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पत्र : जेएनयू का जामिया के नाम

प्रिय जामिया,

कितनी पवित्र तारीख़ थी वह, जब हम पहली बार मिले थे। 6 जनवरी की शाम। उस शाम के एक-एक पल, एक-एक घटनाएँ मुझे याद हैं।

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें

— फ़िराक़ गोरखपुरी

उसके बाद से हमारी कितनी ही बातें हो चुकी हैं। तुम सोच रही होगी कि वाट्सएप, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक के समय में मैं तुम्हें ख़त क्यों लिख रहा हूँ? इसका जबाब भी बहुत सरल है क्योंकि ख़त मुहब्बत की निशानी होते हैं। सोशल मीडिया के ज़माने में बहुत गंभीर बात करो तो भी बात सतही लगती है। किंतु मेरा प्यार तुम्हारे लिए सतही नहीं है। हृदय की अनंत गहराई से मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ और उसी हृदय की गहराई से यह ख़त लिख रहा हूँ। ख़त इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि मैं अपने हिस्से का एक-एक वक़्त तुम्हारे साथ साझा करना चाहता हूँ।

उस शाम जब मैं तुमसे मिला तो मुझे लगा कि मैंने अपने जीवन को अब तक बहुत ही नीरस तरीक़े से जिया है। तुम्हारी आँखों की चमक मेरे अस्तित्व को रौशन कर रही थी। मुझे लगा की मैं कुछ हूँ। फिर तुम नेट-जेआरएफ़ का पेपर देने के बहाने चली गई। मेरी उदास आँखों को तुम पढ़ पा रही थी। जाते हुए तुमने वादा किया कि तुम फिर आओगी मुझसे मिलने और तुम आई। ग़र कोई कहे कि सबसे ज़्यादा सर्दी दिसंबर माह में होती है तो मैं उसे झूठा कह दूँगा। जेएनयू में सबसे ज़्यादा सर्दी जनवरी की रातों में होती है। हम दोनों जनवरी की सर्द रात में लकड़ियों की तपती लौ के सामने रात भर बैठे रहे। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि दुनिया में ऐसा कोई शब्द ही नहीं जो इस एहसास को बयाँ कर पाए। तुम्हें पता है जेएनयू में मुझे हमेशा एक चीज़ की कमी खलती है कि यहाँ कोई नदी या झील नहीं है। यह कमी और पैनी हो गई जब मैंने एचसीयू देख लिया। लेकिन उस रात मैंने तुम्हारे आँखों में झील देखी। उस रात मुझे जेएनयू से कोई शिकायत नहीं रही। मैं पूरी रात उस झील के किनारे लौ की आँच के साथ बैठा रहा। है कोई शब्द? नहीं न!

उस रात के बाद हम नहीं मिले। तुम घर चली गई। और फ़रवरी बाद लौटी। कहते हैं फ़रवरी मुहब्बत का महीना है। मग़र जेएनयू में मुहब्बत का महीना फ़रवरी नहीं, मार्च होता है। मार्च इसलिए की बोगनवेलिया बिना ख़ुशबू के पूरे कैंपस में महकता है। बोगनवेलिया पूरे मार्च अपने चरम पर होता है। कैंपस की हर लड़की के बालों में बोगनवेलिया मुहब्बत के साथ विराजमान होता है‌। यूँ ही तो नहीं आमिर हमज़ा ने कहा ‘बोगनवेलिया गुलदस्ते का नहीं बालों का फूल है।’ मैं सोचता हूँ कि बोगनवेलिया तुम्हारे बालों में कितना सुंदर लगेगा। तब मुझे गर्व होता है यह सोचकर कि बोगनवेलिया तुम्हारे बालों के साथ जामिया तक क्रांतिकारी गीत गुनगुना सकता है।

होली का महीना भी तो है यह मार्च। अरे हाँ बाबा मुझे याद है रमज़ान भी है इस बार। लेकिन तुम्हें जेएनयू की होली देखनी चाहिए और चाट सम्मेलन और झेल कुमारी का विवाह, भाई वाह! इस समय का मज़ा ही कुछ और है। मेरी दिली इच्छा थी कि मैं तुम्हारे साथ ताप्ति से निकलने वाली बारात में नाचता, चाट सम्मेलन में चटोरों को सुनता और तुम्हें अपने रंग में रंग देता। तुम्हारा रंग तो मुझ पर गहरा चढ़ा है। लेकिन कोई बात नहीं तुम अपने रोज़े पर ध्यान दो। तुम्हें रमज़ान मुबारक। नमाज़ समय पर पढ़ते रहना। मैं तुम्हारे लिए दुआ करूँगा।

किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है
तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है
तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता है
मेरे बग़ैर तुझे नींद कैसे आती है

— जौन एलिया

जेएनयू में पूरे पतझड़ मुझे ऐसा लगा जैसे तुम बोल रही हो और दुआएँ बरस रही हैं। रिंग रोड तुम्हारे बग़ैर सूना लगता है। पीएसआर के पत्थर उदास से दिखते हैं, ठीक से बात तक नहीं करते। मोर नाच तो लेता है मगर वो उत्साह नहीं दिखता। नीलगाय के कान स्थिर हो गए हैं कि कहीं से तुम्हारी आवाज़ आ जाए तो उनको जीवन मिल जाए। लाइब्रेरी की एक सीट‌ हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करती रहती है। कैंटीन का स्वाद वही है मग़र ज़ुबाँ पर नहीं चढ़ता।

तुम्हें मालूम है इस दौरान जेएनयू में क्या-क्या हुआ?

सैंकड़ों सेमिनार हो चुके हैं। एक सेमिनार में तो दो क्रेडिट का कोर्स भी हो गया। छाँह पत्रिका को एक साल भी पूरे हो गए। एक संगोष्ठी और काव्यपाठ के माध्यम से उत्साह वर्धन भी किया गया। सैंकड़ों प्रस्ताव स्वीकार कर लिए गए हैं, कई तो ख़ारिज भी कर दिए गए। चुनाव कराने के लिए आंदोलन हो रहे हैं। दस दिनों से डीओएस पर धरना-प्रदर्शन चल रहा है। चुनाव की सरगर्मी पीक पर है। मैंने तुम्हें बहुत याद किया इसलिए नहीं कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ बल्कि इसलिए भी कि हम दोनों एक ही लक्ष्य को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। ‘शिक्षा की क्रांति का लक्ष्य’।

लिखने को और भी बहुत कुछ है किंतु इस ख़त में इतना ही। तुम होली पर जेएनयू तो नहीं आ पाई। लेकिन मैं पूरी कोशिश करूँगा कि तुम्हारे इफ़्तार में शामिल हो जाऊँ। अपना ध्यान रखना। नमाज़ समय पर पढ़ते रहना। और हाँ ख़त ज़रूर लिखना। ढ़ेर सारा प्यार।


तुम्हारा प्रिय
जेएनयू
15/03/2025

~

प्रिय जामिया,

पिछले ख़त का जवाब नहीं दिया तुमने। मैं कई दिनों तक इंतज़ार करता रहा। मेरे दिल की कुछ बातें थीं उस ख़त में। मुझे लगा तुम भी अपने दिल की कहोगी और फिर हमारा रिश्ता एक तरफ़ा नहीं रहेगा। यह एकतरफ़ा शब्द भी मेरे ही दिमाग़ की ईजाद है। इधर कुछ दिनों से मैं एकतरफ़ा-एकतरफ़ा की रट लगाए बैठा हूँ। क़रीब महीने भर हो चले हैं मैंने तुम्हें फ़ोन नहीं किया। तुम्हारी तरफ़ से कोई फ़ोन नहीं आया है। यह मुझे बेचैन करने लगा कि तुमने फ़ोन क्यों नहीं किया? कई रातों की नींदों से मैं लड़ता रहा हूँ और जवाब बुनता रहा हूँ कि तुम्हारे साथ बहुत-सी समस्याएँ हैं जिस वजह से तुम स्टेबल नहीं हो। जैसे ही ठीक हो जाओगी फ़ोन कर लोगी। मगर महीना बीत गया है। अब सीने में एक दर्द उठता है कि क्या मैंने ही तुम्हारे नाम की धड़कनों को धड़कनें दिया है। तुम्हारी तरफ़ से कुछ नहीं था। दोस्ती, प्यार या फिर कोई बेनाम रिश्ता ही। क्या कुछ भी नहीं था?

तुम्हारे साथ रहते हुए कभी नहीं लगा कि तुम इतनी खा़स हो जाओगी। तुम्हारे साथ सहज था मैं। तुम्हारे साथ रहते हुए अच्छा लगता है। दोस्त की तरह ही मैं आगे बढ़ना चाहता था और शायद सब वैसा ही चलता अगर तुम बात बंद नहीं करती। पता नहीं क्या हो रहा है। बैठै-बैठे तुम्हारे बारे में सोचने लगता हूँ। एक पल में हँसने लगता हूँ। अगले ही पल उदास हो जाता हूँ। इधर कुछ दिनों से ठीक से नींद नहीं आ रही है। कुछ दिनों से पहली प्रेमिका से बात हो रही है, वो उसके अपने दुखड़े सुनाती रहती है। मैं उसका कंधा बनकर रह गया हूँ। बहुतों ने कंधे की तरह मुझे इस्तेमाल किया है। मैं सब जानते हुए भी इस्तेमाल होता रहा हूँ। उससे बातें करते हुए तुम्हारी याद आती है। तुम कई गुना अच्छी हो उससे। सुंदर तो हो ही।

पिछली बार हम डीयू जाते टाइम मिले थे। मुझे उससे पहले की एक मुलाक़ात याद है। तुम्हारे रूम पर। उस रात के लिए शर्मिंदा हूँ। पिछला साल हमारे मिलने का साल था। यह साल शायद बिछड़ने का हो। मगर जो भी था ख़ूबसूरत था। बहुत-सी चीज़ें मेरे लिए पहली बार थी। मैं 24 की उम्र में 16 की तरह जीने लगा था। तुम मुझे अपनी ओर खिंचती हो। इस प्रेमपत्र में बस इतना ही। शेष फिर कभी लिखूँगा।

तुम्हारा
जेएनयू
27/02/2026

~

प्रिय जामिया,

पिछला साल तुम्हारे प्रेम में गुज़रा। यह साल तुम्हारी स्मृतियों में गुज़र रहा है। आने वाली एक उम्र तुम्हारे इंतज़ार में गुज़र जाएगी। मैं तुमसे प्रेम करता रहा। तुम उसे मजबूरी का नाम देती रही। मगर मैं फिर भी प्रेम करता रहा। अब भी करता हूँ। 
मैं तुम्हें हमेशा से समझने की कोशिश करता रहा। तुम अपने आप को और उलझाती रही और मुससे दूर भागती रही। तुमने हमेशा चाहा कि मैं तुम्हारी तारीफ़ करूँ, तुमसे वादा करूँ, बड़ी-बड़ी बाते करूँ। मगर मैं तो क्षण में जीने वाला लड़का, बिना शर्त प्रेम करने वाला लड़‌का हूँ। जिसको चाहा ख़ूब चाहा, जितना जिया जी भर कर जिया। यह बताना की किसी के लिए कितना एफ़र्ट्स दे रहा हूँ, यह बताना कि किसी को कितना चाहता हूँ, यह कभी आया ही नहीं। प्रेम करना जानता था। जताना कभी आया ही नहीं।

शायद तुम यह भी चाहती रही होगी कि मैं तुमसे अपने इश्क़ को बयान करूँ। Over expressive बनूँ। लेकिन मैं तो कविता से प्रेम करने वाला लड़‌का, कविता में जीवन जीने वाला लड़‌का हूँ। मुझे तो लगता रहा कि तुम मेरी आँखों से प्रेम को पढ़ो/पढ़ सकती हो, धड़कनों को अपने दिल से सुनों/सुन सकती हो, स्पर्श को महसूस करो/कर सकती हो। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके बावजूद कि तुम मेरे साथ नहीं हों, मैं तुम्हें याद करके ख़ुश होता हूँ। यह साल तुम्हारी स्मृतियों का साल है। मैं तुम्हें याद करता हूँ। ख़ूब-ख़ूब याद करता हूँ। मगर मैं अब मिलूँगा नहीं। मिल नहीं पाऊँगा। हमेशा ख़ुश रहो। अपना ध्यान रखो। ढेर सारा प्यार।

