घाम-पानी : घोस्ट ऑफ़ एवरेस्ट : मैलोरी और इरविन की अधूरी यात्रा!
हरि कार्की
07 अक्तूबर 2026
सबसे पहला सवाल जो आप मुझसे पूछेंगे और जिसका जवाब देने की मैं कोशिश भी करूँगा, वह है—“आख़िर एवरेस्ट पर चढ़ने का फ़ायदा क्या है?” और मेरा जवाब होगा—“कोई फ़ायदा नहीं।”
मुझे इससे किसी भी तरह के लाभ की ज़रा-सी भी उम्मीद नहीं है। हाँ, इससे यह ज़रूर हो सकता है कि हम ऊँचाई पर मानव शरीर के व्यवहार के बारे में थोड़ा-बहुत जान सकें और संभव है कि चिकित्सक हमारे इन ऑब्ज़र्वेशन का इस्तेमाल उड़ान संबंधी उद्देश्यों के लिए कर सकें। लेकिन इसके अलावा इससे कुछ हासिल नहीं होगा।
वहाँ से हम सोना या चाँदी वापस नहीं लाएँगे, न कोई रत्न, न कोयला और न लोहा। हमें वहाँ ज़मीन का एक फ़ुट हिस्सा भी ऐसा नहीं मिलेगा, जिस पर फ़सल उगाकर भोजन पैदा किया जा सके। हाँ, सच इसका कोई फ़ायदा नहीं है...
इस साहसिक अभियान से हमें जो मिलेगा, वह है—नितांत आनंद। और अंत में आनंद ही तो जीवन का उद्देश्य है।
हम केवल खाने और पैसा कमाने के लिए नहीं जीते। हम भोजन करते हैं और पैसा कमाते हैं ताकि जीवन का आनंद उठा सकें।
जीवन का अर्थ यही है और इसीलिए जीवन मिला है।
— जॉर्ज मैलोरी, 1923
कुछ जगहें हम हमेशा अपने भीतर लेकर चलते हैं। हम बेशक कुछ दिन वहाँ रहकर लौट आते हैं, लेकिन उन दिनों की स्मृति-यात्रा लगातार हमारे भीतर-साथ चलती रहती है। किसी चेहरे, महक, आवाज़ का खटका लगता है और वह स्मृति-यात्रा औचक ही अचेतन से चेतन में प्रवेश कर जाती है। अवेयरनेस का यह पल बहुत ही अनूठा होता है, जैसे तानपुरे के साथ रियाज़ करना सीख रहे किसी संगीत-विद्यार्थी का सुर-अनुनाद महसूस करना।
मैं गोमुख की यात्रा पर हूँ। जहाँ प्रकृति और लोक-स्मृति एक-दूसरे के क़रीब आते हैं। भौगोलिक रूप से, गोमुख गंगोत्री हिमनद का अग्रभाग [terminal snout] है। यहाँ से निकलने वाली धारा को भागीरथी कहा जाता है। भागीरथी आगे चलकर अलकनंदा से देवप्रयाग में मिलती है और उस संगम के बाद नदी का नाम गंगा हो जाता है। यह गोमुख-गंगा-भागीरथी को लेकर बताई जाने वाली सामान्य जानकारी है। भारतीय स्मृति में इसकी कहानी कुछ और है : इस कहानी में राजा भागीरथ हैं। कपिल मुनि का शाप है। मुक्ति के लिए आवश्यक और स्वर्ग में प्रवाहित होने वाली गंगा का पृथ्वी पर लाया जाना है।
भागीरथ ने इसके लिए कठोर तपस्या की और गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं। शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया, क्योंकि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि उनके सीधे पृथ्वी पर उतरने से पृथ्वी उसका भार सह नहीं पाती। भागीरथ आगे-आगे चले और गंगा उनके पीछे। इसीलिए गोमुख से निकलने पर इस धारा को नाम मिला—भागीरथी।
