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‘मालिक’ का मलबा

ख़ून कम कर अब कि कुश्तों के तो पुश्ते लग गए
क़त्ल  करते  करते   तेरे  तीं   जुनूँ   हो   जाएगा

[अब ख़ून करना रोक, लाशों की लकीरें लग चुकी है। (वरना) क़त्ल करते-करते तू पागल हो जाएगा।]

मीर

‘हर पीढ़ी के अपने मृतक होते हैं’—अमेरिकी उपन्यासकार जॉन नोल्स के उपन्यास ‘एक अलग-सी शांति’ (‘A separate peace’) से यह पंक्ति हमारे समय में मानवीय अनुभव की एक अनिवार्य और सार्वभौमिक सच्चाई को व्यक्त करती है। विज्ञान और तकनीक ने पिछली शताब्दियों की तुलना में मनुष्यों का औसत जीवन-काल बढ़ाया है, लेकिन उनकी बदौलत ही हमारे समय में मृत्यु को भी एक नया ‘जीवन’ मिला है। वह अब पिछले वक़्तों की तुलना में बेहद उन्नत, कुशल, तत्पर, फ़ुर्तीली, बेसब्र, बेक़ाबू है, और इनके साथ ‘स्वचालित’, ‘स्वनिर्भर’ भी। ऐसा लगता है कि अब उसकी रफ़्तार को थामना या मृतकों से मुँह फेरना या उन्हें चुनना या त्यागना—कुछ भी जीवित बचे लोगों के हाथों में नहीं। पुराने रक्त-धब्बे मिटते भी नहीं कि नए प्रकट हो जाते हैं। एक जगह पिछले शवों को अग्नि देने की तैयारी चल ही रही होती है कि दूसरी जगहों पर नए धमाकों या बमबारियों में विशाल आबादियाँ ढेर कर दी जाती हैं। पिछले दफ़नाए भी नहीं जा पाते कि नयों की एक लंबी क़तार आती दिखाई देती है। हम मीर के समय की क़त्ल-ओ-ग़ारत को छोड़कर सिर्फ़ अपने समय की बात करें तो हमारे देश में आज़ादी से पहले बंगाल-दुर्भिक्ष के कई लाख मृतकों को परे हटाकर कलकत्ता, नोआखाली, जम्मू-कश्मीर, बिहार और हैदराबाद के अनगिनत मृतक आए, फिर उन्हें भी पीछे धकेलकर देश-विभाजन के दौर के बेपनाह मृतक। वे इसके बाद भी छोटी-बड़ी तादाद में, नियमित अंतरालों में आते रहे, पंजाब, असम, त्रिपुरा, भागलपुर, लक्ष्मणपुर बाथे, मेरठ, मुज़फ़्फ़रपुर, 1984, 2002, मणिपुर... यह एक लंबी, असमाप्त सूची है। पिछली सदी में आर्मीनिया, दो विश्वयुद्धों, क्रांतियों, गृहयुद्धों, ‘रेप ऑफ़ नानकिंग’, पर्ल हार्बर, स्तालिनग्राद, हिरोशिमा, नागासाकी, बांग्लादेश, वियतनाम, कोरिया, कंपूचिया, इंडोनेशिया, सर्बिया, क्रोएशिया... कितनी-कितनी जगहों पर कितनी तादाद में ‘कुश्तों के पुश्ते’ लगाए गए। उनमें सैनिक तो थे ही, औरतें, बूढ़े, बच्चे और शिशु भी थे, सद्य:जात और अजन्मे। कुछ चुपचाप, ज़माने से छिपाकर लाए गए और कुछ फ़ौजी ताम-झाम, भोंपुओं और तोपों के साथ। इनमें स्पेनिश फ़्लू, कोविड-19, नाइन-एलेविन, मुंबई और हाल ही के ग़ज़ा और ईरान के मृतकों को भी जोड़ें... भाषा भयातुर होकर लड़खड़ाने लगती है। अभी उस भाषा का बनना शेष है जो इतने सारे मृतकों का बोझ सँभाल सके।

