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‘हासिल’ से आगे का इलाहाबाद

बीते 23 अगस्त को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र [NCZCC], प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में ‘हिन्दवी उत्सव’ 2026 का आयोजन किया गया। मैं इस बात का आग़ाज़ इस तरह नहीं करूँगा कि मैं झूँसी से निकला तो बारिश हो रही थी। बारिश से बचते-बचाते जब मैं पत्रिका चौराहे पर उतरा तो बारिश इतनी तेज़ हो चुकी थी कि मुझे कार्यक्रम-स्थल जाने के लिए उसके रुकने का इंतिज़ार करना पड़ा। जहाँ मैं खड़ा था, उसके ठीक सामने शराब की दुकान थी, जिसे हम आमतौर पर ठेका कहते हैं। तो मैं कैसे अपने आपको रोक सकता था! मैंने बीयर की एक बोतल ली और उसे लेकर तहख़ाने में घुस गया, जो एक पर्दे से ढका हुआ था। वहाँ चार लोग और बैठकर पी रहे थे। मैंने भी कुर्सी जमाई और पीना शुरू किया। जब मैं रुका तो बारिश बंद हो चुकी थी। मैंने आगे बढ़कर एक सिगरेट ली और रैपिडो बुक किया। रैपिडो वाला आया तो मेरी सिगरेट जल ही रही थी। मैंने उससे पूछा, “भाई, कोई दिक़्क़त तो नहीं है, सिगरेट पी रहा हूँ?” रैपिडो वाले ने कहा, “नहीं, कोई बात नहीं।” मैंने कहा, “ठीक है, फिर चलते हैं।”

मैं NCZCC के मुख्य गेट पर उतरा और ऑडिटोरियम की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा दिए। तब तक नशा धीरे-धीरे मेरी नसों में फैल चुका था और अब वह मेरे दिमाग़ पर हमला करने वाला था। मैंने सोचा था कि गेट के दूसरी तरफ़ किसी कुर्सी पर जाकर बैठूँगा, ताकि कोई मुझसे बात न करे। लेकिन मुझे कहाँ पता था कि जिस जगह मैं बैठने जा रहा हूँ, वहाँ कवि गौरव पांडेय बैठ जाएँगे और उनके बैठते ही मैं थोड़ा-सा नर्वस हो गया कि मुझे बोलना पड़ेगा। हालाँकि मैंने उनसे थोड़ी-बहुत बातचीत की और फिर शांत होकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद मैंने अपनी सीट भी बदल ली। मुझे नहीं पता कि मैं किस वजह से ऐसा कर रहा था। तिग्मांशु धूलिया की पूरी बातचीत मैंने सुनी और लगभग सभी सत्र सुने। नशे की हालत में मैं सभी चीज़ों को और स्थिरता के साथ सुन पा रहा था कि आख़िर चल क्या रहा है!

पिछले दिनों ‘हिन्दवी बेला’ पर प्रकाशित आदित्य मिश्र की रिपोर्ट पढ़ी, जो ‘हिन्दवी उत्सव’ पर ही आधारित थी। उसमें तिग्मांशु धूलिया के हवाले से लिखा गया कि, “दु:ख है कि इलाहाबाद अपना किरदार खो रहा है। अब न तो शहर की कोई स्थानीयता रह गई, न ही वहाँ बसने वाले लोगों की।” उन्होंने यह भी कहा, “अब के छात्रनेता नेता कम, ठेकेदार ज़्यादा हैं।” तिग्मांशु धूलिया का इलाहाबाद आकर दस दिनों के लिए रहना कब हुआ था? मुझे नहीं लगता कि इलाहाबाद छोड़ने के बाद वह कभी लगातार दस दिनों तक यहाँ रहे होंगे। हाँ, वह पिछले दो वर्षों से ‘बज़्म-ए-विरासत’ ज़रूर करवा रहे हैं, जिसके लिए तीन-चार दिनों के लिए इलाहाबाद में ठहरते हैं, लेकिन वहाँ भी उनका संपर्क कुछ ख़ास लोगों तक सीमित रह जाता है। तो इलाहाबाद को तिग्मांशु धूलिया कहाँ से देख पाएँगे? 

