पत्र : सरस के लिए : आज तुम्हारा जन्मदिन है...
मयंक यादव
29 अक्तूबर 2026
सरस,
कैसी हो? आशा करता हूँ कि ठीक होगी। ये ख़त तुम्हारे जन्मदिन के लिए है। कुछ इच्छाएँ, यादें और हल्की-सी हिदायतें। हाँ, तुम्हें वो बिल्कुल भी पसंद नहीं, पर क्या करूँ? आदत से जो मजबूर ठहरा। हम भी कितने अजीब हैं, ना? कि पहले-पहल हमें जो खिलौना चाहिए था, जब वो हमें मिल जाए तो हम जाने-अनजाने उसे इतनी कसकर पकड़ते हैं कि वो टूट जाए।
तुमसे बात किए हुए आज कई माह बीत गए और ठीक से बात किए बरसों। तुम्हारे साथ न रहते हुए मुझे लगता है कि दुनिया मेरे लिए तब ज़्यादा नर्मदिल थी या लगती थी, जब तुम मेरे साथ थीं। तुम्हारे बाद हर चीज़ कठोर हो गई है। मेरे बाल उलझने लगे हैं, नाख़ून गंदे रहते हैं, चेहरे और हथेलियों पर जैसे काँटे उग आए हों। अब सब बदला है। तुम कहती थीं ना कि अगर तुम्हें फ़र्क़ पड़ रहा है तो तुम अपना सब काम कैसे करते हो? और देखो, मेरे सब काम ठप हो गए। महीनों से कुछ पढ़ा नहीं, गाना भूल चुका हूँ, कमरे पर घंटों पड़ा रहता हूँ और बस दीवारें देखता हूँ। लोग कहते हैं मेरा वज़न कम हो गया है, पर तुम्हारे बाद मुझे अपना सीना ज़्यादा भारी लगने लगा है।
आज इतने महीनों बाद जब कुछ लिखने भी बैठा तो देखो, क्या लिख रहा हूँ। बहुत पहले तुम्हें एक शे’र सुनाया था :
मैंने जब लिखना सीखा था
पहले तेरा नाम लिखा था
और तुम हँस दी थीं कि ये तो झूठ है, पर इस बार मत हँसना।
मैं अब जब दुबारा लिखना सीख रहा हूँ तो पहले तुम्हारा ही नाम लिख रहा हूँ। आज तुम्हारा जन्मदिन है और इतनी भी ताक़त नहीं कि तुम्हें फ़ोन या मैसेज कर सकूँ। ये मुश्किल क्यों है, नहीं पता। शायद मैंने ख़ुद बना दिया है। ये करने को क्षण भर में भी किया जा सकता है, ना करने को सालों तक टाला जा सकता है। मेरे कुछ हितैषियों का मानना है कि मैं यहाँ स्वार्थी हो रहा हूँ, इससे तुम्हें तकलीफ़ होगी, ये फिर से एक आशा देने जैसा होगा। पर मैं कहीं-न-कहीं ख़ुद तुम्हें एक आशा देना भी चाहता हूँ। यह कितना विचित्र और कष्टप्रद है कि तुम्हें प्रेम करते रहना चाहता हूँ, पर कर नहीं पा रहा। तुम्हारी स्मृतियाँ भी बिल्कुल तुम्हारी जैसी हैं, कंधे छील देती हैं और फिर हँसाती हैं।
मैं क़रीब-क़रीब दस दिन पहले सोते से जगा और एक पल को हँसकर फिर उदास हो गया। मैंने फिर से तुम्हारा स्वप्न देखा था। वो इतना सजीव था कि उठते ही मुझे लगा, तुम मेरे साथ हो। मैं अपनी ही नासमझी पर हँस दिया। मैंने पुनः उस स्वप्न में जाना चाहा, क्योंकि वहाँ तुम थीं। मुझे लगा जैसे मैंने तुम्हें वहीं अकेले छोड़ दिया और ख़ुद निकल आया। मेरे सीधे हाथ की एक उँगली अभी भी पसीजी थी, जो शायद तुमने थाम रखी थी। तुम्हें शायद ये सुनकर अतिशयोक्ति लगे, पर उस दिन मैं बिस्तर से उठा नहीं। मैं इंतज़ार में था कि कब मुझे नींद आए और कब तुम मेरी उँगली फिर से थामो, पर उस रोज़ ये कमबख़्त नींद रात तीन बजे आई और तब तक तुम जा चुकी थीं।
