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एक लाख अस्सी हज़ार चार सौ बावन मिनट का इंतज़ार

जानते हो तीन हज़ार घंटे कितनी देर में बीतते हैं?

नहीं जानते। चार महीने, ग्यारह दिन में। दिन-रात, सुबह-शाम सब जोड़ दें तो। चार महीने, ग्यारह दिन।

मैं कोई देवदास की पार्वती नहीं हूँ, जिसने पल में यह हिसाब लगा लिया हो कि जानते हो देव! एक लाख अस्सी हज़ार चार सौ बावन मिनट कितने घंटे के बराबर होते हैं? नहीं जानते?

आदमी हिज़्र का हिसाब तब लगाता है जब विसाल की उम्मीद हो।

घर से अपनी दूरी का अंदाज़ा घर लौटते लोग लगाते होंगे, घर छोड़कर जाने वाले किलोमीटर प्रति घंटा का हिसाब नहीं रखते। वे बस परिचय की पहुँच से दूर हो जाना चाहते हैं। हम घर से नहीं भागे, ख़ुद से भागते रहे, अपनी सोच से भागते रहे, अपनी सोच के डर से भागते रहे। हम ख़ुद से जान बचाकर भागे हुए शरणार्थियों में शुमार हैं।

इस साल का चौमासा बीता है ख़ुद से भागने में।

आदमी जीवन का बहिष्कार करता है तो मरना चाहता है और पलायन करता है तो अनगिनत फ़िल्में देखता है, गीत गुनगुनाता है, साहित्य में डूबते-उतरते हुए सोता-जागता है। सबकुछ करता है सिवाय एक भी मिनट ख़ाली बैठने के। वह अपने ख़ाली एक लाख अस्सी हज़ार चार सौ बावन लम्हों में भी सोचने का रिस्क नहीं ले सकता।

शरीर को काम पर रखने के लिए दिमाग़ को झुनझुना देना पड़ता है। थोड़ी देर सिनेमा से खेलो, थोड़ी देर नुसरत की क़व्वाली सुनो। कल पश्चिमी दर्शन से खेलना, परसों रूस के उदास साहित्य में कोई गूढ़ सच ढूँढ़ने का खेल खेला जाएगा। रोज़ खेलना। खेलने से दिमाग़ स्वस्थ ही नहीं रहता, बँटा भी रहता है। जब रोहित शर्मा सत्तानवे रन बनाकर क्रीज़ पर हो तो आदमी अपनी एक्जिस्टेन्शियल क्राइसिस का नहीं सोच पाता। दिमाग़ बँट जाता है।

मैंने साल के तीन हज़ार घंटे दिमाग़ बाँटने में ख़र्च किए। जानते हो तीन हज़ार घंटे कितने होते हैं?

नहीं जानते।

चार महीने ग्यारह दिन के बराबर। मैं भी नहीं जानती थी। फ़ोन से गूगल द्वारा यह काम करने को कहा। कन्वर्ट वन लाख एटी थाउजेंड फ़ोर हंड्रेड फ़िफ़्टी टू मिनट्स इनटू आवर्स।

इतिहास कालक्रम की तीन श्रेणियाँ हैं—प्रागैतिहासिक काल, आद्य ऐतिहासिक काल और ऐतिहासिक काल।

सबसे पहले प्रागैतिहासिक काल आया जब का लिखा कुछ मौजूद नहीं, फिर आद्य ऐतिहासिक काल, जब का लिखा मौजूद तो है लेकिन पढ़ा नहीं जा सका है और तीसरा और सबसे नवीन काल ऐतिहासिक काल जिस समय का लिखा मौजूद भी है और पढ़ा-समझा भी जा चुका है।

मेरे साल के भी तीन हिस्से हैं।‌ ये चार महीने ग्यारह दिन, मेरे साल का ऐतिहासिक काल हैं‌ क्योंकि इनका लेखा-जोखा स्मार्टफ़ोन और स्मार्ट ऐप्स ने दे दिया है और बता दिया है कि तुम्हारे ख़याल से भागने के लिए मैंने क्या-क्या जतन किए हैं। बाक़ी के चार महीने मेरे साल का आद्य ऐतिहासिक काल हैं, जिनका अंदाज़ा मैं थोड़ी कोशिश करके लगा पाती हूँ। बाक़ी के चार महीने साल का प्रागैतिहासिक काल हैं। जब सब कांशियस तौर पर अनजाने में तुमसे और तुम्हारे ख़याल से दूर होने की भरपूर कोशिश की होगी मैंने लेकिन उसका लेखा नहीं है कहीं।

