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पत्र : मैरी हैस्केल के लिए

जब ख़लील और मैरी मिले, तब ख़लील इक्कीस वर्ष के थे—एक संघर्षरत युवा कलाकार। मैरी उनसे दस वर्ष बड़ी थीं और बोस्टन के एक प्रतिष्ठित बालिका विद्यालय की प्रधानाध्यापिका थीं। ख़लील ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन मैरी ने उसे ठुकरा दिया। इसके बावजूद उन्होंने वर्षों तक ख़ुद को ख़लील की ख़ुशी और प्रतिभा के पोषण के लिए समर्पित रखा। उन्हें प्रोत्साहित किया, पेरिस में अध्ययन के लिए भेजा, अँग्रेज़ी सिखाई और आर्थिक मदद की। उनकी पांडुलिपियों पर साथ काम किया, जिनमें ‘द प्रॉफ़ेट’ भी शामिल है। उनके दुखों को बाँटा और ख़ुशियों में भागीदार बनीं। दोनों ने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन उनका गहरा और भावुक संबंध इस बात का प्रमाण है कि वे एक-दूसरे के जीवन का सच्चा प्रेम थे।

यह एक असाधारण प्रेम-कथा है। दोनों अक्सर एक-दूसरे से दूर रहते थे और पत्रों के माध्यम से संवाद करते थे। साथ होने पर मैरी अपनी डायरी में दिन भर की बातें और ख़लील द्वारा कही गई हर बात दर्ज करती थीं। दूसरी ओर ख़लील उनके साथ अपने अंतर्मन के विचारों और भावनाओं, दार्शनिक चिंतन, रहस्यमय मान्यताओं, अपने काम की व्याख्याओं और रोज़मर्रा के छोटे-छोटे अनुभवों तक सब कुछ साझा करते थे। सालों तक किसी को उन क़रीब पाँच सौ ख़तों और सैंतालीस डायरियों के बारे में पता नहीं था, जिनके आधार पर Beloved Prophet शीर्षक पुस्तक तैयार हुई।

ख़लील जिब्रान के अंतिम संस्कार में मैरी हैस्केल बोस्टन में मौजूद थीं। वहाँ ख़लील की छोटी बहन मारियाना ने उनका परिचय लोगों से एक दोस्त के रूप में कराया। जहाँ बाक़ी सभी लोग रो रहे थे, वहीं मैरी चुपचाप ख़ुश नज़र आ रही थीं। वह ख़लील की भीतरी जिद्द-ओ-जहद और उस ‘अनाम आत्मा’ तक पहुँचने की उनकी कोशिशों से बरसों से परिचित थीं। वह पवित्र आत्मा उनकी हर रचना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही थी। मैरी को यक़ीन था कि ख़लील की मृत्यु भले ही उनके दोस्तों के लिए दुखद हो, पर यह आँसू बहाने का अवसर नहीं था। आख़िरकार, ख़लील उस आत्मा के साथ थे, जिसकी ओर वह जीवन भर बढ़ने की कोशिश करते रहे थे।

ख़लील जिब्रान पर लिखी गई पुस्तकों में मैरी हैस्केल का नाम शायद ही कभी मिलता है। न्यूयॉर्क स्थित ख़लील के स्टूडियो और कैम्ब्रिज में मैरी के स्कूल में उनकी गुप्त मुलाक़ातों, बोस्टन की एकांत सैरों और उनके संबंध के शुरुआती वर्षों के उत्साह, आनंद, उथल-पुथल और निराशाओं से उनके आस-पास के लोग अनजान रहे हों, यह कल्पना करना मुश्किल है। फिर भी, पत्रों का यह संग्रह सामने आने से पहले उनके संबंध के बारे में निश्चित रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं था।

इन पत्रों का अस्तित्व ख़लील की मृत्यु के बाद सामने आया। उनकी जीवनीकार बारबरा यंग, मैरी हैस्केल के साथ ख़लील के काग़ज़ात व्यवस्थित कर रही थीं। इसी दौरान उन्हें ख़लील के स्टूडियो में मैरी के लिखे ख़त मिले। पत्रों और डायरियों से भरा एक बड़ा बक्सा सामने आया तो वह अवश्य ही स्तब्ध रह गई होंगी। ख़लील की मृत्यु से कई साल पहले तक वह उनके लिए क्लर्क के रूप में काम कर चुकी थीं, फिर भी उन्हें मैरी के साथ ख़लील के संबंध के बारे में कुछ पता नहीं था।

