कहानी : बेबल की लाइब्रेरी
होर्खे लुइस बोर्खेस
14 जून 2026
पिछली सदी के अर्जेंटीना के सुविख्यात लेखक-कवि बोर्खेस हिंदी पाठकों के लिए अनजान नहीं हैं। उनकी कहानियों में ‘कल्पना’, ‘अनंत’, समय, स्मृति, भूलभुलैया और ‘किताबों की दुनिया’ जैसी अवधारणाएँ मिलती हैं। वह जादुई यथार्थवाद और ‘मेटा-फ़िक्शन’ (एक कहानी के भीतर अनेक कहानियाँ) के उस्ताद माने जाते हैं। तर्क, ज्ञान, दर्शन, सपनों और कल्पना की एक अलग दुनिया रचती उनकी कहानियाँ अक्सर वास्तविक तथ्यों अथवा रिपोर्ट की तरह लिखी जाती हैं; गोया कोई पुराना, गुप्त दस्तावेज़ बरामद हुआ हो। उनका कहना था : “मैंने कल्पना और असलियत की सीमा पर लिखा है, जहाँ दोनों एक-दूसरे में घुल जाते हैं।”
उनके पिता भी लेखक थे और घर में अँग्रेज़ी साहित्य की बेशुमार किताबें थीं, इसलिए वह स्पैनिश और अँग्रेज़ी दोनों में समान सहजता से लिखते-पढ़ते थे। उम्र के साथ उनकी दृष्टि लगभग पूरी तरह जाती रही। बाद में उन्हें अर्जेंटीना की नेशनल लाइब्रेरी का निदेशक बनाया गया। उन्होंने एक बार कहा था, “मेरे पास बेहिसाब किताबें हैं और मैं उन्हें पढ़ नहीं सकता।”
‘लाइब्रेरी ऑफ़ बेबल’ उनकी प्रसिद्ध कहानी है। यह एक ऐसी लाइब्रेरी है जो एक ‘कायनात’ है। इस अनंत लाइब्रेरी में ‘हर मुमकिन किताब’ मौजूद है—यानी हर किताब जो कभी लिखी गई या लिखी जाएगी या लिखी जा सकती थी मगर नहीं लिखी गई, भविष्य और इतिहास की किताबें, हर इंसान की पूरी जीवन कथा, वही कथा ग़लत रूप में और हज़ारों-लाखों ऐसी भी किताबें जिनका कोई मतलब नहीं। बोर्खेस यह विचार रखते हैं कि अनंत ज्ञान निरर्थक हो सकता है, अगर उसे समझने की कुंजी हमारे पास न हो।
लाइब्रेरियंस इस लाइब्रेरी के बेशुमार हेक्सागोनल्स और गलियारों में भटकते हुए किताबों के मायने तलाश करते हैं, मगर मायूस होते हैं। कुछ का यक़ीन है कि कहीं न कहीं कोई ‘किताबों की किताब’ या ‘सूचीपत्रों का सूचीपत्र’ है, और कोई ऐसा लाइब्रेरियन भी जो हर किताब का हर राज़, हर मायना खोल सके और इस बेतरतीबी को एक ‘व्यवस्था’, एक तरतीब या ‘ऑर्डर’ में ढाल सके। इस खोज में इंसान ज्ञान के प्रति हैरत, डर और उलझन से गुज़रता है। यहाँ ज्ञान की अधिकता भी उतनी ही भयावह प्रतीत होती है, जितनी उसकी कमी।
कहानी अंत में संकेत देती है कि ‘सच’ शायद बहुत क़रीब ही मौजूद है, लेकिन उसे पाने के लिए व्यवस्था, धीरज और यक़ीन ज़रूरी हैं। संभव है कि हम उस तक कभी पूरी तरह न पहुँच सकें; फिर भी यह तलाश कहीं रुकती नहीं, क्योंकि इसी तलाश का नाम जीवन है और इसमें ही इंसान होने का कोई अर्थ है।
— योगेंद्र आहूजा
“इस कला से आप 23 अक्षरों की विविधता पर ग़ौर कर सकते हैं...”
