जगह-जगह 2.0 : क्या कर रही होगी जबलपुर में तुम
निशांत कौशिक
12 जून 2026
शहरज़ादे का शहरआशोब
जबलपुर को खोजता हूँ तो पहले उन सूचियों से उलझता हूँ जिनमें 12 सड़कों और 13 जनों की, 5 मोहल्लों और 3 उद्यानों की, 2 पुलों और 52 तालाबों की, एक कल्चुरी काल के तेवर की, एक विलियम स्लीमन की, एक ओशो की और ज्ञानरंजन की, प्रेमनाथ के टूट चुके टाकीज़ की, सैंकड़ों लेखकों और नाटककारों की और कॉफ़ी हॉउस के सांभर में हींग की बातें होती रहती हैं।
शहरों का शव-परीक्षण और नॉस्टाल्जिया इन शहरनामों और सूचियों की नियति है और उनका होना महत्त्वपूर्ण भी है। एक ख़राब ‘शहरनामा’ शादी के कार्ड की तरह होता है और उसमें पाठक केवल अपना नाम ढूँढ़ता है।
यहाँ लिखा हुआ शहरनामा नहीं है।
जिनके पास उम्र है, उनका देखा-जाना जबलपुर मुझ तक रिसते हुए पहुँचा। वे ऊँट बिलहरीवी को जानते होंगे, उन्होंने कॉमरेड महेंद्र वाजपेयी के भाषण सुने होंगे, उन्हें राजा रसगुल्ला, मंजू तेली की गली, लटकारी का पड़ाव और घोड़ा-नख़्ख़ास के क़िस्से पता होंगे। उन्होंने उस्ताद ख़लीफ़ा को दीवान मार्किट में सैंकड़ों शे’र साँस-उसाँस में सुनाते देखा होगा, उन्हें अज़ीज़ नाज़ाँ, कमानिया गेट की क़व्वालियाँ और कुल-हिंद मुशायरे याद होंगे। वे भातखंडे स्कूल के खंडहर से पुराने थे। वे अब भी टॉकीज़ों की जगह पर तीसरी बार उठी इमारत को उसी टाकीज़ के नाम से पुकारते हैं। हर शहर में असद ज़ैदी की ‘दुर्गा टॉकीज़’ है, जबलपुर में मैं उसे ‘शारदा टॉकीज़’ की तरह याद करता हूँ।
मैं बरसों शहर को खोजने रेलवे स्टेशन जाया करता था, जहाँ से दिशाओं की बाँहें फैलती हैं। तीन भाषाओं में लिखा शहर का नाम, समंदर से उसकी कुल ऊँचाई, यार्ड में खड़े महाकाय डब्बे। स्टेशन का बायाँ पैर एल्गिन को खुलता है, दायाँ छावनी के इलाक़े या सदर तरफ़। दुःख, दारिद्र्य और संकट कुछ भी हो, शहर से गुज़रती ट्रेन कहीं पहुँच रही होगी और मेरा शहर उसका साक्षी है। यह सुख मेरे लिए शहरी गौरव बना रहा।
मैं गोल बाज़ार की सड़कों में गोल-गोल घूमता रहा, मदन-महल के धँस चुके पुल के नीचे देवताओं से अधिक सिर झुकाया। शहर की कलारियों की मध्यरात्रि की दिव्य खिड़कियाँ और रात में बेहिसाब वुसत हासिल कर चुके शहर के पार जाने वाली सड़कों को रौंदती बेसँभाल ख़्वाहिश में, जबलपुर का सरापा कभी-कभी पकड़ में आता था। निकोटिन में आँखें लाल थीं, होंठ काले और नाख़ून पीले। नींदें लाँघकर चप्पे-चप्पे और चौराहे आबाद किए।
जबलपुर से मैं 14 साल पहले निकला था। तब मेरे मुँह में बुंदेली थी, थैले में मावा-जलेबी और जेब में ज़र्दा।
