पिंजड़े में क़ैद ज़िंदगी
सोनी पांडेय
10 मार्च 2026
इस साल सारी आपदाएँ एक साथ आने को व्याकुल हों जैसे। अभी तो मानसून की आहट भी नहीं और बादल हैं कि रोज़ सावन-भादो हुए जाते हैं। सुबह से शुरू हुई बारिश बंद होने का नाम ही नहीं ले रही है। बाबू कहने को दस साल का है, पर काम पाँच साल वाला करता है। ज़रा-सी नज़र हटी नहीं, माँ की और वह भागकर बारिश में भीग आता है। आक् छीं, आक् छीं की बौछार से घर हिला हुआ है।
ज्योति सोचती है कि यह कब बड़ा होगा? दुनिया इतनी आसान नहीं कि हर जगह वह या माँ इसकी पहरेदारी करते रहेंगे। वह माँ से झल्ला कर कहती है, “यह कब बड़ा होगा? एक तो चारों तरफ़ कोरोना से मचा हाहाकार डरा रहा है, उस पर से इसकी शैतानियाँ।”
माँ ने उसे झकझोरते हुए ग़ुस्से में एक थप्पड़ गाल पर लगाया, उसने रोना शुरू कर दिया। वह साथ-साथ चिल्ला रही थी, “तू मुझे चैन से जीने देगा कि नहीं?”
माँ के हाथ में दूध का मग है। हल्दी वाला दूध देख वह रो रहा है। माँ का निहोरा, रोना-धोना अलग। भाई के लिए माँ का स्नेह अद्भुत है। उसके अतिरिक्त दुलार और केयर ने उसे ज़िद्दी बना दिया है। वह काम ज़रूर करता है, जिसे नहीं करना चाहिए। माँ टी.वी. पर कोरोना से बचाव के उपाय को ध्यान से सुन रही है। इधर भाई ज्योति से विनती कर रहा है, “प्लीज़ दीदी! तुम पी जाओ।”
कितनी बार तो ज्योति ने उसे बचाया है माँ से, वह जबरन उसके गले में ठेलेंगी और वह पीकर उल्टी करेगा, फिर सिर पकड़ कर रोना शुरू। माँ से नज़रें बचाकर भाई-बहन ने दूध का काम तमाम कर दिया है। भाई ड्रामेबाज़ी में अव्वल है, तली में बचे दूध का मूँछ बना झूठे डकार मार माँ को गिलास थमा दिया।
“हो गया।” उसने कहा और माँ का वही पुराना लाड़-प्यार, “अरे! मेरा राजा बच्चा!”
उसके गालों पर एक चुम्बन ले माँ रसोई में चली गई।
लॉकडाउन की अवधि बढ़ते-बढ़ते कुछ समस्याओं ने घेरना शुरू कर दिया है। सबसे ज़्यादा अवसाद। चारों तरफ़ अजीब-सा सन्नाटा पसरा रहता है। सभी अपने-अपने घरों में बना-खा कर पटाए रहते हैं। कभी-कभार कोई अपनी बालकनी में दिख जाता है तो मनुष्यों के ज़िंदा रहने का प्रमाण मिलता है, वरना मौत के बाद की नीरवता ने जैसे सबके जीवन में घर कर लिया है। लोग सहमे से एक-दूसरे से बचते घरों में क़ैद हैं। ज्योति कभी खिड़की खोल बाहर झाँकती है तो कभी बरामदे में कुर्सी डाल चुपचाप बैठी शून्य में देखती रहती है।
शून्य में घंटों तकते रहना उसका प्रिय काम है, सहसा उसके मन में अँधेरा घिर आता है, चारों तरफ़ घुप्प अँधेरा, अँधेरे में गोल-गोल घूमती सतरंगी किरणों का वलय धीरे-धीरे उसकी आँखों के रास्ते मन में उतरने लगता है। उसका मन एक गहरी खाईं है, यह किरणों का वलय जाकर सतह में बैठता जाता है, बैठता जाता है। फिर उस घेरे से अचानक चिंगारियाँ निकलने लगती हैं और भयानक आग लग जाती है। वह घबराकर आँखें खोल लेती है। देर तक उफनती साँसों पर नियंत्रण की नाकाम कोशिशें, बेहोशी और माँ के रोने की कानों में आती आवाज़।
यह बीमारी उसे पिता की मृत्यु के बाद लगी। माँ ने दवा, दुआ सब कराया पर यह बीमारी एक यंत्रणा की तरह उसके जीवन में घर कर चुकी है। इन दिनों वह डरने लगी है, बेतहाशा। बीमारी यदि उभरी तो वह जल्दी मुक्त नहीं हो पाएगी। डॉक्टर कहते हैं कि अकेले मत रहा करो, ख़ूब दोस्त बनाओ, ख़ूब बातें करो। खुल कर रोया और हँसा करो। वह कोशिश करती है। इन कोशिशों से ही ज़िंदा है।
