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अहमदाबाद : एक प्रवासी स्त्री की आँखों से

तीन वर्ष पहले जब मैं अहमदाबाद आई, तो लगा जैसे किसी अपरिचित भूमि पर क़दम रख रही हूँ। पर धीरे-धीरे यह शहर मेरे भीतर उतरने लगा। या शायद यूँ कहूँ कि यह कभी पराया लगा ही नहीं। अहमदाबाद में एक अद्भुत सहजता है। यह शहर बाँधता नहीं, अपनाता है। यह हर आने वाले को अपने में स्थान देता है, मानो कहता हो—“यहाँ सबके लिए जगह है।” 

मेरे लिए अहमदाबाद की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह शहर मुझे मेरे औरत होने की याद नहीं दिलाता। यहाँ सड़कों पर चलते हुए मुझे फब्तियों की चुभन महसूस नहीं होती, न तेज़ भागती सवारी के अनचाहे स्पर्श से सतर्क रहना पड़ता है, न चाय की दुकानों पर बैठे पुरुषों की निगाहें पीछा करती हैं। यह शहर मुझे मेरे लिंग से मुक्त कर देता है। यह भूलने देता है कि मैं ‘एक स्त्री’ हूँ क्योंकि यहाँ जीवन लिंग के भेद से परे, कर्म और व्यवहार के स्तर पर समानता में साँस लेता है।

मुझे अक्सर लगता है कि सुंदर स्थान वह नहीं जहाँ सिर्फ़ दृश्य रमणीय हों, बल्कि वह होता है जहाँ व्यक्ति अपने ‘पहचान के लेबलों’ को भूल सके। जहाँ न लिंग, न जाति, न धर्म कुछ भी उसकी आत्मा पर बोझ न बने। पर यह विस्मरण पूर्ण नहीं होता। अहमदाबाद मुझे मेरे लिंग की सीमाओं से मुक्त करता है, पर जाति की स्मृति से नहीं। एक शहर से दूसरे शहर की प्रवासी होने के नाते मैंने यहाँ पाया कि ‘जाति’ अब भी भारतीय सामाजिक ढाँचे की वह अदृश्य दीवार है जो शिक्षा, आधुनिकता और रोज़गार की प्रगति के बीच भी ज्यों की त्यों खड़ी है।

घर देखने जाओ तो पहला सवाल होता है—“आपकी जात क्या है?”

मेरी जात में मेरी कितनी भूमिका है, यह मैं नहीं जानती; पर इस समाज की रीत में वही मुझे सुरक्षित ठहरने का एक आधार देती है।

“क्या जात है?”

“ब्राह्मण हूँ।”

“कहाँ की?”

“बनारस की।”

“अरे, काशी की ब्राह्मण हैं आप! अच्छा, और भोजन?”

“प्याज़-लहसुन नहीं खाती, बस आलू।”

“अच्छा, तो जैनियों से थोड़ी दूरी पर हैं आप।”

हर बार यह संवाद एक हल्की हँसी और गहरी सोच साथ लाता है। मैं अक्सर सोचती हूँ, जब समाज भोजन और भक्ति के आधार पर दूरी नापने लगता है, तो उसकी सभ्यता किस दिशा में बढ़ रही होती है? मैं लिंग से भले ही मुक्त महसूस करूँ, पर जात अब भी मुझसे मुक्त नहीं हो पाई है। मेरे लिए जात कभी-कभी एक पहचान की ढाल बन जाती है, पर हर किसी को यह ढाल सुरक्षा नहीं देती। कहीं-कहीं तो जो मांसाहारी हैं, उनके लिए घर ढूँढ़ना ही संघर्ष बन जाता है।

लेकिन ठीक इसी जगह, मेरे अनुभवों के उलट, अहमदाबाद अपने अनोखे रेस्टोरेंट कल्चर के कारण एक अलग ही उदाहरण पेश करता है। भारत के अधिकांश हिस्सों में जहाँ भोजन को सख़्ती से ‘शाकाहारी’ और ‘मांसाहारी’ की दो श्रेणियों में बाँट दिया जाता है, वहीं अहमदाबाद इस विभाजन को अस्वीकार करते हुए संवेदनशीलता से पसंद और मान्यताओं दोनों को सम्मान देता है। वहीं आप को शाकाहार में भी तीन श्रेणियाँ देखने को मिल जाती है। यहाँ जैन और स्वामीनारायण जैसी सख़्त परंपराओं के बीच भी आपको शेष विकल्प मिल जाते हैं। वहीं दूसरी ओर आधुनिक रेस्तराँ में ग्लूटेन-फ़्री, वीगन और विशेष आहार विकल्पों की समझ देखकर मन सचमुच प्रभावित होता है। यह शहर भोजन को नियमों की दीवार नहीं बनाता, बल्कि लोगों की निजता और व्यक्तिगत जीवनशैली का सम्मान करता है।

