हिंदी का आलोचक : पाँच कटाउज और एक कालजयी उपन्यास की तलाश
ऋषभ प्रतिपक्ष
23 अक्तूबर 2026
अगर आप हिंदी में उपन्यास लिखने की गुस्ताख़ी कर चुके हैं (या करने की सोच रहे हैं), तो मेरी पहली सलाह होगी कि पहले अपना कवच (या इसके बदले कोई और उपयुक्त चीज़) मज़बूत कर लीजिए।
डिजिटल युग के आगमन के बाद हिंदी साहित्य में जिस तेज़ी से लेखकों की संख्या बढ़ी है, लगभग उसी अनुपात में आलोचकों की संख्या भी बढ़ी है। हिसाब लगाएँ तो हर लेखक पर पाँच आलोचक! हिंदी में उपन्यास लिखने वाले कम हैं और उनसे ‘कालजयी’ रचना की उम्मीद लगाने वाले आलोचक ज़्यादा। यह अलग बात है कि इस आलोचना का जीवन-चक्र औसतन तीन घंटे का होता है। यह आलोचना इंस्टाग्राम पर नहीं हो सकती, किसी पत्रिका या अख़बार में नहीं हो सकती, ट्विटर पर नहीं हो सकती... यह सिर्फ़ फ़ेसबुक पर हो सकती है। लिहाज़ा, हिंदी साहित्य की आलोचना के भविष्य की पूरी ज़िम्मेदारी मार्क ज़करबर्ग के कंधों पर है। जिस दिन उनका मूड ख़राब हुआ, उन्होंने एल्गोरिदम से रीच सीमित कर दी... आलोचना का खेल ख़त्म!
एक बात और जान लीजिए। किसी ने इन ‘सज्जनों’ को बाक़ायदा आलोचक नियुक्त नहीं किया है। ये आलोचना के प्रैक्टिशनर हैं। इनके पास पाँच कटाउज हैं : मौलिकता, पूँजीवाद, ग़ुंडा पब्लिशर, सस्ते लेखक और सोशल मीडिया द्वारा हिंदी की बर्बादी। हर आलोचना में यही पाँच इंजेक्शन लगाए जाते हैं और हिंदी साहित्य का मरीज़ भनभनाता हुआ उठ बैठता है। कम-से-कम इन्हें ऐसा लगता है। हालाँकि झोलाछाप डॉक्टर की भी एक लिमिट होती है!
हिंदी का औसत आलोचक जब किसी नए उपन्यास को हाथ में लेता है, तो उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक होती है... वैसी, जैसी किसी खोजी पत्रकार को बहुत बड़ा घोटाला पकड़ लेने पर होती है। वह चाहता है कि लेखक ऐसा उपन्यास लिखे, जो आज तक लिखा ही न गया हो! वह चाहता है कि नया उपन्यास एक ही साँस में प्रेमचंद को पीछे छोड़ दे, श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य को मात दे दे, निर्मल वर्मा की उदासी को पछाड़ दे, मनोहर श्याम जोशी की शैली को बौना कर दे और कृष्णा सोबती तथा अमृता प्रीतम के तेवर से भी आगे निकल जाए। इतना ही नहीं, उसी 300 पन्नों की किताब में मार्केज़ का ‘जादुई यथार्थवाद’, दोस्तोयेव्स्की का ‘मनोवैज्ञानिक द्वंद्व’ और कामू का ‘अजनबीपन’ भी घुसा दिया जाए। यानी उपन्यास नहीं, उसे साहित्य का एक ऑल-इन-वन पैकेज चाहिए!
लेकिन थोड़ी देर बाद एक अद्भुत सच सामने आता है। दरअस्ल, यह वह ‘महान् उपन्यास’ है, जिसे आलोचक ख़ुद लिखना चाहता था! बस फ़र्क़ इतना है कि उसने ख़ुद क़लम उठाने का कष्ट नहीं किया। वह चाहता है कि उसकी मनपसंद ऑल-इन-वन रेसिपी कोई और पकाकर उसके सामने परोस दे। यह साहित्य का वह ‘प्रॉफ़ेसी’-चक्र है, जो कभी पूरा नहीं हो सकता।
किसी समझदार व्यक्ति ने कहा था, “यदि आप चाहते हैं कि कोई काम एकदम परफ़ेक्ट हो, तो उसे ख़ुद कीजिए।” किसी लेखक के सिर पर बंदूक़ रखकर यह पूछना कि “तुमने वैसा क्यों नहीं लिखा, जैसा मैं सोच रहा था?” साहित्य के साथ नाइंसाफ़ी है।
कोई भी लेखक अपने अनुभवों, अपने संसाधनों, अपनी समझ और अपने वर्ल्ड-व्यू के हिसाब से ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। वक़्त के साथ उसका सर्वश्रेष्ठ बदलता है, सँवरता है। लेकिन आलोचक को यह सब ‘इमीडिएट’ चाहिए... अभी, इसी वक़्त, इसी पन्ने पर!
