रील रसाचार्य : माटी को पुतरा कैसे नचत है
रचित
20 सितम्बर 2026
रील का क्या है! ‘हिन्दवी’ ने एक कॉलम घोषित किया था : ‘रीलमरील’। इसे जिन्हें लिखना था, वह लिख नहीं पाए। इसके बावजूद समय-समय पर इस कॉलम के अंतर्गत तीन लेख आए, जिनमें से एक मैंने भी लिखा। फिर यह कॉलम स्थगित रहा। इसके बाद हाल ही में ‘हिन्दवी’ के संपादक-मंडल ने तय किया और मुझे सूचित कि इस कॉलम को री-डिफ़ाइन किया जा रहा है और अब इसका नाम होगा : ‘रील रसाचार्य’! ‘रील’ के आगे ‘रस’ तक तो ठीक था, लेकिन ‘आचार्य’ जैसा शब्द आते-आते मैं थोड़ा चौंका, हालाँकि चौंकने वाली सूचना इसके आगे थी कि यह कॉलम मुझे लिखना है और वह भी साप्ताहिक! जैसे-तैसे महीने दो महीने में एक ‘बेला’ लिख पाने वाले मुझे इस सूचना ने एक अजीब से ख़लफ़शार [अर्थ के लिए ‘रेख़्ता डिक्शनरी’ देखें... यह शब्द मैंने एक रील में सुना था, अच्छा लगा तो लिख दिया] में डाल दिया।
इस स्थिति की सबसे बड़ी वजह इस कॉलम का दिन था : इतवार... ‘हिन्दवी’ पर आने वाला वृहत पाठक-समुदाय इस तथ्य से परिचित ही है कि ‘हिन्दवी’ पर इतवार की सुबह; आधे साल भर भारी तोड़-फोड़ वाले गद्य और साहित्यिक-सामाजिक विमर्श का केंद्र बनी रहती है, जहाँ से वाक् और भाषा से संभव हर उपलब्धि और ख़तरे का सीधा संबंध मैंने अपनी आँखों से देखा है।
ख़ैर, इस सूचना ने मुझ ‘अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम’ पर यह जो ज़िम्मेदारी और साथ ही भरोसा डाला है; उसके भावपक्ष से तो मैं प्रफुल्लित हूँ, लेकिन कलापक्ष से आक्रांत भी। यह सीधे-सीधे मेरे दो प्रिय स्तंभों ‘रविवासरीय’ और ‘बिंदुघाटी’ के क्लासिक-वैचारिक कवि-समय में रील-स्क्रॉल करते हुए ग़लती से पहुँच जाने जैसा है; फ़िर याद करता हूँ कि कितनी जगहें हैं, जहाँ मैं रील स्क्रॉल करते ही पहली बार पहुँचा था...
पहली बार... चलो यहीं से शुरू करते हैं...
मैंने पहली रील कौन-सी देखी थी?