— The Anatomy of Melancholy, भाग 2, खंड II, उप-खंड IV
कायनात (जिसे लोग ‘लाइब्रेरी’ भी कहते हैं) असंख्य, शायद अनंत, षट्कोणीय दीर्घाओं से निर्मित है। हर दीर्घा के बीच विशाल हवादार खोखल हैं, जिनके चारों ओर बहुत नीची रेलिंगें लगी हुई हैं। हर षट्कोण से ऊपर और नीचे की मंज़िलें नज़र आती हैं, अनंत तक जाती हुई। यही सिलसिला आगे और पीछे, दाएँ, बाएँ हर तरफ़ फैला हुआ है। इन दीर्घाओं की तरतीब कभी नहीं बदलती। हर दीर्घा में दो तरफ़ छोड़कर शेष में बीस लंबी अलमारियाँ—हर तरफ़ पाँच—सभी दिशाओं को ढके रहती हैं, इनकी ऊँचाई मंज़िल की ऊँचाई के बराबर है, बस इतनी ही कि एक औसत क़द का लाइब्रेरियन आसानी से पहुँच सके। षट्कोण की दो ख़ाली भुजाओं में से एक तंग से प्रवेश-द्वार की तरफ़ खुलती है। वह रास्ता एक और दीर्घा में ले जाता है जो पहली और बाक़ी सब दीर्घाओं जैसी ही है, वही शक्ल, वही नक़्शा और वही ख़ामोश तिलिस्म। इस दरवाजे के दाएँ-बाएँ दो छोटे कमरे हैं; एक में बस खड़े-खड़े सो लेने भर की जगह, दूसरी इंसानी ज़रूरतें पूरी करने के लिए। यहीं से एक घूमती हुई सर्पिल सीढ़ी गुज़रती है, नीचे रसातल तक उतरती और ऊपर आसमान जितनी ऊँचाइयों में खिंचती हुई। प्रवेश-द्वार में एक आईना टँगा है, जो सामने की हर शक्ल-सूरत को वफ़ादारी से दुगुना करता है। लोग इस आईने को देखकर अक्सर यह फ़ैसला कर लेते हैं कि यह लाइब्रेरी अनंत नहीं है (अगर यह सचमुच अनंत होती, तो इस फ़रेबी दोहराव का क्या मतलब?)। लेकिन मुझे तो ये चमकते आईने पसंद हैं, जो ‘अनंतता’ का भ्रम भी देते हैं और उसका वादा भी करते मालूम होते हैं…
रोशनी कुछ गोल, फलनुमा गोलों से आती है; जिन्हें लोग ‘लैम्प’ कहते हैं। हर षट्कोण में ऐसे दो लैम्प तिरछी दिशा में लगे होते हैं। उनकी फैलाई हुई रोशनी न तो काफ़ी होती है, न कभी रुकती है—बस एक धीमी टिमटिमाहट जैसी लगातार बनी रहती है।
लाइब्रेरी के हर रहवासी की तरह, मैं भी अपनी जवानी में यात्राएँ करता रहा हूँ। मैं एक ऐसी किताब की तलाश में भटकता रहा, शायद ‘सूचीपत्रों का सूचीपत्र’—और अब जब मेरी आँखें मुश्किल से अपना ही लिखा पहचान पाती हैं, मैं अपनी मौत की तैयारी कर रहा हूँ, उस षट्कोण से कुछ ही फ़ासले पर, जहाँ मेरा जन्म हुआ था। मर जाने के बाद, मुझे कोई न कोई रहमदिल हाथ रेलिंग के उस पार फेंक देगा; मेरी क़ब्र वही बेपनाह हवा होगी, जिसमें मेरा जिस्म लंबे समय तक डूबता रहेगा और उस अंतहीन गिरने से पैदा हुई हवा में बिखरता और घुलता चला जाएगा। मैं फिर दोहराता हूँ कि यह लाइब्रेरी ‘अनंत’ है, बेछोर। आदर्शवादी (Idealists) कहते हैं कि ये षट्कोण जैसे कक्ष असल में ‘परम स्पेस’ की लाज़िमी शक्ल हैं, या कम से कम हमारी स्पेस की धारणा की। उनका कहना है कि तीन या पाँच कोनों वाले कक्षों की कल्पना नहीं की जा सकती। (रहस्यवादियों का दावा है कि बेख़ुदी की हालत में उन्हें एक गोल कक्ष दिखता है, जिसमें एक बहुत बड़ी किताब रखी होती है, जिसकी पिछली जिल्द कमरे की दीवारों को घेरे रहती है—लेकिन उनका यह दावा शुबहे से ख़ाली नहीं और उनके शब्द धुँधले और उलझे हुए होते हैं। उस घूमती हुई किताब को वे ‘ईश्वर’ कहते हैं।) फ़िलहाल मेरे लिए यह पुरानी उक्ति दोहराना काफ़ी है कि लाइब्रेरी एक ऐसा गोला है जिसका केंद्र कोई भी षट्कोण हो सकता है और जिसकी परिधि तक पहुँचना नामुमकिन है।
