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हड़ताल, सड़क और साझा पीड़ा के दृश्य

धूप, हवा, पानी, ज़िंदगी इत्यादि—यह सब कुछ है तो है, इनकी एहमियत क्या है, इसका एहसास किसे है? हाँ, ये अपनी क़ीमत तब मालूम होने देंगी, जब ये नहीं होंगी। यह प्रकृति है। प्रकृति के नियम-क़ानून को इंसान समझने की कोशिश करता रहता है, जिसके लिए वह विज्ञान का सहारा लेकर लगातार रिसर्च भी करता रहता है। लेकिन इसके असली नियम-क़ानून तो प्रकृति का मालिक ही जानता है, जो अदृश्य है।

प्राकृतिक संसाधनों और उनके उपयोग पर पूरी तरह से हमारा वश नहीं चल सकता। इंसान की किसी क्रिया पर प्रकृति क्या प्रतिक्रिया देगी, यह भी स्पष्ट रूप से कोई नहीं जानता। लेकिन सामाजिक संसाधनों और उनका उपयोग तो हमारे ही हाथ में है—तो इस स्थिति में इसे बेहतर और न्यायपूर्ण ढंग से चलना चाहिए। मुश्किल सवाल यह है कि ऐसा क्यों नहीं होता?

रोज़मर्रा के कामों में सामाजिक संसाधन या सुविधाएँ हमारे काम आसान करती हैं। लेकिन जब सुविधा के बिना हमारी सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगे, तो वही सुविधा ज़रूरत बन जाती है। दिल्ली में रहने वाले अधिकतर नागरिकों के लिए ऐसी ही एक ज़रूरत है— डीटीसी ‘बस’।

मैं और मेरे जैसे कई मुसाफ़िर प्रतिदिन बस से सफ़र करते हैं। घर से निकलना, बस पकड़ना और अपनी मंज़िल तक पहुँच जाना—बहुत सामान्य-सी बात लगती है। यह मंज़िल लगभग सभी के लिए दफ़्तर है। दिल्ली जैसे भारी ट्रैफ़िक वाले शहर में घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर का सफ़र वैसे भी कभी आसान नहीं रहा। दिल्ली का ट्रैफ़िक इस प्रक्रिया में मुश्किलें पैदा करता ही है, लेकिन कभी रुकावट नहीं बनता।

विचारणीय है कि जिस बस से सफ़र किया जा रहा है, अगर वह बस ही सड़कों पर न हो, तो क्या होगा? यक़ीनन, ऑफ़िस-घर के बीच के सफ़र में रुकावट होगी। इसी रुकावट का सामना बीते महीने दिल्ली के मुसाफ़िरों को करना पड़ा। दिल्लीवासियों को गाड़ियों से खचाखच भरी सड़कों पर खड़ी बस की एहमियत का भी पता लगा।

अपने अधिकारों की माँग करना और उन माँगों के पूरा न होने पर अपना विरोध दिखाने के लिए कुछ समय के लिए काम रोक देना—अर्थात् हड़ताल करना—प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। बस की हड़ताल से प्रभावित होने वाले आम नागरिक चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर पा रहे थे, जबकि इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित भी यही सामान्य नागरिक हैं। डीटीसी के जो बस ड्राइवर हड़ताल पर गए, वे भी इन्हीं आम नागरिकों में से कुछ नागरिक हैं।

बसों की हड़ताल से मुसाफ़िर परेशान हैं। कॉन्ट्रैक्ट/दैनिक वेतन पर काम करने वाले ड्राइवर और कंडक्टर माँगें पूरी न होने से परेशान हैं। हड़ताल से पहले और हड़ताल के दौरान देश का नागरिक परेशान है। जिसकी परेशानी दूर करने प्रकृति का अदृश्य मालिक नहीं आएगा, बल्कि समाज की ज़िम्मेदारी में अपनी अहम भूमिका निभाने वाला ही आएगा। अर्थात्, कहा जा सकता है—सरकार (परिवहन विभाग) को इस समस्या का समाधान करना चाहिए।

इस समस्या पर पहले से विचार किया जाना चाहिए था। अब तक नहीं किया गया, तो अब ऐसा समाधान किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो।

बस न चलने पर लोगों का ग़ुस्सा बस चालकों पर ज़रूर निकल रहा है, लेकिन उनकी जगह पर रहकर विचार किया जाए, तो समाचारों के माध्यम से जो माँगें सामने आई हैं, वे अनैतिक नहीं हैं।

