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C/O बंगाल : नक्सल आंदोलन : बांग्ला-कविता जब सड़क पर उतर आई

सन् 1971, 5 अगस्त...

भोर की रोशनी अभी पूरी तरह फूटी नहीं थी। वह रात और सुबह के बीच का एक धुँधला समय था। इस आधे अँधेरे में ही बंगाल के महानायक उत्तम कुमार सुबह की सैर कर रहे थे। यह उनकी रोज़ की आदत थी—आम लोगों के मॉर्निंग-वॉक के लिए निकलने से पहले ही अपनी सुबह-सैर पूरी कर लेना। उनका ड्राइवर सड़क के किनारे गाड़ी लेकर खड़ा था। उत्तम कुमार मैदान में कुछ चक्कर लगा रहे थे, बीच-बीच में फ़्री-हैंड एक्सरसाइज़ कर रहे थे। ये करके वह गाड़ी में बैठकर कुछ देर में लौट जाने वाले थे। पर तभी अचानक एक गाड़ी आकर कुछ दूरी पर रुक गई। यह समझने में देर नहीं लगी कि वह पुलिस की जीप थी। जीप का दरवाज़ा खुला और एक-एक करके पाँच लोग नीचे उतरे—चार पुलिसकर्मी और उनके साथ एक ऐसा व्यक्ति जिसका चेहरा ढका हुआ था। फिर पुलिस की गोलियाँ चलीं। एक शरीर वहीं लुढ़ककर गिर पड़ा। उत्तम कुमार स्तब्ध खड़े रह गए। आँखों के सामने जो कुछ घट रहा था, उसे समझ पाने की शक्ति जैसे क्षण भर में छिन गई थी। उनका शरीर स्थाणु हो चुका था। भागने की ताक़त तक नहीं बची थी।

इसके बाद चार पुलिसकर्मी उत्तम कुमार की ओर बढ़े। उनमें से एक ने उनके पास आकर कहा, “आप उत्तम कुमार हैं न? याद रखिए, आपने यहाँ कुछ भी नहीं देखा। कुछ नहीं सुना... नहीं तो... सिर्फ़ इसलिए कि आप नायक हैं...”

इस अधूरे बाक़ी में धमकी पूरी तरह समझ में आ चुकी थी।

अगले दिन अख़बार निकले। महानगर में सब कुछ सामान्य था। इस घटना की कहीं कोई सुर्ख़ी नहीं थी... जैसे कुछ हुआ ही न हो!

उत्तम कुमार की आँखों के सामने पुलिस ने एक एनकाउंटर किया था। जिस व्यक्ति को गोलियाँ मारकर मौत के घाट उतारा गया, उसके बारे में बाद में यह दावा सामने आया कि वह नक्सल नेता सरोज दत्त थे। लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई ठोस-तथ्याधारित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। काग़ज़-कलम की सरकारी दुनिया में सरोज दत्त आज भी ‘लापता’ हैं। 

सरोज दत्त अपनी राजनीतिक पहचान से परे एक कवि-लेखक-अनुवादक और ‘परिचय’ जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के संपादक भी थे। वह अपने समय के एक तेजस्वी और बहुआयामी व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत में ‘अमृत बाजार पत्रिका’ के संपादकीय विभाग में काम किया था। वर्ष 1949 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने और हिंसक राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों के बाद उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया। 1962 में उन्हें पहली बार गिरफ़्तार किया गया, हालाँकि वह गिरफ़्तारी बहुत थोड़े समय के लिए थी। 1964 में वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [मार्क्सवादी] यानी CPI[M] में शामिल हुए और सुशीतल रायचौधरी के साथ पार्टी के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ के संपादन की ज़िम्मेदारी सँभाली।

1967 में नक्सलबाड़ी की घटना के बाद जिस उग्र राजनीतिक आंदोलन ने जन्म लिया, सरोज दत्त ने उसका खुलकर समर्थन किया। दो वर्ष बाद, 1969 में, पुराने राजनीतिक ढाँचे से अलग होकर चारु मजूमदार और अन्य नेताओं के साथ उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [मार्क्सवादी-लेनिनवादी] यानी CPI[ML] के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद नक्सल आंदोलन बहुत तीव्रता से उग्र हुआ और चारु मजूमदार तथा सरोज दत्त पुलिस की वांछित-सूची में आ गए। सरोज दत्त को लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहना पड़ा।

फिर आया 1971 का अगस्त... 