फिर भी, कई आगंतुक कभी-कभी इस संवेदनशीलता को न समझकर गुजराती खाने का उपहास उड़ाते हुए कहते हैं—“हर चीज़ में चीनी डाल देते हैं!” यह बात मुझे हल्की ठेस पहुँचाती है। आख़िर जब कोई शहर आपको अपनाता है, आपकी भाषा, आपकी आदतें, आपकी उपस्थिति को बिना सवाल स्वीकार करता है तो क्या हमें भी थोड़ा-सा प्रयास नहीं करना चाहिए—उस मिठास में घुलने का? और यदि सच में दाल की उस हल्की मिठास को आप बर्दाश्त न कर सकें, तो भी कोई बाध्यता नहीं है; अहमदाबाद में पंजाबी थाली से लेकर हर प्रकार का पारंपरिक और आधुनिक भोजन आपकी पसंद के अनुसार मिल जाता है।

यही कारण है कि यह शहर किसी एक स्वाद, एक संस्कृति या एक पहचान में सीमित नहीं हो सकता। इसकी विविधता की व्याख्या एक ही शब्द में संभव नहीं ठीक वैसे ही जैसे यदि आपने आम खाया है तो ही आप आम की मिठास समझ सकते हैं; लेकिन अगर आपने केवल दशहरी ही चखा हो, तो आप कैसे जान पाएँगे कि केसर आम का स्वाद किस तरह अपनी अलग पहचान रखता है? अहमदाबाद भी उसी केसर के आम जैसा है अपनी विविधता, अपनी परतों और अपनी अनोखी मिठास के साथ, जिसे समझने के लिए आपको इसके भीतर उतरकर, इसके स्वादों और संस्कृतियों को सचमुच चखना पड़ता है।

फिर भी, यह शहर विरोधाभासों के बीच संतुलन साधना जानता है। हर व्यक्ति अपनी रुचि, अपने समूह, अपने विश्वास के साथ यहाँ किसी न किसी कोने में अपना छोटा-सा घरोंदा बना ही लेता है। अहमदाबाद बढ़ता है, फैलता है, और हर आने वाले को समाहित कर लेता है। अहमदाबाद की आत्मीयता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उसके इतिहास, संस्कृति और व्यवहार में गहराई से महसूस की जा सकती है। जैसा कि कभी समुद्र पार से आए पारसी समुदाय ने गुजरात की धरती पर शरण माँगी थी, तब तत्कालीन राजा जा‍दीराजा ने दूध के कटोरे में शक्कर घोलकर यह संदेश दिया था कि “यदि तुम घुलने-मिलने का वचन दो, तो यह भूमि तुम्हें अपने भीतर स्थान देगी और तुम भी इसे मीठा करोगे।” यह घटना सिर्फ़ इतिहास नहीं, बल्कि अहमदाबाद की सांस्कृतिक संरचना का मूल मंत्र है।

इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह शहर आज भी राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारत और देश के हर कोने से आए लोगों को पूरी आत्मीयता से अपनाता है। मैं स्वयं, एक प्रवासी स्त्री के रूप में, यहाँ महसूस करती हूँ कि लोग यह नहीं पूछते कि आप ‘कहाँ’ से आई हैं, बल्कि यह जानने में रुचि रखते हैं कि आप ‘क्या’ लेकर आई हैं; आपके अनुभव, आपकी भाषा, आपकी संस्कृति इस शहर की विविधता को और समृद्ध बनाते हैं।

अहमदाबाद की गलियों में घूमते हुए आप मारवाड़ी भोजनालयों की ख़ुशबू, बंगाली मिठाइयों की मिठास, पारसी बेकरी की महक, सिंधी कुकिंग, तमिल स्नैक्स, पंजाबी ढाबों और कठियावाडी भोजनालय की चहल-पहल सबको एक ही शहर में एक ही सहजता से साथ जीते हुए पा सकते हैं। गरबा की लय में राजस्थान की घुँघरू की आवाज़, पारसी त्यौहारों का सादापन, जैन परंपराओं की शांति, मुसलमानों की रूहानी संस्कृति और हिंदू त्योहारों की रंगीनियाँ यह सब मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक तस्वीर बनाते हैं, जिसमें कोई रंग दूसरे पर हावी नहीं होता, बल्कि सभी एक-दूसरे को पूरक बनाते हैं।

अहमदाबाद की यही विशिष्टता विविधता को गले लगाने की क्षमता उसे ऐसा शहर बनाती है, जहाँ हर बाहरी व्यक्ति को घर जैसा अपनापन मिलता है। यहाँ किसी को यह बोझ महसूस नहीं कराया जाता कि वह किसी और प्रदेश या संस्कृति से आया है; बल्कि उसकी पहचान को सम्मान और उसके योगदान को जगह दी जाती है। यही कारण है कि यह शहर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि संस्कृतियों का साझा घर है—जहाँ मेरी जैसी प्रवासी स्त्री भी ख़ुद को पूर्ण रूप से स्वीकारित, सुरक्षित और जुड़ी हुई महसूस करती है। 