ख़ैर, यह तो हुई पहली यात्रा। इसी के साथ मैं एक पाठ-यात्रा पर भी हूँ। बीते दो हफ़्तों से यह यात्रा चल रही है। मेरे पास सौ साल पहले की गई एक यात्राओं के विवरण हैं। इन्हें आज पढ़ना क्या ही रोमांचक चीज़ है! कम जानकारी, ज़्यादा तैयारी, अधूरे नक़्शे के सहारे किए गए सफ़र की घबराहट और मज़े का अनुभव आपको ऐसे ब्योरों को पढ़ते हुए सहज ही हो सकता है। यात्राएँ करनी हैं तो ऐसे कठिन दिन की तैयारी ज़रूर रहनी चाहिए—जब हमें ख़ुद भी पता नहीं हो कि हम कहाँ जाने वाले हैं।
गोमुख जाने के लिए मेरी यात्रा दिल्ली की एक सुबह शुरू हुई। यह अक्टूबर का महीना है। रास्ते में शिउली के फूल भी देख पाया। सुबह छह बजे की बस, रात्रि बसों की तुलना में मुझे बेहतर लगती है और अगर आप हिमाल का रुख़ कर रहे हैं तो सुबह यात्रा करने की आदत पहले दिन से बन जाए तो बेहतर है। पहाड़ों में सूरज जीवन-आस की तरह होता है। यहाँ सुबह की रोशनी पहाड़ों को धीरे-धीरे खोलती है, जबकि शाम में वही पहाड़ परछाइयों में डराने भी लगते हैं। जहाँ उगता सूरज रास्ता देता है, डूबता सूरज लौटने की जल्दी का एहसास—ख़ासकर जब आप पहले से ही देरी के साथ हों।
आठ दिन—दिल्ली से गोमुख तक और फिर वापस। गूगल-मैप बढ़िया चीज़ है। बाज़ार चाहती है कि हर चीज़ आसान लगे। इसके नक़्शे में रास्ता बहुत सीधा दिखाई दे रहा है—दिल्ली, उत्तरकाशी, हर्षिल, गंगोत्री, गोमुख। नक़्शों की एक आदत होती है—भ्रम-रचना। इन्हें सिर्फ़ काग़ज़ या मोबाइल-स्क्रीन का टुकड़ा समझिए, मदद लीजिए और आगे चलिए। ऐसी यात्राएँ किलोमीटर देखकर नहीं की जाती। यक़ीन करिए ट्रैक करना कैसा होता है, यह ‘अनुभव’ ट्रैक में पहुँचे बिना महसूस नहीं किया जा सकता।
मेरे पास एक छोटा-सा बैग था, एक एक्शन कैमरा-किट और दो किताबें। दिल्ली पीछे निकल चुकी थी। मैं उत्तरकाशी रुका। मुझे रुकने का इंतिज़ार था। मैं अपनी पहली यात्रा से मुक्त होकर अपनी दूसरी यात्रा में लौटा। पाठ-यात्रा करते हुए मैं एवरेस्ट और उसके आस-पास की चुनौती भरी यात्रा पर वापस आया।
यह यात्रा समय में एक सदी पीछे की जा रही थी। साल है 1924... सुनने में यह कितना अविश्वसनीय लगता है कि मैं भीतर-भीतर एक ऐसे रास्ते पर जा रहा था, जहाँ मेरे हाथ में मौजूद किताब मुझे एक सदी पहले घट चुकी यात्रा में आज ले जा रही थी। एक साथ दो यात्राएँ। एक तरफ़ मेरे सामने गूगल-मैप की सहूलत थी और दूसरी ओर किताब में उनके पास अधूरे नक़्शे; मेरे पास मौसम की जानकारी थी, उनके पास अनुमान; मेरे पास मोबाइल था, उनके पास एक घड़ी और कम्पास; मेरे पास तमाम सुविधाएँ थी जिससे मैं शाम तक आराम करने के ठीक-ठाक बंदोबस्त तक पहुँच सकता था, उनके सामने कई बार यह भी निश्चित नहीं था कि अगली रात कहाँ होगी; मैं गोमुख जा रहा था। वे एवरेस्ट जा रहे थे।