अगर वह इलाहाबाद में कुछ दिन रहें, उन गलियों में घूमें, विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन को देखें, हॉस्टलों के कमरों में जाएँ, डेलीगेसी के छात्रों से मिलें, लोकनाथ की गलियों में घूमें, संगम के किनारे नौका विहार करें और मुट्ठीगंज के पुराने इलाक़ों से पुराने शहर होते हुए करेली, सुलेम सराय और धूमनगंज से बमरौली तक जाएँ, वहाँ से हवाई जहाज़ से मुंबई उड़ जाएँ, तब उन्हें समझ में आएगा कि इलाहाबाद क्या है और उसका किरदार वाक़ई खो रहा है या नहीं। इलाहाबाद की जो छवि उनके मन में बनी है, वह बंबइया शैली से निर्मित है। अब बंबइया निगाहों से देखेंगे तो उन्हें इलाहाबाद अपना किरदार खोता हुआ ही मालूम होगा। जैसे हर किसी को लगता है कि पीछे छूट गई चीज़ अब वर्तमान में खो गई है—वैसे ही तिग्मांशु धूलिया को भी लगता है कि उनके समय के इलाहाबाद में जो स्थानीयता थी—वह अब खो गई है।

2003 में जब उन्होंने ‘हासिल’ फ़िल्म बनाई, उस समय रणविजय का किरदार इलाहाबाद में कहाँ जीवित था, शायद तिग्मांशु धूलिया कभी नहीं बता पाएँगे। हाँ, मैं बता सकता हूँ कि 2013 में रणविजय का किरदार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कैसे दिखता था, यदि मासूम दर्शकों को यह जानना हो। 2013 में जब मैं यहाँ अपना स्नातक करने आया, तब इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति अपनी चरम अवस्था में थी। 2012 के चुनाव के बारे में मैंने सुना था, लेकिन 2013 में यहाँ आने के बाद उसका असर मैंने प्रत्यक्ष देखा। उस समय छात्र राजनीति ख़ासकर अभिषेक सिंह माइकल और अभिषेक सिंह सोनू के गुटों में बँटी हुई थी। दोनों के बीच वर्चस्व को लेकर रंजिश थी और उसका परिणाम एक भयंकर गैंगवार के रूप में सामने आया। यह मुंबई वाली गैंगवार नहीं थी, बल्कि हॉस्टलों की गैंगवार थी, जहाँ छात्र एक-दूसरे पर बम फेंकते थे और लल्ला चुंगी धुएँ से भर जाती थी। मैंने उस दौर का वह धुआँ अपनी आँखों से देखा है।

लेकिन छात्र राजनीति को केवल इस हिंसा से समझना उसके पूरे चरित्र को नकार देना होगा। 2012 के चुनाव में साधारण पृष्ठभूमि से आए अनेक छात्रों ने चुनाव लड़ा। आइसा की ओर से उपाध्यक्ष पद का चुनाव शालू यादव ने जीता। रामायण राम ने अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। विवेकानंद पाठक, जो एनएसयूआई से जुड़े थे और आज कांग्रेस में उत्तर प्रदेश के महासचिव हैं, छात्र राजनीति के उन चेहरों में थे, जिनकी बात सुनने के लिए छात्र जुटते थे। सुनील मौर्य और विकास स्वरूप अक्सर कुछ छात्रों को समझाते हुए मिल जाया करते थे। इन लोगों की राजनीति धन और बाहुबल की राजनीति से अलग थी। उनकी अपनी वैचारिकी थी और विश्वविद्यालय में बदलाव का स्पष्ट आग्रह था।

शालू यादव का कार्यकाल विशेष रूप से उल्लेखनीय था। जिस छात्रसंघ भवन में लड़कियों का बैठना तक सहज नहीं था, वहाँ उन्होंने लड़कियों के साथ बातचीत और राजनीतिक विमर्श का माहौल बनाया। उनका नारा था, “छात्र-हितों का हनन हुआ तो ख़ून बहेगा सड़कों पर...” इसका अर्थ किसी पर गोली चलाना नहीं था, बल्कि छात्र-हितों के लिए अपने ख़ून का एक-एक क़तरा देने की प्रतिबद्धता थी। इसके उलट 2012 के चुनाव में अभिषेक सिंह माइकल जेल में रहते हुए महामंत्री चुने गए और अपने पूरे कार्यकाल में छात्रों के बीच नहीं आ पाए। इसलिए छात्र राजनीति की पूरी तस्वीर को केवल माइकल, सोनू या ‘हासिल’ के रणविजय के ज़रिये देखना ग़लत होगा।