तुम्हारा
जेएनयू
07/03/2026

~

प्रिय जामिया,

पत्रों की यह शृंखला कब ख़त्म होगी मालूम नहीं। लेकिन मैं जब पूरी तरह से ख़ाली होता हूँ तो तुम्हारी तरफ़ लौटता हूँ और तुम्हें पत्र लिखने बैठ जाता हूँ। तुम्हारे साथ या तुम्हारे साथ होने के एहसास (अब तो सिर्फ़ एहसास भर रह गया है) से मैं पूरा हो जाता हूँ। प्रेम से भर जाता हूँ।

तुम हमेशा मेरे साथ बहुत सलीक़े से पेश आती रही हो। यही कारण है कि मैं तुम्हें अधिक से अधिक प्रेम कर लेना चाहता था। तुम्हें जहाँ से भी बचा सकता, अपने पास बचा लेना चाहता हूँ। जब भी कोई लड़की मेरी डिसरिस्पेक्ट करती है तो‌ सहसा तुम्हारी याद आती है।

अभी मैं यात्रा में हूँ। पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ। तुमसे दूर या तुम्हारे और पास। जैसे-जैसे दक्षिण की ओर बढ़ रहा हूँ, उत्तर और क़रीब होता मालूम हो रहा है। तुम और क़रीब आ रही हो। तुम्हारी स्मृतियाँ और गहराती जा रही हैं।

मैंने कितनी बार सोचा तुम्हारे साथ बहुत-सी यात्राएँ करूँगा। कई-कई जगहें सोची थी‌। मगर सब अधूरा रह गया। तुम्हारे बग़ैर मैं अधूरा हो गया हूँ।

मुझे समाज से नफ़रत है। मुझे धर्म से नफ़रत है। मुझे जाति जैसे शब्द से नफ़रत है। कभी मुझे ताक़त मिली तो मैं एक अलग दुनिया बनाऊँगा। जिसमें कोई सामाजिक दबाव नहीं होगा। कोई धर्म नहीं होगा। कोई जाति नहीं होगी। सिर्फ़ प्रेम होगा। प्रेम में हम दोनों होंगे।

इधर जेएनयू में बसंत आया हुआ है। बोगनविलिया मेरी ओर देखता है और मुस्कुराता है। मैं उसे समझाता हूँ, तुम मेरे साथ नहीं आई हो। बोगनविलिया उदास हो जाता है। मैं उसके पास बैठता हूँ। वो तुम्हारे बारे में पूछता है। मैं उदास हो जाता हूँ। उससे कुछ फूल तुम्हारे नाम से तोड़ लेता हूँ और किसी लड़की को भेंट कर देता हूँ। हर वो लड़की जो बालों में बोगनविलिया लगाती है, मुझे तुम्हारी याद दिलाती है।

तुम्हारे साथ बिताया हर एक पल मुझे ख़ुशी देता है। इसलिए हर एक चीज़ को बारंबार मैं याद करता रहता हूँ। आख़िर यात्रा के वो पल जब हम दोनों के हाथ, एक-दूसरे के हाथों में थे। वो पल सबसे क़ीमती पलों में थे। मुझे उम्र भर वो याद रहेंगे। उसी एहसास से साथ याद रहेंगे। तुम उस दिन नोट्स वाली बात पर ग़ुस्सा हो गई थी। ग़ुस्से में कितनी प्यारी लगती हो तुम। मुँह फुल जाता है तुम्हारा। ऐसे में तुम और प्यारी लगती हो। फुला हुआ मुँह पकड़कर चुमने का मन करता है।

वो सब अब दुबारा शायद नहीं होगा। मगर मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। ख़ूब-ख़ूब प्यार करता हूँ। ख़ूब-ख़ूब याद करता हूँ।

तुम्हारा
जेएनयू
10/03/2026

~

प्रिय जामिया,

चिदंबरम में तीन दिन की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ख़त्म हो गई है। दो दिन तमिलनाडु भी घूम चुका हूँ। तीसरा दिन चेन्नई में बीतेगा। फिर दिल्ली लौट आऊँगा। इधर तुम्हारी याद लगातार आती रही है। समुद्र के किनारे बैठकर तुम्हें ख़ूब याद किया। तुम पास होती तो कितना ख़ूबसूरत होता। समुद्र अपनी विशालता पर इतराता बहुत है। अपने मोतियों पर घमंड है उसे। काश! तुम साथ होती तो मैं उसे दिखा पाता कि दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत मोती मेरे पास है। उसका घमंड तोड़ नहीं पाया मैं। एक दिन तुम्हारे साथ ज़रूर आऊँगा।