मैंने पहली रील कौन-सी देखी... यह तो याद नहीं; लेकिन किस तरह की रीलें उस समय देखी जा रही थीं, यह याद है। वह डांस और लिप सिंक के शॉर्ट वीडियो का शुरुआती ज़माना था, जिनमें फ़िल्टर्स की भरमार होती थी। ऐप का नाम था : ‘म्यूज़िकली’ [Musical.ly]। रोहित नाम का एक लड़का जो पान मसाला [गुटखा] खाते हुए अजय देवगन के किसी डायलॉग या कुमार सानू के किसी गाने पर लिप सिंक करता था। एक और बहुत कम-उम्र लड़का था, जो फ़व्वारे या कहीं से भी उसके मुँह पर गिरते पानी में बेतरह [ज़ाहिर है बेवजह भी] रो-रोकर आँखें लाल किए रहता था। पुनीत सुपरस्टार जो अपने-आपमें एक आर्ट-फ़ार्म है, उसकी शुरुआत भी यहीं से हुई थी। एक और लड़की जिसका नाम संचिता बासु था। वह बहुत सुंदर डांस और एक्टिंग की वीडियो बनाती थी। संचिता फ़िलहाल डिज़्नी प्लस हॉटस्टार की एक सीरीज़ ‘ठुकरा के मेरा प्यार’ में मेन लीड है।
वर्ष 2017-2018 में रिकॉर्डतोड़ डॉउनलोड्स और एक्टिव यूज़र से इस ऐप की लोकप्रियता किसी भी दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से बहुत आगे निकल गई थी। इस ऐप ने छोटे क़स्बों और यहाँ तक कि गाँव तक की नौजवान आबादी के बीच कुछ ऐसी और इतनी तेज़ी से लोकप्रियता हासिल की, जिसे आप सिर्फ़ ‘रातोंरात सफ़लता’ के मुहावरे से ही समझ सकते हैं। आगे चलकर एक अन्य कंपनी ने इसे ख़रीद लिया और ‘म्यूज़िकली’ को नया नाम मिला : ‘टिकटॉक’।
पिछले सारे रिकार्ड ध्वस्त करते हुए ‘टिकटॉक’ सबसे ज़्यादा एक्टिव यूज़र वाला प्लेटफ़ॉर्म बना। समाजशास्त्रियों को एक नया शब्द मिला : ‘टिकटॉकर्स’। देश के हर शहर, क़स्बे, यहाँ तक कि गाँव तक में ऐसी जगहें विकसित हुई; जिन्हें मज़ाक़ में ‘टिकटॉक वालों का हॉलीवुड’ कहा गया। ये वे जगहें थीं जहाँ ‘टिकटॉकर्स’ अपने वीडियो रिकॉर्ड करते थे। पार्क से लेकर हाइवे, खेत से लेकर बाज़ार... ये जगहें कुछ भी हो सकती थीं। जहाँ ऐसी कोई जगह नहीं थी, वहाँ ये टिकटॉकर्स नगर पालिका की लगाई ‘आई लव झुमरी तलैया’ टाइप बोर्ड्स में बने दिल की डिज़ाइन में तीर की तरह घुसकर साक्षात् क्यूपिड का भारतीय संस्करण होने पर आमादा थे। अब क़स्बों और शहरों में अजीब-से रंग-बिरंगे बाल और अतिचुस्त पैंट पहने सड़क पर कुछ विचित्र करते रंग-बिरंगे युवा आम हो गए। भीड़ भरे शहरों में ये जियाले सुबह जल्दी उठकर कुहरा, गर्मी, सूरज, वर्षा, भीड़, शोर सबको बाईपास करके छापामार ढंग से अपना काम करते रहे। आज भी आप इतवार की अलस्सुबह किसी पब्लिक स्पेस पर इन्हें अद्यतन फ़ैशन में पा ही जाएँगे... जैसे : दिल्ली के कनॉट प्लेस में।
‘टिकटॉक’ पर सोफ़िया अंसारी एक फ़िनोमिना की तरह उभरी। हर तरफ़ उसके वीडियो थे। सोफ़िया की उसके कपड़ों लेकर बहुत ट्रोलिंग हुई और ट्रोलिंग करने वालों में दिल्ली-एनसीआर की वे फ़ीमेल रोस्टर्स सबसे आगे थीं, जो उन दिनों किसी वजह से ख़ुद वैसे कपड़े नहीं पहन पा रही थीं। आज सोफ़िया अंसारी म्यूज़िक वीडियो और मॉडलिंग प्रोजेक्ट्स में दिखाई देती रहती है और उसे ट्रोल करने वालियाँ अब सोफ़िया के अंदाज़ में वीडियो पोस्ट कर रही हैं।