गुजरात पर्यटन की प्रसिद्ध पंक्ति “कुछ दिन तो गुज़ारिए गुजरात में” यहाँ बसने वाले अनगिनत प्रवासियों के लिए बदल जाती है—“यहाँ रहिए, यहीं बस जाइए।” यह शहर लोगों को अस्थायी ठहराव नहीं, स्थायी अपनापन देता है। हाँ, जात का असर यहाँ भी है, पर वह केवल आवास की दीवारों तक सीमित रह गया है। कार्यक्षेत्र में यह दीवार धीरे-धीरे धुँधली होती जाती है। यहाँ किसी की पहचान उसके लिंग या धर्म से नहीं, बल्कि उसके काम, ईमानदारी और दक्षता से होती है।

इन्हीं सब बातों के बीच अहमदाबाद अपनी असली पहचान दिखाता है—कर्मनिष्ठा। यह शहर अपने काम में डूबे लोगों का शहर है। यहाँ परिश्रम केवल रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि जीवन की साधना है। सुबह की पहली किरण के साथ यह शहर जाग उठता है। कोई मंदिर की घंटियों के साथ, कोई चाय के स्टॉल पर भाप उठाते प्यालों के साथ, और कोई उस औरत की तरह जो अपनी कार से उतरकर फ़ोल्डिंग टेबल लगाती है, फ़्रूट सलाद और सूप बेचने के लिए तैयार होती है। वह जानती है कि सुबह टहलकर लौटते लोगों की पहली ज़रूरत स्वास्थ्य है और वह उस ज़रूरत को मुस्कान के साथ पूरा करती है।

शाम को वही औरत किसी कॉलेज के गेट पर दिख जाती है, जहाँ वह होममेड पेस्ट्रीज़ बेचती है। दिनभर की थकान उसके चेहरे पर नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वास की उजली रेखा में बदल जाती है। उसके हाथों से निकली हर पेस्ट्री में परिश्रम की मिठास है और यही इस शहर की आत्मा है।

अहमदाबाद में कर्म को लिंग से नहीं जोड़ा जाता। यहाँ काम करने वाली स्त्री और पुरुष के बीच कोई भेद नहीं केवल निष्ठा और ईमानदारी का मूल्य है। यहाँ हर कार्य सम्मानित है; कोई काम छोटा नहीं, कोई पेशा नीचा नहीं। हर काम एक धंधा है, और हर धंधा एक उद्योग। यहाँ तक कि एक ठेला लगाने वाला भी अपने को ‘व्यवसायी’ कहता है, और उसमें गर्व महसूस करता है। यह गर्व इस शहर की पहचान है। अहमदाबाद की धूल में भी एक आत्मसम्मान घुला है जो कहता है कि “जो श्रम करता है, वही सृजन करता है।” यहाँ श्रम का अर्थ केवल मेहनत नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक आस्था है।

पर अहमदाबाद केवल कर्मठ नहीं, वह उत्सवप्रिय भी है। यह शहर काम करता है, पर जीना नहीं भूलता। यहाँ कोई महीना ऐसा नहीं जब कोई उत्सव न हो। यहाँ की दीवारें भी रंग और ताल पर झूमती प्रतीत होती हैं। जन्माष्टमी की रातें यहाँ पत्ते खेलने, हँसी बाँटने और परिवार के साथ बैठने की रातें हैं। गणेश चतुर्थी आते ही गलियाँ फूलों से भर जाती हैं और नवरात्रि में पूरा शहर रंगों की लय में थिरकता है। गरबा की रातें—स्त्री और पुरुष दोनों के सामंजस्य की प्रतीक हैं। यहाँ नृत्य केवल उत्सव नहीं, संवाद है; हर क़दम में एक इतिहास धड़कता है, हर घूम में एक संस्कृति साँस लेती है। रंग-बिरंगे वस्त्र, चमकते गहने और मुस्कानें हर चेहरा मानो कह रहा हो, “यह मेरा भी शहर है।”

अहमदाबाद में काम और उत्सव के बीच कोई दूरी नहीं। यहाँ दिवाली के दिन तक दुकानें खुली रहती हैं, क्योंकि यहाँ उत्सव भी काम का हिस्सा है। कर्म और आनंद एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। फिर आते हैं वे पाँच दिन  जब पूरा शहर बंद हो जाता है। दिवाली के बाद का वह विश्राम परिवारों का एक साथ बैठना, देशाटन या विदेश भ्रमण पर निकलना, और लौटकर फिर उसी लय में लौट आना।