उस बक्से में पच्चीस वर्षों के पत्रों के साथ मैरी की डायरियाँ भी थीं। ख़लील ने उनसे अपने पत्र जलाने की विनती की थी। उनका कहना था कि इनसे ग़लतफ़हमियाँ पैदा होंगी। मैरी पहले तो इसके लिए सहमत हो गई थीं, लेकिन बाद में उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। ये पत्र ख़लील के साथ बिताए उनके जीवन का हिस्सा थे। उन्होंने ख़लील के सभी पत्र सहेजकर रखे थे। उन्हें कैसे पता चलता कि ख़लील ने भी उनके पत्रों को उतनी ही आत्मीयता से सँभालकर रखा था? अपनी लिखावट पहचानते हुए उन पत्रों को पढ़कर उनके भीतर भावनाओं, दुख और ख़ुशी का कैसा सैलाब उमड़ा होगा... यह कौन जान सकता है!

मैरी का मानना था कि उनके और ख़लील के ये पत्र एक ऐसे भविष्य से जुड़े हैं; जो ख़लील को उसी तरह सँजोकर रखेगा, जैसे उन्होंने रखा था। वह उन पत्रों को अपने साथ जॉर्जिया के सवाना स्थित अपने घर ले गईं, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के शेष वर्ष बिताए।

इन पत्रों और डायरियों को वर्जीनिया हिलु ने पुस्तक का रूप दिया।

ख़लील जिब्रान के पत्र मैरी हैस्केल के लिए

एक 

प्यारी मैरी,

काश, मैं तुम्हें बता पाता कि तुम्हारे पत्र मेरे लिए क्या मायने रखते हैं! वे मेरी रूह में नई जान डाल देते हैं। मैं उन्हें ज़िंदगी के संदेशों की तरह पढ़ता हूँ। न जाने कैसे; वे हमेशा तभी आते हैं, जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। वे हमेशा मेरे भीतर वह एहसास जगाते हैं जो हमें और दिन, और रातें, और ज़्यादा ज़िंदगी जीने की चाहत देता है।

जब भी मेरा दिल ख़ाली और बेचैन होता है; मुझे किसी ऐसे इंसान की बहुत ज़रूरत महसूस होती है, जो मुझे यह बताए कि हर ख़ाली और बेचैन दिल के लिए एक नया कल होता है। और मैरी, तुम हमेशा यही करती हो।

— ख़लील

दो 

न्यूयॉर्क
मंगलवार, 31 अक्टूबर 1911

मैरी, प्यारी मैरी,

मैं आज पूरे दिन शहर में अपने देशवासियों के बीच रहा। कड़ी मेहनत की और उससे भी ज़्यादा गहराई से सोचा। काफ़ी देर हो चुकी है और मैं थक गया हूँ, लेकिन तुम्हें ‘गुड नाइट’ कहे बिना सो नहीं सकता था। आज और कल तुम मेरे बहुत क़रीब रही हो, बहुत ही क़रीब। तुम्हारा आख़िरी ख़त एक लौ की तरह है, पंखों वाले गोले जैसा या उस अनोखे संगीत वाले द्वीप से आई किसी लहर जैसा।

प्यारी मैरी, इन दिनों मेरा मन तस्वीरों, आवाज़ों और परछाइयों से भरा हुआ है। मेरे दिल में आग है, मेरे हाथों में आग है और मैं जहाँ भी जाता हूँ, मुझे रहस्यमय चीज़ें दिखाई देती हैं।

क्या तुम जानती हो कि लगातार जलते रहने का क्या अर्थ है? और जलते हुए यह महसूस करना कि तुम ख़ुद को हर चीज़ से आज़ाद कर रही हो?

क्या तुम मेरे आस-पास हो? ओह, आग के आनंद से बढ़कर कोई आनंद नहीं!

और अब मैं अपने भीतर की सारी आवाज़ों से पुकारकर कहता हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।


— ख़लील

तीन 

न्यूयॉर्क
रविवार, 18 फ़रवरी 1912 

मेरी प्यारी मैरी,

मुझे बहुत ख़ुशी है कि तुम कभी परेशान नहीं होतीं। किसी मुश्किल हालात से कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह उन लोगों की चिंता होती है, जिनसे मैं प्यार करता हूँ।

जब तक मैं अपना काम पूरा नहीं कर लेता, इस अनोखी और ख़ूबसूरत धरती को छोड़कर नहीं जाऊँगा... और इसे पूरा करने में मुझे काफ़ी समय लगेगा!