उन मुख़्तसर मुलाक़ातों का इंतिज़ार मैं ट्रेनों और जबलपुर के बाहर करता रहा जो पूछें, “आप भी जबलपुर के हैं?” और मैं “हाँ, जबलईपुर के, और तुम भी उतई” कहकर जवाब दूँ। वे मेरा मोहल्ला पूछें, वहाँ की कोई इमारत दोहराएँ, तंबाकू मलकर हथेली पर चुटकी से रख दें, “कभी जबलपुर जाओ तो बताना, कुछ भेजना है” या “कभी जबलपुर से लौटो तो बताना, कुछ मँगवाना है” का अवसर आए। यह यात्रा की विचित्र भारतीय सामाजिकता है, लेकिन मैं बदक़िस्मती से इससे महरूम ही रहा।
हर शहर की तरह जबलपुर में भी वे लोग लगातार मिलते रहे जो जगहों की ओर इशारा करके बताते थे कि यहाँ पहले कुछ नहीं हुआ करता था, सब जंगल था या सपाट था। वे पहले दंगे, पहली आगज़नी और पहले हत्याकांडों को अतीत के रिफ़्रेंस की तरह इस्तेमाल करते रहते हैं और उनमें अतीत-बोध की एक विचित्र क़िस्म की प्रतिष्ठा ढूँढ़ते हैं।
बनारस से ‘गली’ उठ चुकी है और पंजाबी कविता से ‘चरखा’। जबलपुर की बीड़ी फ़ैक्ट्री में काम करने आख़िरी बार शोले का अहमद निकला था। यहाँ बस नर्मदा अटल है, उस पर खड़ा एक बौना अँग्रेज़ी पुल। गुलज़ार ने कहा था, “कोई चाल ऐसी चलो यार अब कि समंदर भी पुल पर चले।”
मैं शहर का मालिकाना जहाँ ढूँढ़ता रहा, वहाँ अब दीमकें और खटमल हैं, दाग़ी कुर्ते हैं और अपने दालान में गूँजती आवाज़ें। वे जगहें ही उनकी श्रोता भी हैं। यह ज़िंदगी की निर्ममता है।
बशीर बद्र गए। देवताल में, नागपुर हाइवे के पास वनस्थली के शिवोमा प्रकाशन से उनकी किताब ‘उजाले अपनी यादों के’ का एक बेहद ख़ूबसूरत संस्करण प्रकाशित हुआ था, यह स्केचिंग से बनाया हुआ अप्रतिम संस्करण था। उसके चित्रकार सुरेंद्र राव भी बीते वर्ष चले गए। केवल मृत्यु ही अमर कर सकती है, जीवन नहीं।
गढ़ा के विनीत पाठक का एक शेर पत्थर पर लिखकर श्मशान घाट के मोड़ पर लगा दिया गया, जहाँ शव की दिशा बदली जाती है और पैर धोए जाते हैं—
“जान आग़ाज़ पर निसार कर चले,
हम ने अंजाम-ए-सफ़र कब सोचा था।”
शहर को जिस गश्त और गर्द ने इसका अनूठापन दिया था, वहाँ अब बस दुकानें हैं। दुकानें रसोई में हैं, बिस्तर में हैं, सड़क के बीच हैं। जो मध्यवर्ग की संतानें आईटी से ऊबकर जबलपुर पहुँचती हैं, यहाँ उन्हें गैस्ट्रोपब और चायोस मिलते हैं। लोगों के कंधों पर बोझ हैं, जेब में पॉवर-बैंक और मुँह में बर्गर।
जो चले गए, उन सभी को शहर याद नहीं करता। शहर में भीड़ का उबाल है। आधी से अधिक इंडियन आइडल में अपने शहर के बाशिंदों को वोट करती है, बाक़ी नियमित अख़बार पढ़ती है और लगभग सारी रविवार को मॉल जाती है। युवा कवि मुक्तिबोध की कविता के ‘गढ़’ ढहा रहे हैं। परसाई के लिए नया सौंदर्यशास्त्र कोई अब तक ढूँढ़ रहा है। बुकोव्सकीय लहजे में, जहाँ जिसको जो मिला, वह उससे लग गया, जुड़ गया, बीत गया, डूब गया, नष्ट हो गया या बरसों से उबर ही रहा है।
