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रील रसाचार्य : फ़ाइव रील-एक्सपेरिमेंट

एक दोस्त के साथ फ़िल्म देख रहा था। हर महत्त्वपूर्ण दृश्य से पहले; आगे क्या होने वाला है, उसे पहले से पता था। जब ऐसा दो बार हो गया तो मैंने कहा कि जब फ़िल्म पहले से ही देख रखी है तो क्या ज़रूरत थी दुबारा यही फ़िल्म देखने की! उसने कहा कि मैंने फ़िल्म नहीं देखी है, हाँ कुछ-कुछ सीन्स देखे हैं—रील्स में।

दोस्त एक नेता का सोशल मीडिया मैनेज करता है। ठेकेदार से नेता बने और दुपहर तक स्कूल गए नेता जी के X (Formerly Twitter) पर अब ज्ञानात्मक-संवेदना की झाईं-सी दिखती है, जिसके 4K वर्जन में मेरे दोस्त का एटीएम कार्ड... 

इधर एक नई चीज़ हुई, आजकल नेता जी के ट्वीट्स में जो उद्धरण जा रहे हैं, वे मेरे दोस्त की पहुँच तो दूर कल्पना से भी परे हैं। मैंने पूछा तो वह बोला, “इंस्टा पर एक पेज है, वहाँ से उद्धरण ले लेता हूँ।”

मैंने बीच में टोका, “दिनमान?”

“नहीं-नहीं ‘दिनमान’ तो स्लाइड-कार्ड है, पेज नहीं। मैं रील की बात कर रहा हूँ। रील से कोट मिल जाते हैं तो नेता जी को चिपका देता हूँ। मस्त पेज है, तुम भी फ़ॉलो कर लो।”

तीन दिन बाद मिले एक दोस्त की दाढ़ी का कट अच्छा लगा, पूछा तो पता चला रील से सीखा है। 

वह आगे बोला, “इसे इटैलियन बियर्ड कहते हैं; तुम्हारे ऊपर भी मस्त लगेगी, आओ कभी हवेली पे... दो साइड कट, दो छोटे कट चिन के नीचे और एकदम सेट।”

चार-पाँच इस तरह के ही और वाक़ये मैंने देखे हैं। जैसे : एक दोस्त के कपड़े पहनने का तरीक़ा एकदम बदल गया, मेरा मतलब बेहतर हो गया। उसने इसका क्रेडिट रील्स को दिया। एक और दोस्त ने अपनी आवाज़ गहरी करने की सफल कोशिश का क्रेडिट रील्स को दिया। इससे पहले वह इसके लिए सिगरेट पीकर फिर ठंडा पानी पीने के बाद बीड़ी पीने के तरीक़े आज़मा चुका था। अब फ़ाइनली वह ख़ुश, तुष्ट और कॉन्फ़िडेंट है—अपनी आवाज़ को लेकर। उसका कॉन्फ़िडेंस देखकर मुझे अच्छा लगा। आवाज़ का क्या है, कॉन्फ़िडेंस बड़ी चीज़ है! 

बॉयज़ हॉस्टल के वॉशरूम जैसी एस्थेटिक के साथ सालों से रहने वाले एक दोस्त के घर गया तो लगा किसी सुरुचिसंपन्न व्यक्ति के घर आ गया हूँ, जो निश्चित ही यह व्यक्ति तो कभी नहीं था। क़रीने से लगी तस्वीरें और पूरा तामझाम देखकर दरयाफ़्त करने पर इसकी प्रेरणा में भी कोई रील और किसी का इंस्टा हैंडल निकलकर आया। 

ये कुछ घटनाएँ हैं जिनकी लाइट में मैं रील को देखता हूँ। रील के बहुत बदनाम चेहरे के पीछे बहुत कुछ ऐसा भी है जो बड़ी बारीकी से बहुत सारे कबाड़ के साथ-साथ लोगों के जीवन में सकारात्मकता भी जोड़ रहा है। 