इसी से जुड़ा दूसरा तथ्य यह है कि हर पीढ़ी के अपने ‘मलबे’ होते हैं, मीलों-मील फैले हुए। हमारे हाल के इतिहास में मौतों की तरह ‘मलबों’ की भी एक अटूट शृंखला है। पिछले हटाए भी नहीं जा पाते कि वे लाखों की तादाद में फिर प्रकट हो जाते हैं। साम्राज्यवादी-राष्ट्रवादी अभियानों के तहत या राज्यों को एकजुट रखने या नए इलाक़े जीतने के लिए शहर, राजधानियाँ और देश मलबे में बदल दिए जाते हैं। पिघले हुए इस्पात और जले हुए कंक्रीट के हज़ारों टन ढेर के नीचे पुराने मालिक दब जाते हैं और उन्हीं के ऊपर नए मालिक जीत का जश्न मनाते हैं। कभी-कभी उनके तहख़ानों या कोठरियों या कहीं एक क़ब्र या ‘कबर्ड’ जितनी टेढ़ी, संकरी जगह में भूखे, थके और बीमार, पराजित या भगोड़े सैनिक पकड़े जाने से पहले थोड़ी देर की एक बेसुकून नींद चुराते हैं। कचरे और मलबे के बीच नई घासें उगने का सिलसिला जारी रहता है। बकरियाँ हमेशा चरती दिखती हैं। युद्धक्षेत्रों में लड़ाइयाँ थम जाएँ तो भी इन खंडहरों के बीच किसी न किसी शक्ल में जारी रहती हैं—ध्वंस, स्मृतियों और ‘स्वत्व’ की कहीं अधिक विनाशक लड़ाइयाँ। हर मलबा एक युद्धक्षेत्र होता है। इन मलबों की कोई अच्छाई है तो यह कि वहाँ ज़िंदगी भर के दोस्त बनते हैं। बच्चों के माँ-बाप खो जाएँ तो कोई न कोई स्नेहिल सौतेले माँ-बाप आगे आकर उन्हें गले लगा लेते हैं। वे मलबे के बीच किसी टूटी दीवार या गिरी हुई छत की आड़ में, टूटे-फूटे फ़र्श पर अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं। बच्चे नन्हे हाथों से मलबा हटाकर ध्वस्त मकानों की ईंटों से घरौंदे बनाते हैं। उनके नए या पुराने माँ-बाप उन्हें दिन के असांत्वनीय उजाले में वहीं लावारिस छोड़कर दूर-दराज़ के मलबों और खंड़हरों में खाना-पानी तलाश करने निकलते हैं और रात होते-होते ‘अपने-अपने मलबों’ में वापस लौट आते हैं।

मलबे... वे हमारे आगे-पीछे, हर तरफ़ हैं। ‘राइट इन फ़्रंट ऑफ़ अवर आइज़’। वे पुरानी तस्वीरों, ताज़ा अख़बारों, आते-जाते रास्तों, शहरों के सीमांतों और पास-पड़ोस, सभी जगह देखे जा सकते हैं। हमारे देश में एक पुरानी मस्जिद को मलबे में बदलने से एक नई राजनीति की शुरुआत हुई, जबकि एक पड़ोसी देश में राजनीति पहले बदली, शताब्दियों पुरानी, ‘विश्व-विरासत’, विशाल बुद्ध मूर्तियों का मलबा बाद में बना। कुछ ही समय के बाद एक दूरस्थ देश में सफ़ाई से विमान टकराकर दो विशाल टावर्स का मलबा बना दिया गया। यह सिलसिला इसके बाद भी रुका नहीं, जिसकी ताज़ातरीन कड़ी ग़ज़ा, यूक्रेन और ईरान के मलबे हैं। इन्हें देखकर यह सवाल बींधता है कि ये मानव-जीवन या अनुभवों के किन पहलुओं के प्रतीक हैं? ये इमारतों के मलबे हैं या हमारी सभ्यता के? अतीत की याद दिलाते हैं या भविष्य की एक डरावनी शक्ल दिखाते हैं? क्या हम सिर्फ़ दीवारों के मलबे देखते हैं या बेशुमार कहानियों, अधूरे सपनों और उन शब्दों के जो कभी कहे नहीं गए? क्या वे ज़िंदगी के अस्थायित्व या अनिश्चितता की ओर इशारा करते हैं या हमें याद दिलाते हैं कि तबाही और बरबादी के बीच भी जीवन जारी रहता है?