जॉर्ज मैलोरी [George Mallory] और एंड्रयू इरविन [Andrew Irvine]। यह नाम मैंने पहले भी सुना था, लेकिन बीते कुछ दिनों में मैलोरी और इरविन के बारे में मैंने काफ़ी-कुछ पढ़ा-जाना था। इस बीच कई सवाल मुझे बेचैन कर रहे थे। जैसे : क्या जॉर्ज मैलोरी और एंड्रयू इरविन सबसे पहले एवरेस्ट की चोटी तक पहुँचे थे? जून 1924 के उस रोज़ आख़िर हुआ क्या था? अगर इतिहास में एवरेस्ट की पहली सफल चढ़ाई उन्होंने की, तो क्या वे वहाँ से लौटते समय ग़ायब हुए? इरविन कहाँ हैं? क्या मैलोरी और इरविन के पास जो कैमरा था, उसमें असली राज़ छिपा है? अगर कैमरा कभी मिला भी तो उसकी फ़िल्म सुरक्षित होगी? क्या उसमें कोई ऐसी तस्वीर होगी जो एवरेस्ट के इतिहास को उलट दे... और क्या उन्हें आख़िरी बार देखने वाले नोएल ओडेल ने जो देखा वह सही था? यह सभी सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहे थे।
मैं जैसे-जैसे आगे पढ़ता गया मुझे कुछ और बातें भी आकर्षित करने लगीं। मैं सोचने लगा कि उस समय—जब वहाँ पहुँचने की कल्पना छोड़िए, बेस कैंप तक पहुँचने के रास्तों के बारे में जानकारियाँ सीमित थी, लोग-समय-संसाधन सब कुछ सीमित था—एवरेस्ट जाने की कल्पना भी कर पाना कितना रोमांचक रहा होगा! शायद आजकल के किसी भी बड़े अभियान—जिसमें मौसम की भविष्यवाणी, जीपीएस, सैटेलाइट फ़ोन, डिजिटल नक़्शे, लाइव-लोकेशन, ऊँचाई के आँकड़े हैं—में उस पहले अभियान के अनुभव जितनी शक्ति नहीं होगी। 1924 की उस यात्रा से होते हुए मुझे अपने वर्तमान सफ़र की सुविधाएँ अचानक बहुत बड़ी लगने लगीं। मैं रास्ता भूल भी जाऊँ तो मोबाइल निकाल सकता हूँ। वे रास्ता भूलते तो? मैं मौसम ख़राब होने पर यात्रा रोक सकता हूँ। लेकिन जब दुनिया का सबसे ऊँचा हिमाल सामने हो और आप वहाँ पहुँचे हों जहाँ अभी तक कोई न पहुँचा हो, तब क्या लौटना उतना आसान होता है? यात्राओं को लेकर कई कही जाने वाली एक और बात आज सिद्ध हो रही थी कि यात्रा का रोमांच सुविधा की अनुपस्थिति में ही पैदा होता है। उस अनिश्चितता में, जहाँ आपको एक पल या अगले क़दम पर होने वाले बदलाव का रत्ती भर अंदाज़ा न हो। ऐसे क्षणों से निकलकर ही जीवन के असली रंग दृश्य होते हैं।
मैंने किताब बंद की और बाहर आ गया। उत्तरकाशी—भागीरथी के किनारे बसा क़स्बा है, जहाँ से गंगोत्री की यात्रा शुरू होती है। मुझे आगे हर्षिल, गंगोत्री और फिर गोमुख की ओर जाना था। हिमालय की दहलीज़ पर आकर, मैं सगरमाथा के शिखर की दहलीज़ पर खड़े दो पर्वतारोहियों को लेकर मन ही मन खोया था। मैंने तय किया कि किताब ख़त्म करके ही आगे की यात्रा करूँगा।
मैं सोचते-सोचते भागीरथी के नज़दीक आ गया। मैं सड़क को देखता रहता और नदी के किनारे घूमती हुई सड़क और अगले पहाड़ के मोड़ के पीछे मुझे एक गाँव दिखा। एक राहगीर से मैंने पूछा—वहाँ पहुँचने में कितना समय लगेगा। उसने बताया बीस मिनट। मैंने हेडफ़ोन लगा लिए और चलने लगा। गाने शफ़्ल हुए और एक पसंदीदा गीत चलने लगा। यह गीत जगहों, वहाँ के लोगों और उसके समय को लेकर था—याद रह जाने वाली जगहों के बारे में, उन जगहों के बारे में जो बदल गईं, जो कहीं खो गईं और उन जगहों पर लौटकर हम वापस उन जगहों तक नहीं पहुँचे। वहाँ उस समय के ‘कुछ लोग’ अब भी हैं, जबकि हमारे लिए वे ‘कुछ लोग’ केवल हमारी स्मृति में बचे हैं। हम उनसे उस तरह अब कभी नहीं मिल पाएँगे।