वह बात भी किससे करे, दोस्त भी बहुत नहीं बना पाती। भरोसा तो किसी पर नहीं कर पाती है। कितनी दिखावटी और बनावटी दुनिया है, वह अच्छे से जानती है। कितनी-कितनी बार हारी है और उस अँधेरे से निकलने के लिए छटपटाते हुए हाथ बढ़ाया है। हर हाथ यहाँ खंजर है। सबके नाख़ून देह में चुभने को आतुर। वह दर्द का एक ऐसा दरिया है, जहाँ रात-दिन दर्द मध्यम-मध्यम बहता रहता है। उसे अब इसी दर्द में जीने की आदत हो गई है। एक ऐसी आदत जिससे मुक्ति का कोई रास्ता उसे नहीं मिलता। वह हँसना चाहती है और हँसी होंठों के बीच आकर ज़ब्त हो जाती है। वह रोना चाहती है और आँसू आँखों के कोर में आकर कहीं बिला जाते हैं। लोग उसे कठोर मन-मिज़ाज की लड़की कहते हैं और वह रूई के फाहे से मन के परों पर कल्पनाओं का संसार बनाती-बिगाड़ती, उमड़ती-घुमड़ती रहती है, जैसे बारिश का बादल। अजीब यह है कि यह बादल शब्दों में नहीं ढल पाते, बरसते तो बिल्कुल भी नहीं।
इन दिनों चारों तरफ़ मातम पसरा रहता है। घर सड़क के क़रीब होने से रात भर एम्बुलेंस का सायरन बजता रहता है। आधी रात को पीछे के घर से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। सुबह तक रह-रह कर एक औरत और दो बच्चों के रोने की कातर आवाज़ें। उसकी देह जैसे रस्सी में जकड़ी हो और वह तुड़ा कर उठ खड़ा होना चाहती है पर हाथ-पैर साथ नहीं दे रहे हैं। जब बीमारी उभरती है उसकी पूरी देह निढाल हो जाती है, जैसे किसी ने शरीर का सारा ख़ून पी लिया हो। डॉक्टर इसे मनोवैज्ञानिक बीमारी कहते हैं और चाहते हैं कि वह अपना मन लोगों से हँसने-बोलने में लगाए पर मन साथ नहीं देता। वह पिछली बार कब खुलकर हँसी थी उसे याद नहीं। उसे याद नहीं कि कब वह मन भर किसी सखी-सहेली से बतियाई थी।
इस निस्तब्धता से वह घबराती है और चीख़ना चाहती है, इस क़दर कि मौन के सारे किवाड़ एक साथ खुल जाएँ और लोगों की बतकही से उसकी दुनिया फिर से गूँजने लगे। वह चाहती है कि उसके पंख निकल आएँ और वह उड़कर उन सबसे मिल आए जो एक सन्नाटे में कहीं दूर खो गए हैं। दीवारों के घेरे उसे किसी मनुष्यहीन जंगली दुनिया की तरह लगते और सन्नाटा किसी प्रेतबाधा-सा उसे अपनी जकड़ में ले लेता। वह जी भर रोती और बस यही प्रार्थना करती कि इस दो गज की दूरी से जल्दी मुक्ति मिले।
तारा दीदी चाहती हैं कि वह चीज़ों को सहज भाव से समझे और जीवन में आने दे पर मन पर लगे ज़ख़्म भरते ही नहीं। चौदहवीं की उम्र में पहली बार जाना था उसने कि लड़की का अस्तित्व बस देह भर है। उसे जब चाहे तोड़-मरोड़ कर फेंका जा सकता है। तब तो और आसानी से जब सिर पर पिता या बड़े भाई का साया न हो। विनय उसे अच्छा लगता था, कितनी सुकोमल भावनाएँ थीं उसकी, गुलाब की पंखुड़ियों जैसी। जैसे ओस कण दूब पर मोती-सा अटक जाता है और देखने वाले को लुभाता है, वह उसके जीवन के तप्त रेगिस्तान में ओस कण की तरह आया था।
उम्र का सोलहवाँ साल, सभी बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जी-जान से लगे थे। गौतम सर इंग्लिश की कोचिंग सुबह साढ़े पाँच बजे पढ़ाते थे, वह आँख मलते साइकिल उठाकर सुबह भागती थी। सात बजे घर लौट कर तुरंत तैयार हो स्कूल, फिर लौट कर तीन से छह बजे तक फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायो की लगातार कोचिंग। न ढंग से खाना हो पाता था और न सोना, उस पर से आए दिन माँ से बाबा-दादी के झगड़े। ज़िंदगी उसे बेहद उबाऊ लगने लगी थी। बोर्ड की परीक्षाएँ नज़दीक थीं, रात में पढ़ते-पढ़ते वह सो गई थी, ध्यान ही नहीं रहा कि साइकिल के टायर में हवा कम है।