कल दुपहर कमज़ोरी रहने के बावजूद मैंने काफ़ी अच्छा काम किया। आज मैं बहुत बेहतर महसूस कर रहा हूँ। मेरे हाथों और माथे की जलन कल रात के मुक़ाबले आधी भी नहीं रह गई है। अगर आज रात अच्छी नींद ले सका, तो कल काम भी करूँगा और गाऊँगा भी! और जब तक तुम न्यूयॉर्क आओगी, तुम्हारा ख़लील इतना मज़बूत हो चुका होगा कि तुम उसे पहचान भी नहीं पाओगी!

— ख़लील

चार 

न्यूयॉर्क
रविवार, 20 अप्रैल 1913

क्या तुम जानती हो, प्यारी मैरी कि सात सिर और दो हाथ होने का क्या अर्थ है? बेशक, तुम जानती हो। अभी मेरे सात सिर हैं और सिर्फ़ दो हाथ। और ये दोनों हाथ आग की तरह जल रहे हैं। जब मेरे हाथ जलते हैं, तो मैं कुछ बोल नहीं पाता। तो देखो, मैं गूँगा हो गया हूँ। लेकिन मैं अपने दिल के सभी मुँहों से तुम्हारा आख़िरी ख़त गा रहा हूँ। हाँ, मैरी, मेरे दिल के कई मुँह हैं और वे सभी तुम्हारे हाथों को चूमने और तुम्हारे ख़तों को गाने में सक्षम हैं।

वसंत के ये दिन मुझे बेचैन कर देते हैं। ये मेरे भीतर किसी ऐसी चीज़ की चाहत भर देते हैं, जिसे मैं ख़ुद भी नहीं जानता। काश, मैं खेतों में जा पाता और फूलों के साथ बढ़ पाता!

— ख़लील

पाँच 

न्यूयॉर्क
मंगलवार, 27 फ़रवरी 1912

तुमने मेरे भीतर जो नई भावना जगाई है, उसके अलावा मैं किसी और चीज़ के बारे में सोच ही नहीं पा रहा हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि इसके बारे में क्या सोचूँ या कैसे सोचूँ। शायद मुझे सोचने के बजाय बस उस महान् चेतना पर भरोसा करना चाहिए, जो हम सबके लिए सोचती है।

वह अदृश्य शक्ति हम दोनों की मदद करे।

— ख़लील

छह 

न्यूयॉर्क
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 1912

तुम्हारा पत्र मेरे जीवन में एक नए युग की शुरुआत कर रहा है। यह ज्वालाओं से भर रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे हमारे और दुनिया के बीच युद्ध छिड़ गया हो। लेकिन अंत में हम ही जीतेंगे। हम विजय प्राप्त करेंगे। मैं यह बात अपनी आत्मा की हर आवाज़ से कह रहा हूँ। एक महीने पहले मैं यह नहीं कह सकता था, मैं अब स्वप्नद्रष्टा नहीं हूँ। सपनों की दुनिया सुंदर है; लेकिन उससे परे एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ परम सत्ता निवास करती है।

— ख़लील

सात

न्यूयॉर्क
रविवार, 17 नवंबर 1918

ऐसा लगता है जैसे हम एक ही समय में कई ज़िंदगियाँ जी रहे हों। इन महान् दिनों में हमारा दिल हर जगह मौजूद है। हमारी प्यासी आत्माएँ अब उस महान् नदी के किनारे खड़ी हैं। हम जी भर कर पानी पीते हैं और ख़ुशी से भरे होते हैं, फिर भी वह मीठा पानी ख़ुद प्यासा है। जब हम उसे पीते हैं, तो वह हमें पीता है।