हर षट्कोण की हर दीवार पर (दो तरफ़ छोड़कर) पाँच-पाँच अलमारियाँ हैं; हर अलमारी में एक जैसे आकार-प्रकार की बत्तीस किताबें, हर किताब में चार सौ दस पन्ने, हर पन्ने पर चालीस पंक्तियाँ; और हर पंक्ति में तक़रीबन अस्सी काले अक्षर। हर किताब की पुश्त पर भी कुछ हर्फ़ होते हैं, मगर ये हर्फ़ इस बात का कोई इशारा नहीं देते कि अंदर के पन्नों में क्या लिखा होगा। मुझे मालूम है कि एक ज़माने में यह निरर्थक-सा इंतज़ाम लोगों को बेहद रहस्यमय लगता था। अब, संक्षेप में इस रहस्य का हल बताने से पहले (जिसका खुलासा, अपनी सारी दुखद परिणतियों के बावजूद, शायद इस इतिहास का सबसे अहम वाकया है) मैं कुछ मूल नियमों की याद दिलाना चाहता हूँ।
पहला सिद्धांत यह है कि लाइब्रेरी हमेशा से मौजूद है—‘ab aeterno’ यानी अनादि। कोई भी समझदार ज़ेहन इस हक़ीक़त पर शक़ नहीं कर सकता। इसका सीधा निष्कर्ष यह है कि दुनिया भविष्य में भी अनंत समय तक बनी रहेगी। इंसान—जो एक आधा-अधूरा लाइब्रेरियन है—शायद संयोग का नतीजा है या किन्हीं बदनीयत देवताओं का कारनामा, लेकिन यह पूरा ब्रह्मांड, जिसमें इतनी ख़ूबसूरत सलीक़े से रखी हुई आलमारियाँ हैं, हैरतअंगेज़ रहस्यों को सँजोए ग्रंथ हैं, मुसाफ़िर के लिए कभी न थकने वाली सीढ़ियाँ हैं, और एक जगह टिक कर काम करने वाले पुस्तकालयाध्यक्षों के लिए ऐसे सुंदर प्रसाधन-कक्ष हैं—यह सब तो केवल ‘ईश्वर’ की ही रचना हो सकती है। दिव्यता और इंसानियत के बीच की दूरी समझने के लिए बस इतना काफ़ी है कि मैं अपने ग़लती करने वाले हाथ से किसी किताब के आख़िरी पन्नों पर जो काँपते हुए, भद्दे से निशान बनाता हूँ, उनकी तुलना किताब के अंदर छपे हुए जीवित मालूम होने वाले अक्षरों से कर लें—इतने सही, इतने महीन, गहरे काले और ऐसी बेमिसाल समरूपता लिए जो किसी इंसान के बस की बात नहीं।
दूसरा सिद्धांत यह है कि लिपि के निशानों (orthographic symbols) की तादाद पच्चीस है।* [मूल पांडुलिपि में न तो अंक हैं और न ही बड़े (कैपिटल) अक्षर। विराम चिह्न केवल दो हैं—अल्पविराम और पूर्णविराम। ये दोनों चिह्न, रिक्त स्थान और वर्णमाला के बाइस अक्षर मिलकर वे पच्चीस प्रतीक बनते हैं, जिनका उल्लेख अज्ञात लेखक ने किया है।] इस छोटे से सबूत ने, लगभग तीन सौ साल पहले, लाइब्रेरी के बारे में एक आम सिद्धांत गढ़ने का रास्ता खोला और उस उलझन का हल भी दिया जिसे कोई अंदाज़ा, कोई क़यास तब तक साफ़ नहीं कर पाया था यानी यह कि ज़्यादातर किताबें बेशक्ल और अराजक क्यों हैं। इन्हीं किताबों में से एक—जिसे मेरे पिता ने सर्किट नंबर 1594 के एक षट्कोण में देखा था—बस तीन हर्फ़ों M, C और V से बनी थी, जो पहली से आख़िरी पंक्ति तक बेहूदे तरीक़े से दुहराए गए थे। एक और किताब, जो इस इलाक़े में बहुत पढ़ी जाती है, केवल अक्षरों की एक भूलभुलैया है; मगर उसके आख़िरी से पिछले पन्ने पर यह पंक्ति पढ़ी जा सकती है, “ऐ वक़्त, तेरी पिरामिडें…” जैसा सब जानते हैं—एक सीधी-सी समझदार पंक्ति या एक सादा-सा वाक्य पाने के लिए हमें बेवक़ूफ़ाना शोर, बेहूदे हर्फ़ों के जमघट, और बेमानी उलझनों की पूरी-की-पूरी मंज़िलें पढ़नी पड़ती हैं। (मैं एक ऐसे जंगली इलाक़े के बारे में जानता हूँ, जहाँ के लाइब्रेरियंस इस फ़िज़ूल अंधविश्वास में नहीं पड़ते कि किताबों में कोई अर्थ तलाश किया जाए। वे इसे उसी क़िस्म का काम समझते हैं, जैसे सपनों का अर्थ निकालना या हथेली की उलझी लकीरों में कोई पैग़ाम खोजना। ...वे मानते हैं कि लिखावट ईजाद करने वालों ने पच्चीस प्राकृतिक निशानों की नक़ल की थी, लेकिन यह बस एक इत्तिफ़ाक़ था और यह कि किताबें, अपने आपमें, कुछ भी मतलब नहीं रखतीं। यह राय—जैसा हम आगे देखेंगे—पूरी तरह ग़लत भी नहीं है।)