5 अगस्त की मध्य रात्रि पुलिस ने उन्हें देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय के घर से गिरफ़्तार किया। इसके बाद जो हुआ, वह आज भी इतिहास के सबसे रहस्यमय और विवादित अध्यायों में से एक है। उपलब्ध विभिन्न स्रोतों में यह दावा मिलता है कि 5 अगस्त की भोर में कोलकाता के मैदान क्षेत्र में पुलिस ने गोलियाँ मारकर उनकी हत्या कर दी। एक शोध-आधारित दस्तावेज़ में उसी दिन मैदान में एक अज्ञात-सिरविहीन शव मिलने का उल्लेख भी है। दूसरी ओर आधिकारिक अभिलेखों में उनकी मृत्यु का स्पष्ट और निर्णायक विवरण लंबे समय तक अनुपस्थित रहा।

काल की चाल में एक भयावह गुप्तहत्या का पूरा लेखा-जोखा अनंत काल में कहीं विलीन हो गया। सरकारी काग़ज़ों ने चुप्पी ओढ़ ली, इतिहास ने अपने पन्ने बंद कर लिए। उस छिन्नमस्तक समय का कोई निर्णायक दस्तावेज़ हाथ नहीं आया। आज समय के पास शेष है तो बस एक कवि की कविता... एक हाइपोथेटिकल दस्तावेज़... जो इतिहास के अँधेरे में किसी धुँधली गवाही की तरह खड़ा है।

इस कविता के कवि थे विमल देव। उन्होंने रची थी एक जलती हुई, बेचैन कर देने वाली कविता—‘उत्तम कुमार की मॉर्निंग-वॉक’। इस कविता ने उस सुबह को शब्दों में पकड़ने की कोशिश की; जिसे इतिहास शायद जानबूझकर अपनी स्मृति से मिटा देना चाहता था। 

इस सबके बावजूद सरोज दत्त को सिर्फ़ एक राजनीतिक नाम में सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वह कवि थे, गद्यकार थे, अनुवादक और संपादक भी। 1940 में ‘अग्रणी’ पत्रिका में प्रकाशित उनकी कविता ‘फ़िनलैंड’ इसके प्रमाणों में से एक है। इस कविता की भूमिका में उन्होंने लिखा : “यह कविता रूसी-फ़िनिश संघर्ष के समय लिखी गई थी... मेरा मानना है कि यदि इस कविता की कोई सार्थकता और उपयोगिता है, तो वह अभी समाप्त नहीं हुई है और आने वाले समय में भी समाप्त नहीं होगी...”

सत्य का अमृत-भरा कलश छिपाकर वे
अख़बारों के पात्र में रोज़ झूठ की मदिरा उड़ेलते हैं।
व्याकुल प्यास से हमारे कंठ में अटकी हुई साँस,
हम हर सुबह उस गरल को आकंठ पीते हैं।

कवि मणिभूषण भट्टाचार्य की कविताओं में उस दौर के सबसे तीखे आघातों में से एक को महसूस किया जा सकता है। ‘उत्कंठ शरवरी’ और बाद में ‘गांधीनगर में रात’ शीर्षक उनकी कविताएँ सत्तर के दशक के राजनीतिक अँधेरे को काव्य-भाषा में दर्ज करती हैं। समकालीन साहित्यिक विमर्श में ‘गांधीनगर में रात’ को उस समय की प्रतिरोधी कविता का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना गया है। उनकी कविताओं में भूख, श्रम, पुलिसिया दमन, आम आदमी का जीवन और मध्यवर्ग का भय... सब एक साथ उभरकर सामने आते हैं।

