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फाँसी : दंड की कठोरता या सुधार का सोपान

हिंदी साहित्य जगत में हाल ही में प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘फाँसी’ काफ़ी चर्चा में रहा है। इस उपन्यास की एक ख़ास बात यह है कि इसे दो उपन्यासकारों—उद्भ्रांत और शैलेश पंडित ने संयुक्त रूप से लिखा है। ऐसा नहीं है कि हिंदी भाषी जन संयुक्त लेखन की परंपरा से बिल्कुल ही अनजान हैं। पाठ्य-पुस्तकों, व्यक्तित्व निर्माण की पुस्तकों, पाक शास्त्र इत्यादि विधाओं में इस प्रकार का लेखन हमारे सामने दीर्घ काल से आता रहा है।

फ़िल्म जगत में भी साझी कृतियों की परंपरा रहती आई है। बॉलीवुड की हिंदी फ़िल्मों के पटकथा लेखन में तो ऐसी परंपरा हम सब ने भी देखी है और जिसका सबसे मशहूर उदाहरण एक ज़माने की सलीम-जावेद की जोड़ी है। जाने-माने फ़िल्म प्रोड्यूसर बी.आर. चोपड़ा के बैनर बी. आर. फ़िल्म्स का तो अपना एक कहानी विभाग ही था, जिसमें आनी वाली फ़िल्मों की संकल्पना और पटकथा पर निरंतर काम चलता रहता था; लेकिन जहाँ तक विशुद्ध रूप से सृजनात्मक साहित्यिक कृतियों जैसे—कविता, कहानी और उपन्यास इत्यादि का प्रश्न है, इन विधाओं में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता। हाँ, अधिक से अधिक हम इस सिलसिले में राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी द्वारा संयुक्त रूप से रचित उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ का उल्लेख कर सकते हैं, मगर अपवाद स्वरुप ही। ऐसे में ‘फाँसी’ का चर्चित होना स्वाभाविक ही है।

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि विश्व साहित्य में संयुक्त रूप से रचित उपन्यासों के कई उदाहरण हैं। जैसे—नील गाईमन एवं टेरी प्राचेट द्वारा रचित ‘गुड ओमेंस’ और एमी कॉफ़मैन तथा मीगन स्पूनर का ‘दीज़ ब्रोकन स्टार्स’। ‘द ग्लास ओशन’ नामक उपन्यास तो तीन लेखकों ने मिलकर लिखा था—बेअतरिज़ विलियम्स,  लौरेन वील्लिंग एवं मीगन स्पूनर ने। अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जब कतिपय लेखक द्वय ने अपना नाम देने की बजाय, किसी छद्म नाम से उपन्यास की रचना की। उदाहरण के लिए क्रिस ब्रूक्मायर और मरिसा हैजमन की शादीशुदा जोड़ी अपने उपन्यास ‘एम्ब्रोस पैरी’ छद्म नाम से लिखती थी।

इस सिलसिले में रहस्य, रोमांच और जासूसी विधा के जाने-माने अमरीकी उपन्यासकार जेम्स पैटरसन की चर्चा भी ज़रूरी हो जाती है। वह पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं और अपने उपन्यासों की भारी माँग को पूरा करने के लिए उनके पास भी लेखकों की पूरी टीम है। वह एक बार में 70 से लेकर 90 अध्यायों का चार-चार पंक्तियों का सारांश अपनी टीम को भेजते हैं। टीम के सदस्य उन अध्यायों को पूरी तरह से विकसित कर उनके पास वापस भेजते हैं। इसके बाद पैटरसन उन अध्यायों को संस्कारित और संपादित कर अंतिम रूप देते हैं।

संयुक्त लेखन के क्रम में किस लेखक की क्या ज़िम्मेदारी होगी, इसका कोई निर्धारित नियम नहीं है। यह लेखकों का आपसी मामला है और उनके पारस्परिक तालमेल, परिस्थितियों और लेखन शिल्प से जुड़ी उनकी विशेषताओं पर निर्भर करता है। यह भी हो सकता है कि लेखक आपस में यह तय कर लें कि कौन-सा अध्याय कौन लिखेगा, ऐसा भी हो सकता है कि उपन्यास का ख़ाका मिल-जुल कर तैयार किया जाए और इसके बाद, लेखकगण बार-बारी से कहानी को आगे बढ़ाते जाएँ।

