सावन-गात खँची कजरी की अल्पना
शैरिल शर्मा
28 अगस्त 2026
आषाढ़ की साँझें हमेशा किसी के लौटने की आहट लेकर आती हैं। दिन भर की धूप से तपे हुए आकाश के किसी कोने में जब पहली कारी रेखा दिखाई देती है, तो लगता है जैसे बहुत दूर गया हुआ कोई अपना, स्मृति की देहरी पर आकर ठिठक गया हो। हवा अचानक अपना ताप भूल जाती है। आम के पत्ते काँपते हैं। बाँसों के झुरमुट में कोई अनसुना स्वर जन्म लेता है और धरती, जो इतने दिनों से अपने भीतर की प्यास को चुपचाप ढो रही थी, पहली बूँद के स्पर्श से ऐसी साँस छोड़ती है, मानो किसी ने उसके सूखे कपोल पर हथेली रख दी हो।
तभी कहीं से स्वर उठता है :
“पूरब से आई कारी बदरिया,
पश्चिम से डोले पवनवा रे...
जिया हुलसे, हियरा हुलसे,
जब बरसे सावन के कतरा रे।”
कौन जानता है पहली बार यह किसके कंठ से निकला होगा! किस देहरी पर बैठकर किसी अनाम स्त्री ने पहली बार उन पनिघर बादलों को देखकर यह जाना होगा कि आकाश में घिरती हुई घटा केवल जल से नहीं बनी, उसमें किसी की याद भी घुली है। गीतों के आरंभ का कोई इतिहास नहीं होता। वे किसी एक कंठ में जन्म लेते हैं और फिर लोक की असंख्य साँसों में अपना घर बना लेते हैं। कजरी भी ऐसी ही है―किसी एक कवि की नहीं, किसी एक समय की नहीं। वह उन असंख्य स्त्रियों की सामूहिक स्मृति है, जिन्होंने सावन को देखा नहीं, जिया है।
सावन पंचांग में दर्ज कोई साधारण ऋतु नहीं। वह पृथ्वी और आकाश के बीच लंबे समय से स्थगित संवाद का फिर से आरंभ हो जाना है। जेठ की धूप ने जिस धरती को तपा-तपाकर भीतर तक प्यासा कर दिया था, सावन उसी धरती के अधरों पर जल रख देता है। पहली बूँद गिरती है और मिट्टी से जो गंध उठती है, वह जल की गंध नहीं होती। उसमें एक पूरा भूला हुआ संसार जागता है―कच्चे आँगन, भीगी खपरैल, बैलों की गरम देह, गोबर से लिपे चौक, कुएँ की जगत पर रखे घड़े, आम्रकुंजों की अँधेरी छाया और किसी बहुत पुराने प्रेम की स्मृति।
मिट्टी की सोंधी गंध शायद पृथ्वी की सबसे पुरानी प्रेम-पत्रिका है। उसे पढ़ने के लिए अक्षर नहीं, केवल मन चाहिए।
कालिदास ने जब मेघ को विरही यक्ष का दूत बनाया होगा, तब उनके सामने भी यही प्रकृति रही होगी―बादल, पर्वत, नदियाँ, वन, पवन और दूर तक फैली हुई प्रतीक्षा। मेघदूत का मेघ आकाश में चलने वाला जल नहीं रह जाता, वह विरह और मिलन के बीच पुल बन जाता है। यक्ष अपनी प्रिय तक स्वयं नहीं पहुँच सकता, इसलिए वह बादल को भेजता है। कितना अद्भुत है कि भारतीय मन ने बादल को भी संवेदना दे दी, उसे देखा नहीं, उससे बात की।
लोक ने उसी मेघ को अपनी सहज भाषा में पुकारा :
“कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया,
बदरिया घेरि आईल ननदी...”
घटा सचमुच आकाश को घेरती है, लेकिन कजरी की स्त्री जानती है कि असली घटा बाहर नहीं, भीतर उठी है। बाहर के बादल जितने घने होते जाते हैं, मन के भीतर का एकांत उतना ही गाढ़ा होता जाता है। सावन में अकेलापन भी भीगता है। स्मृति भी भीगती है। किसी की कही हुई एक मामूली-सी बात अचानक बहुत दूर से लौट आती है। कोई पुरानी हँसी, किसी हथेली का स्पर्श, किसी विदा के समय आँखों में ठहरी हुई नमी, सब जैसे वर्षा की बूँदों के साथ फिर से जीवित हो उठते हैं।
कजरी इसी पुनरागमन का गीत है। वह केवल वर्षा का गीत नहीं, वह अनुपस्थिति की उपस्थिति का गीत है। शायद इसीलिए कजरी में स्त्री की आवाज़ इतनी मार्मिक सुनाई देती है। उसके पास प्रेम को समझाने के लिए दर्शन नहीं, पर प्रेम को जीने का अनुभव है। वह बादल से बात करती है, पवन से पूछती है, नदी को अपना दुख सुनाती है, नीम की डाल से साजन का पता पूछती है। प्रकृति उसके लिए बाहर की वस्तु नहीं; उसके दुःख की सहभागी है।
“नदिया किनारे मोरा डोला हिले रे,
साजनवा परदेस बसत हो...”