लंबे समय तक यह समझा जाता रहा कि ये अभेद्य किताबें बहुत पुरानी या बहुत दूर की भाषाओं से ताल्लुक़ रखती हैं। यह सच है कि सबसे पुराने लोग—शुरुआती लाइब्रेरियंस—एक ऐसी ज़बान बोलते थे जो आज की हमारी ज़बान से बिल्कुल अलग थी; यह भी सच है कि यहाँ से दाईं तरफ़ कुछ मील पर भाषा किसी इलाक़ाई बोली जैसी हो जाती है और नब्बे मंज़िल ऊपर बिल्कुल बेबूझ। यह सब—मैं दोहराता हूँ—सच है; लेकिन चार सौ दस पन्नों में बिना किसी बदलाव के लिखी हुई MCV, MCV, MCV... की क़तारें किसी भी ज़बान से मेल नहीं खा सकतीं—वह कैसी ही स्थानीय या टूटी-फूटी, आदिम, अधूरी-सी हो। कुछ लाइब्रेरियंस ने इशारा किया कि हर हर्फ़ अपने बाद आने वाले हर्फ़ को किसी न किसी तरह प्रभावित कर सकता है और पृष्ठ 7 की तीसरी पंक्ति में जो MCV है, वह किसी और पन्ने में किसी दूसरी जगह आने वाले उसी MCV जैसा नहीं है। मगर यह धुंधली-सी दलील कभी ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। कुछ और लोग इस मसले को ‘खुफ़िया कोड’ के नज़रिये से देखने लगे और यह क़यास अब लगभग आम तौर पर स्वीकार कर लिया गया है—हालाँकि उस तरह नहीं, जिस तरह इसके पहले खोजियों ने सोचा था।
पाँच सौ साल पहले, ऊपर की मंज़िलों के एक षट्कोण के प्रमुख* [पहले हर तीन षट्कोणों पर एक व्यक्ति होता था। ख़ुदकुशियों और साँस की बीमारियों ने यह अनुपात नष्ट कर दिया है। मेरी याद में बेपनाह उदासी के दृश्य हैं : ऐसी तमाम रातें जब मैं गलियारों और चमकीली सीढ़ियों से होकर गुज़रा, लेकिन एक भी लाइब्रेरियन नज़र नहीं आया।] को एक ऐसी किताब मिली जो उतनी ही उलझी हुई थी जितनी बाक़ी सब—लेकिन उसमें क़रीब दो पन्नों पर एक-सी, हमवार पंक्तियाँ थीं। उसने यह किताब एक घुमक्कड़ अर्थ निकालने वाले को दिखाई, जिसने बताया कि ये पंक्तियाँ पुर्तगाली में हैं। कुछ दूसरों ने कहा कि ये यिद्दिश में हैं। एक सदी से भी कम वक़्त में यह हक़ीक़त तय हो गई कि यह भाषा न पुर्तगाली थी, न यिद्दिश, बल्कि गुआरनी भाषा की समोयेद–लिथुआनियाई बोली थी, जिसमें शास्त्रीय अरबी की झलक भी थी। इसके मायने भी हल कर लिए गए—इसमें ‘संयोजनों के विश्लेषण’ के सिद्धांत थे, जिन्हें विभिन्न उदाहरणों से अनगिनत बार दोहराकर समझाया गया था। इन्हीं उदाहरणों ने एक प्रतिभाशाली लाइब्रेरियन को लाइब्रेरी का मूल नियम खोजने में मदद दी। उस विचारक ने देखा कि सारी किताबें—चाहे एक-दूसरे से जितनी भी अलग हों—कुछ समान तत्त्वों से बनी हैं : पूर्णविराम, अल्पविराम, ‘स्पेस’ और बाईस अक्षर। उसने यह भी साबित किया और इसका प्रमाण तमाम मुसाफ़िरों ने दिया है कि इस अनंत लाइब्रेरी में कोई भी दो किताबें एक जैसी नहीं हैं। इन तमाम अकाट्य आधारों से उसने यह नतीजा निकाला : लाइब्रेरी ‘परिपूर्ण’ है और इसकी अलमारियों में इन बीस-पच्चीस लिपि-चिह्नों के सभी संभावित संयोजन मौजूद है—जिनकी तादाद बहुत ज़्यादा है, मगर अनंत नहीं, यानी वह सब कुछ जो कहा जा सकता है, किसी भी भाषा में, यहाँ मौजूद है : कायनात के सारे राज़, भविष्य का बारीक से बारीक इतिहास, फ़रिश्तों की आपबीतियाँ, लाइब्रेरी के कैटलॉग, हज़ारों झूठे कैटलॉग, उन नक़ली सूचियों की ख़ामियों का ब्योरा, असली सूची की ख़ामियों के सबूत, बेसिलाइड्स का ग्नॉस्टिक इंजील, उस इंजील पर टीका, उस टीके पर टीका, आपकी मौत का सच्चा बयान, हर किताब के हर भाषा में संस्करण और हर किताब की हर किताब में की गई दख़लंदाज़ियाँ…