मैं अपनी ज़िंदगी की उन तमाम जगहों के बारे में सोचने लगा—जहाँ मैं कभी रहा था, गया था या जिन्हें कभी अपना समझा था। उनमें से कुछ जगहों पर मैं आज भी लौट सकता था। कुछ जगहों पर लौटना संभव नहीं था। कुछ जगहें वैसी ही थीं, लेकिन वे वैसी नहीं लगती थीं, जैसी मेरी स्मृति में थीं।
तेज़ आवाज़ हुई। अचानक मुझे लगा कि मैं मेरे ख़याल में चल रहा हूँ। क्या मैं किताब के भीतर का किरदार हो गया था। मुझे कुछ समझ नहीं आया। मैंने रुककर उस व्यक्ति को खोजा जिससे मैंने यह रास्ता पूछा था—मैं काफ़ी दूर तक पीछे लौट आया। वहाँ कोई नहीं था। मैंने ग़ौर किया कि वह गाँव जहाँ आने के लिए मैं आगे बढ़ रहा था—वह भी वहाँ नहीं था। मैं समझ गया, यह वही जगह है जो इतने समय से भीतर मेरे साथ चल रही थी। यह क्षण अवेयरनेस का क्षण था। इस यात्रा का असली अर्थ यही था। एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि मैलोरी और इरविन के रास्ते उस सौ साल पुराने समय में वापस होकर आना। 1924 का एक रास्ता 2026 के इस रास्ते के समानांतर खुल चुका था। यहाँ मैलोरी और इरविन सिर्फ़ किताब के पात्र नहीं रहने वाले थे। वे मेरी इस यात्रा में मेरे साथ चलने वाले थे।
मेरे पीछे नदी की ओर से घूमती हुई सड़क से ऊपर की तरफ़ एक बस आती हुई दिखी। यह आजकल चलने वाली बस जैसी सामान्य बस नहीं थी। क्या 1924 में इस इलाक़े में बस चलती रही होंगी? मैंने सोचते हुए याद किया कि काठगोदाम से नैनीताल तक मोटर सड़क का निर्माण 1911 के आस-पास शुरू हुआ था और यहाँ 1915 में यातायात सेवा शुरू हुई थी। Hill Motors Transport Company हल्द्वानी/काठगोदाम से अल्मोड़ा और रानीखेत तक लॉरियाँ चलाती थी। शायद यह बस उसी समय की हों। मैंने इस ख़याल को जाने दिया। बस बिल्कुल मेरे आगे रुकी, जैसे मेरे लिए ही आई हो। आगे क्या करना था मैं जानता था। मैं बस में बैठ गया।
बस के भीतर चढ़ते ही मुझे बाहर की ठंड से कुछ राहत मिली। बस में काफ़ी यात्री थे। बाहर भागीरथी बह रही थी, लेकिन बस के भीतर यात्रियों की बातचीत में उसकी आवाज़ अब कानों तक नहीं पहुँच पा रही थी। मैंने कोशिश की, लेकिन किसी को पहचान नहीं पाया। मैं पीछे की तरफ़ बढ़ने लगा। दरवाज़ा बंद हो चुका था। किसी भी यात्री को मेरे वहाँ होने की बात से फ़र्क़ नहीं पड़ा। मैं सबसे पीछे की लंबी सीट पर जाकर दाएँ हिस्से वाली खिड़की के पास बैठ गया।
कुछ देर तक बाहर वही पहाड़ थे, वही सड़क, वही पीछे जाते पुल, छोटे-छोटे गाँव। फिर धीरे-धीरे नज़ारा बदलने लगा। सबसे पहले सड़क ग़ायब हुई, अब सामने धूल और पत्थर थे। मैंने जेब से मोबाइल निकाला। मेरे मोबाइल का नेटवर्क पूरी तरह जा चुका था। स्क्रीन पर तारीख़ थी—8 जून 1924... मैं यह तारीख़ पहचानता था। मैंने किताब की उठाई और मेरे ज़ेहन से जॉर्ज मैलोरी और एंड्रयू इरविन के जुड़े वही सवाल गुज़रने लगे। यह वही दिन था, जब एवरेस्ट को फ़तेह करने कोई पहली बार इतनी ऊँचाई पर था और आगे बढ़ रहा था। मैं यह सब सोच ही रहा था कि मेरे बग़ल वाली सीट से आवाज़ आई—“तुमको इतने सवाल क्यों परेशान कर रहे हैं?”