यहाँ नदी केवल नदी नहीं। वह समय है, निरंतर बहता हुआ, किसी के लिए न रुकने वाला। डोला केवल डोला नहीं; वह प्रतीक्षा में डोलता हुआ मन है। और ‘परदेस’ केवल कोई दूर का नगर नहीं, वह दूरी है जो प्रेम के बीच आकर बैठ जाती है।
एक समय था जब परदेस जाने वाला साजन महीनों, कभी वर्षों बाद लौटता था। चिट्ठी के आने में भी ऋतुएँ बदल जाती थीं। किसी गाँव की नववधू सावन की पहली घटा देखकर सोचती होगी, इस बार शायद वह आएगा। फिर बादल बरसते होंगे, खेत हरे हो जाते होंगे, नीम पर झूला पड़ता होगा, सखियाँ लौट-लौटकर उसे बुलाती होंगी, लेकिन देहरी वैसी ही ख़ाली रहती होगी। उस ख़ाली देहरी का संगीत ही कजरी है।
उसकी करुणा इसलिए बड़ी है कि उसमें केवल एक स्त्री का दुःख नहीं है। उसमें उन सभी स्त्रियों की प्रतीक्षा है जिन्हें जीवन ने प्रेम दिया और दूरी भी। किसी का पति परदेस में है, किसी के प्रेम को समाज ने ही लोक-बाह्य घोषित कर दिया है। किसी की विदाई ने दो घरों के बीच एक लंबी सड़क खींच दी, किसी का प्रिय लौटकर कभी आया ही नहीं। कजरी इन सबके बीच एक अदृश्य सेतु बनाती है। एक स्त्री गाती है और अनगिनत स्त्रियाँ उसमें अपनी आवाज़ पहचान लेती हैं।
विद्यापति की विरहिणी जब कहती है :
“ए सखि, हमारि दुखेर नाहि ओर...”
तो वह उसी लोक-स्त्री की सहचरी लगती है जो सावन में साजन को पुकार रही है। शास्त्र और लोक के बीच जो दूरी हमें दिखाई देती है, वह अनुभव के स्तर पर कहीं नहीं है। विद्यापति के पद में जो आँसू हैं, वही आँसू कजरी के स्वर में हैं।
कालिदास के मेघ में जो संदेश है, वही संदेश पुरवइया लेकर चलती है। संस्कृत का यक्ष और भोजपुरी-अवधी की विरहिणी, दो अलग समयों और भाषाओं में होते हुए भी, अंततः उसी मनुष्य के रूप हैं जो अनुपस्थित प्रिय को प्रकृति में खोजता है।
यही भारतीय काव्य-चेतना का सौंदर्य है, यहाँ प्रकृति कभी केवल प्रकृति नहीं रहती।
बादल स्मृति हो जाता है।
नदी प्रतीक्षा।
पवन स्पर्श।
रात विरह।
और वर्षा मिलन की संभावना।
सावन में नीम की डाल पर झूला पड़ता है। हरी चूड़ियों की खनक में एक पूरा मौसम जाग उठता है। हथेलियों पर मेहँदी की बेलें उतरती हैं। पायलें भीगी मिट्टी पर धीमी आवाज़ करती हैं। सखियाँ एक-दूसरे को झुलाती हैं और झूला ऊपर उठता जाता है। उस क्षण लगता है जैसे मन पृथ्वी से छूटकर आकाश को छू लेना चाहता है। फिर झूला नीचे आता है। यही प्रेम है―ऊपर उठना और फिर मिट्टी की ओर लौट आना।
झूला इसीलिए केवल सावन का खेल नहीं; जीवन का प्राचीन रूपक है। मिलन और वियोग, आशा और निराशा, प्राप्ति और अभाव, सब उसी लय में हैं। मनुष्य जानता है कि कोई भी ऊँचाई स्थायी नहीं, फिर भी वह झूलता है। प्रेम का साहस शायद यही है कि लौट आने की नियति जानते हुए भी मनुष्य उड़ने से नहीं डरता।
कजरी इसी उड़ान और लौटने के बीच जन्म लेती है। वह रोती है तो उसकी लय में संगीत है। वह हँसती है तो हँसी के पीछे एक महीन-सी नमी रहती है। वह प्रेम करती है तो विरह को साथ लेकर। इसीलिए सावन का उल्लास कभी बिल्कुल उजला नहीं होता। उसमें कहीं न कहीं एक साँवली छाया रहती है और शायद इसी छाया में उसका सौंदर्य है।