जब यह एलान हुआ कि लाइब्रेरी में दुनिया की हर संभव किताब, हर वो किताब जो कभी लिखी गई या लिखी जाएगी या लिखी जा सकती थी मगर नहीं लिखी गई—मौजूद है, तो लोगों पर तत्काल एक अजीब-सा उन्माद, एक दीवानी-सी ख़ुशी छा गई। हर आदमी को यूँ महसूस हुआ जैसे उसे कोई पुराना, मुकम्मल और अब तक न छुआ गया ख़ज़ाना मिल गया हो। यह ख़याल दिलों में बैठ गया कि इंसानी ज़िंदगी का कोई भी मसला—चाहे व्यक्तिगत हो या सार्वभौमिक—ऐसा नहीं है जिसका समझदारी भरा समाधान किसी न किसी षट्कोण में मौजूद न हो। यकायक कायनात का मतलब भी खुल गया और उम्मीदों का दायरा बेपनाह फैल गया।
उन दिनों ‘विन्ड केशन्स’ (‘पक्ष-कथन और भविष्यवाणियों की किताबों’) का बड़ा ज़िक्र था, यानी ऐसी किताबें जो हर इंसान के हर अमल, हर फ़ैसले को हमेशा-हमेशा के लिए वाजिब साबित करतीं और आने वाले ज़माने के लिए अद्भुत रहस्यों का ज़ख़ीरा सँजोए रहतीं। हज़ारों लालची लोग अपने प्यारे, पैदाइशी षट्कोणों को छोड़कर सीढ़ियों पर उमड़ पड़े—इस नाकाम तमन्ना में कि शायद कहीं उन्हें अपना ‘विन्डिकेशन’ मिल जाए। सँकरे गलियारों में ये मुसाफ़िर आपस में भिड़ जाते, एक-दूसरे को बद्दुआएँ देते, उन पावन सीढ़ियों पर एक दूसरे का गला घोंटते, धोख़ेबाज़ किताबों को अँधेरी सुरंगों में फेंकते और दूर-दराज़ इलाक़ों से आए लोगों के हाथों धक्का खाकर अंतरिक्ष में गिरकर अपनी जान गँवाते। कुछ तो इस तलाश में पागल भी हो गए…
विन्डिकेशंस वाक़ई मौजूद हैं। मैं ख़ुद ऐसी दो किताबें देख चुका हूँ—दोनों आने वाले वक़्त के लोगों के बारे में थीं, ऐसे लोग जो शायद सच हों और शायद नहीं भी। लेकिन तलाश करने वाले यह भूल गए थे कि किसी इंसान का अपनी ही किताब, या अपनी किताब का कोई झूठा, नक़ली रूप—ढूँढ़ पाना, हिसाब से देखा जाए तो, लगभग नामुमकिन है… शून्य के बराबर।
इंसानी ज़िंदगी के बुनियादी रहस्यों—लाइब्रेरी की पैदाइश और वक़्त की शुरुआत—की व्याख्या की भी उस दौर में उम्मीद की जा रही थी। यह माना जा सकता है कि ये गहरे, संगीन राज़ शब्दों में बयान किए जा सकते हैं; और अगर दार्शनिकों की भाषा इनको समझाने के लिए काफ़ी न हो, तो यह बहुरूपी, बे-शुमार लाइब्रेरी ख़ुद वह अनदेखी ज़बान पैदा कर लेगी जिसकी ज़रूरत है—और उसके साथ वह तमाम शब्दावलियाँ और व्याकरण भी, जो उस ज़बान के लिए दरकार होंगे।
अब चार सदियाँ बीत चुकी हैं कि इंसान इन असीम षट्कोणों में भटकते-भटकते थक गए हैं…
यहाँ बहुत सारे आधिकारिक खोजकर्ता हैं, जिज्ञासु और परीक्षक। मैंने उन्हें कई बार अपने फ़र्ज़ अदा करते देखा है, हमेशा थके हुए। वे एक ऐसी सीढ़ी का ज़िक्र करते हैं जिसमें पायदान ही नहीं थे और जहाँ उनकी जान जाते-जाते बची। वे गैलरियों और सीढ़ियों के क़िस्से लोकल लाइब्रेरियन को सुनाते रहते हैं। कभी-कभी वे पास पड़ी कोई किताब उठा लेते हैं और बदनाम लफ़्ज़ों की तलाश में उनके पन्ने पलटते हैं। लेकिन साफ़ है—अब किसी को किसी खोज की उम्मीद नहीं रही।
