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किसी देश के प्रधान नेता के सपनों का मनोविश्लेषण

किसी देश के प्रधान नेता के सपनों का अध्ययन कर रहे एक मनोविश्लेषक चार्ल चुंग चैप्लिन के गोपनीय नोट्स :

यह एक ऐसे राजा का चेतन मन है जो भूल गया है कि वह स्वयं एक देश का साधारण नागरिक है। यहाँ एक विराट मंच है लगातार फैलता हुआ और जनता सिकुड़ती हुई। चारों तरफ़ फ़ीते ही फ़ीते हैं। कुछ कट चुके हैं, कुछ कटने वाले हैं। देश को एक सूत्र में बाँधने का काम संविधान नहीं, उद्घाटन के फ़ीते कर रहे हैं। अंधी तालियों की गर्जन, नारों की प्रतिध्वनि है और कैमरों की खीचिक-खीचिक। टेलीप्रॉम्टर के सामने महामहिम रोबोट की तरह बड़बड़ा रहे हैं।

देश और विश्व की जनता और जनता की समस्याओं के चेहरे—सब कुछ फ़ोटो फ़्रेम के बाहर हैं। वैसे भी किसी की समस्याओं की फ़ोटो लेना क्या शिष्टाचार के विरुद्ध नहीं? इसलिए फ़ोकस में प्रधान नेता कभी भेल-भुजा, कभी टॉफ़ी के साथ हैं। [ख़ुश रंग चेहरों के साथ ही दिखते हैं।] 

समस्याएँ कैमरे के सामने आते ही, पता नहीं क्यों विपक्ष जैसी दिखने लगती हैं। हालाँकि समस्याओं का बहुत मन है प्रधान नेता के साथ सेल्फ़ी लेने का। बेरोज़गारी तो कई बार अपने बिखरे बाल सँवार के भी आई। स्कूलों और अस्पतालों ने भी घंटों लाइन में प्रतीक्षा की मगर महामहिम समस्या को देखते ही वहाँ से भाग जाते हैं। जाँच हो रही है और सारी समस्याओं की जड़ में शत्रु देश निकल रहा है।

महामहिम के मन में कुछ दूसरे प्रधान नेताओं के स्वप्न घूम रहे हैं—एक नेता ने अभी-अभी सैकड़ों बच्चों की लाशों से ज़मीन पर ‘राइट टू सेल्फ़ डिफ़ेंस’ लिखा है। एक नेता चुपचाप शिक्षा के संस्थान बनाकर चला गया है। एक बूढ़ा नेता डॉलर उड़ाते हुए बचकाने डांस में अपने दोनों हाथों से हवा में हारमोनियम बजा रहा है। दीवार पर टँगे महामहिम के कुर्ते की आस्तीन से साँप की जगह कुछ बूढ़े व्यापारी अपनी जीभ लपलपाते हुए निकल रहे हैं।

देश के प्रधान नेता के सपनों में कसीनोनुमा एक विशाल परीक्षा-भवन भी दिखाई दिया। एक सपने में किसी सरकारी भवन की बंद खिड़कियाँ अचानक खुलीं और परीक्षाओं के प्रश्नपत्र—जो ताश के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे थे—खिड़कियों से सफ़ेद कबूतरों की तरह उड़ गए। उनके उड़ने पर सब हैरान हैं। यह दृश्य वैसा ही है, जैसे स्वतंत्रता दिवस पर कोई तानाशाह मंच से कबूतर उड़ाकर मुर्दा शांति का संदेश देता है। यह सत्ता का जादुई यथार्थवाद है—कबूतर उड़ रहे हैं, प्रश्नपत्र उड़ रहे हैं, युवाओं के भविष्य उड़ रहे हैं, वोट उड़ रहे हैं, नागरिक-अधिकार उड़ रहे हैं, रीढ़विहीन शिक्षा उड़ रही है, झूठे वादे उड़ रहे हैं, आसमान छूती महँगाई उड़ रही है, हिंसा उड़ रही है, सहनशीलता उड़ रही है, संशोधित (परकटा) इतिहास उड़ रहा है, आपसी विश्वास उड़ रहा है, अफ़वाहें उड़ रही हैं, धुआँ-आग-राख-बारूद उड़ रहा है। सब कुछ हवा में विलीन हो रहा है, उड़ रहा है...