सावन आदिम गंधों से विन्यस्त हो उठता है। भीगे गोबर से लिपे आँगन की मिट्टी, चूल्हे के धुएँ में घुलती लकड़ी की गरमाहट, सब मिलकर ऐसा संसार रचते हैं जिसे आँखें नहीं, स्मृति देखती है।
जेठ के आतप से जले, आषाढ़ में अतृप्त रह गई मिट्टी किसी पुराने प्रेमी की चिट्ठी खोलती है। उसमें कुछ ऐसा है जो भीतर जाकर एक पुरानी टीस को छूता है। जैसे किसी ने नाम लेकर पुकारा हो और हम मुड़कर देखें तो वहाँ कोई न हो। झिर-झिर गिरती बूँदें जीवन के संयोग का ऐसा विन्यास रचती हैं, जहाँ इच्छाएँ हैं, स्मृतियाँ हैं, देह की अनाम सिहरन है और प्रेम की वह आदिम आकांक्षा है जिसे सभ्यता ने कितने ही नाम देकर भी पूरी तरह समझा नहीं।
और फिर भोर का पारिजात! रात के अँधेरे में खिलकर सुबह तक धरती पर झर चुके वे श्वेत फूल, जिनके मध्य में नारंगी-सी लौ अब भी जलती रहती है। कोई उन्हें टूटते नहीं देखता। वे बस भोर में मिलते हैं जैसे रात ने अपने स्वप्न चुपचाप आँगन में रख दिए हों। भीगी दूब पर पड़े पारिजात के फूलों को देखते हुए लगता है कि सौंदर्य का सबसे करुण रूप शायद वही है जो खिलकर भी टिकता नहीं।
क्या प्रेम भी ऐसा ही नहीं?
जो हमारे पास रहता है, वह धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाता है। जो दूर चला जाता है, वह स्मृति में एक उजली गंध की तरह बचा रहता है। उसकी आवाज़ कभी किसी गीत में सुनाई देती है, उसका चेहरा किसी बारिश में दिखाई देता है, उसकी छुअन किसी हवा के झोंके में लौट आती है। मनुष्य उसे छू नहीं सकता, पर उससे मुक्त भी नहीं हो सकता।
विरह प्रेम का अभाव नहीं है। विरह वह जगह है जहाँ प्रेम समय से बच जाता है। मिलन में प्रेम देह और दिनचर्या का हिस्सा बनता है; विरह में वह स्मृति, प्रतीक्षा और कल्पना का। इसी कारण विरह में प्रेम कभी-कभी अपने सबसे उज्ज्वल रूप में दिखाई देता है। जो सामने है, उसे हम देख लेते हैं; जो दूर है, उसे मन लगातार रचता रहता है। कजरी इसी रचे हुए प्रेम की संगीतात्मक स्मृति है।
अब शहरों में सावन आता है, लेकिन उसकी आहट बदल गई है। ठोस ऊँची इमारतों के बीच बादल घिरते हैं। खिड़कियाँ बंद रहती हैं। मिट्टी की जगह सीमेंट है। वर्षा होती है, लेकिन सोंधी गंध उतनी दूर तक नहीं जाती। झूले की जगह स्क्रीन है। चिट्ठी की जगह संदेश है। परदेस अब बैलगाड़ी की दूरी नहीं, एक विमान की दूरी है। फिर भी मनुष्य की प्रतीक्षा नहीं बदली।
आज भी कोई किसी संदेश की प्रतीक्षा करता है।
आज भी कोई रात में पुराने संवाद पढ़ता है।
आज भी किसी बारिश में कोई अचानक उदास हो जाता है।
आज भी किसी गीत की एक पंक्ति किसी बीते हुए व्यक्ति को वर्तमान में खड़ा कर देती है।
दूरी के साधन बदल गए हैं, दूरी नहीं।
प्रेम की भाषा बदल गई है, विरह नहीं।
इसीलिए कजरी आज भी हमारे लिए आवश्यक है। वह हमें उस मनुष्य तक वापस ले जाती है जो हमारे भीतर आधुनिकता की बहुत-सी परतों के नीचे दब गया है, वह मनुष्य जो वर्षा को केवल मौसम नहीं समझता था; जो हवा में संदेश सुनता था, बादल में प्रिय का चेहरा, नदी में समय और मिट्टी की गंध में घर।
लोक अतीत नहीं है। लोक मनुष्य की बची हुई स्मृति है और कजरी उस स्मृति की धड़कन।