जिस असामान्य उम्मीद ने कभी दिलों को रौशन किया था, उसके बाद स्वाभाविक ही एक गहरी मायूसी आई। यह यक़ीन कि किसी न किसी षट्कोण में अनमोल किताबें मौजूद हैं और हर सवाल का, हर समस्या, उलझन, जिज्ञासा का जवाब बस किसी क़रीबी शेल्फ़ पर रखा है—फिर भी हमेशा के लिए हमारी पहुँच से बाहर—लगभग असह्य हो गया था। एक गुस्ताख़ संप्रदाय ने यहाँ तक सुझा दिया कि तमाम तलाशें छोड़ दी जाएँ, और लोग हर जगह बस अक्षरों और प्रतीकों को ताश के पत्तों की तरह तब तक फेंटते रहें, जब तक वे किसी नामुमकिन-सी किस्मत से ख़ुद-ब-ख़ुद वही पवित्र ग्रंथ न रच डालें। अधिकारियों को सख़्त आदेश जारी करने पड़े। संप्रदाय ग़ायब हो गया, लेकिन अपने बचपन तक मुझे ऐसे बूढ़े लोग दिखते थे, जो लंबे समय तक शौचालयों में छिपते-फिरते और धातु के सिक्कों जैसे प्रतिबंधित पासों को उछालते हुए, कुछ हिसाब लगाते हुए दिव्य अव्यवस्था की कमज़ोर नक़ल करते रहते।
दूसरे लोगों ने इसके उलट, यह समझा कि सबसे पहली ज़िम्मेदारी थी बेकार किताबों को मिटा देना। वे अपने काग़ज़ात—जो हमेशा ग़लत भी नहीं होते थे—दिखाते हुए षट्कोणों पर धावा बोलते, किसी किताब को झुँझलाहट से सरसरी नज़र से देखते और फिर पूरी की पूरी शेल्फ़ नष्ट कर देने का फ़ैसला सुना देते। उनका यह तपस्वियों सरीखा, सफ़ाई-पसंद जुनून लाखों किताबों के बेहूदा ज़ाया होने की वजह बना। उनका नाम आज भी लानत के साथ लिया जाता है; मगर जो लोग इस उन्माद में नष्ट हुए ‘ख़ज़ानों’ का मातम करते हैं, वे दो कुख्यात सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। पहली : लाइब्रेरी इतनी विशाल है कि इंसानों द्वारा की गई कोई भी कटौती उसके सामने नगण्य है। दूसरी : हर किताब अद्वितीय और अपूरणीय है, फिर भी (क्योंकि लाइब्रेरी ‘संपूर्ण’ है) हर किताब की सैकड़ों-हज़ारों ऐसी अपूर्ण नक़लें हमेशा मौजूद रहती हैं, जो सिर्फ़ एक अक्षर या अल्पविराम से अलग हों। आम राय के विपरीत मैं यह कहने की जुर्रत करता हूँ कि उन उन्मादी सफ़ाई पसंदों द्वारा की गई लूटपाट के नतीजों को उनकी दहशत ने हद से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखा दिया है। दरअस्ल, वे एक रक्ताभ षट्कोण की किताबों पर झपटने के जुनून में पागल हो उठे थे—जो आम आकार से छोटी थीं, सर्वशक्तिमान, तस्वीरों से भरी और जादुई।
हमें उस ज़माने के एक और अंधविश्वास का भी पता है—‘किताब वाले इंसान’ का। लोगों का ख़याल था कि किसी न किसी षट्कोण की किसी शेल्फ़ पर एक ‘किताबों की किताब’ मौजूद है, जो सभी किताबों का राज़, उनका पूरा ख़ुलासा, उनका मुकम्मल निचोड़ है—बाक़ी सारी किताबों का सारांश समेटे एक ‘ख़ुफ़िया किताब’—और यह कि कोई न कोई लाइब्रेरियन उसे ज़रूर पढ़ चुका है, और कि वह इस ब्रह्मांड में ख़ुदा का सा दर्जा रखता है। उस दूर-दराज़ के अनजान पदाधिकारी के प्रति इबादत के निशान अब भी इस इलाक़े की ज़बान में कहीं-कहीं बाक़ी है। सदियों तक कई कारवाँ, कई क़ाफ़िले, उसे तलाश करने निकलते रहे। सौ बरस तक उन्होंने हर क़िस्म की राहें नापीं—बिन नतीजे। आख़िर उस गुप्त षट्कोण का पता कैसे लगाया जाए जिसमें वह किताब रखी है? किसी ने एक उल्टी तरकीब सुझाई : किताब A ढूँढ़नी हो तो पहले किताब B को तलाश करो—वह A का ठिकाना बताएगी; किताब B ढूँढ़नी हो तो पहले किताब C ढूँढ़ो, और ऐसे ही यह सिलसिला चलता रहे, बे-इंतिहा, अनंत तक…
मैंने अपनी ज़िंदगी के बरस इसी तरह के साहसिक अभियानों में लुटाकर ख़त्म कर डाले। मुझे यह बिल्कुल नामुमकिन नहीं लगता कि इस असीम लाइब्रेरी की किसी शेल्फ़ पर वाक़ई एक मुकम्मल किताब मौजूद हो।* [मैं फिर कहता हूँ: बस इतना काफ़ी है कि कोई किताब ‘संभव’ हो और वह यहाँ मौजूद है। ‘असंभव’ को छोड़कर बाक़ी सबकुछ मौजूद है। मिसाल के तौर पर : ऐसे कोई किताब मुमकिन नहीं जो एक ‘सीढ़ी’ भी हो, हालाँकि यक़ीनन ऐसी किताबें मौजूद हैं जो इस ख़याल पर बहस करती, इसे साबित करती या इससे इंकार करती हैं—और शायद कुछ ऐसी भी हों जिनकी संरचना किसी सीढ़ी जैसी हो।]