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के विघटन का दौर तब तक आया नहीं था। ‘आदर्श’ शब्द का तब बंगाल के लोगों के मन पर एक अलग ही असर था। वामपंथ नाम की एक धारणा उन्हें लगातार अपने घेरे में रखती थी। यह एक ऐसा विश्वास था जिसके भीतर संघर्ष भी था, स्वप्न भी और आने वाले बेहतर समाज और जीवन की उम्मीद भी।

मणिभूषण भट्टाचार्य ने एक के बाद एक ऐसी रक्तरंजित पंक्तियाँ रचीं; जिनमें उस समय का भय, भूख, दमन और प्रतिरोध एक साथ धधक उठता है :

सूखे से उजड़ा गाँव
प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े रहते हैं हज़ारों-हज़ार,
भूख से लोग मरते हैं
और ‘आनंद बाज़ार’ में लिख दिया जाता है—
‘कुपोषण से हुई मृत्यु।’

और :

जो कल क्रांतिकारी था, आज वही मंत्री है,
मंत्री-पद छिन जाए तो बन जाता है बहरूपिया नेता।
जो कल हत्यारा था,
आज वही योजनाओं का शिल्पकार है।

व्यंग्य और हास्य की संप्रेषण-क्षमता को बढ़ाकर मणिभूषण ने अनेक कविताओं में असंभव-सा लगने वाला काम संभव कर दिखाया। राजनीतिक-सामाजिक और व्यक्तिगत बेईमानी के विरुद्ध, पाखंड के विरुद्ध, नीचता और अवसरवाद के विरुद्ध उनका क्रोध कई बार सीधे-सीधे व्यक्त न होकर व्यंग्य या धारदार हास्य का सहारा लेता है। इससे उस क्रोध की धार और भी तीखी-तेज़ हो जाती है; और जब यही क्रोध सीधे फूट पड़ता, तब उसकी तपिश असहनीय हो उठती। क्रोध कितना पवित्र हो सकता है, यह बांग्ला-कविता में सुकांत और मणिभूषण भट्टाचार्य ने बार-बार दिखाया है। ‘दक्षिण समुद्रेर गान’ पुस्तक की ‘दधीचि’ कविता में एक सरकारी अधिकारी के प्रस्ताव के विरुद्ध जिस तरह एक आमूल क्रांतिकारी कवि गर्जना करते हुए उठ खड़ा होता है, उसे पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं :

क़लम फेंक कर फ़ॉर्म को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया, 
और वे टुकड़े सेक्रेटरी के चेहरे पर उड़ा दिए। फिर चीख़कर उठे—
‘स्काउंड्रेल्स! इस तरह मेरा अपमान करने का मतलब क्या है?
मैं पूर्व-क्रांतिकारी नहीं हूँ, आज भी क्रांतिकारी हूँ।’

नक्सलबाड़ी आंदोलन से पहले ही पचास और साठ के दशक की बांग्ला-कविता में नगरीय जीवन, व्यक्ति-मन का संकट, यौन-प्रतीक, अस्तित्व-बोध, मध्यवर्गीय असंतोष और प्रतिष्ठान-विरोधी चेतना काफ़ी प्रबल हो चुकी थी। हंगरी जनरेशन ने भाषा और सौंदर्यबोध की प्रचलित संरचनाओं को तोड़ दिया था, वहीं ‘कृत्तिवास’ के साहित्यिक परिक्षेत्र ने नए शहर और व्यक्ति-मन के अनुभवों को कविता में सामने रखा था। इसलिए नक्सलबाड़ी आंदोलन ने बांग्ला-कविता में पहले से सक्रिय विद्रोही साहित्यिक धारा के साथ जुड़कर राजनीतिक वास्तविकता के तीव्र आघात को और गहरा किया। कविता समाज और इतिहास की ओर पहले से कहीं अधिक प्रत्यक्ष और तीव्रता के साथ उन्मुख हुई। इसके परिणामस्वरूप कविता के ‘मैं’ में भी एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। व्यक्तिगत प्रेम, अकेलापन और अस्तित्व-संकट के स्थान पर इतिहास, भूख, बेरोज़गारी, श्रमजीवी मनुष्य तथा बंदी और मारे गए युवाओं के अनुभव कविता के केंद्र में आने लगे। व्यक्ति की पीड़ा धीरे-धीरे सामाजिक पीड़ा में बदलने लगी। कवि का ‘मैं’ अपने व्यक्तिगत अनुभव की सीमाओं से आगे बढ़कर एक व्यापक ‘हम’ की ओर अग्रसर हुआ।

