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रामलीला : जब देवराज ने रोका लंकाधिपति का रास्ता

लॉकडाउन के बाद पूरे देश ने कोरोना वायरस की क़ैद से निकलकर खुली हवा में साँस लेना शुरू ही किया था। सड़कों पर फिर से गाड़ियाँ दौड़ने लगी थीं, लोगों में बिना डर और हिचक के एक-दूसरे से one-arm distance को कम किया जाने लगा। मेलों में बच्चे और उनसे रौनकें फिर लौटीं। त्योहार हो या शादी, उसमें पचास से बढ़कर फिर हज़ार लोग पहुँचने लगे। इसी बीच कटरा वालों ने भी सोचा—दो साल हो गए, भांजा अपने नाना से मिलने नहीं आया। नाराज़ न हो, इससे पहले न्योता भेज दिया जाए। शोभायात्रा निकाले जाने की तैयारी होने लगी। चौकियों को फिर सजाया जाने लगा, सड़कें साफ होने लगीं, गड्ढे भरे जाने लगे। नए गमले रख दिए गए, चौक-चौराहों पर लाइटें लग गईं, ताकि भांजे के स्वागत में कोई कमी न रह जाए।

तैयारियाँ चल ही रही थीं कि इन सबके बीच देवराज इंद्र को स्मरण हो आया—अब तो कलियुग है। लंकेश से प्रतिशोध का समय आ गया है। त्रेता न सही, द्वापर में भी नहीं, अब युग बदलने से पहले फिर एक बार अचूक प्रयास कर ही लिया जाए। बात उस समय की है, जब तीनों लोक रावण के अधीन हो चुके थे। चर-अचर, देव, दानव, गंधर्व, नवग्रह—सभी पर लंकाधिपति का आधिपत्य हो चुका था। अब बारी स्वर्ग की थी। लंकेश ने मेघनाद को भेजा। देवराज और मेघनाद के मध्य इतना भीषण युद्ध हुआ कि लगा, समूल नाश हो गया। देवराज पर मेघनाद भारी पड़ने लगा था और अंत में स्वयं को अदृश्य कर इंद्र पर हमला किया तथा उन्हें लंका ले जाकर बंदी बना लिया। राजा के बिना राज्य की जो स्थिति होती है, वही स्वर्ग की हुई। समस्या के समाधान के लिए सभी देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा के अनुरोध के बाद देवराज इंद्र को मुक्ति मिली, जिसके बाद उन्होंने इंद्रजीत को अजेय अस्त्र प्रदान किया।

इस बार स्थिति बदल गई। युग त्रेता नहीं, कलियुग हो गया। युद्ध क्षेत्र स्वर्ग नहीं, कटरा का मोहल्ला था। अस्त्र वज्र या अजेय नहीं, बल्कि आँधी, तूफ़ान, मूसलाधार बारिश और कड़कड़ाती बिजली थे। लंकेश के पास पुष्पक विमान नहीं—चाँदी के सिंहासन का हौदा, लकड़ी का हाथी, उसके नीचे पहिया न लगा हो तो चलना मुश्किल। लेकिन देवराज के पास तो फ़ुल फ़ैसिलिटी थी, तिस पर भारी पड़ गए। सारी सेना तैयार थी—वरुण, अग्नि, वायु, मानस पुत्र के साथ। इधर महाराजा रावण बिना तैयारी के।

वरुण देव हाई अलर्ट हो गए। बारिश को डाल दिया ऑटो-पायलट मोड पर। इधर इंद्र देव ने शुरू की बिजली की गड़गड़ाहट। शोर इतना ज़्यादा था कि राजा रावण की सेना रथ, हाथी, अस्त्र-शस्त्र छोड़कर अपनी जान बचाते हुए रेनकोट पहने कुछ दूर तक तो आए, पर बहुत दूर का रास्ता तय कर पाने में असमर्थ रहे। डर बस ये था कि कहीं राजा के साथ उनकी प्रजा भी न भस्म हो जाए। हाथ में पॉपकॉर्न लिए हम लोग इंतज़ार में थे—इस बार “महाराज क्या नया गेटअप लेकर आएँगे।” लेकिन मौसम की मार और सड़कें खस्ताहाल हो गईं, तो उस साल वो अपने ननिहाल वालों से मिलने आए ही नहीं। आए भी तो बस आज़ाद चौराहे से ही उन्हें वापस होना पड़ा और नाना के घर रुके बिना लंका वापस प्रस्थान करना पड़ा।

हाँ, हमारे यहाँ ऐसा ही हुआ है। शायद ही आपने सुना हो कि रावण की पूजा पहले होती हो, फिर राम की आराधना होती है। उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक ज़िला, जहाँ ब्रह्मा ने पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद प्रथम यज्ञ किया था। समुद्र मंथन के बाद अमृत की कुछ बूँदें जिन स्थानों पर गिरीं (हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग), वे सभी पवित्र तीर्थ कहलाए और इन्हीं तीर्थों में तीर्थराज प्रयाग, जिसे इलाहाबाद, प्रयागराज, संगम नगरी आदि नामों से जाना जाता है।

