कमल-क्रंदन : एक प्रतीक से पुष्प की ओर…
संदीप रावत
15 अक्तूबर 2026
एक समय था जब मैं केवल एक फूल था किसी सरोवर का। मैं उस दिन सबसे अधिक प्रसन्न था, जिस दिन मेरा कोई नाम नहीं था। सूरज का प्रकाश मेरे ऊपर उतरता था, जल मुझे अपनी गोद में थामे रहता था और ओस की बूँदें आसमान को समेटे हुए मेरी पंखुड़ियों पर काँपती रहती थीं। मेरा होना ही मेरा अर्थ था।
वह अवश्य कोई कवि या प्रेमी रहा होगा जिसने मुझे देखा और देखते ही उसे अपने प्रिय का मुखड़ा याद आ गया। मुझे अपनी भाषा में लाकर उसने अपनी भाषा का ही अलंकार कर दिया। एक कवि की कविता में पहली बार मैंने जाना कि मेरा ‘होना’ एक शब्द भी बन सकता है। कवि ने मेरा उपयोग नहीं किया; उसने मेरे उस मौन को सुना, जिसमें मैं जन्म से रहता आया था।
बहुत समय तक मैं कवि के भीतर काव्य-सरोवर में खिलता रहा। फिर समय बीता। कवि कम होते गए, व्याख्याकार और नैतिक शिक्षक बढ़ते गए। कविता की जगह विचारों ने ले ली और मैंने देखा है कि गहरे से गहरा विचार भी काव्य नहीं हो पाए।
जब काव्य-सरोवर सूखने लगे, तब मनुष्य मुझे अपने समाज के नए कीचड़ में ले आया। उसने मुझे मंदिरों, राजसिंहासनों, शयनकक्षों, पताकाओं और ग्रंथों में रखना शुरू कर दिया। देखते ही देखते मेरे चारों ओर, मेरी पंखुड़ियों पर भारी-भरकम अर्थ जमा हो गए। किसी ने मुझे सृष्टि का प्रतीक कहा, किसी ने वैराग्य का, किसी ने सौंदर्य का, किसी ने आत्मा का, तो किसी ने विलासिता और सद्गुणों का।
योगियों से लेकर भोगियों तक, सभी ने अपने अनुभव-संसार को अभिव्यक्त करने के लिए मेरा उपयोग किया। भाषा में प्रवेश करते ही मैं संज्ञा बना, क्रिया बना, विशेषण बना, समास बना, शब्द बना, उपमा बना, प्रतीक बना, ब्रह्मा का आसन बना, आध्यात्मिक बना, विलासी बना और अंततः राष्ट्रीय पुष्प भी बना! पहले मैं बिना किसी नाम के कितना ख़ुश था, पर अब मुझमें एक हाथी जैसा भारीपन रहता है।
पहले मैं केवल हृदय को स्पर्श करता था, अब मैं विचार हूँ—आध्यात्मिक और राजनीतिक विचार, कट्टर विचार! योगी मुझे ध्यान की चरम अवस्था में पाना चाहते हैं; साधु हज़ार पंखुड़ियों वाले कमल को प्राप्त करना चाहते हैं; और राजनीतिक दल मुझे अपने झंडों, कपड़ों और पदकों में चिपका कर पूरे विश्व में देखना चाहते हैं।
इंसान ने मुझे अपनी प्रेयसी के केशों में सजाया, मुझे बुद्ध के चरणों में चढ़ाया, योगियों ने मेरी तरह पद्मासन लगाया और मुझे अपने खुले हृदय जैसा बताया। पर क्या मैं इंसान के खुले हृदय जैसा हूँ?