इस परिवर्तन के साथ कविता की भाषा में भी बदलाव आया। कविता धीरे-धीरे अलंकारों के अतिरिक्त बोझ को कम करते हुए बोलचाल की, प्रत्यक्ष और संक्षिप्त; किंतु तीव्र प्रहार करने वाली भाषा की ओर बढ़ने लगी। पोस्टर, वाल-राइटिंग, नारे, जुलूस, जेल, थाना, सड़कें, गलियाँ, पुलिस की गाड़ियाँ और रात का कोलकाता जैसे वास्तविक जीवन के तत्त्व कविता की इमेजरी में प्रवेश करने लगे। इस तरह कविता का संसार केवल निजी अनुभूतियों और कल्पना का संसार नहीं रहा; समकालीन राजनीतिक संघर्ष, शहर का तनाव और इतिहास की कठोर वास्तविकता भी उसकी भाषा और दृश्य-कल्पना का अभिन्न हिस्सा बन गए।

विशेष रूप से सरोज दत्त, द्रोणाचार्य घोष, तिमिरबरण सिंह, मुरारी मुखोपाध्याय, अमिय चट्टोपाध्याय, अभिक गंगोपाध्याय, पार्थ बंद्योपाध्याय, रंजीत गुप्त, सागर चक्रवर्ती, सरोजलाल बंद्योपाध्याय, विपुल चक्रवर्ती, मृदुल दाशगुप्त, धूर्जटी चट्टोपाध्याय, सत्येन बंद्योपाध्याय, सब्यसाची देव, नवारुण भट्टाचार्य, मणिभूषण भट्टाचार्य, समीर राय, कमलेश सेन, सृजन सेन, कौशिक बनर्जी और सुभाष मुखोपाध्याय जैसे कवियों की क़लम इस दौर में गूँज उठी। इनके साथ वीरेंद्र चट्टोपाध्याय और शंख घोष जैसे वरिष्ठ कवियों की कविताओं में भी उस समय की राजनीतिक हिंसा, दमन, मृत्यु और सामाजिक उथल-पुथल की तीव्र प्रतिक्रिया दिखाई देती है। शोध और समकालीन साहित्यिक स्मृतियों में मुरारी मुखोपाध्याय, अमिय चट्टोपाध्याय, तिमिरबरण सिंह और द्रोणाचार्य घोष जैसे कवियों का विशेष उल्लेख मिलता है जो प्रत्यक्ष रूप से उस उथल-पुथल भरे राजनीतिक दौर से जुड़े थे।

इन कवियों की रचनाओं में हमें एक नई भाषा की खोज दिखाई देती है; जिसमें निजी भावबोध के साथ इतिहास की बेचैनी, सामाजिक अन्याय, युवाओं की आकांक्षा, मृत्यु, कारावास, प्रतिरोध और बदलते समय की कठोर वास्तविकता एक साथ उपस्थित होती है। यहाँ तक आते-आते कविता सिर्फ़ सौंदर्य और निजी अनुभूति की अभिव्यक्ति नहीं रह जाती, वह अपने समय की बेचैनी और संघर्ष को दर्ज करने का माध्यम भी बनती है। मृदुल दाशगुप्त, सब्यसाची देव, पार्थ बंद्योपाध्याय और अन्य समकालीन कवियों की रचनाओं में इस परिवर्तन की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ नज़र आती हैं।