शहर रुकता नहीं, बस साँस लेता है। वह पाँच दिन का मौन, आने वाले वर्ष की ऊर्जा का संचय है। और फिर वही लय भागती बसें, फाफड़े और जलेबी की महक, हाईवे पर ट्रक की गड़गड़ाहट, और हर नुक्कड़ पर किसी की चाय की प्याली से उठता धुआँ। होली के अवसर पर इस शहर की सबसे सुंदर बात यही है। यहाँ होली में हुड़दंग नहीं, उल्लास है। स्त्री और पुरुष साथ में पूजन करते हैं, रंग खेलने से पहले आत्मीयता की ज्योति जलाते हैं। यहाँ रंग केवल चेहरे पर नहीं लगते, दिलों पर भी छा जाते हैं। इस शहर का उल्लास संयमित है, उसमें शोर नहीं, शांति की लय है। यह शहर हँसता भी है तो मर्यादा के साथ, और झूमता भी है तो संस्कार के साथ।
कहा जा सकता है कि अहमदाबाद वह नगर है—जहाँ श्रम और उल्लास एक ही वाक्य के दो शब्द हैं। जहाँ काम पूजा है और उत्सव उसका आशीर्वाद। जहाँ लोग अपने जीवन को रोज़ कमाते नहीं, उसे रोज़ रचते हैं। रात में रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट लौटते हुए यहाँ भय नहीं लगता क्योंकि रास्तों पर सिर्फ़ वाहन नहीं, आत्मविश्वास चलता है और उसके साथ चलती हैं—अनेक स्त्रियाँ, मेरी ही तरह। कोई अपनी ड्यूटी पूरी कर लौट रही है, कोई सफ़र पर निकल रही है, कोई बस अपनी उड़ान से पहले एक चाय की चुस्की ले रही है। यह दृश्य बताता है कि अहमदाबाद की रातें, डर की नहीं, विश्वास की साथी हैं। यह शहर स्त्रियों को केवल सुरक्षा नहीं देता, उन्हें अपने निर्णय लेने की जगह भी देता है। यहाँ स्वतंत्रता, सतर्कता से जुड़ी है और यही संयम इसे सुरक्षित बनाता है। विश्वविद्यालयों की ट्रिपें हों या देर रात कोई कार्यक्रम, माताएँ तीन बजे भी अपनी बेटियों को छोड़ने आती हैं। यह दृश्य केवल ज़िम्मेदारी का नहीं, बल्कि आत्मबल और विश्वास का प्रतीक है। यह शहर स्त्री के साथ ‘सहानुभूति’ नहीं दिखाता, बल्कि उसे ‘समानता’ से देखता है  और शायद इसी वजह से यहाँ की स्त्री सचेत भी है, स्वतंत्र भी, और शहर के लिए आवश्यक भी। अहमदाबाद की स्त्रियाँ इस शहर की नब्ज़ हैं। वे मौन नहीं, मंथन हैं। वे उस बुद्धि और संवेदना की संगति हैं।

जिसने इस शहर को केवल उद्योग का नहीं, विचार का नगर बनाया है। यहाँ की स्त्री अपने जीवन को सिद्ध करने नहीं, समझने निकली है। वह प्रश्न पूछती है, और उत्तर भी रचती है। कभी मंच पर नृत्य की मुद्रा में, कभी प्रयोगशाला में विज्ञान के सूत्र में, और कभी किसी सड़क किनारे सजे ठेले पर अपनी मेहनत की मुस्कान में।

कस्तूरबा गांधी इस शहर की आत्मा की तरह हैं—मौन, दृढ़ और करुणामयी। उन्होंने सत्याग्रह को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक आंदोलन बनाया। उनकी उपस्थिति ने साबरमती आश्रम को स्त्री-संवेदना और सहनशीलता का प्रतीक बनाया; जहाँ सत्य, सेवा और त्याग, जीवन का स्वाभाविक क्रम बन गया। गिरा साराभाई के स्थापत्य में जो अनुपात और लय है, वह केवल संरचना नहीं, सोच की ज्यामिति है—जहाँ दीवारें भी संवाद करती हैं। मृणालिनी और मल्लिका साराभाई की नृत्यकला में जो प्रश्न उठता है, वह समाज की आत्मा का प्रतिबिंब है। जहाँ गति, केवल सौंदर्य नहीं, विचार बन जाती है। इनके साथ अनगिनत अनाम स्त्रियाँ हैं, जो पुस्तकालयों में, प्रयोगशालाओं में, शिल्प, वस्त्र और शिक्षा के क्षेत्र में अपने विवेक से इस शहर की चेतना को रोज़ गढ़ रही हैं। अहमदाबाद की स्त्री में श्रद्धा और बुद्धि का दुर्लभ संतुलन है। वह कर्म करती है, पर कर्म को प्रश्न करने की बुद्धि भी रखती है। वह परंपरा को निभाती है, पर उसमें बँधती नहीं। उसका स्त्रीत्व किसी भूमिका का नहीं, बल्कि एक स्थिति का प्रतीक है। जहाँ संवेदना और निर्णय एक ही दिशा में प्रवाहित हैं। वह जानती है कि सौंदर्य केवल देह में नहीं, विचार में भी होता है और यही विचार उसे इस शहर की सबसे जीवंत ऊर्जा बनाता है। वह इतिहास की धारा से नहीं बहती, बल्कि समय की दिशा मोड़ देती है—शांत, लेकिन अडिग विश्वास के साथ।

यहाँ का संबोधन भी अनोखा है। हर नाम के आगे ‘भाई’ या ‘बेन’ जुड़ा होता है। मानो हर रिश्ता पहले से ही एक मर्यादा में लिपटा हो। बच्चे अपने पिता के नाम के साथ भी ‘भाई’ जोड़ते हैं। पहली बार सुनो तो हँसी आती है, पर धीरे-धीरे यह संबोधन आत्मीयता का रूप ले लेता है। इस एक शब्द में जो ऊष्मा है, वही अहमदाबाद की सामाजिक बनावट की जड़ है। यह शहर हर व्यक्ति को ‘जी’ की तरह सम्मान देता है। यहाँ संवाद में भी आदर है, और व्यवहार में भी एक सूक्ष्म गरिमा।

