निर्मल वर्मा : चिंतन के स्वर
ब्रजरतन जोशी
26 मई 2026
सुख्यात लेखक निर्मल वर्मा के लेखन को पढ़ना अक्सर किसी शांत, धुँधले पहाड़ी रास्ते पर चलने जैसा अनुभव देता है, जहाँ दृश्य जितना सामने होते हैं, उससे कहीं अधिक ओझल भी।
उनके यहाँ कथ्य से अधिक महत्त्व उस अनकहे का है, जो शब्दों के बीच साँस लेता है। वे स्वयं लिखते हैं कि लेखक का काम ‘मौन को भाषित करना नहीं, बल्कि भाषित में मौन को उजागर करना’ है। इस एक वाक्य में उनके समूचे चिंतन का बीज छिपा है।
यह आलेख अपने भीतर निर्मल वर्मा की आलोचना को, उनके अपने आत्मालोचन और सांस्कृतिक जटिलता तीनों को एक साथ साधने की कोशिश है। निर्मल वर्मा का वैचारिक लेखन प्रायः इधर हिंदी आलोचना परिदृश्य में गहरे वैचारिक तनाव से देखा-समझा गया है। इस तरह की आलोचना का अधिकांश पढ़ते हुए साफ़ महसूस होता है कि आलोचक केवल व्याख्या नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे एक वैचारिक प्रतिवाद रच रहे होते हैं।
तर्क-पद्धति और चिंतन का सार
निर्मल वर्मा के वैचारिक चिंतन की आलोचना जिस मूल तर्क-पद्धति पर चलती है, वह है ‘स्थापना-विपर्यय-खंडन’ की पद्धति। इसके अंतर्गत प्रायः सभी पहले निर्मल वर्मा की स्थापनाओं को उनके अपने उद्धरणों के माध्यम से स्थापित करते हैं, फिर अपनी दृष्टि में व्याप्त पूर्वग्रहों को बिना संवेदनात्मक छनाव के उजागर करते हैं और अंततः उन्हें वैचारिक रूप से ख़ारिज।
भारतीयता बनाम पश्चिम : एक द्वंद्वात्मक संरचना
निर्मल वर्मा के चिंतन का मूल आग्रह यह है कि भारतीय संस्कृति ‘अखंड’ है, जबकि पश्चिमी संस्कृति ‘विभाजित’।
उदाहरण के लिए वह कहते हैं कि भारतीय चेतना में धार्मिक और सांसारिक जीवन के बीच विभाजन नहीं है, जबकि यूरोप में यह खाई चौड़ी होती गई।
आलोचकों का एक वर्ग सतही दृष्टि से उनकी इस स्थापना को चयनधर्मी कहता रहा है क्योंकि उनकी दृष्टि से यह एक ख़ास प्रकार की भारतीयता को चुनता है और बाकी को हटा देता है।
यहाँ तर्क यह है कि निर्मल वर्मा ‘संस्कृति’ को एक स्थिर, शाश्वत इकाई की तरह देखते हैं, जबकि वह उसे ऐतिहासिक और बहुलतापूर्ण प्रक्रिया मानते हैं।
मिथक बनाम इतिहास
निर्मल वर्मा मिथकों, प्रतीकों और संस्कारों को भारतीय चेतना का मूल मानते हैं और इतिहास को गौण।
प्रायः विद्वज्जन अपने पूर्वग्रह के चलते ऐसी भी व्याख्या करते हैं कि उनकी दृष्टि में ‘भारत का कोई इतिहास नहीं है’ इस कथन को वह गंभीर समस्या मानते हैं। जबकि निर्मल वर्मा मूलतः इतिहास की व्याख्या के क्रम में यह ज़रूर कहते हैं कि हमारे पास यूरोप के संदर्भ में जिसे इतिहास माना गया है, वैसा इतिहास नहीं है। असल में यह तर्क को मूल संदर्भों से काटकर देखने की विधि से आता है।
जो लोग इसका प्रतिवाद ऐतिहासिक परिवर्तन के उदाहरण से करते हैं, वे इतिहास को नकारने के पीछे दरअस्ल सामाजिक परिवर्तन और संघर्षों को नकारने की बात करते हैं। जबकि ऐसा है ही नहीं।
धर्म का अमूर्तन और राजनीतिक संकेत
एक आपत्ति यह भी आती है कि निर्मल वर्मा धर्म को एक अमूर्त आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करते हुए अपने लेखन में ‘यवन’, ‘म्लेच्छ’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। जो यह दिखाता है कि धर्म को अमूर्त बनाए रखने का दावा करते हुए भी निर्मल वर्मा उसे सांस्कृतिक-राजनीतिक पहचान में बदल देते हैं।
इस तर्क से तो गांधी भी और भला गांधी ही क्यों भारतीय परंपरा में ही निर्मल वर्मा से पहले बहुत बार अलग-अलग कालखंड में इन शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह हमने ही इन शब्दों के अपने रूढ़ अर्थ तय कर लिए और कभी मूल अर्थ की तह तक जाने और इन्हें अपने मूल स्वरूप और इनके परंपरागत अर्थ को जानने की जिज्ञासा ही नहीं की।