दरिद्रता से पीड़ित परिवार में जन्मे द्रोणाचार्य घोष [जन्म : 1948] की रगों में विद्रोह और कविता दोनों ही प्रवाहित होते थे। बांग्ला-कविता के अनेक समर्पित पाठकों का मानना रहा है कि यदि वह जीवित रहते, तो बांग्ला भाषा को एक पाब्लो नेरूदा या नाज़िम हिकमत मिल सकता था। और प्रेम! सच कहें तो प्रबल प्रेमी द्रोणाचार्य की एक उल्लेखनीय समानता निरंतर प्रेम में डूबे कवि व्लादिमीर मायकोव्स्की से थी। यहाँ अंतर केवल इतना था कि लेनिन पर कविताएँ लिखने वाले मायकोव्स्की और अस्वीकृत प्रेम से उन्मत्तप्राय मायकोव्स्की—मानो दो बिल्कुल अलग ‘सेल्फ़’ थे। लेकिन द्रोणाचार्य की कविता में क्रांति और प्रेम एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल गए थे कि दोनों को अलग कर पाना लगभग असंभव हो जाता है।

11 सितंबर 1968 की अपनी डायरी में द्रोणाचार्य लिखते हैं कि राजनीति उनके मर्म और मज्जा तक उतर चुकी है। उस राजनीतिक चेतना के प्रकाश में उन्हें अपनी कविता को बदलना होगा... वह सचमुच अपनी कविता को बदल पाए और उसके साथ स्वयं को भी। उन्होंने लिखा :

युद्ध, प्रतियुद्ध
सब कुछ रक्तपात में विलीन—
उसकी स्मृति 
अँधेरी कहानी के भीतर 
एक असहाय शरीर रखती है

क्रांति का हाथ थामकर क्षयग्रस्त अकेलेपन को पार करते हुए उन्होंने अपनी प्रेमिका कृष्णा [बंद्योपाध्याय] को लिखा :

तो फिर ऐसा ही हो, धूसर उम्र को लापरवाही से परे फेंक कर
मेरे इस सघन जीवन को धीरे-धीरे अपने हृदय में जगह देना।
प्रकाश आता है—उसके आने में अब अधिक समय नहीं,
अब तुम्हारे स्वप्न में वह सीधा संघर्ष धधक रहा है, प्रिये!
तो फिर ऐसा ही हो, तुम्हारी गहराइयों में उतरने के उस क्षण, प्रिये,
कृषि-विप्लव में लड़ने के लिए मुझे मोहहीन स्पंदन देना।

1967 में नक्सलबाड़ी का किसान-विद्रोह द्रोणाचार्य घोष की चेतना में एक आमूल परिवर्तन लेकर आया। उन्होंने अपना घर-परिवार भी छोड़ दिया और जीवन के अंतिम क्षण तक सीपीआई[एमएल] के एक निःसंकोच और अग्रणी कार्यकर्ता बने रहे। अंतिम बार गिरफ़्तार किए जाने के बाद जेल में द्रोणाचार्य ने किसी भी प्रकार की क़ानूनी सहायता लेने से इनकार कर दिया। 7 फ़रवरी 1972 को अपने सहयोद्धाओं के साथ हुगली जेल से भाग निकलने के प्रयास के दौरान द्रोण शहीद हुए। उन्हें गोलियों से नहीं मारा गया था। पुलिस ने उन पर एक धारदार हथियार से निर्मम प्रहार किया था और उनके शरीर को बुरी तरह घायल कर दिया था, यहाँ तक कि उनके चेहरे की हड्डियाँ तक कुचल दी गई थीं।