नीचे ज़मीन पर कुछ भी शेष नहीं है। जैसे ज़मीन का गुरुत्व बल क्षीण हो गया है। पृथ्वी जैसे चाँद-सी हो गई है। 

प्रधान नेता के मन की यह परत एक दलदल जैसी है। सामंती भय के कीचड़ में कीचड़ वाला पुष्प खिला हुआ है, जिसकी जड़ें पाताल तक जा रही हैं। महामहिम के सपने में एक ग़ुब्बारा लगातार फूल रहा है। वह इतना बड़ा हो चुका है कि दुनिया को ढक लेना चाहता है। तभी कुछ बच्चे अपनी एक मामूली पेन की नोक विश्व के उस गुरु-ग़ुब्बारे की छाती में चुभोकर भाग जाते हैं। ग़ुब्बारा फुस हो रहा है और सपने का दृश्य बदल रहा  है—प्रधान नेता ग़ुस्से में एक टूटे हुए खिलौने के भीतर से निकल रहे हैं। वह इतने हिंसक हो उठे हैं कि पूरे घर को फूँक देना चाहते हैं।

सपने का रंग अचानक लाल हो गया है। शिक्षा मंत्रालय की इमारत जल उठी है। भीतर से बच्चों के रोने-बिलखने की आवाज़ें आ रही हैं। तापमान नाक़ाबिले-ए-बर्दाश्त हो चुका है। पूरा देश इस आग में झुलस रहा है, मगर ठीक इसी समय आम पन्ना के ठेले की घंटी राष्ट्र को संबोधित करने लगती है। बढ़ती गर्मी और कमर तोड़ महँगाई के इस दौर में, सत्तू घोलने की यह शाही रेसिपी का प्रसारण दरअस्ल अर्थशास्त्र (Economics) का पाक-कला (Gastronomy) से एक प्राचीन संबंध स्थापित करना है। कुछ आकृतियाँ अपनी भूख और लाचारी का स्वाद लेते हुए और प्रधान-नेता की प्रशंसा करते हुए कैमरों का पीछा कर रही हैं। प्रशंसा के इस अंधकार से एक आदमक़द रबर प्रकट होती है, जिस पर लिखा है—शिक्षामंत्री। रबर बच्चों के चेहरों पर रेंग रही है। वह आँख, कान और होठों को हमेशा के लिए मिटा देना चाहती है।

सपने ने एक छोटे से कमरे का रूप ले लिया है, जहाँ कुछ बच्चे अपना भविष्य और अपने परिवार की पूरी बचत को दाँव पर लगाकर ईमानदारी से पढ़ते हुए नज़र आ रहे हैं। काफ़ी अँधेरा है यहाँ, मगर संविधान के सारे अनुच्छेद बच्चों के भीतर जुगनुओं की तरह तैर रहे हैं। परीक्षा भवन के बाहर तलाशी लेते हुए, किसी ने बच्चों का चीरहरण जैसा कर डाला है। मानसिक तनाव से भरी रेलगाड़ियाँ परीक्षार्थियों को दूर ले जा रही हैं। हेल्पलाइन नंबर के व्यस्त रहने की गूँज ब्रह्मांड में फैल रही है। मगर इतनी मेहनत के बाद भी बच्चे एक अभिनेत्री की लंबाई नहीं बता पा रहे, जिस कारण वे असफल हो रहे हैं। काफ़्का का दुःस्वप्न यहाँ सच हो रहा है। एक अधिकारी की नज़र में युवा कॉकरोच में बदल गए हैं। चारों तरफ़ से कॉकरोच सपने में आ गए हैं।

महामहिम के मन में बहुत कुछ सड़ा हुआ है, जिसे कॉकरोचों ने सूँघ लिया है। बहुत सारी विफलताएँ लाश की तरह तैर रही हैं और उनका मन इन विफलताओं को छिपाने के लिए कभी किसी देश पर मिसाइल गिरा रहा है। पूरा राष्ट्र ऑपरेशन फ़ितूर देख नाच रहा है और महामहिम अपने अंतिम मानसिक आश्रय में खिसक आए हैं—उन्होंने ईश्वर का मुखौटा पहन लिया है।