घर की मुखिया औरत हो या न हो, पर अहमदाबाद के घरों में वह समान अधिकारी ज़रूर है। पाँच दिन वह घर या दफ़्तर के काम में व्यस्त रहती है, पर सप्ताहांत आते ही उसकी रसोई भी छुट्टी पर होती है। परिवार जलेबी, फाफड़ा, ढोकला या गोटा पैक करता है, और फिर निकलता है। किसी रेस्तराँ की कतार में या किसी पार्क की घास पर। जो बाहर खाना नहीं खा सकते, वे भी घर का बना खाना साथ लाते हैं। वहाँ बच्चे खेलते हैं, बड़े बातें करते हैं, और हवा में तली हुई बेसन और हिंग की ख़ुशबू के साथ जीवन का उत्सव धीरे-धीरे खुलता है।

यह दृश्य किसी प्रदर्शन का नहीं, बल्कि साझेदारी और सम्मान की संस्कृति का है।  जहाँ स्त्री को केवल श्रम का दायित्व नहीं, बल्कि विश्राम का अधिकार भी दिया जाता है। अहमदाबाद के घर समझते हैं कि जीवन सिर्फ़ कमाने का नहीं, बल्कि बाँटने का भी नाम है। जहाँ आराम भी एक सामूहिक संस्कार है। यह शहर अपने नागरिकों को सिखाता है कि सुरक्षा का अर्थ केवल दीवारों से नहीं, विश्वास से होता है। यह समरसता का वह सूत्र है, जहाँ हर रिश्ता ‘भाई’ और ‘बेन’ से शुरू होता है, और ‘मानवता’ पर आकर ठहरता है।

अहमदाबाद शहर में मेरा व्यक्तिगत सरोकार मुस्लिम परिवेश से अपेक्षाकृत सीमित ही रहा है; परंतु पुराने अहमदाबाद में विद्यार्थियों के साथ की गई शैक्षणिक यात्राओं और अकादेमिक चर्चाओं के दौरान इस्लामिक कारीगरी, मस्जिदों और मदरसों के स्थापत्य-अध्ययन के माध्यम से जिस मुस्लिम समाज से मेरा परिचय हुआ, वह अनुभव अत्यंत समृद्ध और विस्मयकारी रहा है। पुराने शहर की गलियों में ईरानी चाय की दुकानों की आत्मीयता, बिकते इत्र और अगरबत्तियों की सुगंध—जो गलियों में उसी तरह बस जाती है, जैसे अहमदाबाद की सांस्कृतिक स्मृति—मुस्लिम समाज की उपस्थिति को किसी अलग पहचान के रूप में नहीं, बल्कि शहर की साझा संवेदना के रूप में स्थापित करती है। एक शिल्प-इतिहास की शोधार्थी होने के नाते दाऊदी बोहरा समुदाय की पारंपरिक टोपियों ने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया—वे टोपियाँ जिन्हें बोहरा समाज की स्त्रियाँ स्वयं हाथों से बनाती हैं और जिन्हें पुरुष ‘सिर का ताज’ मानकर पहनते हैं। चलते-फिरते बोहरा मुस्लिम पुरुषों को यह टोपी पहने देखना शिल्प और जीवन के सहज सहअस्तित्व का ऐसा दृश्य रचता है, जो भीतर तक सुख देता है। इसी क्रम में, वर्षों से मेरे दो मुस्लिम सहकर्मियों के स्नेह, सहयोग और आपसी सद्भाव ने मेरे कार्यस्थल को एक सुंदर घर जैसा बना दिया है। इनके अतिरिक्त, मेरी ब्यूटीशियन मुस्कान की बातें धर्म और वर्ग से परे स्त्रियों के साझा संघर्ष को एक ही धरातल पर ले आती हैं, जहाँ ऊँच-नीच और भेद की आशंकाएँ स्त्रीत्व के सामने क्षीण पड़ जाती हैं। एक टेक्सटाइल कलाकार के रूप में छिपा समुदाय के आसिफ़ भाई मेरे महत्त्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं| मेरे खादी के वस्त्रों को प्राकृतिक रंगों से जिस शुद्धता और स्थायित्व के साथ वह रंगते हैं, वह सहयोग मेरे सृजन की आधारशिला बन जाता है। यह संबंध ठीक उसी तरह है जैसे अहमदाबाद में गांधी के खादी-दर्शन और मुस्लिम छीपाओं की रंगाई परंपरा का ऐतिहासिक सहजीवन—जहाँ संघर्ष नहीं, सहयोग शहर की धुरी बनता है। इसी धुरी पर खड़ा अहमदाबाद मुझे आज भी एक जीवंत, मानवीय और साझा नगर के रूप में दिखाई देता है।

अहमदाबाद एक निरंतर बदलता हुआ शहर है। समय की रेखा पर अतीत और वर्तमान के बीच खड़ा एक सजीव पुल। यह वह स्थान है, जहाँ इतिहास और आधुनिकता एक-दूसरे को नकारते नहीं, बल्कि साथ-साथ साँस लेते हैं।