इतने वर्ष इंसान के मन, हृदय और दिमाग़ में रहते हुए मैंने यह देखा है कि इंसान इस संसार में नहीं रहता; वह तो प्रतीकों और शब्दों की दुनिया का वासी है। वह प्रतीकों के हाथों की कठपुतली है। इंसान अपने ही बनाए प्रतीकों के जाल में मकड़ी की तरह उलझा रहता है। मैं आँखों देखी बात कह रहा हूँ कि पूरा मनुष्यलोक अत्यधिक प्रतीकों से ग्रसित है। वह शब्दों और प्रतीकों के अलावा अब कुछ नहीं देख पाता। उसका सारा भौतिक और आध्यात्मिक संसार उसके ही मन के भीतर है। मन के बाहर न कोई बुद्ध है, न कोई ईश्वर, न कोई राष्ट्र। इंसान का मन फूल नहीं देखता, फूल का अर्थ देखता है—इसलिए तो इंसान का कुछ ‘देखना’ भी ‘स्वप्न देखना’ माना गया।
देखो! आज मुझे देखते ही लोगों को ग़ुस्सा आने लगता है। आज यदि मैं किसी झंडे पर दिखाई देता हूँ, तो झंडे के साथ-साथ झंडे वाले की भी धुलाई हो जाती है। वर्तमान में मैं ज्ञान, ध्यान, अनासक्ति, सौंदर्य या सत्य की तरफ कम; सत्ता और भ्रष्टाचार की तरफ अधिक स्पष्ट संकेत प्रसारित करता हूँ। आज मैं सबसे भ्रष्ट मनुष्यों के दल की तरफ संकेत कर रहा हूँ। कैसा समय है यह? बिल्कुल दुःस्वप्न जैसा!
हालाँकि, मैं तो वैसा का वैसा ही हूँ, मगर इंसान की चेतना सदा एक-सी नहीं रहती। इतने साल इंसानों की सामूहिक चेतना में रहने के बाद मैं यह कह सकता हूँ कि जब चेतना बदलती है, केवल तभी प्रतीक का अर्थ बदलता है।
आह! मैं मनुष्य की ऊँचाइयों और नीचाइयों का साक्षी हूँ। बुद्ध मुझे देख रहे हैं, बुद्ध होने की आकांक्षा मेरा स्वप्न देख रही है, योगी मुझे साध रहे हैं, चित्रकार मुझे छाप रहे हैं, और राजनीतिज्ञ मुझे पढ़ रहे हैं…
देखो मुझे! मैं कमल हूँ। मनुष्य की स्व (स्वयं) से दूरी, मनुष्य की मनुष्य से दूरी और बुद्ध की बुद्ध से दूरी—केवल एक कमल के बराबर होती है। मैं एक कमलाकार वियोग हूँ, एक कमलाकार मिलन।
अंत में, मैं राजनीतिज्ञों, सौंदर्यशास्त्रियों, आध्यात्मिक गुरुओं और योगियों से यही कहना चाहता हूँ कि मुझे अब और मत साधो! मुझे पूजने और मेरी रक्षा करने के बजाय उस ‘दृष्टि’ की रक्षा करो जो फूल को केवल एक फूल की तरह देखती है। मैं यह सब भार ढो-ढोकर थक गया हूँ।
याद करो मेरी यात्रा का आरंभ—उपमा में मैं केवल एक फूल था और प्रतीक बनकर इंसान का मन बन गया हूँ, मन की कीचड़ भरी परत बन गया हूँ। बस, अब बहुत हुआ! मुझे अब किसी धर्म, किसी दर्शन या किसी राजनीति से मत जोड़ो। मैं किसी का प्रतीक नहीं होना चाहता। मैंने कभी कुछ होना ही नहीं चाहा।
हे मानव! हे महामानव! तुम भूल गए हो कि एक फूल होना, प्रतीक होने से कहीं बड़ा होता है। फूल चाहे कोई भी हो, वह प्रकाश की तरफ़ झुकता है; जबकि प्रतीकों से प्रेम अंधकार की तरफ़ ले जाता है। फूल खिलता चला जाता है और प्रतीक बंद होता चला जाता है। एक फूल का सबसे बड़ा सौभाग्य यही होता है कि कोई उसे बिना किसी प्रयोजन, बिना किसी अर्थ के बस देख ले।
मैं वापस उसी सुबह में लौट जाना चाहता हूँ जब मेरा कोई नाम नहीं था। यदि तुम मुझे सचमुच देखना चाहते हो, तो मेरे सारे नाम भूल जाना।
इहि पस्सिको!
— किसी अज्ञात सरोवर का पुष्प
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