इन ‘टिकटॉक’-वीडियोज़ में अलग-अलग चेहरे, अलग-अलग परिवेश, अलग तरह का अंदाज़ था। अगर एक तरफ़ किसी गाँव-क़स्बे की लड़की की वीडियो थी, तो दूसरी तरफ़ कोई मेट्रो सिटी की लड़की अपनी कॉलोनी के पार्क से वीडियो बना रही थी। कहीं कोई जोकर बनकर एक ही एक्सप्रेशन से सेलिब्रिटी बन गया था, तो कहीं कोई यूट्यबर इन्हें रोस्ट करके एशिया का नंबर-1 यूट्यूबर।
इस बीच मई-2020 में एक टिकटॉकर और एक यूट्यूबर की लड़ाई उस साल का सबसे बड़ा सोशल मीडिया हाइलाइट बन गया था, जबकि यह वही साल था जब कोविड-19 ने दस्तक दी थी।
इसी समय में कई दूसरे तरह के वीडियो ऐप भी लोकप्रिय हो रहे थे। जहाँ दिल और फूल जैसे स्टीकर के ज़रिये आप क्वाइंस भेज सकते थे, जिन्हे पैसे में कंवर्ट किया जा सकता था। अब तो यह ऑप्शन फ़ेसबुक ने भी दे दिया है, पर इसकी शुरूआत उसी दौर में देखी जा सकती है। वीडियो देखकर ऑनलाइन पैसा देने वालों की और ऑनलाइन पैसा कमाने वालों की एक नई तरह की कम्युनिटी बन रही थी। इसमें बड़ा प्लेटफ़ॉर्म था : विगो लाइव, जहाँ लोग अपनी-अपनी रुचि और प्रतिभा के अनुसार पैसा कमाते थे। इसमें ऑनलाइन झगड़े से लेकर ऑनलाइन मुजरा तक होते मैंने देखा है। यहाँ काफ़ी समझदार और जेनुइन लोगों को भेड़ियों के बीच लगभग लिंच होने का भी मैं गवाह रहा हूँ। गाली-गलौज, धमकियाँ, फ़र्ज़ी शेख़ी बघारना, जाति-धर्म का अहंकार और यौन-कुंठा; यानी वह सब जो हमारे समाज में है... अपने सबसे विकृत रूप में इन ऐप्स पर लाइव पर था। इन पर सक्रिय लोग अक़्सर मास्क, फ़िल्टर, चश्मा या कुछ भी ऐसा इस्तेमाल करते थे; जिससे उन्हें पहचाना न जा सके। इस लिहाज़ से गाना गाते हुए या फ़नी कॉमेडी करते हुए वीडियो वाली ‘टिकटॉक’ कहीं बेहतर जगह थी। कुल-मिलाकर देश में शॉर्ट वीडियो देखने और बनाने वालों की एक बड़ी कम्युनिटी तैयार हो गई थी।
अब आगे : 29 जून 2020 आता है। हर ‘टिकटॉकर’ के दिल में यह दिन किसी आपातकाल की तरह दर्ज है। इस दिन ही भारत सरकार चीनी ऐप्स को बैन करने का निर्णय लेती है, जिसमें बड़ी संख्या में यही सब ऐप थे और उनमें से एक था ‘टिकटॉक’। बहुत सारे लोग जो रात या दिन 10-10 घंटे लाइव रहकर पैसा कमाते थे, अच्छा-ख़ासा लाइफ़-स्टाइल मेंटेन कर रहे थे या इसे अपनी जीविका का साधन बना चुके थे; वे सब सन्न रह गए। वह मातम जैसा दिन था और कई जगहों से बुरी ख़बरें आईं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी। इस तरह की और भी कई घटनाएँ हुईं। वे जो मोबाइल-स्क्रीन पर सेलेब्रिटी थे, एक बड़ी आबादी जिनके लाइव आने का इंतिज़ार करती थी, उन्हें ऑनलाइन तोहफ़े भेजती थी, वे लोग एकदम-से साधारण इंसान बन गए थे; जिन्हें शायद कोई किराने वाला उधार में सौदा भी न दे। यहाँ एंडी वारहोल का ‘15 मिनट फ़ेम’ याद आता है कि “भविष्य में हर कोई 15 मिनट के लिए फ़ेमस हो सकेगा।”
