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जगह-जगह 2.0 : दोस्तोयेवस्की को बख़्श दीजिए

“Isn’t it maddening? Just when you begin to recognize a man called Alexandre, he is called Sacha, and then Satchka, and later Sachenka, and suddenly something pretentious like Alexandre Alexandrovitch Bunine and, later, simply Alexandre Alexandrovitch. The minute you get your bearings, they throw you off the track again. There is no end to it.”

— Ernesto Sabato, The Tunnel, Page 93

एक

दोस्तोयेवस्की के किरदारों और उपन्यासों के प्रति यह दरअस्ल ईमानदार प्रतिक्रिया है कि वे उबाऊ हैं, उनमें पठनीयता का घोर अभाव होता है, उनके वाक्य बहुत लंबे और विवरण रसहीन होते हैं, उनके यहाँ नाटकीयता नहीं के बराबर है, उनके यहाँ स्वप्न, शराबख़ाना और चिट्ठियों में मोनोलॉग की भरमार है, वह ‘एना कैरेनिना’ जैसे उपन्यासों के लेखक नहीं हो सकते थे। इन सबके साथ और बावजूद दोस्तोयेवस्की एक बड़े लेखक हैं। उन्होंने उपन्यास को धर्मच्युत समाज, जीवन की विवेचना से उपजे ख़ालीपन, यूरोपीय प्रबोधन की तीक्ष्ण समीक्षा और आधुनिक मानव की मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल के विराट मैदान में तब्दील कर दिया। वह उपन्यासों की शास्त्रीयता और ‘नॉवेल ऑफ़ आइडियाज़’ के पितामह हैं और आगे कई-कई दशकों के बड़े मनोवैज्ञानिक ख़ाकों का उद्गम सीधे उनके उपन्यासों से है। यूरोपीय अस्तित्ववाद के सिरे दोस्तोयेवस्की से खुलते हैं या उनको सलाम करते चलते हैं।

इस बीच दोस्तोयेवस्की के लेखन के साथ कुछ अलग हुआ है। वह पहले से कहीं अधिक चर्चित और पढ़े जा रहे हैं, उनके उपन्यासों और लघुकथाओं के नवीनतम अनुवाद सामने आ रहे हैं, उनकी ‘व्हाइट नाइट्स’ इस बीच भरपूर पढ़ी गई। लेकिन यह इस बात की आश्वस्ति नहीं है कि उन्हें अधिक पढ़ा या उससे अधिक खोजा गया है, बल्कि वह उस क़तार में शामिल हो गए हैं जहाँ आत्म-प्रवंचना के लिए उनके उद्धरण किसी शे’र की तरह दोहराए जाते रहे। दोस्तोयेवस्की उस सफ़ में अभी-अभी खड़े हुए लेखक हैं जिसमें फ़्रांज़ काफ़्काओं, कीर्कगार्दों, फ़्रेडरिक नीत्शेओं, अल्बेयर कामुओं, जॉन एलियाओं, सिल्विया प्लाथों और चार्ल्स बुकोव्स्कियों का चंदन घिसा जाता रहता है।

दो

“हर रूसी उपन्यास के अंत में ईसाइयत एक मलहम की तरह आती है।”

— ज्ञानरंजन, कबाड़ख़ाना

यह साल 2016-17 रहा होगा जब हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर जॉर्डन पीटरसन यूट्यूब के चहेते बन गए। पोस्टकोलोनियल डिस्कोर्स और जर्मन नरसंहार पर लिखे गए उपन्यासों और कथाओं से लेकर पेंटिंग और फ़िल्मों तक, फ़ाशीवाद पर दुनिया भर में भरपूर लिखा गया है। पिकासो जैसे बड़े चित्रकार की ‘गुएर्निका’ पेंटिंग पर दिए गए विनोदपूर्ण जवाब को भी बार-बार दोहराया जाता रहा है। इन सबसे कहीं दूर जॉर्डन पीटरसन ने बुराई का मानक और उसकी समीक्षा अलग ढंग से प्रस्तुत की। सोल्ज़ेनित्सिन के उपन्यास ‘गुलाग आर्किपेलागो’ की उन्होंने लंबी और विवेकपूर्ण पूर्वपीठिका लिखी। उन्होंने सोल्ज़ेनित्सिन को उद्धृत करते हुए कहा, “But the line dividing good and evil cuts through the heart of every human being.”