पिछली सदी के विश्व-साहित्य में ‘मलबे’ और ‘खंडहर’, विनाश, युद्धों, विघटन, स्मृतिलोप, पुनर्निर्माण और अस्तित्व के संघर्ष के शक्तिशाली प्रतीक रहे हैं। युद्धोत्तर जर्मनी में ‘मलबा साहित्य’ (‘Trümmerliteratur’ या ‘Rubble literature’) नाम से एक साहित्यिक आंदोलन चला जिसके एक प्रमुख लेखक हाइनरिख ब्योल थे। इससे जुड़े लेखकों की कृतियाँ युद्ध के अनुभवों के अलावा तबाह नगरों, टूटे-जले मकानों और व्यक्तियों और आबादियों के ‘आत्मिक मलबे’ और नैतिक दिग्भ्रम को अपना विषय बनाती थीं। वीरान, ऊबड़-खाबड़, खंडहरनुमा जगहों में घटित होती कहानियों में बचे-खुचे पराजित और ज़ख़्मी सैनिक गर्द-ग़ुबार के बीच घर लौटते हैं और पहली बार—शाब्दिक और रूपक दोनों रूपों में—मुल्क की छाती पर फैले, लाशों, ख़ून और ख़ामोशी से ढके मलबों से दो-चार होते हैं। एक प्रकार से ये कृतियाँ इतिहास और स्मृति के मलबे से अर्थ की इमारत खड़ी करने की कोशिश करती थीं। जर्मनी ही नहीं, दूसरे देशों के साहित्य में भी युद्धोत्तर यूरोप का आत्मिक, सांस्कृतिक (और नैतिक) मलबा एक प्रमुख विषय रहा है। सार्त्र की कहानी ‘दीवार’ में दीवार ‘अस्तित्व के मलबे’ का रूपक है, और टी.एस. इलियट की ‘वेस्टलैंड’ में उजाड़ ज़मीन ‘रूह की वीरानी’ का प्रतीक बनती है। दीवारें, वीरानियाँ और मलबे, ये सब मनुष्य की बेबसी और अर्थ-शून्यता को व्यंजित करते हैं। महमूद दरवेश की कविताओं में मलबा—मातृभूमि, स्मृति, और पहचान के रूप में आता है। ओरहान पामुक की ‘द म्यूज़ियम ऑफ़ इन्नोसेंस’ में इस्तांबुल के बदलते सामाजिक ढाँचे, पीछे छूटे अतीत और निजी स्मृतियों के मलबे से एक भावनात्मक संग्रहालय खड़ा होता है।

इन सूनी, ठंडी, मुर्दा इमारतों के सामने खड़ा होना एक हौलनाक अनुभव है। इन्हें देखकर हमारे भीतर भी कुछ ढह जाता है। टूटी दीवारों की चुप्पी में उनकी साँसें सुनी जा सकती हैं, जो इनमें रहते थे और अब इस दुनिया में नहीं। हर मलबे के नीचे कोई दर्दनाक कहानी दबी जान पड़ती है। पता नहीं, किसने यह कहा था कि मुल्कों और बस्तियों से भी पहले ‘दिमाग़ों का मलबा’ बनता है, और बाद में दिल चकनाचूर होते हैं। तारीख़ के मलबे पर नई इमारतों की तामीर होती हैं, लेकिन पुरानी दीवारों के अवशेष अपनी कहानियाँ कहते रहते हैं।

मलबे हमारे चारों तरफ़ हैं। हममें से भी तमाम, या अनेक, अपने भीतर ध्वंसावशेष लिए चलते हैं। उन्हें दूर से देखकर डरते रहो तो वे विशालतर होकर वजूद को कुचल डालते हैं। लेकिन उनके क़रीब जाकर शांत और धैर्यवान भाव से उन्हें ‘सुनने’ की कोशिश करें तो वे ही चीज़ों को सुगम और सामंजस्यपूर्ण बना सकते हैं। वे सिखा सकते हैं कि सब कुछ नष्ट होने के बाद फिर से कैसे उठ खड़े हुआ जाता है। शायद इसीलिए एक यूरोपीय लेखक ने कहा था कि मलबों से डरने के बजाय हमें उन्हें अपनी कहानी का हिस्सा बना लेना चाहिए।