जहाँ तक मौजूदा उपन्यास ‘फाँसी’ का प्रश्न है, प्लाट की संकल्पना उद्भ्रांत की है और इन्होंने इसके प्रथम 7  अध्याय भी लिखे। लेकिन उनकी अनेक व्यस्तताओं के बीच सृजन का पहिया बीच में ही थम गया और लंबे अरसे तक वैसे ही थमा रहा। संयोगवश जब उद्भ्रांत, शैलेश पंडित के संपर्क में आए तो बातों ही बातों में इस उपन्यास को इसकी परिणति तक पहुँचाने की भी चर्चा हुई और शैलेश पंडित ने यह जवाबदेही अपने ऊपर ले ली। फिर उन्होंने 19 अध्याय और जोड़कर अपने दृष्टिकोण से 26 अध्यायों में उपन्यास को पूरा कर दिया। उद्भ्रांत उपन्यास के अंत से संतुष्ट नहीं थे और फाँसी से जुड़े प्रश्न को तार्किक बिंदु तक लाना चाहते थे। अतः उन्होंने उपन्यास के क्लाइमेक्स का पुनर्सृजन करते हुए इसमें 4 अध्याय और जोड़े और इस प्रकार 30 अध्यायों का यह उपन्यास पूरा हुआ।

उपन्यास का नायक कानपुर के एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुआ है। पिता अल्पवेतन भोगी सरकारी कर्मचारी हैं और माँ एक गृहिणी। नायक चार भाई-बहनों में से एक है। पिता को ऊपरी कमाई से घोर नफ़रत है, अतः इतने बड़े परिवार की गाड़ी जैसे-तैसे ही खिंच पा रही है। नायक अपने आस-पास के परिवारों की संपन्नता को देखता है जो ऊपरी कमाई से हासिल की गई होती है। इससे उसके मन में अपने पिता की ईमानदारी के प्रति विद्रोह की भावना घर कर लेती है। मन में दबी मौज-मस्ती की इच्छाओं को पूरा करने के चक्कर में वह ऐसी राह पर चल पड़ता है जो अपराध की दुनिया में जाकर ख़त्म होती है। धीरे-धीरे वह एक स्थानीय दादा बन जाता है और चाक़ू और देसी कट्टा उसके खिलौने बन जाते हैं। एक दिन जब उसकी छोटी बहन स्कूल से लौट रही होती है, तब एक बिगड़े रईसजादे द्वारा उसके साथ यौन दुर्व्यवहार होता है। यह घटना उसे क्रोध से भर देती है और वह देसी कट्टे से उस रईसजादे की हत्या करके मुंबई के लिए भाग खड़ा होता है।

इस नई राह पर जैसे उसका भाग्य एक नई करवट लेता है और उसे एक के बाद एक ऐसे भले लोग मिलते जाते हैं जो उसे एक अच्छा और परोपकारी इंसान बनने में सहायता करते हैं। वह पिछली ज़िंदगी से अपना नाता तोड़ते हुए, एक नया नाम अपना कर मुंबई में एक नई ज़िंदगी शुरू करता है। उसके जीवन में एक भली स्त्री का प्रवेश होता है और विवाह के बाद दोनों मिलकर रेडीमेड वस्त्रों के निर्माण और बिक्री का व्यवसाय शुरू करते हैं। व्यवसाय का उदेश्य मुनाफ़ा कमाने के साथ-साथ आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों की महिलाओं को सहारा देना और उनका आर्थिक सशक्तीकरण भी है। व्यापार तेज़ी से चल निकलता है और अनेक ज़रूरतमंद महिलाओं का सहारा बनता है।

लेकिन दुर्भाग्य इस कथा के नायक को एक बार फिर घेर लेता है। कानपुर में उसने जिस रईसजादे की हत्या की है उसका पिता उसके ख़ून का प्यासा है और उसने मुंबई के ही एक दादा को उसके नाम की सुपारी दे रखी है। इसी क्रम में एक दिन इस दादा के गुंडे उसके घर पर धावा बोलते हैं और उसकी पत्नी की हत्या हो जाती है। यह नृशंस  घटना उसे बदले की आग में झुलसा देती है और वह उस दादा के अड्डे पर जाकर् मौत का तांडव रचाते हुए, वहाँ मौजूद सारे गुंडों का सफाया कर देता है। उसका बदला तो पूरा हो जाता है लेकिन उस पर एक साथ कई हत्याएँ करने का मुक़दमा चलता है, और उसे फाँसी की सज़ा हो जाती है, जो सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर भी बहाल ही रहती है।