शहर जिन्हें याद करता है, वे इस शहर से दूर गए और हम उन पतंगों पर हस्ताक्षर की दरख़्वास्त करते हैं। हम पूछते हैं, “डू यू नो ओशो? ही बिलॉन्ग्ड टू जबलपुर।”
क्या कर रही होगी जबलपुर में तुम
उस रात जब शहर से निकला, रात का एक चीथड़ा लिए मैं ट्रेन में चढ़ा, एक तुम लिए घर लौट गई थीं। आँख खुली तो हाथ ख़ाली थे और चेहरे पर धूप थी। बाहर नागपुर जंक्शन था। अभी इस वक़्त जबलपुर में क्या कर रही होगी तुम?
सुबह सादा थी। सिर उठाती ठंड का महीना था। रसोई में सेंके जा रहे ब्रेड की गंध घर में पसर गई। अगरबत्ती और तवे पर जलते घी का मिला-जुला धुआँ था। घर में आलस बिखरा हुआ था और भागमभाग। दिन रोज़ के मानिंद आसमान पर चढ़ रहा था। धूप के कोमल दाँत निकल आए थे। सड़कों पर कुत्ते अंगड़ाई ले रहे थे, ठेलों पर पोहे के पहाड़ थे। सड़क पर आधी छाया पेड़ की थी, आधी सामने खड़ी इमारत की। अभी इस वक़्त जबलपुर में क्या कर रही होगी तुम?
हरारत है स्मृति, कभी स्फुरण, कभी स्पंदन। कबूतर चलकर सड़क पार करते हैं। आईने में पर्दा लहराता है। मौसम का अर्थ अभी तक अक्षुण्ण है। ऋतुएँ समय से आती हैं। प्रार्थनाएँ आसमान लाँघती हैं। पतंग ओस में भीगी है और धरती तक पहुँची नहीं कुछ भी नमी। इस वक़्त जबलपुर में क्या कर रही होगी तुम?
सिंगरहा मोहल्ले में सिंघाड़े उबलते हैं। एक लड़की गेरू की ढिग लगाती है। तेंदु के पत्ते काटने वाले ब्लेड जैसे धागे से बादल कटता है। तम्बोलियों को अब भी याद हैं जबलपुर आने वाले बनारसियों की गिलौरियाँ। भेड़ाघाट में भेड़ें देखने वाले और पंचवटी में वट देखने वाले लोग जा चुके। एक बरगद को आसमान की उम्र याद है। यहाँ मेरी चाय पर धूप की एक लकीर पड़ी है। इस वक़्त जबलपुर में क्या कर रही होगी तुम?
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प्रस्तुत बेला का शीर्षक लीलाधर मंडलोई की कविता ‘क्या कर रही होगी जबलपुर में’ से लिया गया है। अन्य जगह-जगह 2.0 यहाँ पढ़िए : मोबी-डिक : सनक, साहस और समुद्र की कथा | द मैजिक माउंटेन : मनुष्य-चेतना पर महामारी के चिह्न | माई नेम इज़ रेड : फ़ारसी मिनिएचर, नक़्क़ाशख़ाना और पूर्व-पश्चिम का द्वंद्व | ईरान में भारत का ख़्वाब : शाहनामा में पंचतंत्र और शतरंज | पुणे के बहाने | चौरंगी, होटल कैलिफ़ोर्निया और गॉडफ़ादर | न मैं हिंदी शहर नगौरी
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