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जेन ज़ी को ग़लत मत समझियो

काफ़ी समय से कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया आंदोलन की चर्चा है। इस आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। कई लोग इसका श्रेय जेन ज़ी को दे रहे हैं, क्योंकि इस आंदोलन में इस पीढ़ी की भागीदारी मुखर रूप से दिखाई दी। बहुत-से लोगों ने इस पीढ़ी को लेकर कहा कि उन्हें देखकर गर्व महसूस हुआ और इस आंदोलन ने जेन ज़ी के बारे में उनकी पुरानी धारणाएँ बदल दीं। वहीं कुछ लोग इस पीढ़ी की आलोचना भी कर रहे हैं।

दरअस्ल, इस पूरी बहस ने पॉप कल्चर से उत्पन्न एक और विचार को वैधता दी है : किसी भी पीढ़ी को एक समान सामाजिक श्रेणी के रूप में देखा जा सकता है। पीछे मुड़कर देखने पर यह कहा जा सकता है कि यह विचार किसी विशेष दौर में एक पीढ़ी के साझा ऐतिहासिक अनुभवों के लिए वैध हो सकता है। लेकिन जब कोई पीढ़ी अभी बन ही रही हो, तब उसे कुछ तयशुदा गुणों वाले सामान्यीकृत नज़रिये से देखना कई समस्याएँ पैदा करता है।

यहाँ एक बात यह भी है कि पीढ़ियों को ऐसे वर्गीकरण में देखने का विचार पश्चिम से आया है और यह विचार भी कम समस्या पैदा नहीं करता कि पश्चिम में प्रचलित पीढ़ियों के वर्गीकरण को ज्यों-का-त्यों भारत पर लागू कर दिया जाए। पश्चिम के जेन ज़ी और भारत के जेन ज़ी एक जैसे नहीं हैं। भारत अनेक सामाजिक, आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक विषमताओं वाला समाज है। यहाँ एक ही उम्र के दो व्यक्तियों के जीवनानुभव इतने अलग हो सकते हैं कि उन्हें एक ही पीढ़ी का प्रतिनिधि कहना भी कई बार भ्रामक हो जाता है।

यही कारण है कि ऐसा वर्गीकरण किसी भी पीढ़ी को सीमित कर देता है। उनको जो ढाँचागत समस्याएँ विरासत में मिली हैं, वे छिप सकती हैं और चर्चा से बाहर हो जाती हैं। इसके साथ ही उस पीढ़ी के बारे में रूढ़ धारणाएँ बनने लगती हैं, उसकी समस्याओं का अराजनीतिकीकरण होने लगता है और पीढ़ियों के बीच अनावश्यक टकराव पैदा किया जाता है।

किसी भी प्रकार की सामान्यीकृत अवधारणा व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को जाने बिना नहीं बनाई जा सकती। उदाहरण के तौर पर, मुझसे लगभग छह-सात वर्ष छोटे मेरे गाँव के लड़के-लड़कियों ने अभी हाल में ही फ़ेसबुक पर अकाउंट बनाना सीखा है और उसी के माध्यम से लोगों से बातचीत करते हैं। उनमें से केवल कुछ गिने-चुने लड़के-लड़कियाँ पिछले एक-दो वर्षों में इंस्टाग्राम पर भी आए हैं। उनका इंस्टाग्राम अनुभव भी शहरी परिवेश में रहने वाले उनके हमउम्र युवाओं से बिल्कुल अलग है। उनके द्वारा देखा जाने वाला कंटेंट भी भिन्न है। बल्कि, उनका जीवन और व्यवहार अपने ही गाँव के उनसे उम्र में बड़े लोगों से कहीं अधिक मिलता-जुलता है, जबकि उनकी उम्र केवल बीस-बाईस वर्ष है। वे Rizz, Ick या Vibe जैसे शब्दों का उपयोग नहीं करते। तो क्या हम उन्हें भी उसी वर्ग में रख सकते हैं, जिसमें वे लोग आते हैं जो लगातार मीम साझा करते हैं, नए-नए इंटरनेट शब्दों में संवाद करते हैं और प्रेम-संबंधों के नए नियमों पर विश्वास करते हैं? उनमें से कई की तो शादी भी हो चुकी है। ऐसे में सवाल यह है कि मीडिया आख़िर किस जेन ज़ी की बात कर रहा है? क्या वह शहरी, ख़ासकर मेट्रो महानगरों में रहने वाली प्रिविलेज्ड कोहोर्ट—माने विशेषाधिकार-संपन्न जेन ज़ी की— बात कर रहा है? जिसके पास इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की भरपूर उपलब्धता है।

इसलिए हमें किसी भी पीढ़ी के बारे में सामान्यीकृत धारणा बनाने से बचना चाहिए।


यह वर्गीकरण केवल भ्रामक ही नहीं, बल्कि ख़तरनाक भी हो सकता है, क्योंकि नीतियाँ भी इन्हीं धारणाओं के आधार पर बनती हैं/जाएँगी। उदाहरण के लिए, यदि यह मान लिया जाए कि नई पीढ़ी आलसी है या काम करना पसंद नहीं करती, तो कंपनियाँ नई उम्र के कर्मचारियों की भर्ती करने से संकोच कर सकती हैं। यक़ीन मानिए कई जगह यह प्रवृत्ति दिखाई भी देने लगी है।