मैं अज्ञात देवताओं से प्रार्थना करता हूँ कि कोई इंसान—हाँ, सिर्फ़ एक ही सही और चाहे वह हज़ारों साल पहले ही क्यों न गुज़र चुका हो—उस किताब को खोलकर पढ़ चुका हो। अगर इज़्ज़त, प्रज्ञान और ख़ुशी मेरे नसीब में नहीं हैं, तो दूसरों के हिस्से में सही। जन्नत ज़रूर हो भले ही मेरी जगह जहन्नुम में हो। मैं मिट जाऊँ, कुचल दिया जाऊँ, कोई ग़म नहीं—बस तेरा यह असीम और विशाल पुस्तकालय एक पल के लिए, एक ही प्राणी की मार्फ़त, अपने होने का हक़ साबित कर दे।
अविश्वासी लोग दावे से कहते हैं कि लाइब्रेरी में बेतुकी बातें ही असल उसूल हैं, और जो कुछ मुनासिब, सुसंगत या साफ़-सुथरा है—वह तो लगभग किसी चमत्कार से कम नहीं। वे (मुझे मालूम है) कहते हैं कि “एक ‘ज्वरग्रस्त लाइब्रेरी’ है जिसके हादसों-से भरे खंड हर वक़्त इस ख़तरे में रहते हैं कि किसी और किताब में बदल जाएँ, और जिनमें हर चीज़ किसी प्रलापी देवता द्वारा (जैसे बुखार की उत्तेजना में) एक साथ साबित भी होती है, नकार भी दी जाती है, और गड्ड-मड्ड भी कर दी जाती है।” ये शब्द, जो सिर्फ़ अव्यवस्था की शिकायत नहीं करते; बल्कि ख़ुद उसी अव्यवस्था का नमूना हैं, उन्हें बोलने वालों की बे-तमीज़ी और उनकी नाउम्मीदी भरी जहालत को पूरी तरह बेनक़ाब करते हैं। हक़ीक़त यह है कि लाइब्रेरी में तमाम शाब्दिक संरचनाएँ, सारी विविधताएँ शामिल हैं जो पच्चीस अक्षरों के कॉम्बिनेशन से संभव हैं; लेकिन इसमें किसी ‘परम बेहूदगी’ की जगह नहीं है। यह कहना भी फ़िज़ूल है कि मेरी निगरानी वाले तमाम षट्कोणों में सबसे उम्दा किताब का नाम है ‘एक कंघी की हुई गर्जना’ (‘Combed Clap of Thunder’), या किसी दूसरी का नाम है ‘प्लास्टर की ऐंठन’ (‘The Plaster Cramp’) या फिर कोई और Axaxaxas Mlö। पहली नज़र में ये शीर्षक चाहे जितने बेतुके लगें, इनका कोई न कोई गुप्त या सांकेतिक अर्थ ज़रूर है—और चूँकि ये अर्थ भी शब्दों से बने हैं, लिहाज़ा वो भी, क़ायदे के मुताबिक़, लाइब्रेरी में कहीं न कहीं मौजूद हैं। मैं ऐसे कोई अक्षर नहीं जोड़ सकता, जैसे dhcmrlchtdj—जो इस दिव्य लाइब्रेरी में पहले ही मौजूद न हों और जो इसकी किसी न किसी गुप्त ज़बान में कोई ख़ौफ़नाक अर्थ न समेटे हों। कोई इंसान ऐसा कोई शब्द नहीं बोल सकता जो एक साथ मोहब्बत और खौफ़ से भरा न हो और जो इसकी किसी रहस्यमय ज़ुबान में किसी देवता का ताक़तवर नाम न बन जाता हो। कुछ भी कहना सिर्फ़ पहले ही लिखी बातों को दोहराना है। कुछ भी लिखना ‘दोहराव’ की गिरफ़्त में आना है। यह फ़िज़ूल, अनावश्यक लंबा ख़त जो मैं लिख रहा हूँ, यह भी पहले से ही उन बेहिसाब षट्कोणों के किसी एक षट्कोण की पाँच शेल्फ़ों में रखे तीस वॉल्यूमों में से किसी एक में मौजूद है—और इसका खंडन भी वहीं मौजूद है। (बेशुमार मुमकिन ज़बानें एक ही शब्दावली इस्तेमाल करती हैं; उनमें से कुछ में ‘लाइब्रेरी’ का मतलब होगा ‘सर्वव्यापी और शाश्वत षट्कोण-गैलरियों की प्रणाली’, लेकिन किसी दूसरी में ‘लाइब्रेरी’ का मतलब है रोटी या पिरामिड या कुछ भी और—और इन परिभाषित करने वाले शब्दों के मानी एकदम अलग ही कुछ। तुम जो मुझे पढ़ रहे हो—क्या तुम्हें पूरा यक़ीन है कि तुम मेरी ज़बान को ठीक-ठीक समझ रहे हो?)