मान लीजिए, किसी लेखक ने चमत्कार कर ही दिया! उसने प्रेमचंद या निर्मल वर्मा जैसा ही कुछ रच दिया। तब क्या आलोचक उसकी पीठ थपथपाएगा? जी नहीं! आलोचक के पास तुरंत दूसरा अस्त्र तैयार रहता है। वह पुरानी आलोचनाओं की धूल झाड़कर फ़ाइल निकालेगा और साबित कर देगा : “अरे! प्रेमचंद भी कोई उपन्यासकार थे? निर्मल वर्मा का गद्य तो एकदम ख़राब था! कृष्णा सोबती तो यहाँ से उठाती थीं, अमृता प्रीतम वहाँ से चुराती थीं...” यानी आलोचक के लिए चित भी मेरी, पट भी मेरी! अगर आप परंपरा से अलग हैं, तो ‘कच्चे’ हैं; और अगर परंपरा से जुड़े हैं, तो ‘नक़लची’ हैं।
इस तरह हिंदी में साहित्य की सबसे सुरक्षित विधा बन चुकी है—आलोचना। क्यों? क्योंकि इसमें आपका कोई दाँव नहीं लगा होता। कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं, कुछ खोने का डर नहीं, कुछ रचने का जोखिम नहीं। यहाँ उद्देश्य साहित्य का विकास करना नहीं, बल्कि लिखने वाले की खाल खींचना होता है। और यह लताड़ सिर्फ़ समकालीन लेखकों तक सीमित नहीं है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर आज तक के तमाम लेखक इस लपेटे में हैं। जब रचना में कोई खोट नहीं मिलती, तो आलोचक साहित्य छोड़कर व्यक्तिगत जीवन पर उतर आता है : “वह तो अपनी पत्नी को पीटता था!” या “वह तो बहुत क्रूर था!”
साहित्य की आलोचना अब साहित्यकार के चरित्र-हनन में बदल चुकी है।
असली आलोचना का काम यह देखना है कि साहित्य के तत्त्व कैसे बदल रहे हैं। समाज हर दशक में बदलता है। 1920 का भारत, 1970 का भारत और 2026 का भारत एक जैसा नहीं है। यूरोप, अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका, रूस, चीन और नॉर्डिक देशों में साहित्यकारों ने अपने-अपने दौर की बेचैनियों, नई पीढ़ी के मुहावरों और नए अभिव्यक्ति-रूपों को अपनाया है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी का पहला साहित्यकार माने जाने के बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका है। अगर आज का कोई 20-22 साल का युवा अपनी भाषा, अपनी उलझनों और अपने शब्दों में लिख रहा है, तो आप उससे यह नहीं कह सकते कि “तुम भारतेंदु या आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह क्यों नहीं लिख रहे?” और जब आप आलोचक से पूछेंगे कि “अच्छा भाई, आप किसे असली साहित्यकार मानते हैं?” तो संभव है, उसके पास कोई स्पष्ट परिभाषा न हो। जवाब बस इतना होगा : “जो मैं कहूँ, वही साहित्य है।”
इस पूरे खेल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि हिंदी का आलोचक अक्सर ख़ुद को सर्वज्ञ समझता है, जबकि सच्चाई इसके उलट भी हो सकती है। साहित्य की दुनिया से बाहर रहने वाले कई लोग जो आईटी में हैं, बैंक में हैं या पत्रकारिता में; इन आलोचकों से कहीं ज़्यादा पढ़ाकू हो सकते हैं। उनके सिर पर किसी साहित्यिक गुट का बोझ नहीं होता। वे ‘द पेरिस रिव्यू’ पढ़ते हैं, ‘द न्यू यॉर्कर’ के इंटरव्यू खँगालते हैं और अफ़्रीका, नॉर्वे, रूस तथा लैटिन अमेरिका का साहित्य चाव से पढ़ते हैं। उनकी दृष्टि आलोचक की क्रूरता से मुक्त हो सकती है। उनके पास साहित्य के प्रति एक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि होती है। वे जानते हैं कि साहित्य सिर्फ़ लेखक का नहीं, बल्कि पाठक, प्रकाशक और समाज... सबका साझा दायरा है। असली आलोचना का काम फूल को कुचलना नहीं, बल्कि उसे खिलने के लिए बेहतर हवा देना है।
अगर आप हर वक़्त सिर्फ़ आलोचना के ही मूड में रहते हैं, तो यह कोई ‘उच्च साहित्यिक चेतना’ नहीं है। यह बिल्कुल वैसा है, जैसे कोई इंसान दिन-रात कुढ़ता रहे : “दुनिया कितनी ख़राब हो गई है... हवा ज़हरीली है... पानी गंदा है... राजनीति भ्रष्ट है... खाना मिलावटी है... बच्चे बिगड़ गए हैं... कपड़े छोटे हो गए हैं...!”
आलोचकों से उम्मीद है कि वे विश्व साहित्य पढ़कर नए लेखकों को बताएँ कि दुनिया में क्या रचा जा रहा है और साहित्य को बेहतर बनाने की क्या संभावनाएँ हैं। लेकिन इसके लिए मेहनत करनी पड़ती है, पढ़ना पड़ता है और दुनिया के प्रति संवेदनशील भी रहना पड़ता है। इससे कहीं आसान है वह काम, जो वे अभी कर रहे हैं : फ़ेसबुक खोलिए, एक नया उपन्यास उठाइए और पाँच पुराने कटाउज में से कोई एक चिपका दीजिए।
कालजयी आलोचना तैयार!
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