इस कॉलम का उद्देश्य न तो रील की वकालत करना है, न रील की पहले से बनी हुई एक लापरवाह क़िस्म की इमेज को और पुख़्ता करके लोगों की तय धारणाओं को मज़बूत करना। यहाँ उद्देश्य रील को वैसे देखना है, जैसे वह सिर्फ़ मुझे ही नहीं बाक़ियों को भी दिखती है। मैं अक्सर अपने दोस्तों के बीच एक एक्सपेरिमेंट करता हूँ : सभी दोस्त बारी-बारी से अपने इंस्टाग्राम में जाकर पाँच-पाँच रील सबके सामने स्क्रॉल करके दिखाएँगे कि उनकी फ़ीड कैसी है। इससे हमें अपने दोस्तों की सुरुचियों-कुरुचियों के बारे में पता चलता है। ऐसे एक्सपेरिमेंट में अक़्सर कुछ दोस्त हिचकिचाते-लजाते हैं... मैं ख़ुद भी इसका अपवाद नहीं। कारण वही प्राइवेसी यानी निजता की हमारी समझ; जिसे हमारे समाज में कभी कोई बड़ा मूल्य नहीं समझा गया, लेकिन बाज़ार इसी मूल्य की आड़ में बहुत कुछ बेचता है तो उसने प्राइवेसी को एक अति महत्त्वपूर्ण मूल्य बना दिया है। 

पाँच रील के इस एक्सपेरिमेंट से किसी के बारे में अक्सर ऐसा कुछ पता चलता है, जिससे हम एक लंबे परिचय के बाद भी परिचित नहीं थे। आप चाहें तो यह एक्सपेरिमेंट अपने घर या दोस्तों में अपने रिस्क पर करके देख सकते हैं। चूँकि अब आप ‘रील रसाचार्य’ ही पढ़ ही रहे हैं तो आपको इस प्रकार के निजता-हनन से बचने का तरीक़ा भी बताना हम अपना परम् कर्त्तव्य समझते हैं। तो तरीक़ा यह है कि रील में सर्च कीजिए : ‘हाउ टु रीसेट योर रील हिस्ट्री’। आपको तरीक़ा वहीं मिल जाएगा। लुब्ब-ए-लुबाब यह कि अगर आप कायर हैं और अपना सच स्वीकार करने का साहस फ़िलहाल नहीं जुटा पाए हैं तो दूसरों की सच्चाई देखने से पहले अपनी सचाई डिलीट करके रखिए। 

जब आप इस एक्सपेरिमेंट को वीकली बेसिस पर करने लगेंगे, तब आपको दिखेगा कि लगभग चार-पाँच सेशन यानी लगभग एक-डेढ़ माह बाद आपको एक्सपेरिमेंट से पहले अपनी हिस्ट्री क्लियर करने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी। आपके भीतर एक समझदारी विकसित हो चुकी होगी कि क्या देखना समय की बर्बादी है और क्या देखना बचपन की ग़लती, क्या कुसंगति का असर, क्या देखना आँखों में मिर्च झोंकने के समान है और क्या देखना अपने भीतर झाँकना है। 

इस एक्सपेरिमेंट को शुरू करने से पहले एक ही सावधानी दरकार है कि किसी को यह अंदाज़ा न हो कि आप ऐसा कुछ करने वाले हैं, एक सेशन के बाद इसकी संभावना बहुत ज़्यादा हो जाती है। इसलिए सेशन के बाद भी शेख़ी मारते हुए यह नहीं बोलना है कि इसे आगे भी करेंगे, वरना आपकी तरह सब अपनी-अपनी हिस्ट्री डिलीट करके आ जाएँगे और एक्सपेरिमेंट से मिलेगा ज्ञानरंजन की उस कहानी का शीर्षक जिसे कुंदन सरकार और पेट्रोला की वजह से हिंदी की हर पीढ़ी बार-बार पढ़ती है। 

बाक़ी इस एक्सपेरिमेंट का लाभ आपको तभी होगा; जब आप अपने रील-ट्रुथ को रियल ट्रुथ मानकर रियल होकर इसमें शामिल होंगे, नारियल होकर नहीं...

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अन्य रील रसाचार्य यहाँ पढ़िए : रील रसाचार्य

 

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