बहुत पहले, मैरी, मैंने ख़ुद से कहा था, “ईश्वर प्रकाश के हज़ारों परदों के भीतर वास करते हैं...” और अब मैं कह रहा हूँ, “दुनिया प्रकाश के उन हज़ारों परदों में से एक से गुज़र चुकी है और ईश्वर के और क़रीब आ गई है।” सब कुछ अलग है। सड़कों, दुकानों, कारों और ट्रेनों में दिखने वाले चेहरे अलग हैं। लोगों की आँखों में एक नई चमक है और उनकी आवाज़ में एक नई गूँज है और यह बदलाव सिर्फ़ दुनिया के एक हिस्से की दूसरे हिस्से पर जीत की वजह से नहीं आया है। यह आत्मा की उस चीज़ पर जीत है जिसमें आत्मा का अंश कम है, इंसान के भीतर की सबसे ऊँची भावना की उस चीज़ पर जीत है जो उतनी ऊँची नहीं है। चार साल पहले गहरे समुद्र की गहराई में डाली गई पवित्र तेल की बूँद अब सतह पर आ गई है। यह इंसान के भीतर की सबसे मज़बूत चीज़ की निश्चित जीत है, सबसे मज़बूत इसलिए क्योंकि यह सबसे ज़्यादा आशीर्वाद पाने जैसी कोई चीज़ है।

लेकिन मैं तुम्हें ये बातें क्यों लिख रहा हूँ, मैरी? तुम तो ये बातें हमेशा से जानती हो और दुनिया में किसी भी और व्यक्ति की तुलना में तुमने ही इन बातों में मेरे विश्वास और ज्ञान को मज़बूत किया है।

— ख़लील का प्यार

आठ 

न्यूयॉर्क
शुक्रवार, 26 जनवरी 1912

प्यारी मैरी,

आख़िरकार ‘ब्रोकन विंग्स’ (Broken Wings) आ गई है। मैं तुम्हें इसकी एक चिह्नित प्रति (अरबी भाषा में) भेज रहा हूँ, जिसे तुम अभी पढ़ नहीं पाओगी। शायद किसी दिन तुम इसे किसी दूसरी भाषा में पढ़ोगी और शायद तुम्हें यह 1911 के उस शानदार साल की एक अभिव्यक्ति के रूप में पसंद आएगी।

और मैरी, क्या तुमने मुझसे पूछा था कि मैं क्या कर रहा हूँ? तो सुनो, मैं बस काम कर रहा हूँ, काम कर रहा हूँ—अकेले और ख़ामोशी में।

इन दिनों मैं ज़्यादा लोगों से मिलता-जुलता नहीं हूँ। दूसरे लोगों के बीच मुझे कुछ अजीब-सा महसूस होता है, यहाँ तक कि उन लोगों के साथ भी, जिनकी मैं परवाह करता हूँ। जब किसी का दिल एक छोटी-सी दुनिया में बदल रहा होता है, तो वह अकेले रहना चाहता है।

— ख़लील

नौ 

न्यूयॉर्क
बुधवार, 8 अक्टूबर 1913

प्रिय मैरी,

पिछले तीन हफ़्तों में मैंने बहुत कुछ अनुभव किया है। मैंने एक सागर पार किया है और अब एक नई भूमि पर हूँ। सब कुछ कितना अजीब और अलग लग रहा है। मैं इस दुनिया से थक गया हूँ। दुनिया का क्या हाल है? किसी दिन मैं पेंट का एक डिब्बा और स्याही की एक बोतल लेकर कहीं चला जाऊँगा। जीवन से प्यार करने वाला कोई भी व्यक्ति इतनी मूर्खतापूर्ण, कोमल भावनाओं को क्यों सहन करे?

स्याही लेकर कहीं चला जाऊँगा और संन्यासी बन जाऊँगा। सच्चा संन्यासी जंगल में जाता है, लेकिन बड़े शहरों में ख़ुद को खोने से बचने के लिए जंगल में अपना रास्ता ख़ुद बनाना पड़ता है। कोई व्यक्ति अपनी परछाईं देखने के लिए तलवार से ख़ुद को खोज सकता है।

अभी मैं दिन में तीन-चार घंटे से ज़्यादा काम नहीं कर सकता। उसके बाद मुझे आराम, एकांत और शांति चाहिए। कई बार तो मैं बिल्कुल काम नहीं कर पाता। काम करने का समय ही नहीं मिलता। एक ऐसी शक्ति है या यूँ कहूँ कि एक ऐसी सत्ता है, जो मुझे किसी भी तरह का विचार करने या शारीरिक श्रम करने की अनुमति नहीं देती।

मेरी शुरुआती गद्य-कविताओं का एक संग्रह तीन-चार हफ़्तों में प्रकाशित होने वाला है। आज सुबह मैंने उसकी कुछ प्रूफ़रीडिंग की। मुझे प्रूफ़रीडिंग करना पसंद नहीं है। अपने ही किसी मृत स्वरूप के काम की सावधानीपूर्वक जाँच करने से ज़्यादा थकाऊ और क्या हो सकता है? नई क़ब्रें खोदना तो अच्छा है, लेकिन पुरानी क़ब्रों का मुआयना करना नहीं!

