कठपुतली : डोरियों में बसी सदियों पुरानी लोक-स्मृति
अखिलेश कुमार मौर्य
05 अक्तूबर 2026
कठपुतली कला मानव सभ्यता की उन प्राचीन लोक-अभिव्यक्तियों में से एक है, जिनमें मनोरंजन, शिक्षा, धार्मिकता और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘कठपुतली’ शब्द ‘कठ’ (लकड़ी) और ‘पुतली’ (गुड़िया) से मिलकर बना है, जो इसके प्रारंभिक निर्माण-सामग्री की ओर संकेत करता है। किंतु समय के साथ कठपुतलियों का निर्माण लकड़ी के अतिरिक्त कपड़े, काग़ज़, चमड़े, मिट्टी तथा आधुनिक कृत्रिम पदार्थों से भी होने लगा। कठपुतली केवल एक निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि कलाकार के कौशल, आवाज़, संगीत और कथा-विन्यास के माध्यम से सजीव प्रतीक में रूपांतरित हो जाती है। इस कला में दृश्य और श्रव्य, दोनों तत्वों का ऐसा समन्वय होता है कि दर्शक स्वयं को कथा के भीतर अनुभव करने लगता है। इस दृष्टि से कठपुतली कला लोकनाट्य की एक सशक्त और बहुआयामी विधा है।
भारतीय संदर्भ में कठपुतली कला की जड़ें अत्यंत प्राचीन मानी जाती हैं। एक मान्यता यह भी है कि एक बार पार्वती के आग्रह पर शिव ने लकड़ी की पुतली में प्राण फूँक दिए, जिससे वह नृत्य करने लगी। नाट्यशास्त्र में ‘सूत्रधार’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जो डोर से संचालित पात्रों और नाट्य-प्रस्तुति की ओर संकेत करता है। कुछ विद्वानों का मत है कि मौर्य और गुप्त काल में भी मनोरंजन तथा धार्मिक अनुष्ठानों में कठपुतलियों का प्रयोग होता था। लोककथाओं और पुराणों के प्रसार में यह कला अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। मध्यकाल में जब भक्ति आंदोलन का प्रसार हुआ, तब धार्मिक कथाओं को जनसाधारण तक पहुँचाने में कठपुतली नाटकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीण समाज में, जहाँ साक्षरता सीमित थी, वहाँ दृश्य-नाट्य का यह माध्यम अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कठपुतली कला ने स्थानीय सांस्कृतिक विशेषताओं के अनुरूप विविध रूप धारण किए। राजस्थान की ‘कठपुतली नाच’ परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहाँ के भाट समुदाय ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला को संरक्षित रखा। राजस्थान की कठपुतलियाँ प्रायः लकड़ी की होती हैं, जिनके अंगों को डोरियों से नियंत्रित किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में पाबूजी और अमरसिंह राठौड़ जैसी स्थानीय वीरगाथाओं को संगीत और संवाद के साथ प्रस्तुत किया जाता है। रंगीन वेशभूषा, ऊँची पगड़ियाँ और विशिष्ट लोकसंगीत इस शैली की पहचान हैं। यह परंपरा आज भी मेलों, उत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जीवंत रूप में देखी जा सकती है।
दक्षिण भारत में भी कठपुतली की समृद्ध परंपरा मिलती है। आंध्र प्रदेश में ‘तोलु बोम्मलाटा’ नामक छाया-कठपुतली शैली प्रचलित है, जिसमें चमड़े से बनी रंगीन आकृतियों को प्रकाश के माध्यम से परदे पर प्रदर्शित किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में प्रायः रामायण और महाभारत की कथाएँ मंचित होती हैं। इसी प्रकार कर्नाटक में यक्षगान से प्रभावित कठपुतली शैली विकसित हुई, जिसमें लोकनाट्य, संगीत और नृत्य का समन्वय देखने को मिलता है। ओडिशा की ‘काठी कंधेई’ तथा पश्चिम बंगाल की ‘पुतुल नाच’ भी क्षेत्रीय विविधता के सशक्त उदाहरण हैं। इन सभी रूपों में स्थानीय भाषा, लोकसंगीत और वेशभूषा की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
पूर्वोत्तर और मध्य भारत में भी कठपुतली की परंपराएँ स्थानीय अनुष्ठानों और जनजातीय आस्थाओं से गहराई से जुड़ी रही हैं। असम में वैष्णव परंपरा से संबंधित ‘अंकिया नाट’ और ‘भाओना’ जैसे रूपों के साथ चलायमान पुतलों का सीमित प्रयोग मिलता है, जबकि मणिपुर में अनुष्ठानिक नृत्य-नाट्यों में प्रतीकात्मक आकृतियों का उपयोग सामुदायिक संदर्भ में किया जाता रहा है। त्रिपुरा और नागालैंड के कुछ जनजातीय समुदाय कृषि-पर्वों पर पुतलों का निर्माण कर सामूहिक प्रदर्शन करते हैं।
मध्य भारत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के गोंड, बैगा और संथाल समुदायों में भी अनुष्ठानिक अवसरों पर लकड़ी या घास-फूस की आकृतियों के माध्यम से मिथकीय कथाओं और पूर्वजों की स्मृतियों को व्यक्त किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में केवल कथा-वाचन ही नहीं, बल्कि गीत, नृत्य और सामूहिक सहभागिता का भी समावेश होता है।