इलाहाबाद की अपनी संस्कृति है, जिसमें कुंभ मेला, त्रिवेणी संगम, रामलीला, दशहरा आदि शामिल हैं। यहाँ रामलीला का मंचन गोस्वामी तुलसीदास के रामायण लिखे जाने से पूर्व का प्राप्त होता है, जिसके प्रमाण सोलहवीं शताब्दी से मिलने लगते हैं। ‘तबकात-ए-अकबरी’ के अनुसार, सन् 1583 में जब बादशाह अकबर इलाहाबाद क़िले का निर्माण करवा रहे थे, तब उन्होंने रामलीला का मंचन देखा। राम के वनगमन और दशरथ की मृत्यु का मार्मिक दृश्य देखकर वे भावुक हो उठे और उन्होंने अबुल फ़ज़ल तथा बदायूँनी को वाल्मीकि रामायण के फ़ारसी अनुवाद का आदेश दिया। इस प्रकार प्रयाग की रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर भी है, जो आज तक लोगों को जोड़ती आ रही है।

इलाहाबाद की रामलीला की सबसे विशिष्ट बात है कि यहाँ हर बड़े मोहल्ले की अपनी अलग-अलग कमेटियाँ हैं, जो ‘रजिस्ट्रार सोसाइटीज़ एक्ट’ के अंतर्गत पंजीकृत हैं। नगर की प्रमुख कमेटियाँ हैं—पथरचट्टी रामलीला कमेटी, पजवा रामलीला कमेटी, दारागंज कमेटी, श्री कटरा रामलीला कमेटी, सिविल लाइंस रामलीला कमेटी, अल्लापुर रामलीला कमेटी। सभी कमेटियों की रामलीला के मंचन का विधिवत प्रारंभ शारदीय नवरात्र की प्रतिपदा से ही होता है। हर मोहल्ले का रामदल क्रमवार तरीक़े से निकलता है। यह क्रम पूरे दस दिन तक चलता है। यहाँ मुख्य रूप से हम कटरा रामलीला की बात करेंगे, जो पूरे प्रयाग का अकेला ऐसा मोहल्ला है, जहाँ लंकाधिपति राजा रावण की पूजा से रामदल की शुरुआत होती है। कटरा की यह परंपरा एक सौ पचास साल पुरानी है।

प्रयाग की विभिन्न रामलीला कमेटियों में श्री कटरा रामलीला कमेटी का एक विशेष स्थान है। कटरा के भव्य रामदल की एक ख़ास विशेषता यह है कि पितृपक्ष की एकादशी को लंकाधिपति राजा रावण की सवारी पूरे राजसी वैभव के साथ निकलती है, जो ऋषि भारद्वाज के आश्रम से रामवाटिका तक जाती है। इसी के पश्चात कटरा के भव्य रामदल का आरंभ हो जाता है और माना जाता है कि संपूर्ण कटरा पर रावण का राज हो जाता है। पहले के समय मुनादी कर बताया जाता था कि “अब से जो राम का नाम लेगा, उसके नाक-कान में सीसा डाल दिया जाएगा, अतः दशमी तक कोई भी राम का नाम नहीं लेगा।”

नवरात्र की प्रतिपदा से विजयादशमी तक प्रतिदिन राम की सवारी निकलती है। फिर पंचमी को माता सीता की बारात, अष्टमी को रामदल तथा दशमी को रावण पूजन से इसकी समाप्ति होती है। कटरा में रावण दहन की मान्यता नहीं है, क्योंकि रावण को ऋषि भारद्वाज का नाती माना जाता है तथा कटरा वासी उन्हें अपना पूर्वज मानते हैं। जनश्रुति के अनुसार, राम जब रावण-वध के बाद ऋषि भारद्वाज से आशीर्वाद लेने आए तो ऋषि ने उन्हें मना कर दिया। कारण पूछने पर उन्होंने कहा, “पहले तो आपने ब्रह्महत्या की है, दूसरे मेरे नाती की। तो पहले गंगा स्नान कर आएँ, तब मैं आपको क्षमा कर आशीर्वाद दूँगा।”

लेकिन ऐसा नहीं है कि रावण दहन होता ही नहीं है। अतः कटरा रामलीला कमेटी दारागंज कमेटी के साथ मिलकर अलोपीबाग़ में रावण दहन करती है। स्थानीय लोग अपनी इलाहाबादी ठसक में कहते भी हैं कि “भारद्वाज मुनि के ख़ातिर इहाँ रावण न मराई, पर एके मतलब इ थोड़े हैं कि कहूँ न मराई। हमार राजा तो सिरी राम अहे न।”

हाँ तो, बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। महाराज नेक्स्ट ईयर फिर से आने का इनवाइट लेकर गए। स्टेटस लगे, सेल्फ़ियाँ पोस्ट हुईं। और क्या—ख़त्म, टाटा, बाय-बाय…

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राशि पांडेय को और पढ़िए : शहर नक़्शे से नहीं, यात्राओं से पहचाने जाते हैं

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