जब घटाएँ उतरती हैं, तब लगता है कि आकाश अपना कुछ खोकर धरती को दे रहा है। बादल खाली होता जाता है और धरती भरती जाती है। शायद प्रेम भी ऐसा ही है, अपने को थोड़ा-थोड़ा खोकर किसी दूसरे में भरते जाना।
इसलिए सावन में बरसती हुई वर्षा को केवल देखना पर्याप्त नहीं। उसे सुनना चाहिए खपरैल पर, पत्तों पर, कुएँ के जल पर, तालाब की थरथराती सतह पर। उसे सूँघना चाहिए भीगी मिट्टी में। उसे छूना चाहिए नीम की गीली छाल पर, घास की ठंडी नोक पर, उस हवा में जो अचानक जेठ की तपन भूलकर देह के पास आ बैठती है।
और यदि कभी किसी सावनी रात में, जब चारों ओर वर्षा की झमाझम हो और दूर कहीं मेढकों की टर्राहट के बीच कोई अकेला कंठ कजरी छेड़ दे, तो उसे केवल गीत मत समझिएगा। हो सकता है उस आवाज़ में किसी बहुत पुराने समय की एक स्त्री बोल रही हो। हो सकता है वह अपने साजन को पुकार रही हो। हो सकता है वह किसी ऐसे व्यक्ति को पुकार रही हो जो अब इस संसार में है ही नहीं। हो सकता है वह स्वयं अपने बीते हुए जीवन को पुकार रही हो। या शायद वह हम सबको पुकार रही हो जो अपने-अपने महानगरीय परदेसों में रहते हुए भी भीतर कहीं एक कच्चा आँगन बचाए बैठे हैं।
रात गहराती जाएगी। वर्षा की बूँदें खपरैल से टपकती रहेंगी। नीम की डाली पर पड़ा झूला हवा के बिना भी थोड़ा-सा हिलेगा। आँगन में पारिजात झरता रहेगा। और वह स्त्री शायद अब भी देहरी पर बैठी होगी। उसका साजन आए या न आए, सावन कोई वचन नहीं देता। वह केवल प्रतीक्षा को सुगंध दे देता है। इतना कि अनुपस्थित भी उपस्थित लगने लगे। इतना कि बीता हुआ समय लौटकर वर्तमान की हथेली पर सिर रख दे। इतना कि एक पुराना गीत सुनते हुए मनुष्य अचानक अपने भीतर किसी बंद कमरे का द्वार खुलता हुआ महसूस करे।
फिर कहीं बहुत दूर से वही आवाज़ आएगी :
“पूरब से आई कारी बदरिया...”
और शायद इस बार गीत पूरा होने से पहले ही वर्षा थम जाएगी। बादल धीरे-धीरे उजले होंगे। भोर उतर आएगी। भीगी दूब पर पारिजात के फूल पड़े होंगे। किसी पेड़ से एक आखिरी बूँद टपकेगी। और उस एक बूँद के गिरने की ध्वनि में जाने कितने सावनों की स्मृति एक साथ काँप उठेगी। तब समझ में आएगा, प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह नहीं जिसे हम बाँहों में भर लेते हैं। उसका सबसे दीर्घजीवी रूप वह है जो हमारे हाथों से छूटकर भी हमारी गंध में, हमारे गीतों में, हमारी ऋतुओं में बना रहता है। मनुष्य चला जाता है। ऋतु बीत जाती है। गीत भी कभी-कभी थम जाता है। पर प्रेम वह मिट्टी की तरह रहता है। पहली बारिश में फिर महक उठने के लिए।
और कजरी?
वह उसी महक की आवाज़ है। एक ऐसी आवाज़, जो सावन बीत जाने के बाद भी सुनाई देती रहती है किसी पुरानी देहरी के पार, किसी भीगे हुए आँगन में, किसी स्त्री की स्मृति में, किसी विरही हृदय की धड़कन में।
और तब लगता है कि फिर बरस बाद भी जब सावन की पहली बूँद धरती को छुएगी, कहीं भीतर कोई पुरानी कजरी करवट लेगी। कोई परिचित-सी गंध उठेगी, पारिजात झरेगा और मन जाने किस बीती हुई देहरी की ओर देर तक देखता रहेगा।
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