रील रसाचार्य : रील में भागते लोग
रचित
18 अक्तूबर 2026
यह देश एक महामेला है। वैसे तो पूरी दुनिया ही मेलों से बनी-बढ़ी है और मेले और बाज़ार ही थे जिन्होंने इस उपमहाद्वीप को हमेशा के लिए बदल दिया। पुर्तगाली, यूनानी, डच, फ़्रांसीसी, अँग्रेज़ यह सब यहाँ की हाट-बाज़ारों और मेलों में आकर मसाले खरीदने के लिए ही देश पर टूट पड़ी थे। यह देश सबका स्वागत करने वालों का देश था, कहीं न कहीं आज भी है।
सदियों से चले आ रहे महामेले की जुटान से ही इस देश का समूह-बोध बना है, जिसमें नस्लें और जातियाँ आ-आकर शामिल होती रहीं, सीखतीं-सिखातीं, अपने करतब दिखातीं और हमारे करतब देखते हुए इतिहास के भूगोल को महकाती रहीं। यहाँ जो भी हुआ, जैसे भी हुआ, सब अपनी भीतरी बनावट में मेले के ही स्थापत्य पर हुआ। यहाँ झगड़ा हुआ तो मेला लगा, जेसीबी की खुदाई हुई तो मेला लगा। यह मूलतः देखने वाले जिज्ञासुओं और उस देखे को बताने वाले क़िस्साख़ोरों, उस बताए की व्याख्या करने वाले व्याख्याकारों, व्याख्या में गणित जोड़कर आगे की भविष्यवाणियाँ करने वाले नजूमियों और इन प्रवृत्तियों को दूर से देखकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सूत्रबद्ध करने वाले दार्शनिकों का देश था। यहाँ सेनाएँ लाम पर जातीं तो अपने साथ परिवार, बच्चे, कवियों, जादूगरों, मसख़रों और दूसरे मनोरंजनकर्ताओं का एक पूरा चलता-फिरता शहर उनके साथ जाता था। स्वाधीनता आंदोलन में जहाँ सामने पुलिस बंदूक़ों के साथ मुस्तैद होती थी वहाँ भी भीड़ में कोई छोटा-सा समूह गीत गा रहा होता, कहीं लोग चरख़ा कात रहे होते, कहीं कोई बाज़ीगरी का खेल दिखा रहा होता। गांधी के आंदोलनों में यह मेलावृत्ति कम या ज़्यादा मात्रा में सदैव मौजूद रही। आज भी आपको जंतर-मंतर के किसी आंदोलन में चरख़ा कातते हिमांशु कुमार और गाते-बजाते युवा दिख ही जाएँगे।
फ़िलहाल देश में आंदोलन का माहौल है और जैसा कि ऊपर कह चुका हूँ, यहाँ हर जुटान अंततः एक मेला है। इसी मेले में अलग-अलग प्रतिभाओं के लोग पहुँच रहे हैं। रीलें बना रहे हैं। इन रिलहों की के पहुँचने से आप यह समझें कि इसके बाद भी आंदोलन का जज़्बा कहीं कमज़ोर और अगंभीर हो रहा है, जी नहीं वह अपनी जगह क़ायम है।
यहाँ ‘रिलहे’ शब्द का प्रयोग मैं मज़ाक़ उड़ाने के उद्देश्य से नहीं कर रहा हूँ, न ही मैं इन रील बनाने वालों को अपमानित करने जैसा कुछ कर रहा हूँ, मैं तो इस शब्द के सत्व की रक्षा कर रहा हूँ। यहाँ फ़र्नांदो पेसोआ को कोट करना मज़ादायक रहेगा :
किसी चीज़ को अभिव्यक्त करने का मतलब है; उसके गुण को संरक्षित करना, उसके आतंक को निकाल देना।
मैं यहाँ इस ‘रिलहे’ शब्द के इसी गुण की रक्षा का प्रयास कर रहा हूँ और इस पर चिपके अगंभीर, अनर्गल और मूल्यहीन होने के आतंक को ख़त्म करने का भी।