कोई नहीं जानता इसी बीच तुमसे भागते हुए मैंने सबसे अधिक सोचा भी तो तुम्हें ही है। घर से भागने वाले अपने मन के बिल्कुल बीचोंबीच घर को ही बाँधे फिरते हैं।

मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर तुमसे दूर भाग जाना चाहती हूँ। कैसी दुविधा है! भागूँ तो हाथ फिसलकर छूटता है, और रुक जाऊँ तो लगता है कि गले के आस-पास दो हाथों का गिरोह हैं, जिसकी परिधि धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती है। एक हाथ से तुम्हें थामे रखती हूँ और दूसरे हाथ से रोकती हूँ, हाथों का वह गिरोह जो गले की गिरफ़्तारी पर न जाने क्यों आमादा है। मैं एक ही वक़्त पर भागती हूँ और बुत हुई जाती हूँ।

जानते हो तीन हज़ार घंटे कितनी देर में बीतते हैं?

नहीं जानते।

दरअस्ल तीन हज़ार घंटे बीतते नहीं हैं, काटने पड़ते हैं। जैसे बेघरों को बरसात काटनी पड़ती है, जैसे प्रेमचंद की कहानी में किरदार को काटनी पड़ती है—पूस की सर्द रात और नाश्तेनका के बिना ड्रीमर को पूरी ज़िंदगी, काटनी ही पड़ती है।

न आने वाले के इंतज़ार में कटने वाला वक़्त कटता नहीं है, काटना पड़ता है। हँसते हुए, रोते हुए, फ़िल्में देखते हुए, किताबें पढ़ते हुए, पढ़कर फिर रोते हुए, रोकर फ़िल्म देखते हुए, फ़िल्म देखते-देखते बीच में फ़ोन भी देखते हुए, फ़ोन देखते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए, तुम्हें देखते हुए, तुम्हें देखने से बचते हुए, तुम्हें न देखते हुए, तुम्हारे इंतज़ार में एक दरवाज़े को अनगिनत बार खुलते-बंद होते देखते हुए, ख़्वाब देखते हुए, ख़्वाब न देखते हुए, ग़ुलाम अली को सुनते हुए, बेग़म अख़्तर को सुनते हुए, एक अजीब से पॉडकास्ट पर हँसते हुए, दाहिनी करवट लेते हुए, बायीं ओर घूमते हुए, एक-दूसरे आदमी से मिलते हुए, किसी भीड़ में चलते हुए, चाय पीते हुए, आईने में ख़ुद को दस के पूर्णांक में से पाँच से कम कोई प्राप्तांक देते हुए।

समय बीतता नहीं है, काटना पड़ता है। तुम नहीं जान सकोगे। क्योंकि तुम नहीं जानते कि तीन हज़ार घंटे कितने होते हैं? एक लाख अस्सी हज़ार चार सौ बावन मिनट कितने होते हैं? यूँ तो आठ हज़ार सात सौ साठ घंटे होते हैं—एक बरस में और मैंने इससे कम याद भी न किया होगा तुम्हें। लेकिन मसला यह है कि सरकारी आँकड़ा केवल तीन हज़ार का ही उपलब्ध है। ये तीन हज़ार घंटे किसी दुर्घटना में मेरे हाथों से हत तीन हज़ार शवों की तरह मेरे सामने हैं। मैंने इन तीन हज़ार घंटों की हत्या कर दी है और ये केवल सरकारी आँकड़ा है। बाक़ी का श्रम जोड़ने लगूँ तो साल हाथ से निकल जाएगा। मेरी आठ हज़ार सात सौ साठ घंटों की हत्या का भेद खुल जाएगा। ये सारे शव खुली आँखों से मुझे देखेंगे तो कहाँ भाग सकूँगी। कैसे सुन सकूँगी हत समय का विधवा-विलाप और उस पर एक आँकड़ा यह भी है कि ऐसी हत्याएँ करने का यह प्रथम वर्ष नहीं था‌।


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श्वेता त्रिपाठी को और पढ़िए : पूर्वांचल के बंकहों की कथा | पत्रकारिता के दुर्दिनों में, यह फ़िल्म देखी जानी चाहिए

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