जॉर्डन पीटरसन अब तक अमेरिकी दक्षिणपंथ के डार्लिंग नहीं बने थे। लोगों को सोल्ज़ेनित्सिन पढ़ने के लिए उनके लगभग आह्वानरूपी आग्रह के साथ-साथ वह अपने पाठकवर्ग को दोस्तोयेवस्की के पाठ के लिए भी आमंत्रित कर रहे थे। इसमें यह बात ढकी-छुपी या उघड़ी हुई शामिल थी कि जितना नाश हिटलर के जर्मन राष्ट्रवाद ने किया, उतना या उससे अधिक नाश स्टालिन ने साम्यवाद के नाम पर किया। बहुतों के लिए यह एक अधिक सुलझा हुआ परिप्रेक्ष्य था।

इसी क्रम में पीटरसन ने आस्था के सवाल पर कहा कि वह “इस तरह जीते हैं मानो ईश्वर है” (I act as if God exists). यह नास्तिकता और आस्तिकता से अलग एक pretense था या धर्म के प्रति एक हूक थी, जिसके लिए वह बार-बार दोस्तोयेवस्की को उद्धृत करते थे। ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नायक एक ऐसा किरदार है जो धर्मोत्तर दुनिया में है, जहाँ नैतिकता का कुछ ख़ास अर्थ नहीं है। इस क्रम में वह नीत्शे को भी दोहराते हैं, जहाँ ईश्वर की हत्या हो चुकी है, उसकी क़ब्र खोदी जा रही है और क़ब्र खोदने वालों की कुदाल की टकराहट हम सभी के कानों में गिर रही है। ईश्वर की मृत्यु के इस महाशून्य में धर्म जैसे नए पवित्र खेल कैसे ईजाद किए जाएँ? धर्महीन समाज के उजाड़ में हमारे डेमीगॉड जैसे महामानवों के बनने और हिटलर तथा स्टालिन के पनपने का यही मैदान है।

पीटरसन ने दोस्तोयेवस्की को उस धर्महीन और अकेले पड़ चुके मानव के सामने आ रहे संकट के बरक्स पढ़ा और धर्म की पुनर्व्याख्या तथा उसकी मूलभूत मान्यताओं (ईसाइयत) की ओर लौटने का इशारा किया। इसने अमेरिकी दक्षिणपंथ को वह सबसे बड़ा मैदान दिया जिसमें धर्म की सबसे अधिक विकृत मान्यताओं और कुरीतियों के अंग फड़कने लगे। यह बात कुछ सरलीकृत लगे, लेकिन यह दोस्तोयेवस्की के भूत को धार्मिक पुनरुत्थान के जयघोष में शामिल करने का बेहद संजीदा प्रयास था। जॉर्डन पीटरसन अब पूरी तरह अप्रासंगिक और दोस्तोयेवस्की अपनी क़ब्र से कुछ अलग वजहों से बाहर आ चुके हैं।

तीन

“I prefer Dickens to Dostoyevsky... I prefer Grimms’ fairy tales to the newspapers’ front pages.”

— Wisława Szymborska, Possibilities

पिछले आठ-दस सालों में, अस्तित्ववाद का एक भोथरा पुनरुत्थान हुआ है। अचानक हर जगह सिसिफस, उबरमेंश, मर्सॉल्ट और ग्रेगोर सैमसा जैसे किरदारों का ज़िक्र बढ़ा है। ये लेखक न रहकर मनःस्थिति के सिग्नल बन गए हैं। कम्प्यूटर एक चट्टान है और उसके सामने बैठा हुआ आदमी सिसिफस है। विपन्नता और बेरोज़गारी में लाखों-लाखों लोग किसी चिड्डे या तिलचट्टे की तरह बिस्तर से उठ रहे हैं। एक अंतहीन उदासीनता उन्हें मर्सॉल्ट में बदल रही है और नायक की भूख, नायक का इंतज़ार उन्हें उबरमेंश का मुंतज़िर बनाए हुए है। यह समानताएँ संभवतः इन उपन्यासों या लेखकों को प्रासंगिक बनाए रखती होंगी। किसी रील में कोई कहता है, “Imagine hating me when my friends are Dostoevsky, Kafka and Camus.”

