भागो भई!
अथर्व तोमर
29 जुलाई 2026
शीर्षक वाला ‘भागना’ बहुत ही होलिस्टिक है। इसमें हर क़िस्म का भागना शामिल है—प्रॉफ़िट खदेड़ते पूँजीपतियों का भागना हो या पूँजीपतियों को खदेड़ते साम्यवादियों का। दूषित समाज को धर दबोचने के लिए साहित्य-प्रेमियों का भागना हो या फिर परम तत्व की खोज में दर्शन के दिग्गजों का।
प्रकृति का स्ट्रक्चरल डिज़ाइन ही इंसान को भगाने के लिए हुआ है। आदिमकाल में शिकारी जीवों से बचते-बचते और अपने जीवन के सस्टेनेंस के लिए इंसानी जमात को बहुत भागना पड़ा। इसी भागदौड़ में न जाने कब उसे ‘टू बी एक्टिव’ नाम के वायरस ने काट खाया! उस वायरस को आज तक मेडिकल साइंस शरीर से निकाल नहीं सकी है।
देखा जाए तो एक नवजात, एक नौजवान और एक नब्बे पार—तीनों ही भागने को उतारू हैं। सभी की चेतना कुछ-न-कुछ सेंसेशन्स पैदा करती है, जिनसे क्रिया का जन्म तय है। नवजात हाथ और पैर चलाता है, नौजवान ‘और’ की जगह योजक-चिह्न लगाकर ‘हाथ-पैर’ चलाता है, और नब्बे की सीमा पार कर चुका व्यक्ति ऊपर बताई गई दोनों विधियों में से किसी का प्रयोग करने की शारीरिक क्षमता नहीं रखता। इसलिए वह उम्र बढ़ने के इस प्राकृतिक नियम को गरियाते हुए, यहाँ से भाग जाने की तैयारी करने लगता है। आज के तमाम प्रचलित धर्म इसी भाग जाने की यात्रा के उत्तम प्रबंध की ज़िम्मेदारी लेने वाली विश्वसनीय ट्रैवल एजेंसियाँ हैं।
कुल जमा बात इतनी-सी है कि आज की सोशल ट्रेनिंग कुछ ऐसी है कि भागने वाला तब तक भागता रहता है, जब तक वह स्वयं को ही दबोच नहीं लेता। स्वयं को दबोच लेना प्रकृति से सीधे टक्कर लेने जैसा है और इस भिड़ंत में चोट से बचने का शर्तिया इलाज देने वाले ध्यान और मेडिटेशन सेंटर्स भी शहरों में बहुतायत से उपलब्ध हैं। वहाँ जाकर अमीर अपने ‘भागने’ की गति धीमी कर सकते हैं, लेकिन बेचारे ग़रीबों के पास यह सुविधा नहीं है। ज़माना इतना ख़राब हो चुका है कि अमीरों के भागते-भागते रुक जाने को ‘सेल्फ़ केयर’ या ‘आध्यात्मिक झुकाव’ कहा जाता है, जबकि ग़रीबों का रुक जाना कामचोरी और निकम्मापन कहलाता है। शायद अमीर होना आजकल आध्यात्मिक होने की पहली शर्त है।
अभी तक चर्चा के दायरे में वे लोग थे, जिन्हें मामूली समझा जाता है। मामूली कहने का मतलब यह है कि वे बिना किसी बोझ के भाग रहे हैं—हाइली इररिस्पॉन्सिबल तरीक़े से। समाज को देखते ही ‘भाड़ में जाए’ कहने वाले ये लोग पूरे मस्तमौला अंदाज़ में भागते हैं। सामने जो भी आता है, उसे कुचलते हुए आगे निकल जाते हैं। अंडर-डेवलप्ड चेतना के कारण राइट्स, जस्टिस और फ़ेयरनेस जैसे दैवीय शब्द इनकी समझ से बाहर रहते हैं।
दूसरे वे हैं, जो रिस्पॉन्सिबली भागते हैं। भागते-भागते अगर थक जाते हैं, तो रेस्ट करके फिर भागने लगते हैं। कोई अगर इनके सामने भागते-भागते गिर जाए, तो उसे कुचलने के बजाय उठाकर मरहम-पट्टी करते हैं और उसके बाद अपनी दौड़ फिर शुरू कर देते हैं। इन्हें समाज बुद्धिजीवी कहता है। असल में जीवित बुद्धि इन्हीं के पास होती है, क्योंकि अगर ये भागने में कहीं पीछे भी रह जाएँ, तो इनके पास यह कहने का अवसर रहता है कि हम तो राइट्स, जस्टिस और फ़ेयरनेस का बोझ उठाए भाग रहे थे, क़ायदे-क़ानून मान रहे थे, इसलिए हमारी फ़िनिश लाइन थोड़ी पहले रखी जानी चाहिए।
इसी कारण अंधाधुंध भागने वालों की फ़िनिश लाइन मौत के रूप में थोड़ी दूर पर होती है, जबकि ज़िम्मेदारी के साथ भागने वाले जीवित रहते हुए भी मोक्ष की फ़ीलिंग इंजॉय कर सकते हैं। उन्हें मरने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और अगर इन तमाम सेल्फ़-इंपोज्ड एफ़र्मेटिव एक्शंस के बावजूद कुछ कसर बाक़ी रह जाए, तो वे संतुष्टि को ही जीवन का सार घोषित करके बेतहाशा भागने वालों की सारी मेहनत पर पानी फेर देते हैं।
यह सरासर धोख़ेबाज़ी नहीं है तो और क्या है!
दोस्तों, भागदौड़ का पूरा प्रोपेगेंडा आज बुद्धिजीवियों द्वारा इंटेलेक्चुअली हाईजैक कर लिया गया है। घोर अन्याय छाया हुआ है। लेकिन फिर भी भारतीय न्याय-प्रणाली के ‘देर है, पर अंधेर नहीं’ वाले सिद्धांत पर विश्वास रखते हुए मुझे पूरी उम्मीद है कि न्याय एक दिन अवश्य होगा। और अगर देर कुछ ज़्यादा भी हो गई, तो भी चिंता की कोई बात नहीं। प्रथम कैटेगरी के अंधाधुंध धावकों के लिए फ़िनिश लाइन के उस पार—अर्थात् मृत्यु के बाद—भी उच्च कोटि के न्याय का पूरा प्रबंध है। नर्क में रखे गर्म तेल के जलते कड़ाहे आख़िर किस दिन काम आएँगे!
इसलिए, दोस्तों, चिंता की कोई बात नहीं है।
बुद्धिजीवियों को उनकी इस धोख़ेबाज़ी की सज़ा एक न एक दिन ज़रूर मिलेगी।
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