हमारी भाषा में मलबों को हिस्सा बनाने वाली अनेक कहानियाँ हैं। ‘खंडहर’ और ‘भग्नावशेष’ टूटन और ध्वंस के रूपक के रूप में बार-बार सामने आते हैं। निर्मल वर्मा की एक शुरुआती कहानी ‘एक शुरुआत’ का एक पात्र नाज़ियों के द्वारा जला दिए गए एक सिनानोग, उसके सदियों पुराने पत्थरों में यूरोप की ‘डैथ’ देखता है। ‘मैला आँचल’ की शुरुआत में पूर्णिया जिले के वीरान जंगलों में निलहा साहबों की कोठियों के खँडहर राही-बटोहियों को नीलयुग की भूली हुई कहानियाँ याद दिलाते हैं। गौना करके नई दुलहिन के साथ घर लौटता हुआ नौजवान अपने गाड़ीवान से कहता है—‘ज़रा यहाँ गाड़ी धीरे-धीरे हांकना, कनिया साहेब की कोठी देखेगी’। नई दुलहिन ओहार के पर्दे को हटाकर, घूँघट को ज़रा पीछे खिसकाकर झाँकती है—झरबेर के घने जंगलों के बीच ईंट-पत्थरों का ढेर। उसी खंडहर में ‘मेरी’ की क़ब्र है, जिस पर गाँव में डिस्पेंसरी खुलवा पाने में नाकाम रहने के बाद डब्ल्यू. जी. मार्टिन लेटकर सारा दिन रोता रहा था—‘डार्लिंग! डॉक्टर नहीं आएगा।’ पूरन हार्डी की ‘बुड़ान’ और कैलास चंद्र की ‘डूब, स्याही के धब्बे और मनोहर मास्साब’ में बाँध-योजनाओं के तहत चहल-पहल से भरे ज़िंदा शहरों को ख़ामोश कर एक गीला-सीला मलबा बनाने के लिए पानी में गहरे दफ़्न कर दिया जाता है। इसी तरह नवीन कुमार नैथानी की मर्मस्पर्शी कहानी ‘लैंडस्लाइड’ पहाड़ की भौगोलिक त्रासदी को विकास, राज्य और मनुष्य के रिश्ते की गहरी आलोचना के रूप में प्रस्तुत करती है। धरती फट रही है, पर मुनाफ़ा निचोड़ने का सिलसिला नहीं रुकता। पहाड़ पत्थरों की भाषा में विरोध करता है, लेकिन कोई उसे सुनता नहीं। यह कहानी धरती और मनुष्य के बीच टूटे संवाद की कथा है। पहाड़ टूटने पर लोग, मकान, यादें, रवायतें, रिश्ते, पहचान और तारीख़ की कितनी ही तहें उसके मलबे तले दफ़्न हो जाती हैं। यह उन चुनिंदा रचनाओं में से है जो ‘मलबे’ को एक मानवीय और सभ्यतागत सवाल में बदल देती है।

लेकिन ‘मलबों’ के संदर्भ में जिस कहानी का उल्लेख सबसे पहले किया जाना चाहिए, वह बिना शक मोहन राकेश की अन्यतम कहानी ‘मलबे का मालिक’ है, जो देश-विभाजन के समय के विनाश, हिंसा और टूट-फूट (भौतिक और नैतिक दोनों ही) की गवाही देने के साथ ‘नागरिकता’, ‘विस्थापन’, ‘सत्ता’, ‘पहचान’ और ‘न्याय’ जैसे कितने ही सवालों से उलझती है।

कहानी विभाजन के साढ़े-सात सालों के बाद अमृतसर में घटित होती है। जब एक हॉकी-मैच के बहाने सरहद पार से अनेक लोग, वे घर और बाज़ार देखने आए हैं, जो अब उनके लिए पराये हो चुके हैं। एक पुराने खंडहरनुमा मकान का ‘मलबा’ कथ्य का केंद्रीय प्रतीक है, लेकिन कहानी में उसकी मौजूदगी ऐसी सजीव और गहरी है कि वह सिर्फ़ एक कथा-उपादान नहीं, अपने में एक ‘किरदार’ महसूस होता है। इस मलबे के इर्द-गिर्द रक्खे पहलवान और पाकिस्तान से आया बुज़ुर्ग अब्दुल ग़नी आमने-सामने हैं। अब्दुल ग़नी के लिए यह कल्पना और शंका से परे है, लेकिन गली के बाशिंदे बख़ूबी जानते हैं कि रक्खे ने ही विभाजन से पहले उसके बेटे चिराग़ और उसके परिवार की हत्या की थी। वे सभी हत्या के चश्मदीद थे, लेकिन उन्होंने दरवाज़े बंद कर और उनकी चीख़ों को अनसुना कर, अपने को ज़िम्मेदारी से बरी कर लिया था। अब्दुल ग़नी वहाँ संपत्ति के दावे के लिए नहीं, अपने अतीत, रिश्तों और यादों को खोजने के लिए आया है जो अब मलबे के नीचे दब चुके हैं। कहानी में ‘मलबा’ सिर्फ़ भौतिक नहीं, खोए हुए अतीत, वर्तमान की कठोर वास्तविकता, और भविष्य की अनिश्चितता का समेकित रूप है और उसका मालिकाना हक़ इस कहानी में सिर्फ़ क़ानूनी या दस्तावेज़ी नहीं, एक सांस्कृतिक और नैतिक सवाल भी बन जाता है।