अब उसका अंत निकट है। लेकिन किस्मत उसे पुनः एक बार मौक़ा देती है। जेल प्रशासन की महानिरीक्षक को उसकी पूरी कहानी का पता चलता है और वे उन परिस्थितियों से भी अवगत होती हैं, जिनके कारण समाज सेवा और नारी सशक्तीकरण के प्रति संपूर्ण रूप से समर्पित इस व्यक्ति से यह अपराध हो जाता है। उसकी पिछली पृष्ठभूमि का आकलन करने के बाद उनकी समझ में यह आ गया कि यह व्यक्ति जेल से छूटने के बाद अपराध की दुनिया की ओर जाने की बजाय दुबारा परोपकार और समाजसेवा का ही रास्ता अपनाएगा। उनकी कोशिश रंग लाती है और उसे राष्ट्रपति से क्षमादान मिल जाता है।

उद्भ्रांत फाँसी की सज़ा के बिल्कुल ख़िलाफ़ रहे हैं। इस संबंध में अपने विचारों को उन्होंने उपन्यास के पहले ही अध्याय में कथानक की मुख्य पात्र—संतोष भाटिया के माध्यम से व्यक्त किया है, जो जेल प्रशासन की महानिरीक्षक हैं। संतोष भाटिया प्रगतिशील विचारों वाली पुलिस अधिकारी हैं और उनका मानना है कि कोई भी व्यक्ति जन्मजात रूप से अपराधी नहीं होता। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ उसे  अपराध का रास्ता चुनने को मजबूर करती हैं। हर अपराधी के भीतर एक अच्छा इंसान छुपा होता है और यदि जेलों में सुधारात्मक रवैया अपनाया जाए, तो उस अपराधी के अंदर छुपे इंसान को जगाकर उसे एक अच्छा और समाजोपयोगी नागरिक बनाया जा सकता है। ‘फाँसी’ को लेकर संतोष भाटिया का विचार है कि यह सजा अमानवीय है। जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो हमें किसी का जीवन लेने का अधिकार कैसे मिलता है! बेहतर तो यही होगा कि मौत की सजा पाए अपराधी को भी सुधरने और अपने अपराध का प्रायश्चित करने का अवसर देकर उसे उसका शेष जीवन दुबारा सौंप दिया जाए, ताकि वह एक अच्छा नागरिक बनकर शराफत की ज़िंदगी बिता सके।

उद्भ्रांत एक लेखक के रूप में अपने सामाजिक दायित्व और सरोकारों के प्रति हमेशा ही सजग रहे हैं। उनके द्वारा रचित काव्य एवं कथा संग्रहों के साथ-साथ ‘नक्सल’ नामक उपन्यास में भी हम उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता से रूबरू होते हैं। इस उपन्यास के सृजन के पीछे उनका यह मानना है कि अपराधी को दंड तो मिलना चाहिए, लेकिन इसके पीछे का न्यायिक सिद्धांत प्रतिशोध पर आधारित न होकर सुधार पर आधारित होना चाहिए। इसी भावना से प्रेरित होकर उद्भ्रांत ने  इस उपन्यास को एक बिरवे के रूप में सृजित किया, जिसे खाद-पानी देकर एक वृक्ष के रूप में विकसित करने का श्रेय शैलेश पंडित को जाता है।

दो अलग-अलग लेखकों द्वारा सृजित होने के बावजूद कथानक की निरंतरता और प्रवाह कहीं भी बाधित नहीं होते। इतना अवश्य है कि चूँकि उपन्यास के प्राक्कथन में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इसके कौन से हिस्से को किसने सृजित किया है, अतः एक सतर्क पाठक दोनों लेखकों की शैलियों में अंतर को आसानी से पहचान लेता है। उद्भ्रांत की शैली में जहाँ सागर का गाम्भीर्य है, वहीं शैलेश पंडित की शैली किसी अल्हड़ पहाड़ी नदी की भांति कुलांचे भरती हुई चलती है। ये दोनों शैलियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।

इस उपन्यास को पढ़ते समय रूसी उपन्यासकार फ़्योदोर दोस्तोयवस्की के उपन्यास ‘अपराध और सज़ा’ का स्मरण हो आता है, जो ‘फाँसी’ के कथानक से कुछ हद तक समानता रखता है। लेकिन हिंदी साहित्य में ऐसा कोई महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा गया, प्रतीत नहीं होता है जिसमें अपराध के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलुओं की विवेचना की गई हो। गोपालराम गहमरी ने ‘बेक़सूर की फाँसी’ नाम से एक उपन्यास अवश्य लिखा था, लेकिन यह विशुद्ध रूप से जासूसी विधा का उपन्यास था। उद्भ्रांत और शैलेश पंडित एक अनछुए रहते आए विषय पर एक रोचक उपन्यास लिखने के लिए बधाई के पात्र हैं।

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