मेरी नई किताब लगभग तैयार है। उन्होंने मुझे बताया है कि इसे दूसरी किताब के तुरंत बाद प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

चूल्हा अभी तक नहीं आया है और मुझे अपने मॉडलों के लिए इसकी बहुत ज़रूरत है।

मैरी, कृपया यह मत सोचना कि मैं काम में सुस्त हूँ। देखो, मैं अकेला हूँ और एक समय में एक से ज़्यादा काम नहीं कर सकता।

— ख़लील

दस 

न्यूयॉर्क
शनिवार, 30 नवंबर 1913

मेरी प्यारी मैरी,

तुम कितनी प्यारी और कितनी अच्छी हो! तुम हमेशा मेरे लिए कुछ न कुछ करती रहती हो, भले ही तुम्हें ख़ुद ऐसा न लगता हो। जैसे मैं तुम्हें याद रखता हूँ, वैसे ही तुम भी मुझे याद रखती हो।

लेकिन सुनो, मैरी, मेरे लिए क्यूबा या बरमूडा जाना ज़रूरी नहीं है। मैं अब ठीक हूँ और अगर मुझे बदलाव की ज़रूरत पड़ी, तो मैं बिना कहीं दूर गए ही वह बदलाव कर लूँगा। मुझे शारीरिक बदलाव की ज़रूरत नहीं है। बरमूडा जाने से चीज़ों के बारे में मेरी सोच नहीं बदलेगी। पर अब मैं बेहतर महसूस कर रहा हूँ और मेरा मन भी पहले जितना उदास नहीं है। चीज़ों को देखने का तुम्हारा नज़रिया अपने आपमें एक बदलाव है। तुम्हारे पिछले दो ख़तों की भावना ने मेरे जीवन को और उज्ज्वल और स्पष्ट बना दिया है।

मैं यह पक्का करना चाहता हूँ कि तुम ठीक हो। मुझे डर है कि तुम मुझसे सब कुछ नहीं कहतीं। मुझे लगता है कि तुम मुझे दुख से बचाना चाहती हो और इसी वजह से मैं तरह-तरह की बातें सोचने लगता हूँ, ख़ासकर लंबी रातों में। क्या तुम समझ रही हो?

मैरी, प्लीज़, ऐसा मत सोचना कि मैं हमेशा ख़र्च करने से हिचकिचाता हूँ। तुम्हारे नेकी भरे हाथों ने मुझे वह बेहतरीन ज़िंदगी दी है, जिसकी कामना कोई भी कलाकार करेगा। हाँ, मैरी, तुमने मुझे एक ज़िंदगी दी है और मैं यह जानता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम भी जानो कि मैं यह जानता हूँ।

मैं ख़र्च करने से तभी हिचकिचाता हूँ, जब चीज़ें ग़ैरज़रूरी हों। अभी मेरा दक्षिण की ओर जाना ग़ैरज़रूरी है, क्योंकि मैं शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हूँ।

और अब, मेरी प्यारी मैरी, मैं तुम्हारा ख़त फिर से पढ़ने जा रहा हूँ। इसे पढ़कर मुझे अच्छा लगता है।

— ख़लील का प्यार

ग्यारह 

न्यूयॉर्क
23 जुलाई 1914

प्रिय मैरी,

कल रात मैंने एक बेहद ख़ूबसूरत सपना देखा और चाहता हूँ कि तुम भी इसे जानो।

हम दोनों एक ऊँची, हरी पहाड़ी पर खड़े थे, जहाँ से एक ख़ूबसूरत नज़ारा दिखाई दे रहा था...

तुमने मेरी ओर मुड़कर कहा, “ख़लील, हमें उसे वापस समुद्र में फेंक देना चाहिए, उसे समुद्र में डाल देना चाहिए।”

मैं जानता था कि तुम देवी वीनस की उस ख़ूबसूरत संगमरमर की मूर्ति के बारे में बात कर रही हो, जिसे हमने अभी-अभी खोजा था। मैंने कहा, “लेकिन यह कितनी प्यारी है! इसके होंठों पर अब भी गुलाबी रंगत है और आँखों में कितना नीलापन है। क्या ऐसा हो सकता है? यह इतनी...”

