क्या आप दिखा रहे हैं, भाषा का तमाशा
ज़ुबैर सैफ़ी
13 मई 2026
वाक्य किसी भी समाज के साहित्य का अभिन्न अंग रहे हैं। इन वाक्यों के बिना कोई हुकूमत नहीं चल सकती थी और आज भी इन वाक्यों के बिना सरकार नहीं चल सकती।
कैसे-कैसे कालजयी वाक्य इस देश में संभव हुए हैं : ऐ सफ़ेद कपड़ा; चला जा... के; अरे, भाई-भाई-भाई...
मुझे जीवन में कुछ वाक्यों की हमेशा आवश्यकता रही है। कुछ वाक्य ऐसे थे, जिन्हें मैं प्रयुक्त करना चाहता था और उनके सटीक अर्थ के माध्यम से अपनी बात कहना चाहता था। मैंने उन वाक्यों और उनके सटीक अर्थों की खोज में इतना लंबा जीवन जी लिया है। जब पैदा हुआ था, तो उसके कुछ समय बाद ही एक नई भाषा के स्वरों को अपनाया और उन्हें दूध की माँग में बदल दिया। ‘ऊआँ... ऊआँ...’ करता, तो दूध आ जाता। थोड़ा और बड़ा हुआ तो कहना सीख गया कि ‘अम् अम् अम्’, बच्चों की लोकभाषा में इसे पानी के लिए इस्तेमाल करते हैं। इन दोनों वाक्यों का सटीक अर्थ क्या होगा, आज तक नहीं जान पाया।
मुझे वाक्य प्रयुक्त करने के लिए उनके सटीक अर्थों की आवश्यकता पड़ती रही। जब-जब निराश हुआ, तो दुनिया के लिए एक घृणित वाक्य की आवश्यकता पड़ी, जो सटीक अर्थ दे और उस वाक्य में वही आए, जो मैं कहना चाहता हूँ। जब ख़ुद से निराश हुआ, तो एक वाक्य ऐसा तलाशा जिसमें मैं ख़ुद को सटीक अर्थ भरी ऐसी गाली दे सकूँ कि सीधे धक् से लगे। जब किसी कवि को गाली देनी हुई, तो मैं ऐसा अर्थपूर्ण वाक्य ढूँढ़ रहा था, जिसको कह या लिख भर देने से कवि थरथरा जाए, वह उफ़् तक न कर सके। जब रोने का दिल हुआ, तो किसी कविता में रोने के लिए ऐसा वाक्य बनाने की कोशिश हुई कि दिल की जगह काग़ज़ गीला हो जाए।
जब काम-कला से परिचित हुआ, तो ‘हू इज़ योर डैडी?’ सुना। मगर इस का अर्थ नहीं पता था तो इससे मिलता-जुलता वाक्य अपनी भाषा में ढूँढ़ा, ताकि संभोगोन्माद के साथ न्याय कर सकूँ और जब उसे उत्तर दूँ तो उसे उत्तेजना मुँह के रास्ते बाहर आ जाए। मगर निराश हुआ। मेरी उस निराशा को इस विवरण के साथ सोचते हुए समझने की कोशिश कीजिए कि काम-कला के दौरान अगर आपका संभोग-साथी उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए कहे : “नईमुद्दीन, कफ़ील अहमद...” तो सोचिए कि आपको कैसा लगेगा?
जो आपको लगा, उस भावना को आप किसी को समझा सकते हैं? मैं भी इसी तरह के बहुत से वाक्यों से उलझता रहा, जिन्हें किसी को नहीं समझा सकता था। इसी क्रम में कुछ वाक्य मुझे इसी जीवन में ऐसे मिले, जिन्हें मैं प्रयोग करते; प्रयोग होते देखता था, मगर उन का अर्थ किसी को नहीं समझा सकता था। हमारे बीच में हमेशा से कुछ वाक्य ऐसे रहे हैं, जिन्हें समझने से मिलने वाला आनंद तो हम जानते हैं, मगर नहीं जानते कि असल में उस वाक्य में आए शब्दों का अर्थ क्या है। लोक में, परलोक में, इहलोक में लाखों-करोड़ों, अनगिनत वाक्य ऐसे हैं; जिनका प्रयोग तो होता है और आप उसे समझ तो जाते हैं, मगर उसका सही अर्थ किसी को समझा नहीं सकते।
मैं वाक्यों के इस रहस्य को हमेशा से सुलझाना चाहता हूँ। जैसे किसी ने ग़ालिब के बारे में कहा कि उनके शे’र आप समझकर आनंद तो ले सकते हैं, मगर दूसरों को समझाकर उसे इस आनंद से परिचित नहीं करा सकते। मगर मेरी इच्छा है कि उस असली अर्थ के आनंद का परिचय मैं सबको करा सकूँ। इसलिए मैं आपकी मदद ले रहा हूँ और उन दो वाक्यों को लेकर आया हूँ, जिनका सटीक अर्थ मुझे नहीं मिल रहा।
इसको सोदाहरण समझाने के लिए, मुझे आपको दो घटनाओं से होकर लेते हुए गुज़रने की ज़रूरत पड़ेगी। इनमें एक घटना सत्य है और एक लोक-गल्प। तो घटना यूँ है :
एक दिन बड़े कमाल की बात हुई। चौक के बाज़ार से निकला, तो देखा कि एक अधेड़ उम्र का आदमी भीड़ में दो थैले लेकर बैठा है और होंठ के दाहिने किनारे पर बीड़ी जमाए लोगों को कुछ दिखा रहा है या दिखाने का प्रयत्न कर रहा है।
पास पहुँचा, तो जाना कि वह एक तमाशा दिखाने वाला है जिसे लोक की भाषा में मदारी, सपेरा, किमारबाज़, टोपीबाज़ या और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। मैंने देखा कि उसके हाथ में डेढ़-दो बिलांद लंबी एक टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ी थी। जिसे वह तमाशा दिखाते हुए कहता—
“बोल ग़ायब कर दूँ!”