साबरमती नदी इस शहर के मध्य से बहती है, मानो समय की धारा स्वयं यहाँ रूप धारण कर बैठी हो। यह नदी केवल भौगोलिक विभाजन नहीं, बल्कि दो युगों के बीच संवाद का माध्यम है। एक किनारे पर विरासत है, दूसरे पर नवाचार। नदी के एक ओर है पुराना अहमदाबाद, जहाँ हवेलियाँ, पोल घर आज भी लकड़ी की साँसें लेती हैं, झरोखों की जालियों में अब भी प्रार्थनाएँ अटकी हैं, और गलियों की गूँज में एक प्राचीन आत्मा बोलती है। पोलों की सँकरी गलियों से गुज़रते हुए ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो हर दीवार, हर दरवाज़ा एक स्मृति का दस्तावेज़ है। यह वही हिस्सा है जिसे आज ‘Heritage of Ahmedabad’ कहा जाता है। यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित वह क्षेत्र, जहाँ इतिहास किसी म्यूज़ियम में नहीं, बल्कि लोगों के रोज़मर्रा के जीवन में साँस लेता है। माणेक चौक की चहल-पहल, रतनपोल की भीड़, दिन में सराफ़ा बाज़ार और रात में खाने का रात्रि बाज़ार जहाँ सोने की चमक और खाने की महक एक ही लय में घुल जाती है। यहीं हैं वे ईरानी चाय की दुकानें जहाँ कड़क चाय और बन-मस्के की मिठास अतीत की दुनिया को वर्तमान की थकान से जोड़ती है। और वही ‘लकी टी स्टॉल’ जहाँ कब्रों के बीच बैठकर लोग चाय पीते हैं, और दीवारों पर एम.फ. हुसैन की कलाकृतियाँ जीवन और मृत्यु के बीच संवाद रचती हैं। यह शहर विरोधों में नहीं, सह-अस्तित्व में विश्वास करता है, जहाँ स्मृति और आधुनिकता एक ही कप चाय में डूबी मिलती हैं। पुराने शहर के इस हिस्से में भद्रा किला, सिद्दी सैय्यद की जाली, जामा मस्जिद, हठीसिंह मंदिर और जैन डेरासर एक साथ खड़े हैं। जैसे किसी एक आकाश में अलग-अलग धर्मों के दीप जल रहे हों। यहाँ धर्म नहीं, धड़कनें एक हैं। यही वह बिंदु है जहाँ सभ्यता ने ख़ुद को सीमाओं से मुक्त किया है। जहाँ मस्जिद की अजान और मंदिर की घंटियाँ कभी एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक साझा संगीत का हिस्सा लगती हैं।

और जब आप साबरमती के पुल पार करते हैं, तो लगता है जैसे किसी काल-रेखा पर एक युग से दूसरे युग में प्रवेश कर रहे हों। नदी के उस पार है नया अहमदाबाद  विकास, ज्ञान और नवाचार की भूमि। यहाँ शहर की धड़कनें अब प्रयोगशालाओं में सुनाई देती हैं—NID, IIM, ISRO, LD Museum जैसे संस्थानों में, जहाँ डिज़ाइन, विज्ञान और प्रबंधन मिलकर आधुनिक भारत की नई संवेदना रचते हैं। यह वही अहमदाबाद है, जहाँ गांधीजी के सत्याग्रह की प्रेरणा भी जन्मी, और भारत के अंतरिक्ष सपनों की शुरुआत भी हुई। यह शहर अतीत को मिटाता नहीं, बल्कि उसके बग़ल में भविष्य की इमारत खड़ी करता है। यह वह दुर्लभ संस्कृति है जहाँ स्मृति और सृजन दोनों को बराबर सम्मान मिलता है।

मुझे इस शहर का विकास एक कलर स्केल जैसा लगता है। एक छोर पर इतिहास का गाढ़ा रंग है, दूसरे छोर पर आधुनिकता की हल्की सफ़ेदी। दोनों के बीच फैला हुआ है अनुभव का पूरा स्पेक्ट्रम, जहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे में घुलकर एक नया रंग बनाते हैं। अहमदाबाद का अपना, अद्वितीय रंग। अहमदाबाद की आधुनिकता केवल ऊँची इमारतों में नहीं, बल्कि उसकी स्मृति के संरक्षण में दिखाई देती है। यह शहर अपने अतीत को संग्रहालयों में बंद नहीं करता, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में साथ लेकर चलता है।