पहले यवन शब्द को ही लें। अपने मूल में यवन शब्द ग्रीक के आयोनियन से आया है जिसका अर्थ यह शब्द ‘आयोनिया’ (Ionia : वर्तमान तुर्की का तटीय क्षेत्र) के निवासियों के लिए उपयोग होने वाले फ़ारसी शब्द ‘यौना’ या ‘याउना’ का अपभ्रंश है।
इतिहास बताता है कि इसका पहला उपयोग सिकंदर के आक्रमण के समय और उससे पहले भारत में आने वाले ग्रीक निवासियों के लिए इस्तेमाल हुआ करता था। जहाँ तक प्रमुख भारतीय ग्रंथों में महाभारत, पुराणों और बौद्ध ग्रंथों में यवनों को गांधार/उत्तर-पश्चिमी सीमा के निवासियों के रूप में वर्णित किया गया है।
अपने व्यापक अर्थ यह शब्द समय के साथ किसी भी विदेशी आक्रमणकारी या पश्चिमी देशों से आने वाले लोगों के लिए होने लगा, जिसे कालांतर में हमने म्लेच्छ भी कहा।
इसी तरह ‘म्लेच्छ’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘म्लेच्छ्’ (अस्पष्ट बोलना) धातु से मानी गई है—जिसका प्राचीन अर्थ उन लोगों से था जो आर्य संस्कृति, वेदों या संस्कृत भाषा का पालन नहीं करते थे। यह शब्द संभवतः भारत के मूल निवासियों या विदेशियों (जैसे शक, यवन) के लिए प्रयुक्त होता था। शतपथ-ब्राह्मण (लगभग 700 ईसा पूर्व) में यह शब्द पहली बार मिलता है।
यानी जो लोग संस्कृत ठीक से नहीं बोल पाते थे (अस्पष्ट भाषी) या जिनकी जीवनशैली वैदिक नहीं थी, उन्हें म्लेच्छ कहा जाता था।
प्राचीन काल में यह शब्द ग़ैर-आर्यन, विदेशियों (हूण, शक, यूनानी) के लिए प्रयुक्त होता था। यह शब्द अक्सर संस्कृति या भाषा में भिन्नता (बर्बर/असभ्य) को दर्शाता था, न कि किसी विशिष्ट जाति या धर्म को, जैसा हमने मान और समझ रखा है।
कालांतर में, इस शब्द का प्रयोग बाहरी आक्रमणकारियों और बाद में कुछ संदर्भों में ग़ैर-हिंदू समुदायों के लिए भी किया जाने लगा।
ध्यान रहे कि निर्मल वर्मा जैसे चिंतक जब अपने लेखन में इन शब्दों का इनका उपयोग कर रहे हैं, तो वह उन्हीं पारंपरिक संदर्भों में कर रहे हैं। मूल अर्थों के साथ। किसी विचार या दृष्टि विशेष के प्रभाव से नहीं।
मानववाद का विरोध
निर्मल वर्मा यूरोपीय मानववाद की पड़ताल करते हुए उसकी आलोचना करते हैं और उसे फ़ाशीवाद की ओर जाने वाली प्रक्रिया बताते हैं।
जबकि उनके आलोचक इसका उल्टा तर्क देते हैं कि अगर मनुष्य को सर्वोच्च न मानें, तो ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट’ लागू होगा यानी सामाजिक डार्विनवाद, फ़ाशीवाद। यह निर्मल वर्मा की तर्क-शृंखला को उलट देना है और दिखाता है कि उनका निष्कर्ष स्वयं फ़ाशीवादी तर्क की ओर जाता है। जबकि उनके समूचे चिंतन में विचार अपने उदार और सात्विक रूप में है। सीमित दृष्टि या घेरे में नहीं।
आध्यात्मिक अनुभव बनाम यथार्थ
उनके कुंभ प्रसंगों में भी हमारे विद्वान साथीगण यह देख लेते हैं कि निर्मल वर्मा साधुओं के अनुभवों को आध्यात्मिक रूप में देखते हैं, जबकि वह सामाजिक यथार्थ (नशा, हिंसा, पाखंड) को नज़रअंदाज़ करते हैं।
यह पुनः एकांगी और सीमित दृष्टि की पढ़त से उपजा निष्कर्ष है। उदाहरण के लिए चिलम पीता साधु निर्मल वर्मा के लिए ‘रामकृष्ण परमहंस जैसा’ है, तो वही आलोचकों के लिए सामाजिक विडंबना जैसा है।