मैं जब आंदोलन में रिलहों (ठीक है, रीलर्स) के बारे में सोचता हूँ तो सबसे ऊपर मुझे ज़ुल्फ़िकार फ़ार्मेसी के बुज़ुर्ग याद आते हैं, हालाँकि जिन्हें बुज़ुर्ग कहना ख़ुद उनकी मर्दाना कमज़ोरी की दवाओं का अपमान होगा और उनकी फ़िटनेस का भी। मुझे सबसे पहले यही क्यों याद आए? सोचता हूँ, शायद जो मैं करने का प्रयास कर रहा हूँ—गुण की रक्षा, आतंक का ख़ात्मा, ब्लाह-ब्लाह—मैं ख़ुद भी इसका शिकार हूँ। मेरी समझदारी में यह बात नहीं समाती कि रील में हमेशा प्रेमिकाओं-पत्नियों के प्रेम में दवा खाकर पलंग तोड़ देने की सही तकनीकें और क़ुव्वत बेचने वाले ये बुज़ुर्गवार, जो खोई हुई जवानी वापस दिलवाने के दावाकार हैं, इस तरह इस जवानी के जलसे में शामिल हो जाएँगे। मेरे लिए यह जवानी की दो तरह की चिंताओं को एक ही माज़ून देने जैसा लगा।
बहरहाल, मुझे आंदोलन में उनकी गरजती हुई आवाज़ सुनकर मुझे अच्छा लगा। इस आवाज़ मैंने इससे पहले उनके मुँह से सुना था—“होश में आ...” इस रील में वह भटके हुए नौजवानों और बचपन की ग़लतियों से परेशान अधेड़ों को लगभग हड़का रहे थे। आंदोलन में वह अपनी उसी बैठकर जम गई आवाज़ में कुछ-कुछ बोल रहे थे, उनकी बैठी हुई आवाज़ कुछ इस अदा से बैठी लगती है कि वह खड़े होने के किसी भी अमल के ख़िलाफ़ एक व्यक्तिगत सत्याग्रह हो, लेकिन वह खड़े हैं और खड़े होकर इस आंदोलन के पक्ष में बात कर रहे हैं। वह कोई नई बात नहीं कर रहे हैं। देखा जाए तो आंदोलन नई बात करने के लिए होता भी नहीं। आंदोलन समवेत स्वर में एक ही बात के बार-बार अनेक कंठों से व्यक्त होने का नाम है। आंदोलन ऐसे ही बनते हैं, ऐसे ही मेले बनते हैं, ऐसे ही राय बनती है, ऐसे ही लोकतंत्र, ऐसे ही वह ललकार बनती है... जिसे बनाते हैं हम भारत के लोग या हम दुनिया के किसी भी ख़ित्ते के लोग, जिसका आग्रह देश का संविधान भी करता है और मनुष्यता का साझा इतिहास भी।
मैं अब जिस दूसरी शख़्सियत की बात कर रहा हूँ; उन्हें रीलर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे फ़िल्म और मनोरंजन की दुनिया की बड़ी हस्ती हैं। मैं उनका फ़ैन हूँ, मैं बात कर रहा हूँ राखी सावंत की। राखी सावंत अपने आपमें एक आर्ट फ़ॉर्म हैं। अगर कोई इंसान ऑथेंटिक और संदिग्ध एक ही साथ हो सकता है तो वह या तो राखी सावंत है या फिर आलोकधन्वा। राखी स्ट्रेट फ़ॉरवर्ड हैं। लेकिन वह हर दिन अलग तरह से स्ट्रेट और अलग तरह से फ़ॉरवर्ड होती हैं। वह रैंडम, बहुत रैंडम और इस रैंडम में बहुत डिसिप्लिंड हैं। इसे लोग नौटंकी कहते हैं और ड्रामा भी।
मैं जानता हूँ कि मेलों के इस देश में ये दो ही चीज़ें बड़े अभ्यास और प्रतिभा से सधती हैं। मैंने बचपन में नौटंकियों के क़िस्से सुने हैं और गाँव में ड्रामे देखे हैं, मैं दावे से कह सकता हूँ कि राखी एक बड़ी आर्टिस्ट हैं। मुम्बई में हुए हालिया प्रोटेस्ट में उनका आना एक बड़े समुदाय को इससे जोड़ता है।