जब आप इस शहर में चलते हैं, तो लगता है जैसे इतिहास ने ख़ुद को मिटाया नहीं, बल्कि नए रूप में पुनर्जन्म लिया है। यहाँ विकास की परिभाषा ‘पुराने को तोड़ना’ नहीं, बल्कि ‘उसे नए अर्थ देना’ है। यही इस शहर की स्थापत्य चेतना है, जहाँ संरक्षण ठहराव नहीं, बल्कि संवाद है। NID की ख़ुली दीवारें, CEPT की छतों पर बैठी धूप, और LD Museum की छाया: ये सब इस बात के प्रतीक हैं कि यहाँ ज्ञान भी जगह माँगता है, और जगह भी ज्ञान देती है। अहमदाबाद ने अपने शिक्षण संस्थानों को केवल भवनों के रूप में नहीं, बल्कि विचार के परिसर के रूप में गढ़ा है। यह शहर स्थापत्य को केवल रूप नहीं, रस भी देता है। यहाँ Louis Kahn का लाल पत्थर जब शाम की रोशनी से छूता है, तो वह रंग मात्र नहीं, एक अनुभव बन जाता है। यहाँ B. V. Doshi का ‘Sangath’ सिर्फ़ एक भवन नहीं, बल्कि संवाद का स्थान है। जहाँ पानी, हवा और प्रकाश एक-दूसरे से बात करते हैं। यहाँ स्थापत्य तत्वों का मेल नहीं, तत्वज्ञान है। अहमदाबाद की यह स्थापत्य दृष्टि किसी युग या विचारधारा की बंधक नहीं। यह एक सांस्कृतिक संयोजन है, जहाँ भारतीय परंपरा पश्चिमी तकनीक से टकराती नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाती है। इस तालमेल में जो स्वर गूँजता है, वह भारतीय आधुनिकता का स्वर है जिसकी जड़ें स्थानीय मिट्टी में हैं, पर शाखाएँ विश्व की ओर फैली हुई हैं। इसी आधुनिक चेतना को आगे बढ़ाते हैं, यहाँ के संग्रहालय और सांस्कृतिक स्थल। Calico Museum of Textiles में सूत्र और इतिहास एक साथ बुने जाते हैं। यहाँ कपड़ा केवल वस्त्र नहीं, एक सभ्यता की बुनावट है। हर धागा अतीत की स्मृति है, हर रंग किसी युग का मनोविज्ञान। LD Museum में पत्थर और मूर्तियाँ धर्म और सौंदर्य के संवाद रचती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि भक्ति और कला हमेशा एक ही धरातल पर फलती हैं। Vechaar Utensil Museum में मिट्टी और धातु की वस्तुएँ किसी इतिहास की नहीं, बल्कि जीवन की कहानी सुनाती हैं। वहाँ हर बर्तन एक परिवार की स्मृति है, हर घड़ा किसी स्त्री की चुप्पी का रूपक। Vishalla Museum में गाँव का जीवन शहर की गोद में बैठा है। यहाँ मिट्टी की गंध, बांस की छाया, और लोककला की सहजता शहर के तेज़ जीवन में एक विराम की तरह आती है। यह संग्रहालय हमें याद दिलाते हैं  कि विरासत केवल “संरक्षित वस्तु” नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि है  जो पुराने में भी नया देख सके।

यहाँ तक कि रविवारी बाज़ार भी एक जीवंत संग्रहालय है, जहाँ सिक्के, पुराने रेडियो, किताबें, तस्वीरें समय की धूल में चमकते रहते हैं। यह बाज़ार बताता है कि अहमदाबाद अपने अतीत को बेचता नहीं, बल्कि उससे बातचीत करता है। यह संवाद कभी शब्दों में नहीं, वातावरण में होता है। एक ऐसी हवा में जो पुराने और नए दोनों को पहचानती है। अहमदाबाद की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह आधुनिकता को स्मृति से जोड़कर जीता है। यहाँ स्थापत्य, संग्रहालय, गलियाँ, और लोग सब मिलकर यह सिखाते हैं कि सभ्यता का अर्थ केवल निर्माण नहीं, बल्कि निरंतर स्मरण है। यह शहर अपने हर भवन में यह कहता प्रतीत होता है—“अतीत मेरे भीतर है, और भविष्य मेरे हाथों में।”

अहमदाबाद के स्थापत्य की विरासत केवल इमारतों में नहीं, बल्कि घरों की आत्मा में बसती है। तीन वर्ष हुए मुझे इस शहर में आए, पर जब भी पुराने इलाक़ों से गुज़रती हूँ कहीं किसी बरामदे में झूलता लकड़ी का झूला देख लेती हूँ, तो लगता है, जैसे यह शहर अब भी अपने पुराने दिल की धड़कन सुनता है। अहमदाबाद के घरों में झूला सिर्फ़ एक फ़र्नीचर नहीं था, वह संवाद का केंद्र था—जहाँ शाम की चाय, घर की हँसी और दिनभर की थकान धीरे-धीरे एक साथ झूलती थीं। वह झूला घर को गति देता था, और शायद लोगों को भी एक लय सिखाता था—कब रुकना है, और कब फिर धीरे से चलना है। मैंने इसे पहली बार देखकर सोचा था, यह केवल बैठने की चीज़ नहीं, बल्कि घर की नब्ज़ है। पर आज, जब नए अपार्टमेंट्स के बीच से गुज़रती हूँ, तो देखती हूँ  वह झूला अब कहीं ग़ायब है। आँगन, जहाँ कभी हवा रुकती थी, अब ‘यूटिलिटी एरिया’ कहलाने लगा है। बालकनी, जो कभी तुलसी और हँसी दोनों की जगह थी, अब बस ‘स्टैंडिंग स्पेस’ रह गई है। शहर ऊपर बढ़ गया है, पर शायद भीतर से थोड़ा सिकुड़ गया है।