प्रधान नेता के चेतन और अचेतन के मुहाने पर एक डरावना द्वारपाल खड़ा है। यह कोई मनुष्य नहीं, बल्कि बचपन में देखे गए किसी दमित दुःस्वप्न का आर्किटाइप है, जो बरसों से द्वार की रक्षा कर रहा है।

महामहिम की चेतना एक झटके में रूप बदलती है—देश की उन्नति के बड़े-बड़े विचार घूमते-घूमते अप्सराओं  के सपनों के समुद्री टापुओं की ओर बह गए हैं और आदिम उल्लास और अंगूर की शराब का उन्मादी देवता—डायोनिसस—स्वर्ग से उतर आया है और देखते ही देखते किसी सरकारी फ़ाइल में बंद हो गया है। विश्व की त्रस्त जनता युद्ध के ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं कर रही। वह उस भले दिनों वाली फ़ाइल के खुलने की प्रतीक्षा कर रही है। बच्चों के शव यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े हैं, नदियाँ सूख चुकी हैं, शहरों में धुआँ भर गया है। झीलें डामर से भर चुकी हैं। आपातकालीन इस स्थिति में लोग विश्व के प्रधान-नेताओं का डायोनिसस-रूप देखना चाह रहे हैं।

इसी बीच अचेतन में एक अर्ध-जाग्रत दिवास्वप्न चमक उठा है। इस धुँधलके में एक वीभत्स आकृति उभरती है—जिसका सिर दशानन का है और धड़ राम का। आकृति के दोनों तरफ़ जय-जयकार है। यह विचित्र आकृति नहीं जानती कि वह ‘जय’ है या ‘पराजय’।

शायद प्रधान नेता के अचेतन ने अपनी वासनाओं को संतुष्ट करने के लिए देव और दानव के बीच कोई गुप्त समझौता करा लिया हो। इस तमाशे को उनका अपना ‘विवेक’ चुपचाप खड़ा देख रहा है। महामहिम अपने ही विवेक को प्रतिपक्ष मानकर बरसों से कुचलते आए हैं, वे उसे बहुत पहले ही राष्ट्रविरोधी-तत्त्व घोषित कर चुके हैं।

चेतन मन के पर्दे पर दृश्य फिर बदलता है—कैमरों के चक्रव्यूह में घिरा एक राष्ट्रीय मोर है, जिसके कंठ से एक पत्रकार की चीख़ें निकल रही हैं। कुछ विदेशी जानवर पराई भूमि में असहाय भटक रहे हैं, जिनके पैरों में भी उद्घाटन का रेशमी रिबन बँधा हुआ है।

सपनों के इस कोलाज में दृश्य पागलपन की गति से घूम रहे हैं। एक कोने में किसान फंदे से लटक रहा है, दूसरी ओर कोई छात्र अवसाद के शून्य में छलाँग मार रहा है। वनवासियों की ज्ञाननेंद्रियों और स्मृतियों में सीमेंट भरा जा रहा है। मीनारों और पुलों तले मज़दूर दफ़्न हैं। उधर बाज़ार की दीवारों पर लीक हुए परीक्षा-प्रश्नपत्र किसी कमर्शियल विज्ञापन की तरह चिपके हुए हैं।

महामहिम के अचेतन की एक और भयावह परत खुलती है। सपने में वह स्वयं को किसी अंतहीन रास्ते पर बिल्कुल अकेला चलते हुए देख रहे हैं। यह अकेलेपन की यात्रा मनुष्यों के बीच नहीं, बल्कि एक कैमरे से दूसरे कैमरे के बीच की है। कैमरों के विकास-क्रम को देखते हुए प्रधान नेता ‘बायोलॉजिकल’ जीव नहीं लग रहे—वे कैमरे से ही निकले हुए लग रहे हैं। पैंसठ इंच की चौड़ी छाती वाली यह ब्रह्मांडीय घटना लाखों कैमरों से निकलने वाली ध्वनियों, फ़्लैशलाइट और प्रोपेगैंडा की प्रकाश-किरणों के एक महा-विस्फोट (Big Bang) से निर्मित हुई है। यह छवि केवल स्क्रीन और होर्डिंग पर जीवित रह सकती है। कैमरा और तालियाँ बंद होते ही इसका विराट अस्तित्व अँधेरे में विलीन हो जाएगा। 