यह सच है कि व्यवस्थाजन्य ग़रीबी, असमानताएँ, वैमनस्य और दूसरी दरारें आज अधिक दिखाई देने लगी हैं और ये सभी लेखक या किरदार उस ग्रंथि को पकड़ते हैं जहाँ अवसाद और संत्रास है। जीवनशैली के बीच ऐसी फाँकें हैं जो पाटे नहीं पटतीं। शायद इस बात का संबंध साहित्य की लोकप्रियता से कम और हमारे उपभोग के बदलते हुए ढाँचे से अधिक है। किताबें, फ़िल्में, रीलें, उद्धरण, जीवन-शैलियाँ और विचार निरंतर हमारे लिए चुने, क्रमबद्ध और प्रस्तुत किए जाते हैं। हमारे इस देखने में जीवन को स्वेटर के धागे-धागे सा खोल देने की एक अदम्य बेचैनी रहती है। जीवन को सुलझा देने वाला कोई केंद्रीय सूत्र यहाँ से वहाँ दौड़ाता रहता है। जब कोई कहता है कि शेक्सपियर आपकी ज़िंदगी बदल सकता है या कोई दूसरा व्यक्ति यह कहता है कि उसके निजी संकट को दोस्तोयेवस्की के पात्रों के अलावा किसी और के माध्यम से समझा ही नहीं जा सकता, तो ये दोनों इसी संस्कृति की दो अभिव्यक्तियाँ हैं।

लेकिन मामला इससे कुछ अलग भी है। दोस्तोयेवस्की आदि लेखक अब सोशल मीडिया टेम्पलेट से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। वे सबसे अधिक और सबसे ग़लत उद्धृत किए जाने वाले लेखक हैं। वे अब वैसे ही बाज़ार द्वारा चुने और curated लेखक हैं जैसे गुलज़ार और ग़ालिब, जहाँ बात गुल हो जाती है और नाम चेशायर बिल्ली के दाँत की तरह चमकते रहते हैं। रूसी साहित्य के गोगोल, पुश्किन, निकोलाई ओस्त्रोव्स्की, यहाँ तक कि चेख़व भी भरपूर पढ़े और लिखे जाने के बावजूद उस आसानी से, उस निबाह के साथ दोहराए नहीं जाते जिस तरह दोस्तोयेवस्की दोहराए जाते हैं।

टॉल्स्टॉय का ‘कन्फेशन’ कहीं अधिक स्पष्टता से जीवन के संकट का ख़ाका रचता है और उनका उपन्यास ‘रिज़रेक्शन’ विश्वास, अस्तित्व, संबंध और न्याय के बड़े सवालों को कहीं अधिक पठनीय भाषा में सामने लाता है, लेकिन वह अभी तक मुख्यधारा के इस रुझान का हिस्सा नहीं बना है।

सोशल मीडिया का यह क्रम झंडा गिराकर बाँस बचाने वाला पाठ है और एक तरह का bastardization भी। मैं अंततः वही दोहराता हूँ जिसे कभी एक डायरी नोट की तरह लिखा था : “यह लेखक दार्शनिक नहीं, सोशल मीडिया के टेम्पलेट हैं। इनकी पुस्तकों की फ़ोटो लिए, इनकी उक्तियों की बेसिर-पैर पतंग उड़ाते हुए, अपनी मीडियोकर ऊब में मैरिनेटेड आप, अपनी रद्दी उदासी का पान चबाए, जगह-जगह थूकते और मज़े लूट रहे हैं। प्रकाशक धड़ाधड़ छाप रहे हैं और आप पहाड़ों में बैठे जिसे बाँच रहे हैं। उस दोस्तोयेवस्की को बख़्शिए, बंद करिए, भगवान से डरिए।”

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