उनकी न तो कोई बड़ी शिकायत होती है, न ही विलासिता की कोई माँग। उन्हें तो छोटी-छोटी उपेक्षाएँ आहत कर जाती हैं—कभी उनकी पसंद की सब्ज़ी न बनना, तो कभी परिवार के लोगों का उन्हें घर पर अकेला छोड़कर सैर-सपाटे पर चले जाना। कई बार उन्हें यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि ‘आप बहुत ज्ञान बाँटते हैं।’ तनिक सोचिए, वह ज्ञान नहीं, बल्कि ज़िंदगी की धूप-छाँव में अर्जित उनका अमूल्य अनुभव है, जिसे वे सहेजकर आपको सौंपना चाहते हैं।
बुज़ुर्गों के लिए उनका आत्मसम्मान ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। वे छोटे बच्चों की तरह हर चीज़ आपसे माँगेंगे नहीं। उनकी ज़रूरतों और भावनाओं को आपको बिन कहे समझना होगा। जाने-अनजाने जब हम उन्हें यह अहसास करा देते हैं कि वे परिवार पर निर्भर हैं या परिवार के लिए बोझ बन गए हैं, तो उस मन पर क्या बीतती होगी, जिसने अपनी जी-तोड़ मेहनत से इस परिवार की नींव रखी थी?
मराठी सिनेमा की एक बेहद संवेदनशील फ़िल्म है—‘वेंटिलेटर’। फ़िल्म में पिता कई दिनों से अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं और बेटे के सामने यह व्यावहारिक प्रश्न है कि उन्हें कब तक मशीन के सहारे रखा जाए। फ़िल्म के अंत में एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार उस बेटे को याद दिलाते हैं कि जब उसका जन्म हुआ था, तब वह अत्यंत गंभीर रूप से बीमार था। उस समय पिता की माली हालत बेहद ख़राब थी। फिर भी, उन्होंने अपनी पूरी जमापूँजी दाँव पर लगाकर महीनों तक उसे वेंटिलेटर पर रखकर नया जीवन दिया।
हम जीवन के आरंभ और अंत में कितना दोहरा मापदंड अपनाते हैं! एक नवजात के जीवन को बचाने के लिए हम अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं, किंतु जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े उसी व्यक्ति के लिए हमारा धैर्य चुकने लगता है, जिसने हमें यह जीवन दिया। जीवन के दोनों छोर पर साँसों का मोल एक समान है, फिर हमारी संवेदनाएँ अलग-अलग क्यों हो जाती हैं?
यह सच है कि गृहस्थी और करियर की आपाधापी में हमारी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं और समय कम पड़ने लगता है। लेकिन हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि माता-पिता और बुज़ुर्गों के प्रति हमारा ऐसा ऋण है, जिससे हम कभी पूरी तरह उऋण नहीं हो सकते। इस ऋण को चुकाने का दावा करने के बजाय हम इतना तो कर ही सकते हैं कि उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को स्नेह, सम्मान और आत्मीयता से भर दें।
श्राद्ध पक्ष निश्चित रूप से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उन्हें स्मरण करने का पावन पर्व है। किंतु यह भी एक अटल सत्य है कि जीते-जी की गई सेवा और उससे प्राप्त अंतर्मन का आशीर्वाद, मृत्युपरांत किए गए किसी भी तर्पण या श्राद्ध-कर्म से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
उन्हें दुनिया की किसी दौलत की चाह नहीं है। वे जीवन में बहुत कुछ पा चुके हैं और बहुत कुछ खो भी चुके हैं। अब उन्हें बस आपका थोड़ा-सा समय, अपनापन और सम्मान चाहिए। उनके जाने के बाद तो हम भव्य भोज करेंगे, दान-पुण्य करेंगे और विधि-विधान से श्राद्ध भी करेंगे, लेकिन अफ़सोस, उसे देखने और महसूस करने के लिए वे मौजूद नहीं होंगे।
इसलिए, जो करना है, वह आज और अभी कीजिए। उनके साथ बैठिए, उनकी बातें सुनिए, उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं को समझिए और जहाँ तक संभव हो, उन्हें पूरा कीजिए। उनके जीवन के अनुभवों को बोझ नहीं, अपनी विरासत समझिए क्योंकि तर्पण का समय आने से पहले समर्पण का समय होता है। जीते-जी उनका आदर, उनकी सेवा और उनके प्रति आपका अपनापन ही उनका सच्चा श्राद्ध है।
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