‘मलबा’ सिर्फ़ जले हुए घर का बचा-खुचा अवशेष नहीं, विभाजन में जलकर ख़ाक हुई सामाजिकता का भी एक टूटा-फूटा आईना है। विभाजन में सिर्फ़ घर-बाज़ार नहीं, आपसी भरोसा, रिश्ते और ‘सह-अस्तित्व’ भी चूर हुए थे। ‘मलबा’ उस सब कुछ को व्यंजित करता है जो नष्ट हो चुका है—भौतिक भी और नैतिक भी। इसके बर-अक्स ‘मालिक’ के मायने हैं—सत्ता, वर्चस्व, क़ब्ज़ा और हिंसा, जिस पर ग़नी की अप्रत्याशित मौजूदगी सवालिया निशान लगाती है। उसे सामने पाकर पहलवान के भीतर हिंसा और (किंचित) अफ़सोस के बीच एक जंग छिड़ती है, जो उसकी बातों और बेचैन हाव-भाव में साफ़ दिखाई देती है। गली के लोगों के लिए ‘मलबा’ एक तमाशे से अधिक कुछ नहीं, जबकि ग़नी के लिए यह उसकी आत्मा का हिस्सा है। उसकी हर ईंट और चौखट उसके बीते दिनों की कहानियाँ कहती है। जब ग़नी रक्खे से कहता है, ‘जो होना था, हो गया’, तो रक्खे को राहत महसूस होती है, लेकिन क्या वह सचमुच कोई राहत है? विभाजन के दौर का लाशों और ख़ून से लथपथ सामाजिक और नैतिक मलबा पूरी कहानी में पसरा हुआ है।

लेकिन यह सब तो वह है जो यह कहानी कहती है, और जिसे पहले अनेक बार कहा जा चुका है। मैं कहानी से ध्यान हटाकर सिर्फ़ ‘मलबे’ पर केंद्रित करना चाहता हूँ। कहानी में आया, सालहा बेजान पड़ा रहा यह ‘मलबा’ शायद कुछ और चाहता है।

कहानी में सिर्फ़ यही एक मलबा नहीं है। शुरुआत में ‘बाज़ार बाँसाँ’ के अन्य मलबों का ज़िक्र है, जहाँ विभाजन से पहले निचले तबक़े के मुसलमान रहते थे। वह बाज़ार एक भीषण आग में जल चुका है। उस आग की चपेट में आस-पास के कई मुहल्ले भी आए थे। किसी तरह वह आग काबू में आई लेकिन उसमें ‘मुसलमानों के एक-एक घर के साथ हिंदुओं के भी चार-चार, छह-छह घर’ जलकर राख हो गए थे। जगह-जगह मलबे के ढेर अब भी मौजूद हैं, जो नई इमारतों के बीच एक अजीब वातावरण प्रस्तुत करते हैं, लेकिन अब्दुल ग़नी का मकान उस आग में तबाह न होकर किसी अज्ञात शख्स द्वारा आग के सुपुर्द किया गया था। इस ‘मलबे’ के ब्यौरे कहानी में इस तरह आए हैं, जैसे वह सिर्फ़ एक प्रतीक या संकेत नहीं, एक जीवित, बेचैन प्राणी है। उसकी मिट्‌टी से टूटी-जली ईंटें बाहर झाँकती हैं। एक जले दरवाज़े की चौखट और दो जली अलमारियों की कालिख पर सफ़ेदी की हल्की-हल्की तह उभर आई है। यह जला हुआ चौखट मलबे से सिर निकाले साढ़े-सात साल खड़ा रहा, पर अब उसकी लकड़ी बुरी तरह भुरभुरा गई है, जिसमें से लकड़ी के रेशे झड़ते हैं। हम कहानी के इन ब्यौरों पर ग़ौर करें :