फिर तुमने कहा, “लेकिन क्या तुम्हें नहीं लगता ख़लील कि वह समुद्र में ज़्यादा ख़ुश और आराम से रहेगी?” और मैंने उदासी से कहा, “हाँ।”

फिर हमने उस विशाल देवी की मूर्ति को ऐसे उठाया, जैसे वह कोई हल्की-सी चीज़ हो और एक ऊँची, सफ़ेद चट्टान से उसे समुद्र में फेंक दिया। हम दोनों ख़ुश थे।

तभी सफ़ेद पक्षियों का एक झुंड हमारी आँखों के सामने से उड़ा। जैसे ही वे हमारे पास पहुँचे, उनमें आग लग गई और वे उड़ती हुई लपटों में बदल गए। फिर तुमने कहा, “क्या तुम्हें नहीं दिखता कि मैं सही थी?” और मैंने कहा, “हाँ, तुम हमेशा सही होती हो।”

क्या यह एक अजीब सपना नहीं है, मेरी प्यारी मैरी?

— ख़लील का प्यार

बारह 

पेरिस
8 नवंबर 1908 

प्यारी मैरी,

मैं जब दुखी होता हूँ, तो तुम्हारे ख़त पढ़ता हूँ। जब मेरे भीतर का ‘मैं’ धुँध में खोने लगता है, तो उस छोटे-से बक्से से दो-तीन ख़त निकालकर फिर से पढ़ता हूँ। वे मुझे मेरी असली पहचान की याद दिलाते हैं। वे जीवन की उन चीज़ों की उपेक्षा करने में मेरी मदद करते हैं, जो ऊँची और सुंदर नहीं हैं। प्यारी मैरी, हममें से हर किसी के लिए कहीं न कहीं आराम करने की एक जगह होनी चाहिए। मेरी आत्मा के आराम की जगह वह सुंदर उपवन है, जहाँ तुम्हारे बारे में मेरी यादें बसी हैं।

और अब मैं रंगों से जूझ रहा हूँ। यह संघर्ष बहुत ज़बरदस्त है। हममें से किसी एक को तो जीतना ही होगा! मैं लगभग तुम्हें यह कहते हुए सुन सकता हूँ, “और ड्रॉइंग का क्या, ख़लील?” और ख़लील अपनी आवाज़ में एक तड़प के साथ कहता है, “मुझे करने दो, मुझे अपनी आत्मा को रंगों में नहाने दो, मुझे डूबते सूरज को निगलने दो और इंद्रधनुष को पीने दो।”

अकादमी के प्रोफ़ेसर कहते हैं, “मॉडल को उसकी असलियत से ज़्यादा सुंदर मत बनाओ...” और मेरा मन कहता है, “काश, तुम मॉडल को उसकी असलियत के अनुसार ही चित्रित कर पाते।” अब मैं क्या करूँ, प्यारी मैरी? क्या मैं प्रोफ़ेसरों को ख़ुश करूँ या अपने मन को? ये प्यारे बुज़ुर्ग बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन मेरी आत्मा मेरे ज़्यादा क़रीब है।

काफ़ी रात हो चुकी है और अब मैं सोने जा रहा हूँ। मेरे मन में बहुत सारे विचार हैं। शुभ रात्रि, प्यारी मैरी! ईश्वर तुम्हें सदा आशीर्वाद दें।

— ख़लील

तेरह 

न्यूयॉर्क
शुक्रवार, 10 नवंबर 1911

एक पुराना अरबी गाना है, जो इस तरह शुरू होता है—“सिर्फ़ ऊपरवाला और मेरा दिल जानता है कि मेरे दिल में क्या है...” और आज तुम्हारे पिछले तीन ख़त दोबारा पढ़ने के बाद मैंने ज़ोर से कहा, “सिर्फ़ ऊपरवाला, मैरी और मैं ही जानते हैं कि मेरे दिल में क्या है!”

