मोटरसाइकिलों का लोक वाया इन्फ़्लुएंसर

सोशल मीडिया के आला कर्मचारियों ने जब जनता के लिए रील्स फ़ॉर्मेट संभव किया, तब उन्हें मालूम न होगा कि लोक के गणराज में रील्स का क्या हाल होगा! उन्हें क़तई पता नहीं था कि इसी रील्स से सुदूर बाड़मेर के पत्रकार नेताओं के चहुँओर घूमेंगे कि कोई दिनेश बोहरा, कालू माली रील्स के ज़रिए 'राणलियौ' लगाकर अपना पंथ-परिसर बनाएँगे। ऐसा नहीं है कि मेरे सूबे के नेताओं में मीमर नहीं हैं। भला रिछपाल मिर्धा जैसे महान मीमर को कैसे भूला जा सकता है? लोक के सस्ते से सस्ते ह्यूमर से लेकर हाईट भरा ह्यूमर मिर्धा रचते रहे हैं। लेकिन आज मेरा मन यहाँ पत्रकारों, नेताओं या उनके अनुयायियों के रील्स-परिसर पर बात करने का नहीं है।

दरअस्ल, बीते कई दिनों से मेरी इंस्टाग्राम फ़ीड बाइकों से भर गई है। इंस्टा का एल्गोरिदम ही होगा कि वह मुझे मेरे इलाक़े के रील्स दिखाता है, इसलिए इन दिनों धोरों में स्टंट करते बाइकर्स ही मुझे दिखते हैं। उनके पास काम भर पैसों से ख़रीदी मोटरसाइकिलें होती हैं। मॉडीफाइड हीरो स्प्लेंडर। रेगिस्तान में इन इन्फ़्लुएंसर की तीन दर्जन से अधिक खेप लोकप्रिय है। बचे दर्जन औसत हैं। वे धोरों पर बाइक चढ़ाते वक्त गिर जाते हैं, पर वे इस गिरने को ‘‘मैंने माफ करी मां मेरी अे, इस जन्म तेरा हो न पाया’’ जैसे भावुक लिरिक्स में जोड़ ढाणी में बैठे किसी 'फरी हां' (संदर्भ : ओमप्रकाश बागड़ा) का कलेजा निकालने में इतने क़ाबिल होते हैं कि उसे वह रील अपनी फ़ीड में लगानी ही पड़ती है।

इन इन्फ़्लुएंसर में बड़ी तादाद उनकी हैं जिन्हें 'राजा म्हारा राजलिया' और 'चढ़ती झालौ दे गई' जैसे चर्चित गीत बहुत पसंद हैं। यूँ ब-क़ौल कुशालगिरी जी, जिस तरह 'म्हैं थानै सिंवरू' और 'गौरी के नंदा' दोनों अपनी तरह के भिन्न भजन हैं, वैसे ही 'राजलिया' और 'झालौ' अलग-अलग गीत हैं। उनके प्रिय गीतों में जो गीत शामिल हैं; उनमें से कुछ के चयनित लिरिक्स इस तरह हैं—'थोड़ा धीरे-धीरे हालौ', 'राहों में उनसे मुलाक़ात हो गई' (लोक वर्जन), ‘तूं पता बताती जइए’, ‘चेतक', ‘याद आवै थारी ओळूं आवै', 'राठौड़ी राजा मैफल में विराजे', ‘धंधो टेकूं दो नंबर को', 'बाळक बनड़ी'। 

ये मोटरसाइकिल मीमर साहित्यिक नहीं हैं, लेकिन इनका म्यूजिक-सेंस कई बार पोएटिक होता है। रील का एक दृश्य : 

एक युवा गाँव में पाणी की टंकी से दुकानों की तरफ़ बढ़ रहा है, शनै:-शनै:... अचानक उसे अपनी पूर्व-प्रेमिका की याद आती है। बहुत कलात्मक ग्राफ़िक्स विज्युलाइज होता है कि अचानक शाइर ख़ान डांगरी की पतली किंतु रील्सप्रिय आवाज़ में गीत बजता है—‘जिंदगी इक प्यास बनकर रह गई, प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए...’

जिस तरह हर धारा के स्कूल हैं, ठीक वैसे ही इनके भी भिन्न-भाँति के स्कूल्स हैं। वे रील्स जिनकी शुरुआत धमाके अर्थात् टणकीली आवाज से होती हैं, वे ‘पंजाबी-हरियाणवी स्कूल ऑफ़ रीलर’ से मुतासिर हैं। जिनकी रील बहुत मस्त-मंलग तरीक़े से शुरू होती है, जिनमें लोक का अध्यात्म होता है, हाथों की भिन्न मुद्राओं के साथ, वे 'स्कूल्स ऑफ़ गुजराती डायरा' या कि 'मारवाड़ स्कूल ऑफ़ मीमर' से एफ़िलिएटिड हैं। फिर आते हैं लीजेंड—लोकगीतों से प्रभावित। उन लोकगीतों के असल क्रियान्वयन अधिकारी। पुन: एक दृश्य— सीढ़ियों से एक जवान बाइक लेकर आ रहा है। उसकी प्रोडक्शन टीम उसे स्लोमोशन में आकार देती है। सीढ़ियों से बाइक को उतारना रोचक है। चित् में भय किंतु फ़ैंस से बढ़कर ईश्वर भी नहीं। अंतिम सीढ़ी उतरते ही गीत बजता है—‘बन्ना हीरा-पन्ना रौ रूंख अे, लगायौ पर धरती में...’

आप थोड़ा कंटेंट और रील्स के प्रति सजग होंगे तो सोचेंगे कि व्हाट इज रिलेशन बिटविन दिस? नहीं...! यह कुछ-कुछ लिमरिक है। चुनाँचे वे हर समय पोएटिक नहीं हैं। वे न क्रिमिनल हैं, न अधिक धार्मिक। अस्ल अर्थों में वे परस्पर सहयोगी हैं, रीलर टू रीलर। वे कहते हैं कि यह कोई बात नहीं हुई कि इस तरह के गीत सुनना अपराध है कि आपराधिक फ़िल्में देखने से टाबर बिगड़ता है।

ख़ैर! वे किसी टीले पर बैठकर तय करते हैं कि मैं तुम्हारे साथ कोलेब करूँगा। शोहरत में अधियार, पैसे में भी। वे आर. चेतनक्रांति की कविता ‘सीलमपुर के लड़के’ का ग्रामीण रूप हैं, कि आगे का मनोरंजन वे मोटरसाइकिल से करेंगे। वे इन सबसे इतना कमा लेते हैं कि उनसे वे स्पोर्ट्स शूज, गले में दुपट्टा और बाइक पर अपना पसंदीदा शब्द रेडियम करवा सकें। वे कहते हैं कि हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि देश में क्या हो रहा है? वे इन सबसे बेख़बर नित की क्रिया से निवृत्त होकर दुकानों की तरफ़ बढ़ते हैं; फिर अपनी टीम के साथ नमकीन, प्याज़, नींबू और किंगफिशर का अल्पाहार करते हैं। उन्हें आप कितना ही बुरा-भला कहें, वे आपके कहे की लगभग चिंता नहीं करते। उन्हीं के शब्दों में कहूँ तो वे अपने हर आलोचक का जवाब भूंगळी से देते हैं। वे निर्भीक हैं। अपने समकालीनों के प्रति बहुत उदार। लेकिन उनके नाम की रील के पैसे वे लेते हैं। फलत: वे वाणिज्यिक समझ के भी हैं।

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