अब पहले से मौजूद हर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को यह समझ में आ गया कि टेक्स्ट का ज़माना गया, अब सब कुछ वीडियो है और सारे लीडिंग प्लेटफ़ॉर्म्स ने इस सेगमेंट में घुसने की तैयारी शुरू कर दी और साथ ही टिकटॉक के फ़ेमस चेहरों को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर लाने के लिए हाथ-पाँव मारने लगे।
अगस्त 2020 में इंस्टाग्राम ने रील फ़ीचर लॉन्च किया। सब कुछ वही जो ‘म्यूज़िकली’ और ‘टिकटॉक’ की रेसिपी थी, बस ब्रांड नाम अपना। यूँ तो ऐसे बहुत सारे प्लेटफ़ॉर्म उस समय रोज़ लॉन्च हो रहे थे; लेकिन ऐसी प्रतियोगिताओं में वही जीतता है; जिसके पास पहले से ही ठीक-ठाक संख्या में यूज़र और संसाधन हों, इसीलिए इंस्टाग्राम का वीडियो-सेगमेंट सबसे आगे निकल गया और पूरे देश पर छा गया, जिसे हम आज ‘रील’ कहते हैं।
इस तरह ‘रील’ भारत में आई और वैसे ही छा गई जैसे ‘माचिस’। आज किसी भी ब्रांड की दियासलाई हो, हम उसे ‘माचिस’ कहते हैं और शायद अब बहुत लोग यह भी न जानते हों कि ‘माचिस’ एक ब्रांड का नाम है, उस चीज़ का नहीं जिसका निर्माण ‘माचिस’ नाम की एक कंपनी करती थी। इसी तरह आज चाहें यूट्यब शार्ट्स हों या ट्विटर के एक्स वीडियोज़, सबका नाम रील ही है। यहाँ यह भी जोड़ना ज़रूरी है कि इंस्टा पर आईजीटीवी नाम से पहले से एक वीडियो-सेक्शन था, पर वह किसी सरकारी अनुदान पर चलते थकनशील एनजीओ जैसा था। जहाँ कुछ नहीं था, जहाँ कोई नहीं था... अपने दो-एक वीडियो पोस्ट करके भूल गए लोगों के सिवा। ये लोग ही महीने या पंद्रह दिन में वहाँ जाकर अपने वीडियो ख़ुद ही देख आते थे।
दुनिया के दूसरे देशों में ‘टिकटॉक’ मज़े से चल रहा है और ज़ुकरबर्ग पर दबाव बनाने के लिए काफ़ी देशों की सरकारें ‘टिकटॉक’ पर बैन हटाने की सूचनाएँ भी प्लांट करती रहती हैं, बदले में इंस्टाग्राम की मातृकंपनी मेटा उन सरकारों की शर्तें मानती रहती है।
तो बात यह है कि ‘रील’ के लिए सिर्फ़ ‘रीलहे’ नहीं नाच रहे; कंपनी, अर्थव्यवस्था, सरकार और बाज़ार सब नाच रहे हैं : उसी के इशारे पर जिसने रील बनाई नहीं, बनवाई, जिसने मेटा बनाया और जिस पर आरोप है कि उसने कई देशों में सरकारें भी बनवाईं...
एनीवे, नाच तो धरती भी रही है और सूरज भी और माटी का पुतला भी : जब रील नहीं थी तब भी, जब रील है तब भी और जब रील नहीं होगी तब भी।
‘रील रसाचार्य’ की आज की कड़ी में फ़िलहाल इतना ही... अगले सप्ताह रील पर कुछ और बातें की जाएँगी। तब तक अगर आप चाहें तो एक किताब ख़त्म कर सकते हैं...
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