मैं अन्नामलाई यूनिवर्सिटी आया था। बहुत ख़ूबसूरत यूनिवर्सिटी है यह। उसका स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तो और भी आकर्षक। यहाँ के लोग और भी साफ़ दिल और सुंदर। सब लोग कितना प्यार करते थे मुझे। मैं भी उनको बहुत प्यार करने लगा हूँ। किसी को प्यार करना मैंने तुम्हारे साथ रहकर ही सीखा है।

तुमने जो भी सिखाया है। मेरे जीवन में बहुत काम आया। मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार रहूँगा हमेशा। तुमने सिखाया कि कैसे किसी से बात करनी चाहिए। इसलिए भी यहाँ लोगों ने मुझे तवज्जो दी। मैं उनसे बात करता था। उन्हें मेरा बात करना अच्छा लगता था। मैं उनसे मस्ती करता था। उन्हें मेरा मस्ती करना अच्छा लगता था।

यूनिवर्सिटी में मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त बन गया है। मिलकर लगा जैसे मैं बहुत लंबे समय से उसे जानता हूँ। हम अब बेस्ट फ़्रेंड हैं। मैं उसके साथ पूरी यूनिवर्सिटी घूमा हूँ। मैंने तुम्हारे बारे में उसे बताया था। वो तुमसे मिलना चाहता था। उसने मेरे लिए साउथ इंडियन ड्रेस भी अरेंज किया था। लेकिन किसी कारणवश मैं पहन नहीं पाया। अगली बार ज़रूर पहनूँगा। मैं जब लौट रहा था तो वो बहुत इमोशनल हो गया था। मैं भी बहुत इमोशनल हो गया था।

उसे थोड़ी बहुत हिंदी आती है। लिख और पढ़ लेता है। बस बोल नहीं पाता। उसने मुझे समर्पित करके एक कविता लिखी है या फिर यूँ कहे की दोस्त को ख़ुश करने के लिए हिंदी में कविता लिखी है। बहुत छोटी कविता है। तुम भी पढ़ो।

मैं खिड़की के रास्ते
बस तुम्हें ही देखता रहता हूँ,
तुम्हारी हर एक हरकत को
मुझे देखकर
अपनी चादर के अंदर मत छिपो,
मेरे दिल से
एक और अँधेरा सहा नहीं जाएगा…

—गौतम

तुम साउथ इंडिया ज़रूर घूमना। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं। मुझे भी तुम्हारे साथ यहाँ घूमना है। बीच के किनारे बैठना है। ख़ूब सारी बातें करनी है। अगली बार तुम मेरे साथ आना। आओगी ना? ख़ूब प्यार।


तुम्हारा
जेएनयू
16/03/2026

~

प्रिय जामिया,

यह शायद तुम्हारे लिए मेरा आख़िरी ख़त हो। तुम्हें बहुत-सी चीज़ें बतानी हैं। दक्षिण से मैं लौट आया हूँ। मेरे साथ मेरी पुरानी प्रेमिका डीएवीवी भी आई थी। उसे दिल्ली घूमने का मन था। पिछले कुछ महीने पहले ही उसका ब्रेकअप हुआ था। तब से हमारी लगातार बात होती रही है। मुझे हमेशा से वो पसंद थी। उसके अलग रिलेशनशिप होने के बावजूद मेरा उससे प्यार कम नहीं हुआ कभी। मैं आख़िरी अटेम्प्ट तक उसे बचा लेना चाहता था/हूँ। इस बार भी यही था। मैंने सोचा कि एक और मौक़ा दिया जाना चाहिए। ख़ुद को भी और उसे भी। बातें इतनी ज़्यादा होने लगी कि मिलने का मन होने लगा। तय हुआ कि दक्षिण से लौटते वक़्त दिल्ली साथ चलेगी। हुआ भी वही।

तय यह था कि दोनों एक-दूसरे को समझेंगे और सब ठीक लगा तो रिलेशनशिप में आएँगे। एक-दो दिन में चींज़ें कुछ क्लीयर हुईं। हम एक-दूसरे के बहुत क़रीब आते गए। मैंने उसे आधी दिल्ली घुमा दी। वह मुझे पूरी तरह से जानने लग गई और मुझसे प्रेम करने लगी‌।