पिछले जन्मदिन से तुम्हारे लिए कितना कुछ इकट्ठा कर रहा हूँ। कोई पेंटिंग पूरी करना चाहता था, कोई कविता लिखना चाहता था। चाहता था, एक सुंदर-सी कुर्ती दे दूँ। पूरे साल ख़ुद से बे-सिर-पैर के मश्वरे करता रहा और समझाता रहा कि ये तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा, पर अब ठीक-ठीक देखता हूँ तो कुछ भी जुटा नहीं पाया तुम्हारी ख़ातिर। किसी ने सुझाया कि तुम्हें इत्र तोहफ़े में दूँ। फिर मुझे उसे बताना पड़ा कि मुझे अपनी प्रेमिका से बच्चों की महक आती है। वो हँसने लगा और मुझे समझाना पड़ा कि हाँ-हाँ, मुझे उससे बच्चों की महक आती है। उसे ये बताने के बाद मुझे ध्यान आया कि मुझे बच्चे कितने पसंद हैं, लेकिन जीवन के झंझावातों में इस क़दर फँसा कि वो भी ज़ेहन से निकल गया।
पर आज तो तुम्हारा जन्मदिन है और ऐसी बातें नहीं कहूँगा कि तुम उदास रहो। जिस ईश्वर से मेरा विश्वास उठता-बैठता रहता है... हाँ, जिस ईश्वर से मैंने तुम्हें कभी माँगा था, आज फिर उसी से कहता हूँ कि इस बार जब प्रेम तुम्हें खोजे तो तुम सड़क किनारे ठिठकी अकेली खड़ी न हो, बल्कि भरे-पूरे लोगों के बीच से लगभग चिल्लाती हुई कहो कि मैं इस तरफ़ हूँ। तुम्हारी जिस फ़क्कड़ मिज़ाजी से मुझे प्रेम हुआ था, तुम्हें भी कोई वैसा ही अल्हड़ इंसान मिले। तुम्हें ऐसे लोग मिलें, जिन्हें बरसों से जैसे तुम्हारा ही इंतज़ार था और जब भी कभी तुम उनसे ऊबो, तो ये याद रहे कि कोई है, जो बचा लेगा मुझे आख़िरी वक़्त :
चाहे जितना भी पाप करूँ
जो उतार लेगा मुझे फूल-सा फाँसी के फंदे से
उसकी आस्तीन में पोंछता चेहरे की गर्द
कोई है जिसके मुँह पर झूठ न बोलूँ
कोई है जिसके आगे ग़लत सुनते डरूँ
— अरुण कमल
पर तुम्हें सही और ग़लत के बीच चुनाव करना अब सीखना होगा। तुम्हें सीखना होगा कि किस वक़्त क्या बचाया जा सकता है और क्या छोड़ा। बेशक तुम दयालु हो, पर जो तुम्हें प्रेम करते हैं, उनके प्रति कितनी हो? समय निकालकर ये ज़रूर जानना कि अपनी ग़लती मानने से हम कमज़ोर नहीं दिखते, कम-से-कम अपने लोगों के सामने।
इससे शायद हमें अपनों की पहचान ज़्यादा अच्छे से होती है। जहाँ पूरी दुनिया में लोग तरह-तरह के मुखौटे पहनकर घूमते हैं, वहाँ अगर कोई एक भी है, जिससे हम बिना उसके सामने मुखौटा पहने मिल सकें, तो यही एक निधि है हमारे होने की। सीख सको तो सीखना कि देने से कभी ख़त्म नहीं होता और ये निरा नैतिक शिक्षा का पाठ नहीं है। सीखना कि जो चीज़ हँसकर टाली जा सकती है, उस पर वक़्त ज़ाया नहीं करना है।
साथ ही इस साल बदले में कुछ चीज़ें माँगता भी हूँ तुमसे कि अपनी स्कूटी पर किसी को पीछे बैठने न देना। वो मेरी ऐसी इच्छाओं में से एक थी, जिनके पूरा होते ही मैं सबसे ज़्यादा ख़ुश था। उन जगहों पर फिर किसी के साथ जाने से बचना। वो जगहें हमारी हैं। फ़ोन का पासवर्ड आगे भी यही रहेगा तो अच्छा लगेगा और मेरी दी हुई चीज़ें इस बार मत फेंकना। चीज़ें फेंकना तो हमारे स्वभाव में है भी नहीं। कोई एक पिन, एक रैपर, तुमसे छुई हुई किताब, तुम्हारे दिए ख़त... मैंने इन सबको बड़ी जद्दोजहद से सहेजा है और तुमसे भी यही आशा रखता हूँ। उन्हें सहेजना, जैसे तुम्हें फेंकना सिखाया ही नहीं गया। देखा? मैं फिर स्वार्थी हो रहा हूँ। तो इस हिस्से को दुबारा मत पढ़ना।
तुम्हारा जन्मदिन शुभ हो, सरस!
अब उठो! तुम्हारा जन्मदिन है...
बीते तीन दिन से शहर में था, लेकिन तुमसे मिलने की हिमाक़त नहीं कर सका। मैं देखता हूँ कि हमारा शहर बहुत तेज़ी से बदल रहा है। हम जब आख़िरी बार मिले तो हमारे शहर में बारिश हो रही थी। आशा करता हूँ, तुम हमारी जगहें मिटने नहीं दोगी।
मयंक
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