आँकड़ों की एक लहर आकर बहुत दूर चली गई है। अभी आवाज़ से बना एक स्वप्न उभरा है। प्रधान नेता को एक आवाज़ डाँट रही है। यह न तो भूखी जनता की चीख़ है, न ही प्रतिपक्ष की आवाज़। यह एक स्त्री की आदिम आवाज़ है—जो कभी कठोर हो जाती है, कभी धीमी। यही वह आवाज़ है जो इस शक्तिशाली नेता को भीतर से बेहद डरा हुआ, असुरक्षित और चिड़चिड़ा बनाती है; क्योंकि अपने पूरे जीवन में उन्होंने इस आवाज़ को कभी सुना या समझा नहीं, इसे केवल दबाया है। मैं इसे ‘एनिमा’ कहता हूँ। महामहिम के मन की इस अंधी परत में पुरुष का अहंकार और स्त्री की दमित पुकार आपस में बुरी तरह उलझे हुए हैं। यहाँ सम्मान और नियंत्रण का द्वंद्व है। गहरी असुरक्षा और हिंसक क्रोध का एक वीभत्स रस फैला है। सत्य की इस स्त्री-ध्वनि के सामने आते ही महामहिम का यह सपना ‘दुर्योधन’ का रूप लेकर पूरे विश्वक्षेत्र को श्मशान बना देता है।

एक मनोविश्लेषक के रूप में मैं चाहता हूँ कि कम से कम चार घंटों के लिए महामहिम को एक गहरी, आदिम नींद आ जाए। इतनी गहरी कि उनके सारे कैमरे, कुर्सियाँ, तालियाँ और टॉफ़ियाँ—सब कुछ चेतना की ऊपरी सतह पर ही छूट जाएँ। मैं एक बार उनके अचेतन के गर्भगृह में प्रवेश करना चाहता हूँ। देखना चाहता हूँ कि वहाँ वास्तव में कौन रहता है।

क्या वहाँ अब भी कोई बच्चा रेत का घर बना रहा है? या कोई डरा हुआ, दुत्कारा हुआ एक कुंठित युवक बैठा है? या वहाँ कोई रोता हुआ अनाथ बच्चा है जिसे सदियों से कोई चुप कराने नहीं आया? शायद वहाँ कोई ऐसी पराजय हो जिसे कभी स्वीकार नहीं किया गया।

हालाँकि, प्रधान नेता के मन को देखते हुए मुझे पूरा संदेह है कि प्रधान नेता अनिद्रा के पुराने रोगी हैं। कोई योगी नहीं, क्योंकि सत्ता स्वयं में एक लाइलाज अनिद्रा ही है। ऊपर की सतह से शोर और प्रोपेगैंडा की रोशनी की एक शहतीर उतर आई है। महामहिम का ‘बाल-रूप’ बुलडोजर चला रहा है। तभी एक वेटर आता है और वह मेज़ पर मेन्यू-कार्ड की जगह ‘वोटर-लिस्ट’ रख जाता है। ‘सत्यमेव जयते’ बदल गया है ‘भयमेव जयते’ में। भीषण बाढ़ आ गई है। आपदा प्रबंधन विभाग सिनेमा की बारीक़ियाँ पढ़ा रहा है। आपदा के बीच एक कैमरा भावुक कर देने वाले सिनेमाई कोण ढूँढ़ रहा है।

चेतना की चौखट पर अचानक नींद का एक झोंका-सा आया है। चाटुकारों की जय-जयकार बहुत दूर चली गई है। आह! बिना जय-जयकार का यह क्षणिक मौन! इस मौन में एक विश्वविद्यालय प्रकट हुआ है जो ‘चुप्पियों का संग्रहालय’ बन चुका है। तभी अँधेरे से एक मामूली चूहा निकलता है। प्रधान नेता के सपनों में यह चूहा बार-बार लौट आता है और देखते ही देखते एक विशाल, हिंसक हाथी में बदल जाता है।