सरोज दत्त की कविताओं में पुराण और इतिहास की पुनर्व्याख्या भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पुराण के पात्रों और प्रतीकों को समकालीन राजनीतिक वास्तविकता से जोड़कर उन्होंने प्रचलित नैतिकता और उसके स्थापित मानदंडों पर प्रश्न उठाए हैं। द्रोणाचार्य घोष की कविताओं में भी विनाश, हिंसा, भूख और इतिहास की निर्ममता के चित्र दिखाई देते हैं। दूसरी ओर शंख घोष की कविता में नक्सल-काल का प्रभाव बिल्कुल अलग प्रकृति का है। उनकी कविताओं में समय की भयावहता विवेक, अपराधबोध, शोक और नैतिक प्रश्नों के माध्यम से प्रवेश करती है। उनकी कविता में मृत युवा केवल एक व्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि पूरी एक पीढ़ी का प्रतीक बन जाता है। राज्य की हिंसा जिस तरह उनकी कविताओं में प्रश्नों के घेरे में आती है, उसी तरह अंधी राजनीतिक उन्मादिता अथवा हिंसा का रास्ता भी उनकी कविता की नैतिक चिंता से बाहर नहीं था। यही दृष्टि शंख घोष की नक्सलकालीन कविताओं को महज सरल राजनीतिक कविता से अलग करती है।

वीरेंद्र चट्टोपाध्याय की कविताओं में सत्तर के दशक की राजनीतिक वास्तविकता और भी प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित होती है। उन्होंने आम लोगों के दुःख, शासक के अहंकार और अपने समय की सामाजिक अस्थिरता को कविता के केंद्र में रखा। उनकी कविता का मनुष्य भूखा, अपमानित और भयभीत है; लेकिन साथ ही वह प्रतिरोध की चेतना से भी संपन्न है। इसीलिए उनकी राजनीतिक कविता मनुष्य के दैनिक जीवन और उसकी गरिमा के प्रश्न को सामने लाती है :

जब झूठ, सच को कान पकड़कर
बेंच पर खड़ा होने को कहता है,
हम सब गधे की टोपी सिर पर रखकर
उस दृश्य का आनंद लेते हैं।
अपनी ही लज्जा और अपमान 
तब हमें बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।

सत्तर के दशक के उथल-पुथल भरे राजनीतिक समय और नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि में बांग्ला-कविता में जिस प्रतिरोध और रक्तरंजित यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई थी, उसका प्रभाव बाद की कविता में भी दिखाई देता है। सुब्रत सरकार, जय गोस्वामी, सुबोध सरकार और चैताली चट्टोपाध्याय की कविताओं में प्रत्यक्ष नहीं; बल्कि परोक्ष रूप से उस समय की ऐतिहासिक और आत्मजीवनीपरक प्रतिक्रियाओं की छाप दिखाई देती है। विपुल चक्रवर्ती की कविता-पंक्तियाँ हैं :

पाँव से सिर तक कोड़े के निशान रहें,
इस तरह मारो।

निशान कुछ दिनों तक बने रहें,
इस तरह मारो।

इस तरह मारो
कि तुम्हारी मार की बारी ख़त्म होने के बाद
मैं तुम्हें दिखाई दूँ
धारीदार बाघ की तरह।