मुझे अपने विश्वविद्यालय के दिनों के कई और चेहरे याद आते हैं। अजीत यादव विधायक जब छात्र नेता के रूप में उभर रहे थे, तब उनसे मिलकर नेताओं को लेकर मेरी बनी बहुत-सी धारणाएँ टूट गई थीं। उनमें वह अकड़ नहीं थी, जिसकी आमतौर पर छात्र नेताओं से अपेक्षा की जाती है। 2013 में मेरे हॉस्टल से महामंत्री पद के लिए नवीन सिंह मिंटू चुनाव लड़ रहे थे। वह भी छात्रों से बहुत सहजता और अपनत्व से मिलते थे। चुनाव हारने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। मेरे हॉस्टल की कैंब्रिज कोर्ट विंग से महामंत्री चुने गए संदीप यादव झब्बू भी ऐसे ही थे। चुनाव जीतने के बाद भी वह वैसे ही मिले, जैसे पहले मिलते थे। इन लोगों में मुझे रणविजय दिखाई नहीं दिया।

रोहित मिश्र उस दौर में एबीवीपी की ओर से छात्रसंघ अध्यक्ष चुने जाने वाले पहले पदाधिकारी थे। छात्रसंघ भवन की प्राचीर से उनका भाषण आज भी याद आता है। उनके भाषण का असर इतना था कि उन्होंने बेहद कम अंतर से चुनाव जीत लिया। अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा नियुक्त कुलपति के ख़िलाफ़ आंदोलन किया। उनका निलंबन हुआ, पीएचडी रोकी गई, लेकिन वह छात्रों के मुद्दों पर विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ खड़े रहे। दूसरी ओर ऋचा सिंह ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और समाजवादी छात्रसभा के समर्थन के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं। उन्होंने भी विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ कई आंदोलन किए। एक अवसर पर उन्होंने गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने से रोकने के लिए धरना दिया था और उन्हें विश्वविद्यालय में आने से रोक दिया था और कई मौक़ों पर वह छात्र-हितों को लेकर विश्वविद्यालय-प्रशासन से सवाल पूछती रहीं।

मुझे मनीष सैनी भी याद आते हैं, जो बहुत सामान्य परिवार से आए थे और सांस्कृतिक सचिव का चुनाव जीते थे। अखिलेश यादव और अन्य पदाधिकारियों के साथ छात्र-हितों से जुड़े आंदोलनों में शामिल रहने वाले ऐसे कई छात्र थे, जिनके पीछे न धन था, न बाहुबल। नीलम सरोज, शिवम मौर्य, शैलेश पासवान, विकास कोल, सुनील निषाद, भीम सिंह चंदेल जैसे और अनेक दूसरे छात्र इसी सामान्य पृष्ठभूमि से आए थे। यही वह दुनिया थी, जिसे मैंने विश्वविद्यालय में देखा था। इसलिए ‘हासिल’ के रणविजय को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र-राजनीति का प्रतिनिधि मान लेना मेरे लिए संभव नहीं है।

हाँ, यह भी सच है कि छात्र-राजनीति में हिंसा और दबंगई के प्रसंग थे। अच्युतानंद शुक्ल की हत्या जैसी घटनाएँ हुईं। 2018 में मेरे हॉस्टल हॉलैंड हॉल में छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए उदय प्रताप यादव के कमरे को जला दिया गया। उस हिंसा को मैं किसी भी तरह जायज़ नहीं ठहराता, क्योंकि मैं उसका प्रत्यक्षदर्शी हूँ। लेकिन इस एक हिंसक घटना को आधार बनाकर पूरी छात्र राजनीति को हिंसा के बराबर रख देना भी उतना ही ग़लत है। ‘हासिल’ का रणविजय किसी जूनियर के साथ विश्वासघात कर उसकी प्रेमिका को पाने के लिए उसे हत्या के आरोप में फँसाने तक जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में मुझे ऐसा कोई किरदार नहीं मिला। इसलिए रणविजय—तिग्मांशु धूलिया की रचना है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वास्तविकता नहीं।