पता नहीं यह ‘सामूहिक स्मृति’ का कोई भारी पत्थर है, कोई अभेद्य दीवार है या फिर इक झीना शाही पर्दा... जिसकी आड़ में छिपा कोई इतिहास और भूगोल की किताब का संपादन कर रहा है। तुलसीदास मुग़लों का इतिहास लिख रहे हैं और हनुमान अंतरिक्ष यात्री के रूप में आकाशगंगाओं के पार जीवन की खोज कर रहे हैं।

दृश्य पन्ने की तरह पलटता है और बजते-बजते एक ढोल सरकारी अस्पताल और स्कूल को निगलकर महामहिम की कुर्सी बनकर बैठ जाता है। कुर्सी के नीचे, काल कोठरी के अँधेरे में, लगातार बदलते हुए नियमों, अध्यादेशों और धाराओं के भँवर चकरा रहे हैं। भँवर की आँख हर उस आँख को खींच लेती है जो कुर्सी की तरफ़ उठती है।

यह अचेतन मन का एक अंधकारमय अनजान प्रदेश है। यहाँ सदियों पुराने मिथकीय प्रतीक (Symbols) ख़ूँख़ार जानवरों की तरह झाड़ियों में छिपे बैठे हैं। यहाँ कोई बिम्ब अचानक चमकता है, ग़ायब हो जाता है और फिर किसी नए मुखौटे के साथ लौट आता है। यहाँ कुछ भी कभी नष्ट नहीं होता; जो दमित है, वह केवल अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है।

यह आदिम संकेतों की एक अंतहीन, भूलभुलैया है। यहाँ वह सब कुछ सड़ रहा है जिसे तथाकथित सभ्य समाज सदियों से अस्वीकार कर रहा है।

मन के इस अँधेरे गर्भगृह में आकर सत्ता के सब मुकुट, सब हथियार और पैंसठ इंच की सारी छातियाँ पिघल जाती हैं। यहाँ हर राजा—यानी हर मनुष्य—अपनी आदिम लाचारी में पूरी तरह नंगा है। यह नग्नता एक आदिम अस्तित्वगत लाचारी भी है और दैवीय अबोधता भी। चूँकि यहाँ कोई आवरण नहीं है, कोई पर्दा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ सत्य का सन्नाटा है। न्यूज़ चैनलों की सनसनी नहीं। मैं समझ सकता हूँ कि पृथ्वी के सारे प्राणियों में प्रधान नेता का यानी हर इंसान सबसे कमज़ोर और नंगा होना ही हमें मजबूर कर रहा है, किसी न किसी ‘वाद’ के पात लपेट लेने के लिए।

अचेतन के इस पाताल-कुएँ में रस्सी की गाँठ जैसा कुछ तैर रहा है। ये सदियों से कुचली-दबी और हज़ारों आदिम इच्छाएँ और भावनाएँ हैं। ऊपर चेतन मंच पर जो भव्य तमाशा हो रहा है, उसे ख़बर नहीं है कि उसके राजाओं और प्रजाओं की डोर ऊपरवाले के हाथ में नहीं, बल्कि यहाँ इस अचेतन के हाथ में है। यहाँ जो सबसे अधिक कुचला गया है, वही सबसे अधिक शक्तिशाली है।

मन का यह तल बड़ा जादुई और ख़तरनाक है। यहाँ बचपन का एक छोटा-सा अपमान, आगे चलकर पूरी पृथ्वी को रौंदने की हिंसक आकांक्षा बन जाता है। एक व्यक्तिगत भय, पूरे राष्ट्र की सामूहिक नियति बन सकता है। कोई पुराना निजी घाव, भीड़ की ज़हरीली भाषा बोलने लगता है। कुचले जाने के कारण ये भावनाएँ इतनी सूक्ष्म और इतनी मारक हो चुकी हैं कि किसी भी क्षण एक क्रूर तानाशाह का रूप ले सकती हैं।

अब मैं जैसे गहरे पानी में हूँ। यहाँ अनगिनत घिसे-पिटे, सड़े और बार-बार रंगे हुए मुखौटों का एक वर्तुलाकार प्रवाह है। ये मुखौटे एक युग से दूसरे युग तक निर्बाध बह रहे हैं—कभी राजा का मुखौटा, कभी सेवक का, कभी साधु का, तो कभी किसी मसीहा का।