कभी-कभी सोचती हूँ, क्या स्थापत्य की संवेदना बदल गई है, या यह शहर अपने ही बढ़ते भार से झुकने लगा है? अब घर ऊँचे हैं, पर छतों पर तारों की जगह रोशनी के बल्ब हैं। बंगले जो कभी हवा और संवाद के खुले मैदान थे, अब सीमित वर्गमीटरों में बदल गए हैं। फिर भी, अहमदाबाद की आत्मा कहीं खोई नहीं वह हर पुरानी हवेली के झूले में झूलती है, हर बरामदे की हवा में अभी भी वही परिचित ऊष्मा है। यह शहर मानो कहता है— 

“मैंने अपने घर बदले हैं, पर अपने झूले नहीं।
 वे अब भी मेरी स्मृतियों में धीरे-धीरे झूल रहे हैं।”

इन सबके मध्य जो सबसे अधिक व्यथित करने वाला है, वह है साबरमती की स्थिति। वही साबरमती जो कभी इस शहर की जीवनधारा थी, आज स्वयं जीवन से रिक्त खड़ी है। अब उसमें बहता पानी उसका अपना नहीं, वह नर्मदा से उधार लिया गया जल है—उधार का प्रवाह, उधार की साँसें। रिवरफ़्रंट आज आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है—सीधी सड़कें, पक्के किनारे, और चमकदार रोशनियाँ। पर इन्हीं रोशनियों की छाया में सभ्यता की जननी वह नदी मौन खड़ी है। उसके बहाव की जगह अब साज-सज्जा है, और उसके किनारों पर प्रकृति की जगह व्यापार ने घर बना लिया है। नदी का स्वर, जो कभी प्रार्थना-सा लगता था, अब पर्यटक- क्रूज़ के इंजनों की गड़गड़ाहट में खो गया है। कभी-कभी यह दृश्य भीतर तक हिला देता है  मानो सोती हुई नदी पर कोई भार रख दिया गया हो, उसकी शांति बाँध दी गई हो, उसकी आत्मा को कंक्रीट के जाल में जकड़ दिया गया हो। मैंने पहली बार किसी नदी को पूरा पानी से विहीन होकर ‘साफ़’ होते देखा है। गर्मी बढ़ती है तो वही उधार का पानी धीरे-धीरे सड़ने लगता है, उस पर जलकुंभी फैल जाती है, और दिनभर सफ़ाई की मशीनें घूमती रहती हैं  मानो कोई चुपचाप किसी अंत्येष्टि की तैयारी कर रहा हो।

कभी सोचती हूँ कि क्या इसे अब भी साबरमती कहूँ? या यह अब मनुष्य के मनोरंजन का सीमेंट का गलियारा बन चुकी है? पर फिर भीतर से एक और आवाज़ उठती है—“नहीं, मैं औरत हूँ,  मैं किसी नदी को नाले होने की गाली नहीं दे सकती।” क्योंकि नदी सिर्फ़ पानी नहीं होती, वह शहर की स्मृति होती है, वह उसकी साँसों की नमी होती है, वह उसकी आत्मा की छाया होती है। सच कहूँ तो, कोई भी शहर उतना ही जीवित होता है, जितनी जीवित उसकी नदियाँ। नदी का वेग ही शहर की धड़कन है, उसकी मिट्टी की गंध ही उसकी पहचान है, और उसका बहाव ही उसका आत्मविश्वास।

अहमदाबाद केवल एक शहर नहीं, एक अनुभव है जो बार-बार आपको भीतर झाँकने पर मजबूर करता है। यहाँ संस्कृति और विकास, परंपरा और आधुनिकता,  स्त्री और शहर सब एक साथ साँस लेते हैं। पर कभी-कभी ऐसा लगता है, जैसे इन सबके बीच नदी की साँस अटक गई हो। यह शहर अपने पुलों की तरह ही जीवन को जोड़ता है—अतीत से वर्तमान तक, मनुष्य से मनुष्य तक। और शायद अब समय आ गया है कि हम यह पूछें क्या हम अपनी नदियों से भी उतनी ही करुणा से जुड़े हैं, जितनी उनसे ऊर्जा लेते हैं? क्योंकि जब कोई नदी मौन हो जाती है, तो शहर का संगीत भी अधूरा पड़ जाता है। और जो शहर अपनी नदी का संगीत नहीं सुन सकता, वह चाहे जितना भी उजला दिखे, उसके भीतर एक गहरा अँधेरा बहता है।

अंततः गंगा किनारे जन्मी एक स्त्री ने साबरमती के तट पर यह जाना। सुंदर शहर वह नहीं जो चमकता है, बल्कि वह है जहाँ इंसान और पशु एक-सी साँस लेते हैं, जहाँ नदियाँ निर्भीक बहती हैं, जीवन भय से मुक्त होता है। और शायद अब तक कोई भी शहर पूरा-पूरायह कहला पाने जितना सुंदर नहीं हुआ।

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