मैं अपना दिल खोलकर अपने हाथ में रखना चाहता हूँ; ताकि दूसरे भी जान सकें, क्योंकि ख़ुद को ज़ाहिर करने की इच्छा से बड़ी कोई इच्छा नहीं होती। हम सब चाहते हैं कि हमारे भीतर की छोटी-सी रोशनी ढकी न रहे, बल्कि सबके सामने आए।

जब गुफाओं में रहने वाले लोगों ने पहले कवि की अजीब बातों पर हँसी उड़ाई होगी, तो उसे कितना दुख हुआ होगा! उसने अपना धनुष-बाण और शेर की खाल, अपनी सारी चीज़ें, शायद सिर्फ़ इसलिए दे दी होंगी कि उसके साथी भी उस ख़ुशी और जोश को जान सकें, जो सूर्यास्त ने उसकी आत्मा में पैदा किया था और फिर भी, क्या किसी के द्वारा न पहचाने जाने का यह रहस्यमय दर्द ही कला और कलाकारों को जन्म नहीं देता? ‘कला के लिए कला’ कहना निश्चित रूप से एक नेक बात है, लेकिन क्या अंधे लोगों की आँखें खोलना और भी नेक काम नहीं है, ताकि वे आपके दिनों और रातों की ख़ामोश ख़ुशी में शामिल हो सकें? सच्ची कला को उसकी सुंदरता उजागर करके लोगों के सामने लाना चाहिए, तभी वह व्यावहारिक बनती है। मैंने ‘व्यावहारिक’ इसलिए कहा, क्योंकि जो कुछ भी हमारी देखने की दुनिया में कुछ जोड़ता है, वह व्यावहारिक है।

स्टूडियो सचमुच बहुत सुंदर है। मुझे किसी और जगह पर कभी इतना अपनापन महसूस नहीं हुआ।

और हाँ, मैं काम भी कर रहा हूँ। मेरे पास पहले से ही एक छोटी-सी तस्वीर है—एक ऐसी तस्वीर, जो ‘टू क्रॉसेज़’ (Two Crosses) से थोड़ी बड़ी है। यह किताब में एक छोटा-सा काम है।

हम जैसे लोग, जो परम सत्य की खोज में हैं और जिनके अकेलेपन को एक बग़ीचे की तरह सुंदर बना दिया गया है, उनके लिए ज़िंदगी में भूख और प्यास की ख़ुशी के अलावा और क्या बचा है? क्या ‘वास्तविक’ चीज़ों के प्रति अपने प्यार के ज़रिए हमने ‘यथार्थवाद’ से आगे बढ़कर कुछ नहीं पाया है? क्या हम अपनी नज़रें हटाकर बेजान चीज़ों के फीके चेहरों को देख सकते हैं? हममें से किसके पास दो आत्माएँ हैं कि एक को पहाड़ पर और दूसरी को घाटी में भेज सके?

— ख़लील

चौदह 

न्यूयॉर्क
रविवार, 26 नवंबर 1911

ओ मैरी, प्यारी मैरी, जब तुम आओगी, तो वह सचमुच ‘थैंक्सगिविंग डे’ (आभार दिवस) होगा। शार्लेट ने मुझे कुछ समय पहले बताया था कि तुम आ रही हो, लेकिन मैंने तुमसे पूछने की हिम्मत नहीं की। डर था कि कहीं तुम ‘न’ न कह दो... और गुरुवार वैसे ही आएगा; जैसे वे सभी चीज़ें आती हैं, जिनकी हम सचमुच चाहत रखते हैं। गुरुवार अब भविष्य का हिस्सा नहीं है, वह इसी ‘अभी’ का सबसे ख़ास पल है।

इन दिनों मैं यही कर रहा हूँ। मैं अपने घर को व्यवस्थित कर रहा हूँ। अपने विचारों को सहेज रहा हूँ। सभी पुरानी यादों और परछाइयों से छुटकारा पा रहा हूँ। दुनिया को समझने के लिए दुनिया से बहुत दूर होना ज़रूरी है। जीना सभी कलाओं में सबसे महान् कला है। कलाकार होने का मतलब है : असली ज़िंदगी की झलक पाना। असली ज़िंदगी ही ईश्वर है और ईश्वर हर जगह है। मैरी, मैं हर पल तुमसे प्यार कर रहा हूँ। अब मुझे एहसास हो रहा है कि वे बुधवार और शुक्रवार मेरे लिए क्या मायने रखते थे। बड़ी चीज़ों को ठीक से देखने के लिए उनसे थोड़ी दूरी पर होना ज़रूरी है।

ओह, मुझे तुमसे बहुत सारी बातें कहनी हैं! लेकिन गुरुवार आ रहा है और गुरुवार की ख़ुशी अभी से महसूस हो रही है।

— ख़लील

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