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जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति को एक शोधार्थी का पत्र

आदरणीय कुलपति महोदय,

सादर प्रणाम!

आज जब आपकी झलक रील्स के माध्यम से देखने को मिली, तो बड़ा अचंभा हुआ। मुझे तो लग रहा था कि आप कहीं विदेश दौरे पर गए हैं! आज जब आप अपने हुजरे से निकले, तो लगा कि आप बच्चों से बातें करेंगे। लेकिन बात क्या करेंगे आप? आपने तो पूरे विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों को साथ ले लिया। हद तो तब हुई, जब आपके गार्डों ने बच्चों के फ़ोन ज़बरन छीन लिए।

आप वही हैं ना सर, जिन्होंने आंबेडकर जयंती पर एम. ए. अंसारी सभागार में आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि, “मैं छात्रों के साथ हर पल खड़ा रहता हूँ।” इस पर सभी लोगों ने तालियाँ बजाई थीं। लेकिन पिछले 13 दिनों से आप कहाँ थे? क्या जो बच्चे अनशन पर बैठे हैं, वे आपके बच्चे नहीं हैं? वे क्या ही माँग रहे हैं आपसे? बस, मत देने का अधिकार। यदि आप यह भी नहीं दे पा रहे हैं, तो आपको सौ तोपों की सलामी!

बड़े माज़रत के साथ कहना चाहता हूँ सर, आपकी कथनी और करनी में बड़ा फ़र्क़ है, जिसे साहित्य वाले विरोधाभास कहते हैं। आपने तो कमाल करवा दिया! पूरे विश्वविद्यालय परिसर को छावनी बनवा दिया। अरे! कुलपति जी, यह छात्रों की छावनी है, पुलिस की नहीं। सर, ये छात्र हैं और इनकी ज़िम्मेदारी आपकी है।

आपका दिल पिछले 13 दिनों से क्यों नहीं पसीजा सर? बच्चे बिना दाना-पानी के बैठे हैं। वे आपसे सोना-चाँदी और जवाहरात नहीं माँग रहे हैं और न ही विश्वविद्यालय की ज़मीन हड़प रहे हैं। वे बस अपना अधिकार माँग रहे हैं। आख़िर एएमयू के भी तो कुलपति हैं न! उन्होंने तो मामला सुलटा दिया। आपको इतना समय क्यों लग रहा है? कहीं आपका कोई निजी हित तो नहीं, सर?

हद तो तब हो गई, जब आपने गेटों के सामने दीवारें उठवा दीं। परिसर को पुलिसिया जूतों की टापों से भर दिया। आपकी नाकामी का ठीकरा छात्रों के सिर क्यों फोड़ा जा रहा है? जिन बच्चों के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं होगी, वे क्लास कैसे लेंगे? आपने तो एक नोटिस जारी करवा दिया कि ऑनलाइन क्लासेज लगेंगी। लेकिन जिन बच्चों की क्लासेज छूटेंगी, उनका क्या?

आप तो जेएनयू से आए हैं न, सर। जब वहाँ चुनाव हो रहे हैं, तो जामिया इससे अछूता क्यों रहे? आपको आख़िर छात्रसंघ चुनाव से क्या दिक़्क़त है?

आपके ही विश्वविद्यालय में शोधार्थियों की हाज़िरी लगती है। क्या यूजीसी की कोई ऐसी नियमावली है? ज़रा सोचिए न! अभी छात्रों को फ़ेलोशिप के लिए हस्ताक्षर करवाने हैं। वे ऐसा कैसे कराएँगे, जब आपने एंट्री ही बंद करवा दी है? सारे छात्र संपन्न परिवारों से नहीं आते हैं। यदि एक महीने फ़ेलोशिप न मिले, तो उनका चूल्हा बंद हो जाएगा।

सर, एकांत में सोचिएगा! आपके भी बच्चे होंगे। जामिया के सारे बच्चे उन्हीं की तरह हैं। ये भी तो किसी माँ-बाप के बच्चे हैं। यह विश्वविद्यालय हम छात्रों का है सर, आपका नहीं। आप तो किरायेदार हैं। आज आप हैं, कल कोई और आएगा। शायद आपको भी एक एक्सटेंशन मिल जाए! इसीलिए आप छात्रों के साथ नहीं हैं, बल्कि विचारधारा से बँधे हुए हैं।

मुशर्रफ़ परवेज़

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