हम पहले दिन लाल क़िला, चाँदनी चौक, जामा मस्जिद और इंडिया गेट गए। मैं पहली बार किसी लड़की के साथ दिल्ली की सड़कों पर, मेट्रो में तुम्हारे ही साथ घूमा हूँ। मैं जहाँ भी जाता तुम भी मेरे साथ वहीं होती‌। मैं तुम्हें दूर से निहारता रहता और उसका हाथ पकड़ चलता रहता। काश! हम दोनों एक-दूसरे को इतने अच्छे से समझ पाते कि प्यार कर पाते। अगर ऐसा होता तो डीएवीवी की ओर मैं नहीं लौटता। लेकिन हमारे प्रेम के बीच समाज था, जाति थी और धर्म था‌। इसे हम नहीं बदल सकते थे। उसके बाद हम लोटस टेंपल, हुमायूँ टॉम्ब और क़ुतुब मिनार गए। सरोजिनी जाना था, लेकिन तब तक मेरे पैसे ख़त्म हो चुके थे। सो यह अगली बार के लिए बाक़ी रहा।

तुम्हारे बारे में उसे सबकुछ बता दिया है मैंने। एक-एक चीज़। कोई भी रिश्ता झूठ पर क़ायम नहीं करता मैं। उसके साथ भी पहली बार में ठीक से नहीं हो पाया था लेकिन उसने डाँटा नहीं। समझाया। हमने फिर कोशिश की। सब ठीक से हुआ। तुम्हारे बाद से मैं बहुत गिल्ट में था। दिन जैसे-जैसे बढ़ते जाते गिल्ट गहराता जाता था। मैं ऐसा सोचने लगा था कि मुझमें कोई कमी है। मगर ऐसा नहीं था। सब आत्मविश्वास की बात है। तुम्हारे साथ था तब आत्मविश्वास नहीं था, इसने आत्मविश्वास दिया, दूसरा मौक़ा दिया।

मैं उससे प्रेम करता था। बीच में कुछ समय ऐसा भी था, जब लगा कि प्रेम धीरे-धीरे चुक रहा है। तुम्हारे साथ जब था, तब तो उसे भूल चुका था मैं। मगर फिर लौट आई वो और ऐसे समय में आई जब तुम दूर थी। मैंने उसे रोका नहीं। रोक ही नहीं पाया। प्यार ने फिर से अपने लिए हम-दोनों के दिलों में जगह बना ली।

तुम बहुत अच्छी हो। यह बात मैंने उसे कही है। उसने भी तुम्हारी सुंदरता की तारीफ़ की है। तुम दिल से भी उतनी ही सुंदर हो जितनी शरीर से। वो बहुत ग़ुस्से वाली है, तुम बहुत कम ग़ुस्सा करती हो। तुम्हारा ग़ुस्सा मेरे लिए प्यार बन गया। मैं तुम्हें भूलूँगा नहीं। भूल नहीं पाऊँगा। लेकिन अब मैं किसी को कमिटमेंट दे चुका हूँ इसलिए लौट भी नहीं पाऊँगा।

यह बात शायद मैं पहले भी लिख चुका हूँ। फिर भी लिख रहा हूँ। मैं तुम्हारे साथ जितने टाइम रहा प्रेम में रहा। हाँ यह पहले दिन से बिल्कुल सही बात है। मैंने तुम्हें जहाँ भी छुआ, जब भी छुआ प्रेम में छुआ। हवस उसमें रत्ती भर नहीं थी।

यह सब तुम्हें नहीं लिखना पड़ता। लेकिन लिख रहा हूँ क्योंकि प्रेम करता था। करता हूँ। कोशिश करूँगा कि आगे न करूँ। तुम अब तक मेरे साथ बहुत प्रेम से रही हो। बहुत बार मैंने ग़लतियाँ की हैं। बहुत बार तुमने माफ़ किया है। मैंने बहुत कुछ तुमसे सीखा है। तुमने बहुत कुछ मुझे सिखाया है। 

लिखने को बहुत कुछ है लेकिन बस इतना ही। किसी से प्रेम करना, ख़ूब करना। जैसी हो वैसी ही रहना। जैसी हो वैसे ही बहुत सुंदर हो तुम। बहुत-बहुत प्यार।

तुम्हारा
जेएनयू
25/03/2026

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आशीष कुमार शाह को और पढ़िए : कहानी : नीली

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