• 2,000 रुपये प्रतिदिन दिहाड़ी और समान काम का समान वेतन
• सरकारी छुट्टियों का भुगतान और वार्षिक बोनस
• मेडिकल योजना और सामाजिक सुरक्षा
• बस के नुक़सान पर जुर्माना ख़त्म करना और ओवरटाइम का भुगतान
• ऑपरेटर कंपनियों की कमाई के अनुरूप चालकों का वेतन बढ़ाना

ये वे माँगें हैं, जो कोई भी नौकरी करने वाला आम नागरिक अपनी नौकरी में सुविधा और सहयोग के रूप में चाहेगा ही।
दिल्ली की रुकी बसों ने सिर्फ़ ख़ुद को नहीं रोका, बल्कि दिल्लीवासियों की सामान्य दिनचर्या को भी रोक दिया।

बसों की हड़ताल होने वाली है, इसकी पूर्व सूचना कई नागरिकों को नहीं थी। 16 सितंबर को जब मैं बस स्टैंड पर पहुँची, तो स्टैंड पर बहुत भीड़ थी। बसें नहीं आ रही थीं और जो आ रही थीं, वे रुक नहीं रही थीं। सुबह साढ़े सात बजे यह बहुत असामान्य था।

लगभग साढ़े आठ बजे D032 नंबर की बस आई, जिसमें मैं और कुछ और सवारियाँ चढ़ीं। अब तक हमें पता ही नहीं था कि आज बसों की हड़ताल है। नेहरू प्लेस पहुँचकर देखा, तो वहाँ के डिपो और डिपो के बाहर बहुत सारी बसें खड़ी थीं। जिस बस में मैं थी, वह बस भी वहीं रुकवा दी गई।

सवारियों को कह दिया गया कि बस आगे नहीं जाएगी। कुछ सवारियाँ तो आसानी से उतर गईं और कुछ ने ड्राइवर से बहस की। ड्राइवर ने कहा, “हमें पता ही नहीं था कि हड़ताल है, नहीं तो हम बस डिपो से लाते ही क्यों?” सच या झूठ, पता नहीं। सवारियों और बस चालकों के बीच काफ़ी देर तक नेहरू प्लेस में बहस होती रही, जिसका कोई समाधान नहीं निकला। अंततः सवारियों को कोई और साधन देखना पड़ा।

बस न चलने पर दो ही साधन बचते हैं—मेट्रो या ऑटो। अधिकतर लोगों ने मेट्रो पकड़ी, जहाँ रोज़ से बहुत ज़्यादा भीड़ थी। कुछ ने ऑटो का रुख़ किया, जिसका किराया भी रोज़ से बहुत ज़्यादा हो गया। सुबह अचानक हुई इस हड़ताल से परेशान मुसाफ़िर जैसे-तैसे अपने ऑफ़िस पहुँचे।

शाम को घर वापसी के समय जब मैंने मेट्रो से एग्ज़िट किया, तो कोई ऑटो रिक्शा मेट्रो के बाहर नहीं था। थोड़ी दूर चलकर मेन रोड पर पहुँची, तो न एक भी बस सड़क पर थी, न एक भी ख़ाली ऑटो।


कुछ ऑटो शेयरिंग से सवारियों को उनके गंतव्य तक पहुँचा रहे थे। जिनका किराया रोज़ाना 20 रुपये प्रति सवारी होता है, उन्हें रोज़ ही अपने ऑटो को भरने के लिए लाइन लगानी पड़ती है। हर ऑटो वाले को अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है। आज इन्हीं ऑटो वालों ने अपना किराया 100 रुपये प्रति सवारी कर दिया। इसमें ऑटो वालों को भी दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि माँग और आपूर्ति का नियम ही यही है। वस्तु कम होगी, माँग ज़्यादा होगी, तो महँगी होगी। वस्तु ज़्यादा होगी और माँग कम होगी, तो सस्ती होगी।

घर जाने की जल्दी और वाहनों की कमी के कारण लोगों ने 100 रुपये किराया देकर भी घर जाना ठीक समझा, लेकिन कुछ लोगों ने मजबूरी में दूसरे ऑटो या बस का लगातार घंटों इंतज़ार किया।

मुझे भी 100 रुपये का नाहक ख़र्च स्वीकार करना था या घंटों इंतज़ार करना था। रात के नौ बज रहे थे। अपनी प्रवृत्ति और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए मैंने इन दोनों विकल्पों को नज़रअंदाज़ किया और पैदल ही घर जाना ठीक समझा। लगभग दस बजे रात घर पहुँची।

17 सितंबर 2026—यह वह तारीख़ थी, जिस दिन पता था कि बसें नहीं चलेंगी। उस दिन कुछ और अनुभव मिले, जो सहज नहीं लगे। जो ऑटो वाले डेढ़ सौ रुपये में सफ़दरजंग ले जाते थे, आज वे वहाँ जाना ही नहीं चाह रहे थे। शायद इसलिए, क्योंकि कम दूरी तय करने पर ही ज़्यादा कमाई हो रही थी।

मैंने कुछ दिन घर से मेट्रो तक पैदल सफ़र किया। डीटीसी बस की भीड़ की तरह ही मेट्रो में भी भीड़ से सामना हुआ। जहाँ कभी चिराग़ दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर एंट्री करने के लिए सिर्फ़ पाँच-दस लोगों की लाइन होती थी, वहाँ नोएडा के मेट्रो स्टेशनों की तरह ही लंबी लाइन और भीड़ थी। मेट्रो के महिला कोच में एंट्री करना मुश्किल हो गया। अंततः मेट्रो के सामान्य कोच में ही एंट्री करनी पड़ी।

इसी दौरान एक शाम को मेट्रो में हल्की-सी राहत देता आश्चर्य भरा दृश्य भी देखने को मिला। सामान्य कोच की असामान्य भीड़ में एक मुसाफ़िर, जिसकी उम्र लगभग चालीस-पैंतालीस साल होगी, अपनी बेटी को वीडियो कॉल करके ख़ुशी-ख़ुशी बता रहा था कि आज वह मेट्रो से घर आ रहा है।

उसकी पाँच-सात मिनट की वीडियो कॉल से यह समझ आ गया कि आज से पहले उसने मेट्रो से सफ़र नहीं किया था। मेट्रो के इस सामान्य सफ़र से वह और उसकी बेटी ऐसे ख़ुश थे, जैसे मध्य वर्ग का व्यक्ति पहली बार फ़्लाइट में सफ़र करके होता है। इसी मुसाफ़िर ने अपनी सेल्फ़ी ऐसे ली, जैसे आम नागरिक किसी सेलिब्रिटी के साथ लेता है।

जहाँ मेट्रो से सफ़र करने वाले मुसाफ़िर हड़ताल पर झुँझला रहे थे, क्योंकि उन्हें बहुत ज़्यादा भीड़ का सामना करना पड़ रहा था, वहीं यह मुसाफ़िर ख़ुशियों के पल जी रहा था। आश्चर्य है, पर सच है।

इन सब बातों के अंत में कई सवाल उपजते हैं। हड़ताल की ज़रूरत ही क्यों पड़ी? पहले से इस पर विचार क्यों नहीं किया गया? हड़ताल की सूचना आम नागरिकों को पहले क्यों नहीं दी गई? हड़ताल हो ही गई, तो मुसाफ़िरों के लिए कोई इंतज़ाम क्यों नहीं किया गया? देश की राजधानी दिल्ली में बसों की इतनी बड़ी हड़ताल हुई कि एक भी बस सड़क पर नहीं थी। मैंने बस की हड़ताल पहले भी देखी-सुनी है, लेकिन इसका ऐसा असर पहली बार देखा। सबसे बड़ा सवाल—ऐसा दोबारा तो नहीं होगा?

सवाल नागरिकों के रोज़गार और जेब पर पड़े भार का भी है, क्योंकि कुछ नागरिकों ने तीन दिनों के दौरान घर से दफ़्तर तक का सफ़र ही नहीं किया। कारण यह रहा कि ऑटो का किराया इतना बढ़ गया कि पूरे दिन नौकरी करके कमाई गई आधे से अधिक आमदनी किराये में ख़र्च हो जाती। ऐसे में उन्हें ड्यूटी पर जाने के बजाय घर पर रहना ही बेहतर लगा।

जहाँ DTC के कॉन्ट्रैक्ट ड्राइवरों की ₹862 प्रतिदिन की आमदनी है, वहीं DTC में सफ़र करने वाले यात्रियों की आमदनी इनसे भी बहुत कम है। वे क्या करते? क्या वे भी हड़ताल करते?

हड़ताल करना अधिकार है, शायद ज़रूरी भी, लेकिन सवाल यह है कि हड़ताल करने की नौबत आई ही क्यों? इसका असर देश के किस नागरिक पर कितना पड़ा या पड़ेगा, क्या सरकार इससे अनजान है?

सवाल है—आख़िर क्यों?

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