सुनियोजित तरीक़े से लिखना मुझे इंसानों की मौजूदा हालत से काट देता है। लेकिन यह यक़ीन कि सब कुछ पहले ही लिखा जा चुका है—हम सबको मानो बेमानी सायों में, प्रेतों में बदल देता है। मैं उन इलाक़ों को जानता हूँ जहाँ नौजवान किताबों के सामने सज्दा करते हैं और पन्नों को वहशीपन से चूमते हैं, जबकि उन्हें एक अक्षर तक पढ़ना नहीं आता। महामारियों, फ़िरक़ापरस्ती और धार्मिक झगड़ों से और तीर्थयात्राएँ जो आख़िरकार लुटेरों के गिरोहों में बदल जाती हैं—इन सबसे आबादी तबाह हो चुकी है। शायद मैंने पहले ज़िक्र किया है कि ख़ुदकुशियाँ हर साल बढ़ती जा रही हैं। शायद बढ़ती उम्र और डर मुझे धोखा दे रहे हों, मगर मुझे संदेह है कि मानव जाति—यह अद्वितीय मानव प्रजाति—अपनी विलुप्ति की राह पर है; जबकि ‘पुस्तकालय’ हमेशा बना रहेगा, रोशन, तन्हा, अनंत, बे-हरकत, बेशक़ीमती ग्रंथों का ज़ख़ीरा, ब-ज़ाहिर फ़िज़ूल, अविनाशी और पोशीदा।
‘अनंत’—यह शब्द अभी-अभी मैंने लिखा है, और यह सिर्फ़ मेरी बयानबाज़ी की आदत से नहीं आया। मेरा कहना है कि दुनिया को ‘अनंत’ मानना तर्कहीन नहीं है। जो लोग इसे सीमित समझते हैं, वे मानते हैं कि किसी दूर-दराज़ मुक़ाम पर गलियारों, सीढ़ियों और षट्भुज कक्षों का अचानक ख़ामोशी से समाप्त हो जाना मुमकिन है—जो साफ़-साफ़ एक बेहूदा ख़याल है। और जो लोग इसे असीम समझते हैं, वे भूल जाते हैं कि सभी मुमकिन किताबों की तादाद, कितनी ही ज़्यादा हो, फिर भी सीमित है। मैं इस पुराने मसले के लिए एक नर्म-सा इशारा करता हूँ : लाइब्रेरी अनंत भी है और ख़ुद को दोहराती हुई (periodic) भी। अगर कोई शाश्वत मुसाफ़िर इसमें किसी भी दिशा में चलता जाए, चलता ही रहे, तो सदियों या सहस्त्राब्दियों के बाद आख़िरकार वह ठीक उन्हीं किताबों को, ठीक उसी अव्यवस्था में दोबारा पाएगा, और बार-बार का यह ‘कॉस्मिक’ दोहराव ही एक तरह की ‘व्यवस्था’ बन जाएगा, अंतिम और संपूर्ण। यह दिलकश उम्मीद मुझे अपनी तन्हाई में एक तरह की तसल्ली देती है।* [‘लेटिसिया आलवारेज़ दे टोलेदो’ ने टिप्पणी की है कि यह विशाल पुस्तकालय व्यर्थ है। सख़्ती से कहें तो एक ही किताब काफ़ी होती—आम साइज़ की, नौ या दस पॉइंट्स में छपी, और बेहद बारीक पन्नों की ‘अनंत’ संख्या से बनी हुई। (सत्रहवीं सदी के इतालवी गणितज्ञ कावालिएरी के अनुसार हर ठोस चीज़ अनंत तलों के अध्यारोपण [superposition] से बनी होती है।) यह किताब शायद उपयोग में आसान न होती—क्योंकि पुस्तक का हर दिखाई देने वाला पन्ना अपने जैसे अन्य पन्नों में विभाजित होता चला जाता। किताब का वह कल्पनातीत केंद्रीय पन्ना—उसकी कोई ‘दूसरी तरफ़’ न होती। (यही कल्पना बोर्खेस की बाद में लिखी गई कहानी ‘रेत की किताब’ का आधार बनी, जिसमें ऐसी किताब सचमुच मौजूद है—अनुवादक)]
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~ इस कहानी का हिंदी अनुवाद : योगेंद्र आहूजा | अँग्रेज़ी अनुवाद : एंथनी केरागन
~ कथा-पूर्व-उद्धरण : ‘The Anatomy of Melancholy’ (1621), रॉबर्ट बर्टन (1577–1640)—जो इंग्लैंड के एक पादरी, विद्वान और लेखक थे—का प्रसिद्ध ग्रंथ है।
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