यहाँ जब निर्मल वर्मा साधु में रामकृष्ण की छवि देख रहे हैं, तो इसके मानी वह उसकी उस आनंद मग्न अवस्था को देख रहे हैं जैसी मौज रामकृष्ण परमहंस के बारे विदित हैं। और फिर इस तर्क से तो शिव को भी पता नहीं इस दृष्टि वाले कैसे और किस तरह लेंगे या देखेंगे। पूरे भारत भर में शिव अनुयायी भांग को प्रसाद रूप में लेते मिलेंगे, बतौर नशा नहीं। तो क्या वे सारे नशेड़ी ,पाखंडी कहे जाएँगे? इस पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है।
पूर्ण निषेध बनाम आलोचनात्मक संतुलन का अभाव
आलोचक निर्मल वर्मा के चिंतन को लगभग पूरी तरह ‘वर्णाश्रमवादी’ और ‘फ़ाशीवादी’ घोषित कर देते हैं। अब समस्या यह है कि निर्मल वर्मा का पूरा लेखन एकरेखीय नहीं है। उनकी ‘मौन’ और ‘अभिव्यक्ति’ की अवधारणा साहित्यिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए आलोचकगण ‘मौन’ की अवधारणा को केवल रहस्यवाद मानकर ख़ारिज कर देते हैं, जबकि उसमें अस्तित्ववादी गहराई भी स्पष्ट है। जिसकी अनदेखी स्पष्ट रूप से की जा रही है।
बहुलता की वकालत, पर स्वयं की एक दृष्टि एकांगी
निर्मल वर्मा के आलोचक भारतीय बहुलता की बात तो करते हैं और लोकायत, बौद्ध, जैन परंपरा का हवाला देते हैं, लेकिन ख़ुद निर्मल वर्मा के चिंतन को बहुलता के आलोक में नहीं पढ़ते। यानी बहुलता का सिद्धांत तो लागू, पर स्वयं की आलोचना में अनुपस्थित।
आध्यात्मिक अनुभव का सरलीकरण
आलोचकगण कुंभ के अनुभवों को केवल ‘नशा’ और ‘पाखंड’ तक सीमित कर देते हैं। अब इसमें समस्या यह है कि आध्यात्मिक अनुभवों का सामाजिक आलोचना के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक या अस्तित्वगत पक्ष भी होता है, जो उनके विवेचन में सिरे से नदारद रह जाता है।
भावात्मक तीव्रता बनाम वैचारिक संतुलन
बहुधा देखने में यह भी आया है कि आलोचकों का भाषा व्यवहार भी कईं जगह विश्लेषणात्मक से अधिक आक्रामक है। अभी कुछ दिन पूर्व ही पढ़े इसी प्रकृति के एक लेख में ‘पिलपिला चिंतन’, ‘विषवमन’ आदि का इस्तेमाल। इससे तर्क शक्ति तो कम नहीं होती, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर असर ज़रूर पड़ता है।
भारतीयता को ‘प्रक्रिया’ की तरह देखना
थोड़ी गहराई से चिंतन करें, तो भारतीयता न तो केवल मिथकों में है, न केवल इतिहास में बल्कि वह दोनों के बीच चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है। गीता में आया कर्मयोग (आध्यात्मिक) अशोक का धम्म (राजनीतिक-ऐतिहासिक) दोनों मिलकर भारतीयता बनाते हैं।
निर्मल वर्मा का पुनर्मूल्यांकन
उन्हें पूरी तरह ख़ारिज करने के बजाय इस तरह पढ़ा जाना शायद अधिक सुसंगत हो कि वह तर्क पर ‘अनुभव’ को तरजीह देते हैं, जिसके कारण इस प्रक्रिया में ‘इतिहास’ और ‘सामाजिक यथार्थ’ पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते हैं, जैसा आलोचकों को अपेक्षित है।
आध्यात्मिकता का बहुस्तरीय अर्थ
निर्मल वर्मा के लेखन में आध्यात्मिकता को केवल कर्मकांड या पाखंड के रूप में नहीं, अस्तित्वगत अकेलापन, अर्थ की खोज, अनुभव की भाषा के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
अस्तु, उनके आलोचक एक वैचारिक प्रतिवाद रचने की प्रक्रिया में उलझे रहते हैं। जिसके कारण वे निर्मल वर्मा की भारतीयता की अवधारणा को चुनौती देते हैं।
निर्मल वर्मा की ताक़त उनकी तर्क-शृंखला, उदाहरणों की प्रचुरता और वैचारिक स्पष्टता में है।
अगर थोड़ा-सा संतुलन साधा जाए, तो हम उनके यहाँ चिंतन में से भारतीय चिंतन की जटिलता का एक गहरा, बहुआयामी मानचित्र बनाने में कामयाब हो सकते हैं, जहाँ मिथक और इतिहास, धर्म और तर्क, अनुभव और यथार्थ एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को अर्थ भी देते हैं। यही सनातन चेतना है।
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