इस आंदोलन का सबसे बड़ा आकर्षण बन गया निखिल वर्मा नाम का एक लड़का। निखिल के मशहूर होने की वजह बना उसके भागने का तरीक़ा। जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया और निखिल जिसके शरीर की लंबाई सामान्य से कम है, वह वैसे ही भागा जैसे ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ का टिरियन लैनिस्टर भागता। उसके भागने में एक पुराने मोबाइल गेम की आहट सुनकर लोगों ने ‘सबवे सर्फ़र’ बोलना शुरू किया और निखिल का यह—“अरे पुलिस आ गई, पुलिस आ गई” कहकर भागना देखकर पहले तो उनकी चिंता हुई, फिर प्यारा लगा, इतना प्यारा लगा कि रील की दुनिया में वह बहुत तेज़ी से वायरल हो गए। फिर उनके कई वीडियो आए और निखिल लगभग एक सेलिब्रिटी बन गए। आंदोलन में कहीं कार की छत पर खड़े होकर भागने का अभिनय करते दिखे और कहीं आरएएफ़ के एक जवान ने उन्हें गोद में उठा लिया है और ले जा रहा है। आरएएफ़ की वर्दी में हँसते पुलिस वाले की गोद में निखिल को देखना एक अजीब तरह से सुखद दृश्य था।
एक और लड़के की रीलें इधर काफ़ी देखी गईं, जो व्हीलचेयर पर बैठकर इस आंदोलन में शामिल हुआ था। इसी तरह बहुत सारे यूट्यूबर्स और रीलर यहाँ भागते दिखे। सब भागने वालों को रील में देखता हुआ सोचता हूँ कि रील कितनी आगे निकल गई है। जीवन भर की स्क्रॉलिंग और समय से कहीं आगे।
यह भी सोचता हूँ कि आख़िर कितने लोग ऐसे भी होंगे जो रील के लिए आंदोलन में जा रहे हैं। वे भी भाग रहे हैं, रील बन रही है। उनके पीछे पुलिस भाग रही है यह ध्यान रखते हुए कि उनकी रील न बन जाए इन पुलिस वालों के पीछे वे भाग रहे हैं जिन्हें इन भागते पुलिस वालों की रीलें बनानी हैं और नज़र नहीं आना है।
आंदोलन की रीलों में एक रील का आंदोलन भी है और यह आंदोलन एक तरह से रील के संसार का प्रतिबद्धता के संसार में प्रवेश है। बना लेने, चूक जाने, बनते-बनते न बन पाने, ज़बरदस्ती बना लेने, बना ही लेने के बहुत-से मरहलों से गुज़रती हुई मोबाइल पर आंदोलन की रील आती है और मैं घर बैठा आंदोलन पर एक राय बनाकर ‘रील रसाचार्य’ बनने की बेशर्मी ओढ़े उसे देखता हूँ।
हम ज़मीन के संघर्ष और उस संघर्ष के भी सबसे अगंभीर हिस्से पर लिखते-पढ़ते हुए एक पिछड़े शब्द की आड़ में अपनी भाषा को रील में अँटाने की कोशिश करते ग़ैर-ईमानदार हैं और इस तरह हम एक महामेले, एक आंदोलन के संजय बनने का भ्रम पाले हैं। संजय अवध्य है; क्योंकि वह आंदोलन में नहीं जाता, सिर्फ़ रील देखकर धृतराष्ट्रों को हाल-चाल सुनाता है। संजय ‘महाभारत’ का पात्र नहीं है, संजय व्यास भी नहीं है, तो संजय क्या है? संजय एक स्थायी स्तंभ है, जिसने हाल सुनाने हल उठा रखा है।
यह दुनिया एक विराट महामेला है, जिसमें सब अपने-अपने हिस्से का ‘महाभारत’ लड़ रहे हैं। भाग रहे हैं। एक रील में कभी निखिल वर्मा भागता है, दूसरी में कभी ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ का जॉन स्नो तलवार लेकर घुड़सवारों की सेना के आगे खड़ा हो जाता है। ‘वेल, विंटर इज़ कमिंग...’ रील से रजाई नहीं निकलेगी। अभी धूप है, रजाई सुखा लीजिए, कंबल धो लीजिए, उसमें घुस के रील देखने का मज़ा ही अलग है। मिलते हैं अगली बार किसी और स्क्रॉल की मैराथन के साथ...
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