सुबह वह ज़ोर लगा कर पैडल मारती बढ़ रही थी कि अचानक टायर फटा और वह सड़क पर गिर पड़ी। पीछे से आ रहे लड़के-लड़कियों के झुंड ने उसे सहारा देकर उठाया। सिर और पैर में चोटें आई थीं। सिर से ख़ून बह रहा था। जिन लड़कों ने तत्परता दिखा उसे ढाँढ़स बँधाया था उनमें विनय सबसे आगे था। उसके पिता डॉक्टर थे। पिता को फ़ोन कर बुलाया और डिस्पेंसरी ले जा मरहम-पट्टी करा कर घर छोड़ा। उसके पिता भी बहुत अच्छे इंसान लगे, तुरंत गाड़ी लेकर आए और मदद की। ज्योति को यह आत्मीयता इतनी प्रभावित कर गई कि वह पहली बार किसी लड़के के माँगने पर फ़ोन नंबर दे उसके फ़ोन का इंतज़ार करने लगी।
यह लड़कियों को किसी का अच्छा लगना भी कैसी अनुभूति है, सोचती और महसूसती कि जैसे एकदम से हवा में कोई भीगी-भीगी सी गंध फैली हो और वह डूबती चली जा रही हो। जैसे पानी में जलतरंग बज उठा हो और आत्मा के चौखट पर वह मीरा-सी बावरी हो नाच उठी हो। जैसे पैरों में किसी ने पंख बाँध दिया हो और वह जीवन के आकाश पर तारों-सी टिमटिमाती चमक उठी हो। वह इस दुनिया के रस और गंध को महसूस रही थी। ऋतुओं से मिलती मौसमों के झूले में झूलती मन से कहती, “यह दुनिया इतनी ख़राब भी नहीं है” और हँस पड़ती। ये पहली मुहब्बत भी अजीब होती है, एक हल्का-सा नशा मन, मस्तिष्क पर ऐसा छा जाता है कि कुछ भी अच्छा नहीं लगता उसके सिवा। वह किताब लेकर बैठती और उसकी बातों में ऐसी गुमसुम हो जाती कि कुछ ख़याल ही नहीं रहता। नाहक हँसने और मुस्कुराने लगती। माँ उसकी इन हरकतों को देख डर जाती और लाल मिर्च से नज़र उतार जला आती।
शुरू में सब ठीक था, वह ख़ूब बातें करता पर एक दिन अचानक उसने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया और सामने देखने पर मुँह मोड़ निकल जाता। वह समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है। उसने दोस्तों से ख़बर भेजी की कम से कम बताए तो कि क्यों उससे बात करना नहीं चाहता पर वह जैसे पत्थर का देव, परीक्षा के बाद वह नीट की तैयारी के लिए कोटा चला गया। ज्योति महीनों रोती रही। उसकी यह दशा माँ से बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उन्होंने तारा दीदी को बताया।
एक दिन तारा दीदी ने उसे प्यार से बिठा कर पूछा कि आख़िर वह इतनी उदास क्यों रहने लगी है? तारा बच्चों के बेहद क़रीब रहने वाली, उनकी प्यारी दीदी, वह उनके सामने बेहिचक कुछ भी कह सकते थे, कुछ भी कर सकते थे। ज्योति ने सब बताया, तारा थोड़ी देर चुप रहीं फिर उसे समझाया और कहा कि कल से वह उनके साथ बस्ती में बच्चों को पढ़ाने जा रही है। जीवन तो चलता ही रहता है, चलने लगा एक नई दिशा में। पहले प्रेम के अँखुवाने के साथ ही उसका दर्दनाक अंत ज्योति को कठोर बना गया। वह लड़कों से दोस्ती करने से डरने लगी। उसे उन तमाम सहज बातों से असहजता होने लगी जो एक उम्र की ज़रूरी बातें थीं। उन तमाम घटनाओं से वह डर जाती जिसमें किसी की प्रेम कहानी जुड़ी हो। वह प्रेम-पत्रों को बिना पढ़े फाड़कर फेंक देती। जिस प्रेम की सहज अनुभूति लड़कियों को इस उम्र में मोहती वह उसके लिए इतनी असहज बन चुकी थी कि उसे घृणा की हद तक इन बातों से चिढ़ हो गई।
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बेला पॉपुलर
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