अगर कोई ‘हासिल’ फ़िल्म देखकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय, उसकी छात्र राजनीति और इलाहाबाद शहर की व्याख्या करता है तो वह दरअस्ल तिग्मांशु धूलिया के पूर्वाग्रह का शिकार हैं। ख़ुद तिग्मांशु धूलिया ने कहा है कि फ़िल्म की कहानी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर आधारित नहीं थी, बल्कि उनके एक दोस्त की कहानी से निकली थी और उसके लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय को चुना। फिर उस काल्पनिक किरदार को इलाहाबाद की छात्र राजनीति का प्रतिनिधि मानना कितना उचित है?

मुझे उस समय के प्रोफ़ेसर भी याद आते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रोफ़ेसर एस.के. उपाध्याय छात्रों के बीच रहते थे। छात्र कितना भी उत्तेजित हो जाएँ, उन्होंने छात्रों के प्रति आक्रामक व्यवहार नहीं किया और छात्रों ने भी गरिमा बनाए रखी। किसी भीड़ में उन्हें धक्का तक नहीं दिया जाता था। इसके बरअक्स आज जब छात्र हॉस्टल की सुविधाओं, लाइब्रेरी की किताबों, पानी और दूसरी बुनियादी ज़रूरतों के लिए धरना देते हैं, तो पहले उन्हें नोटिस दिया जाता है और फिर उनके ख़िलाफ़ बल प्रयोग की स्थिति पैदा होती है। हद तब हो जाती है, जब विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपने ही छात्रों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने लगते हैं। सवाल यह है कि अगर छात्रसंघ और छात्र राजनीति जीवित होती तो छात्रों और शिक्षकों के बीच की यह दूरी क्या इतनी बढ़ती?

लोग अक्सर कहते हैं कि छात्रनेताओं ने विश्वविद्यालय की पढ़ाई बाधित की और अराजकता पैदा की। लेकिन 2018 के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की जिस तरह की निरंकुशता मैंने देखी है, वैसी अराजकता को मैं छात्रनेताओं के दौर से नहीं जोड़ सकता। तिग्मांशु धूलिया ने जब कहा कि अब छात्रनेता नेता कम और ठेकेदार ज़्यादा हैं, तो मुझे लगता है कि उन्होंने 2012 से 2018 के बीच की छात्र राजनीति को देखा ही नहीं है। उन्होंने अपने मन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जो छवि बना रखी है, उसी चश्मे से आज और कल को देख रहे हैं।

जब मैं विश्वविद्यालय आया था, तब छात्रनेता कुलपति डॉ. अनिल सिंह के ख़िलाफ़ धरना दे रहे थे। उनकी माँग थी कि कुलपति छात्र हितों को प्राथमिकता दें, अन्यथा इस्तीफ़ा दें। छात्रों ने लगभग एक महीने तक उन्हें विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया। बाद में उनके आवास पर धरना दिया गया और अंततः उन्हें कुलपति पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। इसके बाद रतनलाल हांगलू कुलपति बने। उन्होंने 2017 में तीन सौ प्रतिशत फ़ीस वृद्धि कर दी। फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ छात्रों ने आंदोलन किया। फ़ीस में भारी बढ़ोतरी के विरोध में छात्र कई दिनों तक डीन विद्यार्थी कल्याण के कार्यालय के सामने आमरण अनशन पर बैठे और छात्रसंघ के पदाधिकारी भी उनके साथ खड़े रहे। अंततः फ़ीस वृद्धि का फ़ैसला वापस लेना पड़ा। यह वह छात्र राजनीति थी, जिसे ठेकेदारी कह देना उसके वास्तविक चरित्र को मिटा देना है।

2018 में छात्रसंघ बंद कर दिया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियाँ बढ़ती गईं। छात्रसंघ भवन का गेट बंद कर दिया गया। छात्रों के छोटे-छोटे समूहों के इकट्ठा होने पर भी सवाल उठने लगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक के लिए अनुमति अनिवार्य हो गई। निराला सभागार और छात्रसंघ भवन जैसे मंच आम छात्रों के लिए पहले जैसे खुले नहीं रहे। विश्वविद्यालय का यह सन्नाटा सिर्फ़ एक परिसर का सन्नाटा नहीं है; यह अभिव्यक्ति, बहस और असहमति के सिकुड़ने का सन्नाटा है। इसलिए 2018 से पहले के छात्रसंघ का मख़ौल उड़ाना मुझे स्वीकार नहीं है, उससे मुझे आपत्ति है। आज छात्रसंघ न होने के कारण अगर विश्वविद्यालय में दस छात्र भी किसी कार्यक्रम के लिए बैठना चाहें तो उन्हें अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। 2018 से पहले छात्र विश्वविद्यालय के लॉन में बड़ी संख्या में बैठकर कार्यक्रम करते थे। विश्वविद्यालय सिर्फ़ क्लासरूम नहीं था; वह बहस, असहमति और राजनीतिक विचार-विमर्श का भी केंद्र था। छात्रसंघ की उस परंपरा को समझे बिना उस पर टिप्पणी करना ग़लत है।

यहाँ मैं यह भी नहीं कह रहा कि 2018 से पहले विश्वविद्यालय में सब कुछ आदर्श था। हिंसा हुई, गुटबाज़ी हुई और कई गंभीर घटनाएँ भी हुईं। लेकिन उन घटनाओं को छात्र राजनीति की पूरी परंपरा का पर्याय बना देना इतिहास के साथ अन्याय होगा। 2018 के चुनाव में हुई हिंसा के आधार पर छात्रसंघ को ख़त्म कर देना भी एक अलग राजनीतिक निर्णय था। छात्रसंघ का बंद होना, सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए राजनीति में प्रवेश की एक महत्त्वपूर्ण सीढ़ी का हटा देना था।

2018 का एक और प्रसंग मुझे याद आता है। सलोरी में एक प्रतियोगी छात्र के साथ उसके मकान मालिक ने अभद्रता की। उसने अपनी बात छात्रसंघ के पदाधिकारियों तक पहुँचाई। उस समय अध्यक्ष उदय प्रकाश यादव, उपाध्यक्ष अखिलेश यादव और दूसरे पदाधिकारियों ने उसके पक्ष में मोर्चा खोल दिया। धीरे-धीरे आंदोलन सलोरी, बघाड़ा, एलनगंज और गोविंदपुर तक फैल गया। छात्र कई दिनों तक सड़कों पर बैठे रहे। अंततः नगर निगम और ज़िला प्रशासन को छात्रों की बात सुननी पड़ी और किराएदारों के हित में रूम रेंट एक्ट बनाने की बात सामने आई—कमरे का आकार, किराया, सुविधाएँ और मकान ख़ाली कराने से पहले नोटिस जैसी चीज़ें तय करने का प्रस्ताव था। अगर छात्रसंघ और छात्र राजनीति जीवित रहती तो शायद इस लड़ाई का परिणाम कुछ और होता। आज प्रतियोगी छात्र जिस तरह मकान मालिकों की मनमानी झेलते हैं, उससे बचने के लिए कोई मज़बूत सामूहिक मंच उनके पास नहीं है।

2018 की मेरी यादें इसलिए महज़ अतीत के मोह में लहालोट होने की यादें नहीं हैं। वह एक ऐसे विश्वविद्यालय की याद है, जिसकी कल्पना वैज्ञानिक सोच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नए विमर्शों के केंद्र के रूप में की गई थी। 2013 से 2018 के बीच मैंने विश्वविद्यालय में जिस तरह की बहसें देखीं, वे आज कई जगहों पर संभव तक नहीं लगतीं। विश्वविद्यालय का काम सिर्फ़ पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं था, वह छात्रों को सवाल पूछना और असहमति दर्ज करना भी सिखाता था।

यहाँ तिग्मांशु धूलिया की बात—“दु:ख है कि इलाहाबाद अपना किरदार खो रहा है...”, पर मैं उनसे यह कहना चाहूँगा है कि उन्हें इलाहाबाद का किरदार समझना है तो कुछ दिनों के लिए मुंबई छोड़कर इलाहाबाद में रहना चाहिए। विश्वविद्यालय की गलियों में जाना चाहिए, हॉस्टलों में बैठना चाहिए, छात्रों से मिलना चाहिए, संगम जाना चाहिए और उस शहर को उसकी पूरी जटिलता के साथ देखना चाहिए। तब शायद वह यह बेहतर समझ पाएँगे कि इलाहाबाद का किरदार रणविजय नहीं है। रणविजय एक फ़िल्मी किरदार है। इलाहाबाद का असली किरदार उन सामान्य छात्रों से बनता है, जिन्होंने इस विश्वविद्यालय में अपने हिस्से की लड़ाई लड़ी। वह खोया नहीं है, आपके सामने हैं—बस आप अपना काला चश्मा थोड़ी देर के लिए हटा लीजिए।

उस किरदार में विवेकानंद पाठक, अजीत यादव विधायक, रोहित मिश्र, ऋचा सिंह, आदिल हमजा, उदय प्रताप यादव, नीलम सरोज, शालू यादव, रामायण राम, अवनीश यादव, कुलदीप सिंह, रोशनी यादव, सुनील मौर्य, रघुनंदन यादव, राघवेंद्र यादव, अंकुश यादव, अंकुश द्विवेदी, भीम सिंह चंदेल, शिवम मौर्य, सुयश मौर्य, विकास स्वरूप, शक्ति रजवार, राहुल पटेल, रितेश विद्यार्थी, सुजीत सिंह, शैलेश पासवान, मनीष सैनी, कपिल यादव, लालता प्रसाद, विकास कोल, चंदन कुमार, अनुभव मिश्र, आदेश शर्मा, अखिलेश सिंह (नई पीढ़ी के कवि-लेखक), अखिलेश यादव, हरिकेश कुमार, दिनेश चौधरी, रत्नेश यादव, जेपी यादव, शिवानी मिताक्षरा और ऐसे न जाने कितने सामान्य छात्र शामिल हैं। इन सबको एक ही रंग में रंगकर ‘ठेकेदार’ कह देना आसान है, लेकिन यह उस विश्वविद्यालय की उस परंपरा का अपमान है, जिसने सामान्य छात्रों को बोलने, लड़ने और आगे बढ़ने का अवसर दिया।

इसलिए ‘हासिल’ के रणविजय को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का पर्याय मत बनाइए। इलाहाबाद का किरदार रणविजय से नहीं आता। वह उन छात्रों से आता है, जिन्होंने फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ आंदोलन किया, कुलपति के ख़िलाफ़ खड़े हुए, मकान मालिकों की मनमानी के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे, छात्रसंघ भवन को बहस का मंच बनाए रखा, इस विश्वविद्यालय को 6 बजे के बाद बंद होने से बचाए रखा। आम छात्रों के लिए इस विश्वविद्यालय की फ़ीस को आठ सौ रुपये से बढ़कर दस हज़ार रुपये किए जाने से बचाए रखा। छात्रावासों की फ़ीस को छह हज़ार रुपये से पैंतीस हज़ार रुपये किए जाने से बचाए रखा। छात्रों की अभिव्यक्ति के लिए जो मंच थे, जो मुफ़्त में उपलब्ध थे, उनकी उपलब्धता को बचाए रखा और किसी भी तरह से छात्रों की गरिमा के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ किए जाने से बचाए रखा। और यह बताए रखा विश्वविद्यालय के प्रशासन को, विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को कि छात्रों के होने से ही आप हैं। अगर छात्र नहीं होंगे तो आपके यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है। परिसर को निरंकुशता से बचाए रखा, तानाशाही से बचाए रखा और विश्वविद्यालय को सिर्फ़ डिग्री बाँटने वाली संस्था बनने से रोका।

वे ठेकेदार नहीं थे। वे सही मायनों में छात्र नेता थे। और शायद यही बात सबसे ज़्यादा याद रखे जाने की ज़रूरत है। इसको याद करना—लहालोट होना नहीं है।

उम्मीद है कि मेरी बात को उतनी गंभीरता से नहीं लेगा—जितनी गंभीरता से इसे लिखा गया है। हाँ, मुझे 2013–2018 तक के दौर को याद करके लहालोट होने को मन करता है।

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