विश्व स्तर पर भी कठपुतली कला ने विशिष्ट स्थान बनाया है। जापान की ‘बुनराकु’ शैली में तीन कलाकार मिलकर एक कठपुतली का संचालन करते हैं, जिससे अत्यंत सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति संभव होती है। इंडोनेशिया की प्रसिद्ध छाया-कठपुतली शैली ‘वायंग कुलित’ को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है। यूरोप में मध्यकाल के दौरान नगर-चौकों और चर्चों के आस-पास कठपुतली नाटक सामाजिक और धार्मिक शिक्षा का माध्यम बने। इस प्रकार कठपुतली कला वैश्विक सांस्कृतिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अंग रही है।
कठपुतली कला का सामाजिक महत्त्व अत्यंत व्यापक है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जनसंचार का प्रभावी माध्यम भी रही है। औपनिवेशिक काल में सामाजिक कुरीतियों और प्रशासनिक विसंगतियों पर व्यंग्य करने के लिए कठपुतली नाटकों का उपयोग किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी लोककलाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जागृत की गई। स्वतंत्र भारत में परिवार नियोजन, साक्षरता अभियान, स्वच्छता और महिला सशक्तीकरण जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाने के लिए कठपुतली नाटकों का प्रयोग हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ आधुनिक संचार माध्यम सीमित थे, वहाँ यह कला अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई।
शैक्षिक दृष्टि से भी कठपुतली कला अत्यंत उपयोगी है। बाल शिक्षा में इसका प्रयोग रचनात्मकता, संवाद-कौशल और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए किया जाता है। विद्यालयों में बच्चों द्वारा स्वयं कठपुतली निर्माण और प्रस्तुति करने से आत्मविश्वास तथा सहयोगात्मक प्रवृत्ति का विकास होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी कठपुतली के माध्यम से बालकों को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है। विशेष शिक्षा में भी इसे संप्रेषण के सहायक उपकरण के रूप में अपनाया गया है।
तकनीकी और सौंदर्यात्मक दृष्टि से कठपुतली कला बहुआयामी है। कठपुतली निर्माण में शिल्पकला, रंग-रचना, परिधान-निर्माण और मंच-सज्जा का विशेष महत्त्व होता है। एक प्रस्तुति में कथावाचक (सूत्रधार), संगीतकार, संवाद-लेखक और संचालक—सभी की समन्वित भूमिका होती है। छाया-कठपुतली में प्रकाश और परदे का विशेष महत्त्व है, जबकि डोरी-कठपुतली में संतुलन और गति की सटीकता आवश्यक होती है। आधुनिक समय में प्रकाश-व्यवस्था, ध्वनि-प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्रभावों ने भी इस कला के लिए नई संभावनाएँ पैदा की हैं।
समकालीन समय में कठपुतली कला अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। टेलीविजन, सिनेमा और डिजिटल मीडिया के विस्तार ने पारंपरिक लोककलाओं के दर्शक-वर्ग को सीमित कर दिया है। आर्थिक अस्थिरता के कारण नई पीढ़ी इस पेशे को अपनाने में संकोच करती है। शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने लोककलाओं के लिए उपलब्ध मंचों को भी कम कर दिया है। यद्यपि विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाएँ, सरकारी अकादमियाँ और गैर-सरकारी संगठन इस कला के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए प्रयासरत हैं, फिर भी व्यापक स्तर पर संरचनात्मक सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कठपुतली कला को नवाचार के साथ जोड़ना आवश्यक है। डिजिटल मंचों, ऑनलाइन प्रस्तुतियों और अंतरराष्ट्रीय कला-महोत्सवों के माध्यम से इसे वैश्विक दर्शक-वर्ग तक पहुँचाया जा सकता है। विद्यालयी और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में लोककलाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही, कलाकारों को आर्थिक सहयोग, प्रशिक्षण और विपणन-सुविधाएँ प्रदान करना भी आवश्यक है। यदि परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय किया जाए, तो कठपुतली कला फिर अपनी सजीवता और लोकप्रियता प्राप्त कर सकती है।
अंततः कहा जा सकता है कि कठपुतली कला भारतीय और वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य अंग है। यह लोकजीवन की सृजनात्मकता, सामूहिक स्मृति और सामाजिक संवाद का प्रतीक है। अतीत में इसने धर्म, शिक्षा और मनोरंजन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और वर्तमान में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इसे संरक्षण, संवर्धन और नवाचार के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए, ताकि यह प्राचीन कला निरंतर जीवित रह सके।
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