फ़्रांसीसी कवि-निबंधकार और दार्शनिक पॉल वैलेरी [1871–1945] ने अपनी पुस्तक Pièces sur l’art [Pieces on Art, 1934] में कहा है कि कविता का स्रोत भले ही स्वर्ग हो, पर उसका अवतरण-क्षेत्र पृथ्वी है। उन्होंने लिखा है, “A poem is never finished, only abandoned.”  इस विचार की प्रतिध्वनि अनेक महत्त्वपूर्ण कवियों-कलाकारों के वक्तव्यों में सुनाई देती है। टी.एस. एलियट का प्रचलित कथन है, “No poem is ever finished; it’s just abandoned.” अर्थात् कोई कविता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती, उसे केवल छोड़ दिया जाता है। विश्वप्रसिद्ध कलाकार लियोनार्दो दा विंची के नाम से भी इसी आशय का एक कथन जोड़ा जाता है, “A work of art is never finished, only abandoned.” ठीक इसी तरह नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव ने बांग्ला-साहित्य-जगत को एक बिल्कुल नए रूप में ढाल दिया। कविता में आए इस भाषागत परिवर्तन के साथ लघु पत्रिकाओं का विस्तार भी गहराई से जुड़ा हुआ था। नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में कोलकाता और पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक लघु पत्रिकाएँ, राजनीतिक पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तिकाएँ प्रकाशित होने लगीं। ‘देशब्रती’ जैसी राजनीतिक पत्रिकाओं के साथ-साथ विभिन्न लघु पत्रिकाओं में क्रांतिकारी कविताएँ भी प्रकाशित होने लगीं। कविता का प्रसार अब कहीं अधिक व्यापक हो गया... कॉलेजों की दीवारों, छात्रावासों, गुप्त बैठकों, राजनीतिक सभाओं, गाँवों, कारख़ानों, क़स्बों और लघु पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों तक। 

वह घटना जिसका उल्लेख यहाँ आरंभ में किया गया, महानायक उत्तम कुमार की मॉर्निंग-वॉक के दौरान घटित वह कथित एनकाउंटर... उसने उनके मन पर बेहद गहरा आघात पहुँचाया था, ऐसा विभिन्न संस्मरणों में उल्लेख मिलता है। यह कहा जाता है कि इस घटना के बाद उनके ड्राइवर उन्हें घर वापस लेकर आए। मानसिक रूप से विचलित उत्तम कुमार अगले तीन दिनों तक शूटिंग नहीं कर सके और गहरे अवसाद तथा निराशा में डूब गए। सामान्य जीवन में लौटने में उन्हें बहुत समय लगा। उत्तम कुमार की जन्मशताब्दी के अवसर पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह घटना केवल उनके निजी जीवन का एक अँधेरा अध्याय भर नहीं रह जाती, बल्कि सत्तर के दशक के उस अशांत राजनीतिक दौर की भी एक महत्त्वपूर्ण स्मृति और साक्ष्य के रूप में सामने आती है।

बहरहाल, नक्सल आंदोलन ने जिस तरह बंगाल के सामाजिक जीवन और चेतना-जगत को गहराई से झकझोर दिया था; उसी तरह उसने साहित्य-जगत की रूपरेखा को भी बदलकर रख दिया। नक्सल आंदोलन ने बांग्ला-कविता को राजनीतिक दृष्टि से देखने और समझने की एक नई दृष्टि दी। उसने कविता को इतिहास के साथ एक नए और अधिक प्रत्यक्ष संबंध में स्थापित किया। उसने व्यक्तिगत पीड़ा और सामाजिक पीड़ा के बीच खड़ी दीवार को तोड़ दिया। वह कवि के कमरे को सड़क तक और सड़क के इतिहास को कवि के कमरे तक ले आया। उसने मृत्यु को निजी शोक की अनुभूति रहने देकर उसे राजनीतिक स्मृति में रूपांतरित किया, उसने कारागार को कविता के भूगोल का हिस्सा बना दिया, उसने भूख और ग़रीबी को किसी अमूर्त समाजशास्त्रीय आँकड़े के रूप में प्रस्तुत किया और उसे मनुष्य के जीवंत चेहरे के रूप में हमारे सामने ला खड़ा किया। यही कारण है कि नक्सल आंदोलन को केंद्र में रखकर रची गई कविताओं का महत्त्व सिर्फ़ राजनीतिक इतिहास के दस्तावेज़ के रूप में नहीं, बल्कि बांग्ला-कविता के आधुनिकताबोध में आए एक महत्त्वपूर्ण मोड़ के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

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इस स्तंभ में प्रस्तुत कविता-पंक्तियों का बांग्ला से हिंदी अनुवाद लेखिका द्वारा ही। अन्य C/O बंगाल यहाँ पढ़िए : C/O बंगाल

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