ग़नी के सिर के छूने से उसके कई रेशे झडक़र आस-पास बिखर गए। कुछ रेशे ग़नी की टोपी और बालों पर आ रहे। उन रेशों के साथ एक केंचुआ भी नीचे गिरा जो ग़नी के पैर से छह-आठ इंच दूर नाली के साथ-साथ बनी ईंटों की पटरी पर इधर-उधर सरसराने लगा। वह छिपने के लिए सूराख़ ढूँढ़ता हुआ ज़रा-सा सिर उठाता, पर कोई जगह न पाकर दो-एक बार सिर पटकने के बाद दूसरी तरफ़ मुड़ जाता।

मलबे के नीचे नाली का पानी हल्की आवाज़ करता बह रहा था। रात की ख़ामोशी को काटती हुई, कई तरह की हल्की-हल्की आवाज़ें मलबे की मिट्‌टी में से सुनाई दे रही थीं... च्यु-च्यु-च्यु... चिक्‌-चिक्‌-चिक्‌... किर्‌र्‌र्‌र्‌-र्‌र्‌र्‌र्‌-रीरीरीरी-चिर्‌र्‌र्‌र्‌...। एक भटका हुआ कौआ न जाने कहाँ से उड़कर उस चौखट पर आ बैठा। इससे लकड़ी के कई रेशे इधर-उधर छितरा गए। कौए के वहाँ बैठते न बैठते मलबे के एक कोने में लेटा हुआ कुत्ता गुर्राकर उठा और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा—वऊ-अऊ-वउ! कौआ कुछ देर सहमा-सा चौखट पर बैठा रहा, फिर पंख फडफ़ड़ाता कुएँ के पीपल पर चला गया। कौए के उड़ जाने पर कुत्ता और नीचे उतर आया और पहलवान की तरफ़ मुँह करके भौंकने लगा। पहलवान उसे हटाने के लिए भारी आवाज़ में बोला, “दुर्‌ दुर्‌दुर्‌... दुरे!” मगर कुत्ता और पास आकर भौंकने लगा—वऊ-अउ-वउ-वउ-वउ-वउ...।

एक अनूठी और विलक्षण चित्रमयता लिए इन ब्यौरों में मलबा सिर्फ़ एक बेजान पृष्ठभूमि न होकर कथा का ‘पात्र’ महसूस होता है, स्मृति और भावना का संवाहक। ऐसा लगता है जैसे उसका अपना ही वजूद, अपनी ही आवाज़ है। वह एक जीवित पात्र की तरह सोचता, साँस लेता, याद रखता और देखता और दुखी होता है। अब्दुल ग़नी के अनायास आने, नाख़ूनों से मिट्‌टी खोदने और जली हुई चौख़ट को बाँह में भरकर रोने से आग में नष्ट होने के बरसों बाद यह धूल-मिट्टी में सना मटमैला, मूक मलबा भी यकबयक अपनी बरसों पुरानी नींद से जाग उठा है। शायद उसे पुराने दिन और वे सब याद आए हैं, जो ढहने से पहले उसकी दीवारों में रहा करते थे। कहानी के अंत में गली का एक आवारा कुत्ता जो इस मलबे का ‘नुमाइंदा’ और ‘एजेंट’ है, पहलवान को मलबे से खदेड़ना चाहता है और उसके ढेला फेंकने के बावजूद लगातार भौंकते हुए अंततः खदेड़ ही देता है। इसके बाद गली को निर्जन पाकर वह मलबे के एक कोने में गुर्राता रहता है।

यह ‘मलबा’ शायद अब्दुल ग़नी के वापस लौट जाने के बाद, दुबारा नींद में जाने से पहले, अपने एकांत में पुराना जीवन याद करना चाहता है, या ‘बाज़ार बाँसाँ’ और सारी दुनिया में फैले अपनी बिरादरी के दूसरे भाइयों के बारे में सोचना चाहता है। लेकिन अधिक मुमकिन यह है कि नाली के पानी, केंचुओं, कौवे और आवारा कुत्ते की मार्फ़त इस मूक ‘मलबे’ ने ‘मालिक’ रक्खे पहलवान से कहना चाहा हो—“मेरी छाती पर फैला जो यह ‘दूसरा मलबा’ है, ‘मनुष्यता का मलबा’, इसे उठाना या सहना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। इसके बोझ तले मेरी साँसें रुकती हैं। इस मलबे को मेरी छाती से जल्दी से हटा, कमबख़्त। अब मुझे नींद आती है।”

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‘कथादेश’ (दिसंबर-2025) से साभार।

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