मैंने चौंककर देखा। मेरे आगे वाली सीट पर एक आदमी बैठा था। उसके कपड़ों पर धूल थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और हल्का-सा मुस्कुराया।
“जॉर्ज मैलोरी?”
उसने हाँ में सिर हिलाया।
मैलोरी को सामने देखकर में हड़बड़ाया, “आपको यहाँ नहीं होना चाहिए। आज 8 जून है...”
मैं आगे कुछ कहता उससे पहले मैलोरी की सामने वाली सीट पर बैठे, चेहरे पर उम्र से ज़्यादा उत्सुकता लिए हुए एंड्रयू इरविन ने कहा—“शांत! यह समय-यात्रा है। हम वहीं हैं, जहाँ हमें होना है। किसी भी बात के लिए परेशान मत हो।” अपनी बात ख़त्म करके वह किसी उपकरण को ठीक करने लगा।
मैंने यह तो सोचा था कि किताब पढ़ते-पढ़ते मैं उनके समय तक ज़रूर पहुँचूँगा। यह नहीं सोचा था कि वे दोनों ख़ुद मेरे समय में आकर मेरे पास बैठ जाएँगे।
मैलोरी ने मेरी ओर देखा और कहा “अब पूछो।”
मैं कुछ क्षण चुप रहा और वही सवाल किया जिसका जवाब दुनिया को आज तक नहीं मिला, “क्या आप लोग एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचे थे?”
मैलोरी ने मेरी हाथ में रखी किताब की ओर देखा। “यह सवाल एक सदी से हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा।”
वह दोनों हँसने लगे।
“हम ऊपर गए थे। कितना ऊपर गए थे, यह हम जानते थे। कितने ऊपर तक पहुँच सकते थे, यह भी जानते थे। लेकिन इतिहास को हमेशा आख़िरी कुछ फ़ीट ही ज़रूरी लगते हैं। पहला होने के लिए उन आख़िरी क़दमों के चिह्न चाहिए सबको।”
मैलोरी चुप हुए तो इरविन ने कहा, “और पहाड़ को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इतिहास क्या जानना चाहता है।”
मैंने पूछा, “तो आप दोनों वहाँ सबसे पहले पहुँचे?”
इस बार दोनों चुप रहे। बस एक मोड़ से गुज़र रही थी।
मैलोरी ने कहा, “हम वहाँ पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन क्या हम सचमुच चोटी तक पहुँचे, यह हमसे बेहतर शायद वह सगरमाथा जानता है।”
मैंने पूछा, “लेकिन अगर आप पहुँचे थे, तो फिर दुनिया को पता क्यों नहीं चला?”
मैलोरी ने मेरी ओर देखा।
“चोटी तक पहुँचने और दुनिया को यह बताने के बीच कभी-कभी बहुत लंबी दूरी होती है। हम उस दूरी को पार नहीं कर पाए।”
“8 जून 1924 को आख़िर हुआ क्या था?”
मैलोरी ने जेब से एक छोटी-सी घड़ी निकाली और उसे देखते हुए कहा, “सुबह हम ऊपर बढ़े। मौसम साफ़ था। हमें लगा कि हमारे पास वहाँ पहुँचने का सबसे सुंदर अवसर आज है। इरविन और मेरे पास पर्याप्त अनुभव था, हमने सोचा था कि इस बार शायद...”
वह रुक गए।
“शायद?”
“शायद एवरेस्ट हमें जाने देगा।”
इरविन ने बात पूरी की, “पहाड़ को जीतने की भाषा मुझे हमेशा अजीब लगी। हम उसे जीतने नहीं गए थे।”
मैंने पूछा, “और नोएल ओडेल?”