मुखौटों की इस निर्बाध धारा के ठीक नीचे सामूहिक परत की रेत-सी चमक रही है। जहाँ परियों, देवताओं, राक्षसों और नायकों की अनगिनत कहानियाँ सितारों की तरह, ज़र्रों की तरह अदृश्य धुरियों पर अनंत काल से चक्कर काट रही हैं।

प्रधान नेता की यह गहरी नींद अब मुझे मनुष्य के ‘होने’ की गहराइयों में ले जा रही है। यहाँ नींद का एक अनंत, जीवंत सागर है—जिसकी लहरों पर सूरज और चाँद की ब्रह्मांडीय गतियों का सीधा प्रभाव है। यह एक ऐसी प्रतीक्षाहीन प्रतीक्षा का प्रदेश है, जहाँ समय ठहर गया है।

ऊपर जाग्रत सतह पर यह दुनिया जिसे बड़े गर्व से ‘इतिहास’ कह रही है, वह वास्तव में गहराई में पुरातन मिथकों का एक प्रवास है। यही मिथकीय कथाएँ युगों से इंसानों को मुखौटों की तरह बदलती आ रही हैं।

इसी महा-अंधकार के भीतर एक दैवीय ‘मंडला’ उभर आया है। इतिहास की किताबें इसे छू नहीं सकती। कोई संपादक इसे बदल नहीं सकता। इसलिए इस मंडला के भीतर, प्रधान नेता तानाशाही के ताम-झाम छोड़कर, जानवरों की खाल पहने एक विशाल आग के गिर्द उन्माद में नाच रहे हैं। वह अभी-अभी एक सफल शिकार करके लौटे हैं। इस आदिम उत्सव में वह न तो जानवरों से अलग हैं, और न ही अपने क़बीले के बाक़ी मनुष्यों से। क़बीले के लोग आदिम उल्लास से भरे हैं कि उनके पास एक कुशल शिकारी है।

यहाँ प्रकृति और चेतना एकाकार हैं—पेड़ आपस में फुसफुसा रहे हैं। यहाँ मछली भी है, सूअर भी, साँप और मेमना भी; यहाँ शिकार और शिकारी दोनों एक ही लय में साँस ले रहे हैं—यहाँ कोई किसी के विरोध में नहीं है। मन के इस गर्भगृह में पूरा वनस्पति और जीव जगत एक शाश्वत लय में सोया हुआ है। यहाँ कुछ चौकोर, गोलाकार और त्रिभुजाकार ज्यामितीय आकृतियाँ और रहस्यमय निशान उत्कीर्ण हैं जो न ही मनुष्यों की कोई ज्ञात भाषा है, न ही भित्ति चित्र। शायद ये मनुष्य की आत्मा की आदिम लिपियाँ हैं, जिन्हें समझना अभी बाक़ी है।

मगर जैसे ही मैं इस विराट मंडला के केंद्र में देखता हूँ, मुझे वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता। वहाँ न तो प्रधान नेता हैं, न उनका बनाया हुआ कोई क्रूर देश है, न ईरान न ग़ज़ा, न धर्म, न देवता। यहाँ केवल एक असीम, अनंत रिक्तता (Void) है—एक परम शून्य!

इसी रिक्तता से बचने के लिए, महामहिम का भयभीत मन जीवन भर इसे नए-नए तमाशों, युद्धों, नारों, आत्मप्रशंसा और राष्टवाद के प्रसारणों के मलबे से भरता चला आ रहा है... महामहिम पूरे राष्ट्र के मन के मलबे का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह और करें भी क्या जब जीवन-सत्ता का पूरा खेल ही इस शून्य को भरने की एक असफल, हताश छटपटाहट भर हो । कुछ भी उठा के चल देने से भी यह नहीं भरेगा।

