मुकेश पांडेय की फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में सम्मान
हिन्दवी डेस्क
18 सितम्बर 2026
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के मौन संघर्ष, अकेलेपन और साहस की कहानी कहती स्वतंत्र फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ (Daughter of the Mountains) को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल, कोलकाता’ में अवॉर्ड विनर के रूप में सम्मानित किया गया है। फ़िल्म के लेखक, निर्देशक और निर्माता मुकेश पांडेय हैं।
फ़िल्म पहाड़ के उस यथार्थ को सामने लाती है, जहाँ रोज़गार की तलाश में पुरुष दिल्ली और दूसरे मैदानी इलाक़ों की ओर चले जाते हैं और पीछे रह जाती हैं स्त्रियाँ—घर, खेत, पशु, बच्चों और तमाम ज़िम्मेदारियों के साथ। उनके हिस्से में आता है एक लंबा इंतिज़ार और ऐसा अकेलापन, जिसकी कोई सार्वजनिक कथा नहीं बनती।
मुकेश पांडेय का कैमरा इसी अनकही दुनिया की ओर मुड़ता है। फ़िल्म हिमालयी स्त्रियों के जीवन को किसी दूर खड़े दर्शक की निगाह से नहीं, बल्कि उनके अनुभवों की आत्मीयता के साथ देखने की कोशिश करती है।
ईजा की ‘फ़सक’ से फ़िल्म तक
मुकेश पांडेय के अनुसार इस फ़िल्म की शुरुआत एक साल पहले उनकी ईजा की कही एक बात से हुई। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा था, “जितने कष्ट जीवन में हमने देखे, साथ की औरतों ने देखे… उन पर तो मैं तुम्हें सुनाऊँ, तो एक पूरी कहानी लिखी जा सकती है।”
ईजा की इस ‘फ़सक’ यानी क़िस्सागोई ने कहानी का बीज दिया। अगले दिन नेशनल आर्ट गैलरी की एक कला-प्रदर्शनी में चित्रों को देखते हुए उस बीज ने फ़िल्म के दृश्यों का रूप लेना शुरू किया। धीरे-धीरे पटकथा और निर्माण की योजना तैयार हुई।
फ़िल्म की शूटिंग सुरना (द्वाराहाट) और दूनागिरी से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित एक एकांत पहाड़ी घर में हुई। स्थानीय निवासी लीला दाज्यू और उनके परिवार ने शूटिंग टीम को अपने घर का हिस्सा बना लिया। पहाड़ के इस सहज अपनत्व ने फ़िल्म के अनुभव को और आत्मीय बनाया।
फ़िल्म में वरिष्ठ अभिनेता राणा एच.एस. और अभिनेत्री प्रीति रावत ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाई हैं। छायांकन और पोस्ट-प्रोडक्शन का काम एम.के. चौनियाल ने किया, जबकि साउंड डिज़ाइन प्रशांत ने FTII, पुणे के स्टूडियो में तैयार किया। संगीत, गीत और स्वर के स्तर पर तारा कांडपाल, अमित खरे, काजल घोष और मयूरेश ने योगदान दिया। संपादन एवं विज़ुअल डिज़ाइन दिव्यांश पंत का है।
मुकेश पांडेय के लिए यह फ़िल्म महज़ एक सिनेमाई परियोजना नहीं, बल्कि उन तमाम ‘ईजाओं’ और हिमालयी महिलाओं को समर्पित एक श्रद्धांजलि है; जिनकी ज़िंदगियाँ पहाड़ के सन्नाटे में बीतती रही हैं। फ़िल्म उन्हीं ज़िम्मेदारियों, अकेलेपन और ख़ामोशी के भीतर बची रौशनी की कहानी कहती है।
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बेला पॉपुलर
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