“बोल, ग़ायब कर दो सरकार!”
“बोलो वापस ला दूँ”
और उस लकड़ी को किसी के सिर पर या अपनी कपड़ा ढकी पोटली पर घुमाता और कहता—ठुस लंडूरी!
मेरा दिमाग़ चकरा गया। मैं उस वाक्य का अर्थ खोजने लगा। किसी शब्दकोश में इस शब्द-समूह का अर्थ नहीं मिला। कोई साहित्यकार, भाषा-मर्मज्ञ नहीं बता पाया कि ठुस लंडूरी माने क्या!
चलिए, आप ही बताइए कि किस शब्दकोश में, किस भाषा विज्ञानी के पास इस शब्द का अर्थ मिलेगा?
इसी तरह चौपालियाँ बूढ़ों से सुनी एक कहानी बताता हूँ। ध्यान रहे कि यह लोक का गल्प है और इसके सच्चे या झूठे होने से मेरा कोई संबंध नहीं; मैं इसके माध्यम से आपको उस वाक्य तक पहुँचाना चाहता हूँ, जो मुझे आपसे समझना है :
किसी ज़माने में एक किसी शहर में एक बड़े सूफ़ी हुए, जिनके हज़ारों मुरीद थे। उनके यहाँ हज़ारों लोग उपदेश सुनने आते और उनसे प्रभावित होकर उनकी मुरीदी में दाख़िल हो जाते।
उनका लोगों को मुरीद कराने का एक ख़ास तरीक़ा था। वह दो ज़ानू होकर बैठ जाते और सामने बैठे शख़्स से बड़ी नर्मी से कहते—“बोलो पों!”
उसके बाद वह शख़्स पों बोलता और फिर पीर साहब एक बार ख़ुद पों बोलते और मुरीद करने की प्रक्रिया पूरी हो जाती। लोग इस प्रक्रिया को बड़ी हैरत से देखते थे। इस सारे मामले के चलते ही उन का नाम—पीर पों-पों, पड़ गया था।
हुआ यूँ कि पीर पों-पों, एक दिन अपनी ख़ानक़ाह में बैठे उपदेश दे रहे थे। एक शख़्स जिसने ख़ानक़ाह आने से पहले उड़द की दाल खाई थी, अचानक से पों बोल गया। अब यह पों की आवाज़, उस शख़्स के मुँह से निकली या कहीं और से, इसे क़रामाती पीर साहब जानें या फिर ख़ुदा। बहरहाल, जैसे ही यह आवाज़ उनके कान में पड़ी, तो वह चुप हो गए और आँखें बंद कर लीं। लोगों ने सोचा कि पीर साहब ध्यान की अवस्था में चले गए हैं और बड़े शांत होकर उनका चेहरा देखने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने आँख खोली और पों बोले; फिर उस शख़्स से बोले, “क्या तुम्हें नहीं पता कि हमें सब इल्म है, हमने मुरीद होने की तुम्हारी ख़्वाहिश सुन ली और तुम्हें मुरीद किया।” इसके बाद पीर साहब ने पों कहा...
यह सुनकर उस शख़्स के बराबर में बैठा एक शख़्स अपनी जगह से खड़ा हुआ और बोला, “हज़रत-ए-वाला, वल्लाह आप कमाल हैं, आप पर उस पाक परवरदिगार की ख़ास तवज्जोह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि सच्चा सूफ़ी दिलों का हाल जानता है। आप तो बहुत ही सच्चे हैं, आप तो पेट का हाल भी जानते हैं।”
अब आप मुझे बताइए कि यहाँ पों-पों का क्या अर्थ है?
जैसा कि मैंने शुरू में भी कहा कि मैं कुछ वाक्यों के सटीक अर्थ जानना चाहता हूँ, ताकि किसी को समझा सकूँ। अब आप ही समझाइए, सब आप पर है। या आप भी बस किताबें पढ़ते-पढ़ाते, लिखते हुए बस वही कर रहे हैं, जो तमाशे वाला कपड़े के नीचे कर रहा था और पीर साहब आँखें बंद करके।
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