दूर से प्रोपेगैंडा का शोर फिर क़रीब आ रहा है। महामहिम की नींद अब उथली हो रही है। मंडला बुझने लगा है और अचेतन का वह आदिम द्वारपाल कहीं पीछे छूट रहा है। सारे जानवर वापस अपनी अँधेरी गुफ़ाओं और झाड़ियों की तरफ़ भाग रहे हैं। ओह! अचानक आम का मौसम आ गया है। नींद ने एकाएक अपनी बची-खुची गहराई खो दी है।

प्रधान नेता के मन की सतह पर कुछ रंग चिपके हुए हैं—नारंगी, नीला, लाल, सफेद और हरा। ये रंग ही मनुष्यों के विचार बन चुके हैं। महामहिम का मन अभी आधा देश में है, आधा विदेश में।

प्रधान-नेता कुछ बड़बड़ा रहे हैं। यह भाषा की उत्पत्ति से ठीक पहले की कोई अवस्था है। ऐसा लगता है जैसे भाषा अपनी पूरी विकास-यात्रा समाप्त करके वापस अपने आरंभ-बिंदु पर लौट आई है। प्रधान नेता किसी वानर भाषा में कुछ बुदबुदा रहे हैं।

बहुत सावधानी से महामहिम के सपनों का अवलोकन करते हुए अब मुझे यह बोध हो रहा है कि यह किसी एक प्रधान नेता का मन नहीं है। यह सत्ता का सामूहिक स्वप्न (The Collective Myth of Power) है, जहाँ हिंसक जानवर इंसानी प्रवृत्तियों के रूप में ज़िंदा रहते हैं।

अचेतन की लचीली मजबूत शाखाओं पर मुझे झुंडों में झूलती हुई कुछ आदिम आकृतियाँ दिखाई दे रही हैं। सभ्यता ने जिन्हें कपड़े पहनाए और बरसों तक गर्तों में पड़े रहने के बाद संविधान दिया और कंठ में राष्ट्रवाद के भाषण। मगर त्रासदी यही है कि आज भी मौक़ा मिलते ही उसके भीतर से वही बर्बर आदतें बाहर आ जाती हैं।

ज्यों ही सत्ता को इस अचेतन की डालियों पर वापस झूलने का मौका मिलता है, वह अपने सभ्य भाषणों, क़ानूनों और अध्यादेशों के सारे वस्त्र उतार फेंकती है और अपने नग्न रूप में किसी पर भी ग़ुर्राने लगती है।

प्रधान नेता के सपनों का अध्ययन करने के बाद मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा हूँ। जैसे यह ब्रह्मांड पूरी तरह अंधी और रैंडम घटनाओं से जन्मा है। उसी तरह प्रधान नेता की सत्ता भी एक सामूहिक अज्ञानता और अंध-भक्ति के मिलन से जन्मा एक चांस है, एक्सीडेंट है। हमारे महामहिम वास्तव में वक़्त के जुए में अनजाने में मज़े-मज़े में फेंका गया एक ग़लत पत्ता ही हैं। एक ऐसा मनहूस पत्ता जिसके गिरते ही इस पूरे देश की आत्मा, उसकी ज़मीन, उसकी नदियाँ और उसके पर्वत और जंगल... सब कुछ कौड़ियों के दाम बाज़ार में बिक गया। इसके पीछे कोई एक कारण नहीं असंख्य कारणों की शृंखला है। देश के हर हिस्से को देखकर वह कहते भी हैं कि इस दुर्गति का मेरे पूर्व जन्मों का कोई नाता है।

बहरहाल, अब अपने इन बेकार के शब्दों को विराम देने का समय आ चुका है। महामहिम को अपनी अगली भव्य विदेश यात्रा के लिए तुरत निकलना है, बाहर द्वार पर उनकी बुलेटप्रूफ़ गाड़ियों का दस्ता आ चुका है। मैं उनका आभारी हूँ कि उन्होंने ‘आम’ के इस रसीले मौसम में मेरे जैसे एक मामूली मनोविश्लेषक को समय दिया। यह सब देखते-लिखते अब मैं भीतर से बहुत थका हुआ और उदास महसूस कर रहा हूँ। देश में तेल बहुत महँगा हो चुका है... इसलिए मैं पैदल ही चुपचाप अपने घर की तरफ़ लौट जाऊँगा।

— चार्ल चुंग चैप्लिन

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