एक और बात, जो इस आंदोलन के दौरान मीडिया में बार-बार कही गई, वह यह थी कि “जेन ज़ी गालियाँ देती है और उसकी भाषा अश्लील है।” क्या इसका कोई ठोस प्रमाण है? नहीं। क्या यह केवल इसलिए कि इंटरनेट पर मीम्स अधिक अश्लील हो गए हैं? या इसलिए कि आंदोलन में कुछ लोगों ने अश्लील शब्दों का प्रयोग किया? ऐसे में यह तो निष्कर्ष नहीं हुआ, केवल अनुमान हुआ।

असल में आप गाँवों या शहरों में पुरानी पीढ़ियों की सरल-सहज ढंग से बातचीत करते सुनें, तो वहाँ भी गालियों का प्रयोग कम नहीं मिलेगा। लेकिन यहाँ यह कहना भी एक सामान्यीकृत दृष्टिकोण होगा। गालियाँ किसी क्षेत्र विशेष की लोक-संस्कृति, सामाजिक व्यवहार और भाषाई परंपराओं से जुड़ी होती हैं—इसलिए उन्हें उनके संदर्भ से काटकर देखना हमेशा ग़लत ही होगा।

ग़ौर करिए यह पूरा मामला मीडिया और सोशल मीडिया का खेल है। यह सही है कि नई पीढ़ी के कुछ लोगों को कम उम्र में गालियाँ आकर्षक लगती हैं, ठीक वैसे ही जैसे हर वर्जित चीज़ आकर्षक लगती है। ऐसा लगभग हर युवा के जीवन में होता आया है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अब सब कुछ इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर दिखाई देता है, और नई उम्र के लोग अपनी अभिव्यक्ति में पहले की तुलना में कम संकोच करते हैं।

हालाँकि हर पीढ़ी अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुभवों के साथ बड़ी होती है। एक पीढ़ी कुछ सामान्य अनुभवों को साझा कर सकती है और इसके कारण वह अपने साथियों जैसा व्यवहार भी दिखा सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी पीढ़ी का कोई एक सामूहिक चरित्र होता है। ये समानताएँ या साझा-व्यवहार हमेशा संदर्भ आधारित होती हैं।

मसलन, मिलेनियल पीढ़ी ‘शक्तिमान’, ‘चित्रहार’ और ‘शाका लाका बूम-बूम’ जैसे टीवी-शो देखते हुए बड़ी हुई। लेकिन रोचक बात यह है कि जेन ज़ी के अनेक सदस्य भी अपने शुरुआती वर्षों में इन्हीं कार्यक्रमों से परिचित हुए। इसका एक कारण यह था कि इन कार्यक्रमों का कई चैनलों पर लगातार पुनः प्रसारण होता रहा। वहीं, 2004 के बाद DD Direct Plus और अन्य डीटीएच सेवाओं के विस्तार ने सीमित चैनलों वाले टेलीविज़न को निम्न और निम्न-मध्यम आय वर्ग के घरों तक पहुँचा दिया।

इसलिए यह मान लेना कि जेन ज़ी के कुछ निश्चित गुण हैं—जैसे कि वह केवल सोशल मीडिया से ख़बरें लेती है, आलसी है, मुँहफट है या पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील है—ग़लत है। यहाँ इन बातों को ऐसे कहना अधिक उचित होगा कि समाज में अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है (यदि वास्तव में बढ़ रही है), या लोग नई तकनीकों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। इस तरह की भाषा में कही गई बात यह स्पष्ट करती है—न कि आरोपित करती है—कि ये सब किसी एक पीढ़ी की स्थायी विशेषता नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रवृत्तियों हैं जो बदलते समय को बताता चल रहा है। ऐसी समझ के आधार पर बनने वाली नीतियाँ भी अधिक समावेशी हो सकती हैं।


हंगेरियन समाजशास्त्री कार्ल मैनहेम का भी मानना था कि एक निश्चित समय में जन्मे लोग किसी ऐतिहासिक घटना से प्रभावित होकर कुछ साझा अनुभवों से गुज़र सकते हैं। लेकिन उन्होंने भी उन्हें किसी स्थायी चरित्र वाली इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक कोहोर्ट (साथी समूह) के रूप में देखा। अर्थात् किसी कोहोर्ट में कुछ समान गुण हो सकते है, क्योंकि उसके सदस्यों के अनेक अनुभव साझा होते हैं; लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उस पूरी पीढ़ी का व्यक्तित्व या स्वभाव एक जैसा है।

इसलिए हमें इस प्रकार के सामान्यीकरण से बचना चाहिए, ख़ासकर लेखकों को। क्योंकि अगर हम किसी भी पीढ़ी के बारे में पहले से बनी हुई धारणाओं के आधार पर लिखेंगे, तो हम संदर्भ-विहीन, सतही और सूखा साहित्य परोसेंगे। ऐसा साहित्य बहुत जल्दी बासी पड़ जाएगा और समय के साथ अपना मूल्य शून्य हो जाएगा।

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