मैलोरी के चेहरे पर गंभीरता आ गई।
“नोएल ने हमें आख़िरी बार देखा था।”
“उसने कहा था कि उसने दो आकृतियाँ देखी थीं।”
“हाँ।”
“एक चट्टानी उभार के पास।”
“हाँ।”
“क्या वह आप दोनों थे?”
मैलोरी ठहरकर बोले, “आप चाहते हैं कि मैं कह दूँ—हाँ।”
“और सच?”
“सच हमेशा उस आख़िरी दिखाई देने वाली आकृति से बड़ा होता है।”
“आपके पास कैमरा था?”
इरविन ने उपकरण को दूसरी ओर रखा और मेरी तरफ़ सीधे देखा।
“हाँ।”
“वही कैमरा?”
“आपको उसके बारे में भी पता है?”
“बहुत कुछ पढ़ा है आपने।”
“तो यह भी पढ़ा होगा कि अगर वह कैमरा मिल जाए…”
वह ज़ोर से हँसने लगा।
“तो लोग उसमें अपना उत्तर ढूँढ़ेंगे।”
मैंने कहा, “अगर फ़िल्म सुरक्षित मिल जाए तो?”
मैलोरी ने मेरी तरफ़ देखा।
“तब शायद वह बता सके कि हम कहाँ तक पहुँचे थे। लेकिन क्या वह यह बता सकेगी कि उसके बाद क्या हुआ?”
मैं चुप रहा। बस अब एक सँकरी, पत्थरीली राह पर चल रही थी। मुझे लगा जैसे हम गंगोत्री से नहीं, तिब्बत की ओर जा रहे हों।
“तो कैमरे में एवरेस्ट का रहस्य है?”
मैलोरी ने कहा, “नहीं। कैमरे में सिर्फ़ एक तस्वीर हो सकती है। रहस्य हमेशा तस्वीर के बाहर होता है।”
मैंने अपना सबसे बेचैन करने वाला सवाल पूछा, “इरविन कहाँ हैं?”
मेरे सामने बैठे इरविन ने अपनी ओर इशारा किया।
“यहीं तो हूँ आपके सामने।”
मैं हँस दिया।
“मेरा मतलब है... असल में। आज। सौ साल बाद।”
इरविन ने उपकरण फिर से उपकरण उठा लिया, “यही तो मुश्किल है। आप लोग हमें ढूँढ़ते रहे। बर्फ़ में, चट्टानों में, कैमरे में, तस्वीरों में। लेकिन शायद आपको यह समझना चाहिए कि कुछ लोग किसी एक जगह नहीं मिलते।”
“फिर आपका मृत शरीर?”
“हो सकता है पहाड़ ने अपने पास रखा हो।”
“और आपकी कहानी?”
“वह तो आप सबके पास है।”
मैंने मैलोरी की ओर देखा और कुछ देर रुककर एक और सवाल पूछा, “एक बात और है। मैंने आपकी पत्नी रूथ की एक तस्वीर के बारे में भी पढ़ा है। कहा जाता है कि आपने उनकी एक तस्वीर अपने साथ रखी थी और आपने उनसे वादा किया था कि अगर आप एवरेस्ट की चोटी तक पहुँचें तो उस तस्वीर को वहाँ छोड़ आएँगे। क्या वह तस्वीर आपके साथ थी?”
मैलोरी ने मेरी ओर देखा। इस बार उनके चेहरे पर वह मुस्कान नहीं थी जो अब तक हर कठिन सवाल के बाद आ जाती थी। वह बोले, “अगर मैं आपको इसका जवाब दे दूँ, तो क्या एवरेस्ट का वह आख़िरी रहस्य बचा रहेगा?”
मैंने कहा, “शायद नहीं।”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
मुझे बस के भीतर अचानक बहुत ठंड महसूस होने लगी।
मैंने फिर पूछा, “आपका मृत शरीर, आप दोनों के ग़ायब होने के 75 साल बाद—जब 1 मई 1999 को North Face 8156 मीटर की ऊँचाई पर मिला, तब आपके सामान में वह तस्वीर नहीं मिली। क्या इसका मतलब यह माना जाए कि आपने उसे वहीं चोटी पर छोड़ दिया था?”
मैलोरी बोले, “कुछ चीज़ें प्रमाण के लिए नहीं रखी जातीं।”
“लेकिन अगर वह तस्वीर सचमुच चोटी पर छोड़ी गई है, तब...?”
उन्होंने मेरी बात बीच में रोक दी, “तो शायद वह दुनिया की सबसे छोटी चीज़ होगी, जो दुनिया के सबसे ऊँचे स्थान पर पहुँची और फिर किसी को नहीं मिली।”
इरविन ने उनकी ओर देखा। दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
मैंने सोचा : इतिहास शायद इस सवाल का कोई निश्चित जवाब कभी न दे पाए। लेकिन इस सवाल में पहली बार मुझे एवरेस्ट एक हिमाल नहीं, प्रेम की जगह जैसा दिखाई दिया।
“अपनी अंतिम यात्रा के आस-पास आपने कभी यह सोचा कि आपकी कहानी सौ सालों के बाद भी लोगों द्वारा पढ़ी जाएगी?”
उन्होंने सिर हिलाया, “नहीं।”
“अगर मालूम होता तो?”
“शायद मैं और सावधान रहता।”
इरविन ने तुरत कहा, “या शायद नहीं भी!”
दोनों हँस पड़े।
इस बार मुझे भी हँसी आ गई।
मैलोरी और इरविन : यात्रा-साहित्य में पढ़े गए ये दो नाम ऐसे थे—जो मान रहे थे कि वह डरे भी, उत्साहित भी हुए, उन्होंने ग़लती भी की और उम्मीद भी। लेकिन इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया। उन्हें दो रहस्यमय आकृतियों में, एवरेस्ट का प्रेत बना दिया। हिमाल पर जाने वाला हर आदमी पहले एक मनुष्य होता है, इतिहास बाद में।
मैंने पूछा, “आपको डर नहीं लगा?”
मैलोरी ने इस बार जवाब देने में देर की।
“डर तो था।”
“फिर गए क्यों?”
“क्योंकि डर और इच्छा कई बार एक ही दिशा में खड़े होते हैं।”
बस झटके से रुकी।
मैंने बाहर देखा।
सामने कोई बस-स्टॉप नहीं था। आगे का रास्ता साफ़ नहीं दिख रहा था।
मैलोरी उठे, “ठीक है दोस्त, हमारा पड़ाव आ गया।”
“कहाँ?”
“जहाँ से हमारी यात्रा शुरू होती है।”
इरविन उतरने लगे, मैंने जल्दी से उनसे पूछा, “क्या मैं आपके साथ चल सकता हूँ?”
“आपकी यात्रा दूसरी है।”
“लेकिन मैं जानना चाहता हूँ कि आगे क्या हुआ।”
मैलोरी ने कहा, “यहीं आकर आप सब भूल कर रहे हैं।”
“मैं समझा नहीं?”
“आप लोग हमेशा, ‘आगे क्या हुआ... आगे क्या हुआ...’ जानना चाहते हैं। कभी-कभी यात्रा को समझने के लिए हर एक जवाब जानना ज़रूरी नहीं होता है। उस दिन हमें भी नहीं मालूम था कि आगे क्या होने वाला है।”
“अपने सवालों के जवाब किताब में मत ढूँढ़ते रहिए।”
“तो कहाँ ढूँढ़ूँ?”
“रास्ते में।”
बस का दरवाज़ा बंद हुआ। मैलोरी और इरविन जा चुके थे। बस वापस चल पड़ी। अंदर लोग बैठे रहे जैसे सदियों से यहीं बैठे हों।
कुछ देर बाद मैं वहीं पहुँच गया, जहाँ से मुझे बस मिली थी। मैंने मोबाइल निकाला। नेटवर्क काम कर रहा था, स्क्रीन पर तारीख़ बदल चुकी थी—7 अक्टूबर 2026
भागीरथी अब भी मेरे साथ बह रही थी।
मैंने अपनी किताब खोली।
पन्ने पर वही तारीख़ थी—8 जून 1924
•••
अन्य घाम-पानी यहाँ पढ़िए : घाम-पानी
संबंधित विषय
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट