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चाहता तो बच सकता था... : ‘जेन-ज़ी का तोता’ वाले आनंद हर्षुल के नाम पत्र

दिनांक : 18 सितंबर 2026

प्रतिष्ठा में,
‘जेन-ज़ी का तोता’ के लेखक श्री आनंद हर्षुल,

यह पत्र इस आग्रह के साथ शुरू कर रहा हूँ कि आप मेरे संबोधन को स्वयं को एक कहानी विशेष के लेखक में परिसीमित करने वाली धृष्टता की तरह नहीं देखेंगे। यह पत्र मैं उस आनंद हर्षुल को नहीं लिख रहा हूँ, जिनकी कई कहानियों का मैं प्रशंसक रहा हूँ या जिनकी कहानी ससम्मान-सहर्ष अपने संपादन में प्रकाशित कर चुका हूँ। यह पत्र सिर्फ़ और सिर्फ़ उस आनंद हर्षुल को संबोधित है, जो ‘जेन-ज़ी का तोता’ के लेखक हैं, और आजकल इस कहानी पर चल रहे संवाद को इसका ‘कपट प्रभावित प्रतिपक्ष’ समझते हैं और इस कहानी पर प्राप्त ‘बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों’ के बीच मिली ‘कुछ नकारात्मक टिप्पणियों’ से इतने विचलित और आहत हैं कि समकालीन हिंदी-कथालोचना को ही संदेह, बल्कि उससे भी ज़्यादा आरोप की दृष्टि से देख रहे हैं।

मुझे खुशी है कि जबसे आपको इस कहानी के लिए ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ मिला है, सोशल मीडिया पर लोग खोज-खोज कर इस कहानी को पढ़ रहे हैं और इस पर खुले मन से प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर रहे हैं। आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं, ऐसी चर्चा बहुत कम कहानियों को मिलती है। लेकिन आज के समय में, जिसे मैं भूमंडलोत्तर समय कहने का आग्रह करता हूँ, अधैर्य इतना बढ़ गया है और लोग इस क़दर सिर्फ़ प्रशंसा सुनना चाहते हैं कि उन्हें ‘बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों’ से उतनी ख़ुशी नहीं मिलती, जितना दुख ‘कुछ नकारात्मक टिप्पणियों’ से हो उठता है। मुझे लगता है कि इस स्पर्श-कातरता को किसी ख़ास वर्ग, पीढ़ी या पहचान-वृत्त से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह इस भूमंडलोत्तर समय के कई संकटों में से एक है। 

‘जेन-ज़ी का तोता’ कहानी पर मैं अपनी राय ‘बोले भारत’ पर जारी अपनी कहानी-केंद्रित लेखमाला ‘कथा प्रांतर’ की दसवीं कड़ी में 28 अप्रैल 2026 को ही लिख चुका हूँ और आज भी अपनी राय पर क़ायम हूँ। जो पाठक पढ़ना चाहते हैं, उस समीक्षा-आलेख को यहाँ पढ़ सकते हैं : निर्मित यथार्थ और स्वीकृति का तोता

वे लोग जो 28 अगस्त 2026 की शाम ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ के आयोजन में नहीं शामिल हो सके थे, उन्हें संभवतः नहीं पता हो कि इस वर्ष जो यह सम्मान श्रीधर करुणानिधि की कहानी ‘हत्यारे की नींद’ और आपकी कहानी ‘जेन-ज़ी का तोता’ को संयुक्त रूप से मिला है, की अंतिम शॉर्ट लिस्टेड सूची में दूसरे स्थान पर ‘हंस’ मई 2026 में प्रकाशित कहानी ‘छायानृत्य’ और तीसरे स्थान पर हंस दिसंबर 2025 में प्रकाशित प्रीति प्रकाश की कहानी ‘आह लेकिन कौन जाने’ रही। 

‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ की घोषणा के बाद ‘छायानृत्य’ कहानी का लेखक होने के कारण, ‘जेन-ज़ी का तोता’ पर जारी वर्तमान बहस से मैंने ख़ुद को पूरी तरह सायास अलग रखा है। कारण कि इस बहस में मेरा रुचि लेना एक अलग तरह के नैतिक संकट खड़ा करता और ऐसी किसी बहस में मेरी हिस्सेदारी के अलग अर्थ निकाले जाते। लेकिन ‘गोल चक्कर’ पर प्रकाशित कई अंतर्विरोधों से युक्त, स्पर्श-कातर और किंचित मनोरंजक लेखकीय वक्तव्य में अनायास और अनापेक्षित रूप से अपनी समीक्षा और उसकी मंशा पर आपके ज्योतिषशास्त्रीय विचार पढ़ने के बाद मेरे लिए आपको यह पत्र लिखना ज़रूरी हो गया है। मैं चाहता तो इसकी अनदेखी कर सकता था। दो-एक दिन में ख़ुद ही ग़ुबार थम जाता। लेकिन ‘गोल चक्कर’ के मार्फ़त ‘इतिहास’ में दर्ज हो चुके आपके झूठे, मनगढ़ंत और बेबुनियाद प्रलापों का प्रतिकार कैसे होता? श्रीकांत वर्मा याद आए :


चाहता तो बच सकता था

मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा
कैसे रचेगा


आप कह सकते हैं कि अपने ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ में आपने मेरा नाम कहीं नहीं लिया है। पर उन पंक्तियों में अनुस्यूत संकेत इस बात के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं कि आप 28 अप्रैल 2026 को ‘बोले भारत’ पर प्रकाशित ‘जेन-ज़ी का तोता’ पर लिखी मेरी समीक्षा ‘निर्मित यथार्थ और स्वीकृति का तोता’ को संकेतित करते हुए मेरी मंशा पर ही अपने सुभाषित उड़ेल रहे हैं। मैं साहस को सबसे बड़ा लेखकीय गुण मानता हूँ और इसलिए मेरे प्रति विशुद्ध कुंठा-वमन के बावजूद; मैं आपके साहस की सराहना करता, अगर आप मेरा नाम लेकर मुझ पर आक्रमण करते। लेकिन आप तो यह साहस भी नहीं कर सके। क्षमा कीजिएगा; यह शिष्टाचार नहीं, पीठ पर प्रहार है। आप जैसे स्वनामधन्य लेखक को इतना कायर तो नहीं होना चाहिए था। इससे पहले कि कुछ और कहूँ, आपके ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ से वह सुभाषित उद्धृत करना चाहता हूँ :

“जिस कहानी ‘जेन-ज़ी का तोता’ पर मैं पुरस्कृत हुआ हूँ—उस पर बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों के साथ कुछ नकारात्मक टिप्पणियाँ भी हुई हैं। इस कहानी में ‘जेन-ज़ी’ शब्द कितनी बार आया है, एक समीक्षा में यह गिनने की कोशिश भी की गई है। यह समीक्षा इस कहानी के पुरस्कृत होने से पहले ही उसके प्रकाशित होते ही प्रसारित हुई थी। उस समीक्षा के इस वाक्य को पढ़ने के बाद मुझे उस समीक्षा की गंभीरता पर इतना संदेह हुआ कि मैं उसे फिर पूरा पढ़ ही नहीं पाया था। दूसरों से ही मुझे पता चला कि उस समीक्षा में ‘जेन-ज़ी का तोता’ को अच्छे से ‘निपटा’ दिया गया है। बाद में पता चला कि यह ‘हंस-पुरस्कार’ के लिए एक दूसरी कहानी को लाभ पहुँचाने का एक सायास प्रयास था। आलोचना का यह भी एक पक्ष है जो चौंकाने के लिए शब्दों को गिनने से लेकर, लाभ और हानि तक के गणित से जुड़ा हुआ है।”

आपको पूरा हक़ है कि मेरी किसी रचना या आलोचना की भरपूर आलोचना करें; मेरे लिखे की गंभीरता पर संदेह करें, उसे बिलकुल ही न पढ़ें... यदि आपके उपर्युक्त सुभाषित में सिर्फ इतना ही होता तो मैं यह पत्र नहीं लिख रहा होता। लेकिन 154 शब्दों के इस कुंठा-वमन के आख़िरी 67 शब्दों में जो आपने कहा है, इसके लिए ही मुझे यह ख़त लिखना पड़ रहा है। माफ़ कीजिएगा, यदि मेरी शब्द-गणना ने कहीं आपका ज़ायक़ा ख़राब कर दिया हो तो। आपको मैं एक शब्द-सजग और शब्द-समर्थ लेखक मानता रहा हूँ। लेकिन यहाँ आपने जिस तरह ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ को ‘पुरस्कार’ में परिसीमित कर दिया है, उसे देखते हुए अपनी उस राय पर संशय करने को जी चाहता है।

आपने लिखा है कि आपको मेरे द्वारा लिखी उस समीक्षा में ‘जेन-ज़ी’ शब्द की बारंबारता गिनने वाले वाक्य को पढ़ने के बाद उसकी गंभीरता पर इतना संदेह हुआ कि उसे आप पूरा नहीं पढ़ सके। आपने अच्छा ही किया। पर यह तो आप भी मान ही रहे हैं न कि वहाँ तक आप उस समीक्षा को पढ़ चुके थे और तब तक समीक्षा की गंभीरता पर आपको संदेह भी नहीं हुआ था। यदि आपको पहले ही ऐसा महसूस हुआ होता तो भला आप उतना क्योंकर ही पढ़ते। क्षमा कीजिएगा, एक बार पुनः आपकी ख़िदमत में कुछ गणना पेश करने की बलात् इजाज़त ले रहा हूँ। 4751 शब्दों के उस आलेख में ‘जेन-ज़ी शब्द की बारंबारता गिनने वाले उस वाक्य तक आने से पहले 2872 शब्द (यानी आलेख का 60.45% हिस्सा) आप बिना समीक्षा की गंभीरता पर संदेह करते हुए पढ़ चुके थे। ‘जेन-ज़ी का तोता’ इस बात का प्रमाण है कि आप फ़ैंटेसी के सिद्धहस्त हैं, ऐसा मत कह दीजिएगा कि उस किंचित् दीर्घ आलेख के ऐन उसी वाक्य पर आपकी नज़र चली गई थी और आपने उस लेख में उसके अतिरिक्त कुछ और पढ़ा ही नहीं था। 

आपको याद हो या शायद आपने उसे किसी दुःस्वप्न की तरह भुला दिया हो कि आपको खटके उस एक वाक्य के ठीक ऊपर कहानी के कालबोध की विसंगतियों को समझने के लिए मैंने एक तालिका बनाई है। उसकी गंभीरता पर आपकी क्या राय है? आप भूल गए हों और आपको बुरा न लगे तो क्या उस तालिका को यहाँ फिर से उद्धृत करने की इजाज़त देंगे? मैंने सुना है कि आप किसी बैंक में कार्यरत थे। क़ायदे से एक बैंक-कर्मी को गणना से चिढ़ नहीं होनी चाहिए, पर आपकी अंकीय आस्वादपरकता का सम्मान करते हुए उसे उद्धृत नहीं करता हूँ। अब मैं ‘जेन-ज़ी’ तो हूँ नहीं कि अपनी बुज़ुर्ग पीढ़ी के एक कथाकार की रुचि-अरुचि का इतना भी सम्मान न कर सकूँ! 

अब तक मैं आपको एक कथाकार और सेवानिवृत्त बैंक-कर्मी ही समझता रहा था, लेकिन ऊपर उद्धृत आपके सुभाषित से पता चलता है कि आप अपने सेवानिवृत्त जीवन में कोई ख़ुफ़िया या ज्योतिष-एजेंसी भी संचालित कर रहे हैं, जिसके माध्यम से आपको यह पता चला कि यह आलेख (यानी ‘जेन-ज़ी का तोता’ पर केंद्रित मेरा समीक्षा-आलेख) ‘हंस-पुरस्कार’ (ओह! फिर से आपने ‘पुरस्कार’ कहा, जिस सम्मान से आप अभी-अभी अलंकृत हुए हैं, उसकी इस तरह से अवमानना तो मत कीजिए) के लिए एक दूसरी कहानी को लाभ पहुँचाने का एक सायास प्रयास था। क्षमा कीजिएगा, कहानी की तरह कुछ भी अनर्गल लिख जाने की रचनात्मक छूट आप यहाँ नहीं ले सकते। मैं नहीं जानता कि ‘दूसरी कहानी को लाभ पहुँचाने’ से आपके क्या आभिप्राय हैं। लेकिन मुझे तो इस अनर्गल प्रलाप का इतना ही अभिप्राय समझ आता है कि मैंने अपनी कहानी ‘छायानृत्य’ या किसी अन्य लेखक की कहानी के लिए ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ सुनिश्चित करने हेतु मैंने अपने नियमित स्तंभ में, ‘जेन-ज़ी का तोता’ की नकारात्मक समीक्षा लिखी थी। आइए एक बार आपके इस कहे के अर्थ-संभावना की समीक्षा कर लेते हैं। क्षमा कीजिएगा, इस बार आपकी गणना-कातरता का सम्मान नहीं कर पाऊँगा। यहाँ यह अपरिहार्य है। 

आपको इतना तो याद ही होगा कि आपकी कहानी ‘हंस’ (अप्रैल-2026) में प्रकाशित हुई थी और मेरी वह समीक्षा 28 अप्रैल 2026 को। आपके सादर ध्यानार्थ ‘छायानृत्य’ ‘हंस’ (मई-2026) में प्रकाशित हुई थी, यानी उस दिन तक वह कहानी अप्रकाशित थी। यानी मुझ सहित आपके ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ के सभी पाठकों को यह मान लेना चाहिए कि ‘जेन-ज़ी का तोता’ को पढ़ते ही मुझे यह एहसास हो गया था कि आगामी तीन अंकों में प्रकाश्य कहानियों सहित उस वर्ष प्रकाशित ‘हंस’ की समस्त कहानियों में ‘जेन-ज़ी का तोता’ को ही आगामी महीनों में नामित होने वाले निर्णायक ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ के योग्य पाने वाले हैं... और इतना ही नहीं, ‘छायानृत्य’, जो अभी प्रकाशित भी नहीं हुई है, को दूसरे स्थान पर आना है। इसलिए जल्दी से मुझे ‘जेन-ज़ी का तोता’ की नकारात्मक समीक्षा लिखकर उसे बदनाम कर देना चाहिए, ताकि यह सम्मान ‘छायानृत्य’ को हासिल हो सके। माफ़ कीजिएगा, इतनी दूरगामी, हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण संभावनाओं के साथ कोई ख़राब से ख़राब समीक्षा भी नहीं लिखी जाती है। आप चाहें तो इन संभावनाओं को अपनी आगामी कहानियों की फ़ैंटेसी के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। लेखकीय वक्तव्य के माथे पर भला इतना भारी बोझ क्यों देना? 

अब दूसरी संभावना पर भी बात कर लेते हैं। यदि मैं किसी दूसरी कहानी के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रहा था तो वह कौन-सी कहानी हो सकती है? ज़ाहिर है, यह उस वर्ष ‘हंस’ में प्रकाशित कोई ऐसी कहानी होगी, जिसकी सकारात्मक समीक्षा लिखकर मैंने भविष्य में नामित होने वाले निर्णायकों के मत को प्रभावित करने कोशिश की हो। प्रीति प्रकाश की कहानी ‘आह लेकिन कौन जाने’, अकेली वह कहानी है, जो इस श्रेणी में आती है और जिसकी समीक्षा (उपेक्षा का अपराध : आह लेकिन कौन जाने...) मैंने अपने मासिक स्तंभ ‘कथा प्रांतर’ की सातवीं कड़ी में 27 जनवरी 2026 को की थी। मेरी दृष्टि में यह सचमुच ही एक अच्छी कहानी है और अलका सरावगी जी को उचित ही अच्छी लगी। निर्णायकों को मेरी समीक्षा कितना और किस हद तक प्रभावित करती हैं, इसका अनुमान तो आपके अतिरिक्त कोई और नहीं लगा सकता। लेकिन ‘आह लेकिन कौन जाने’ की लेखिका वही प्रीति प्रकाश हैं, जिनकी कहानी ‘राम को जन्मभूमि मिलनी चाहिए’ को 2020 (यानी आपको सम्मान मिलने से छह वर्ष पूर्व) यह सम्मान मिल चुका था। 

काश आप समझ पाते कि जिस ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ में ‘हंस’-परिवार के प्रति आप पारदर्शिता के लिए आभार व्यक्त कर रहे हैं, आपकी ये हास्यास्पद बातें अंततः ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ और उनके सम्मानित निर्णायकों की गरिमा और पारदर्शिता पर ही प्रश्न खड़े कर रही हैं। 

इसलिए आपके निराशाजनक, आत्ममुग्ध और कुछ हद तक कुंठित ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ को पढ़ने के बाद कुछ बिन माँगी निःशुल्क सलाहें दे रहा हूँ। रुचे तो कृपापूर्वक स्वीकार कीजिएगा, अन्यथा एक बार फिर इसे मेरी अगंभीरता समझकर भूल जाइएगा :


• आप कहते हैं : “यह युवा रचनाकार पीढ़ी सोशल मीडिया की पैदाइश है। मुझे लगता है कि वह स्वयंभू महान् पीढ़ी है। इनमें से ज़्यादातर के पास अपने पूर्वज-लेखकों के पाठ की या सम्मान की कोई जगह नहीं है।” माफ़ कीजिएगा, आपका यह कहना भी कहानी में ‘जेन-ज़ी’ के लिए व्यक्त स्टीरियोटाइप सरलीकरण की तरह ही है। हो सके तो खुले मन और नए सिरे से नई पीढ़ी को समझने की कोशिश कीजिए, एक लेखक और मनुष्य के तौर पर निश्चित ही आप बेहतर और समृद्ध होंगे। तब नई पीढ़ी भी आपके कहे में कुंठा नहीं, संवाद के सूत्र तलाशेगी।

• अपनी सुविधा अनुसार आलोचना/समीक्षा को ‘सकारात्मक’ या ‘नकारात्मक’ की श्रेणी में डाल देना भी उचित नहीं है। मुझे तो यह शब्दावली ही ठीक नहीं लगती। इन शब्दों को एक बार ‘सहमति’ और ‘असहमति’ से बदलकर देखिए, लोकतांत्रिक और रचनात्मक आलोचना की ताजा बयार आप तक बेरोकटोक पहुँचने लगेगी। तब हर असहमति में आप न तो साज़िश ढूँढ़ेंगे न पारदर्शिता आपके लिए अनुकूलता का पर्याय ही रह जाएगी।

• आपने कितनी अच्छी बात कही है : “एक कहानी को निर्णायक होने से बचना चाहिए।” क्या ही अच्छा हो, इसे आप अपनी कहानियों को साबित भी करने दें। कहानी की तरह जीवन में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति इतना निर्णायक होना भी उचित नहीं होता—ख़ासकर तब, जब उसका आधार निजी पूर्वग्रह और कुंठा हो।

• आप कहते हैं : “रचना, अपने लिए कपट प्रभावित प्रतिपक्ष का स्वयं ही उत्तर होती है। उत्तर का यह अधिकार वह अपनी उत्कृष्टता से अपने भीतर रचती है।” आलोचना में उठे हर स्वर को “रचना का कपट प्रभावित प्रतिपक्ष” कह देना उचित नहीं है। अगर आप इस बात में विश्वास रखते हैं कि आलोचना या सहमति के उत्तर का अधिकार रचना अपनी उत्कृष्टता से अपने भीतर रचती है, तो फिर ‘जेन-ज़ी का तोता’ को उसी की ताक़त के भरोसे छोड़ देना चाहिए था। ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ की आड़ में आलोचना को साज़िश बताने की क्या ज़रूरत थी?

• आत्मविश्वास और साहस की तरह संशयमूलकता भी एक अनिवार्य लेखकीय गुण है। दूसरों पर नहीं ख़ुद पर संशय... जरा ठंडे मन से सोचकर देखिए कि क्या मृदुला गर्ग, पंकज बिष्ट, योगेंद्र आहूजा, वैभव सिंह, कविता, पंखुरी सिन्हा, विमल चंद्र पांडेय, मनोज पांडेय, प्रत्यक्षा, वंदना राग, गीताश्री, आदित्य, उषा दशोरा, निधि अग्रवाल, अमिता नीरव आदि जैसे वरिष्ठ और समकालीन लेखक सब के सब किसी साज़िश के तहत ‘जेन-ज़ी का तोता’ के ‘कपट प्रभावित प्रतिपक्ष’ हो गए हैं? और यदि सचमुच आपको ऐसा ही लगता है, फिर भी आपको उन ‘बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों’ के लिए प्रसन्न और आश्वस्त होना चाहिए जिनका उल्लेख आपने अपने ‘गोल चक्कर लेखकीय वक्तव्य’ में किया है। इन लेखकों की प्रतिक्रियाएँ वैसे भी उन ‘बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों’ के बीच आई ‘कुछ नकारात्मक टिप्पणियों’ में ही शुमार है न! इनका इस तरह संज्ञान लेकर इतना क्यों विचलित होना?


और हाँ, आख़िरी बात, आपको लगता है कि मैंने आपको या आपकी कहानी को ‘निपटाने’ के उद्देश्य से समीक्षा लिखी थी। आप निःसंदेह एक उम्दा कहानीकार रहे हैं। लेकिन आप इतने भी महान् तो नहीं कि मेरे जैसे मुनीम को आपको ‘निपटाने’ की ज़रूरत पड़े? ऐसी भी ख़ुशफ़हमी क्या पालना जो ख़ुद को इतनी तकलीफ़ दे? आपको नहीं लगता कि समकालीन हिंदी आलोचना इतनी भी हिंसक और अराजक नहीं हो गई है कि इसे परखने के लिए आप जैसे बुज़ुर्ग लेखक को ‘निपटाने-टपकाने’ जैसी शब्दावलियों की शरण में जाना पड़े? 

थोड़ा लिखा, बहुत समझना... पुराने ज़माने की चिट्ठियों के अंत में यही तो लिखा जाता था न! 

बहुत संभव है, मेरा यह पत्र मेरे कुछ पाठकों, मित्रों और वरिष्ठों को मेरी धृष्टता और उद्दंडता लगे। उनके ऐसा सोचने-कहने का मैं हृदय से सम्मान करता हूँ। इसलिए उनसे मैं सचमुच क्षमाप्रार्थी हूँ। मैं चाहता तो बच सकता था, लेकिन कैसे बचता? 

मेरी तरफ़ से इस प्रकरण में बस इतना ही। शायद आपका भी मन अब भर गया हो। यदि न भरा हो और कुछ कहना अभी शेष हो, तो सीधे नाम लेकर मुझे कहिएगा, इसके लिए किसी अप्रत्यक्ष छायायुद्ध की जरूरत नहीं है। जब तक आपका मन न भरे और मुझे भी ज़रूरत बाक़ी लगे, अपन चिट्ठी-पत्री जारी रखेंगे। 

कुशल होंगे। अपना ख़याल रखिएगा, इस साल वर्षा ऋतु अभी थमी नहीं है।

यदि आपके ही शब्द उधार लूँ तो
‘जेन-ज़ी का तोता’ का कपट प्रभावित शुरुआती प्रतिपक्ष

राकेश बिहारी
प्रति (सादर ध्यानार्थ)

✔️ श्री संजय सहाय (संपादक : ‘हंस’)
✔️ सुश्री रचना यादव (प्रबंध संपादक : ‘हंस’)
✔️ हंस कथा सम्मान के सम्मानित निर्णायक—
     सुश्री अलका सरावगी
     श्री प्रेम कुमार मणि
     श्री योगेंद्र आहूजा
     श्री संजीव कुमार
✔️ सुश्री प्रीति प्रकाश 
✔️ और आप सब

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