मुशर्रफ़ परवेज़ के बेला
11 सितम्बर 2026
ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त
आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश