आवारा कुत्तों का मसीहा
आर्यन प्रजापति
17 अक्तूबर 2026
उन दिनों की बात है, जब गाँव में थोड़ी अनबन चल रही थी। उन्हीं दिनों एक आदमी अफ़ीम बेचता था और पैसे कमाता था, लेकिन उन पैसों के बारे में किसी को पता नहीं चलने देता था। बहुत कम लोगों को पता था कि वह अफ़ीम बेचता है। उसका साइड बिज़नेस था ‘मनमस्त पान भंडार’, जहाँ वह सबके पान में चूना लगाता था। किसको कितना चूना लगाना है, इसका उसे पूरा ज्ञान था। एक-एक दिन बीतता गया और वह इतनी सफ़ाई से चूना लगाता गया कि गाँव में पान खाने वाले सब ख़ुश थे। जो नशा करते थे, वे भी उसकी चतुराई से ख़ुश थे। उन्हें अफ़ीम मिलती रही और वे धीरे-धीरे उस आदमी के लिए कुछ भी करने को तैयार होते गए।
आदमी बुरा हो या अच्छा, लेकिन अगर किसी की कृपादृष्टि उस पर हो या वह किसी के काम आ रहा हो, तो उसका साथ वह कभी नहीं छोड़ना चाहता। उस गाँव के लोग भी इसी सिद्धांत पर चल रहे थे। पहले उसने पैसे लेकर अफ़ीम देना शुरू किया था, लेकिन अब वह मुफ़्त में अफ़ीम देने लगा था। नशे में धुत लोगों को इससे कोई मतलब नहीं था कि ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है। जब उन्हें अपनी चीज़ मुफ़्त में मिलने लगी, तो वे उसे अपना मसीहा मानने लगे।
सरपंच ये सब देखता रहा। उसने अपने चंद आदमियों को इस काम में लगा दिया कि पता करें, गाँव में क्या चल रहा है और वह आदमी यहाँ क्यों आया है। सरपंच के आदमी उस आदमी के पान भंडार के चक्कर लगाने लगे। वह भी इतने दिनों से चूना लगाता आ रहा था कि उसे पता था कि कितने चूने से जीभ कट सकती है और कितने से नहीं। सरपंच के आदमी उस पर नज़र रखते और वह चूना लगाते हुए उन आदमियों पर। उसकी पारखी निगाह ने भाँप लिया कि उन आदमियों को किस चीज़ की ज़रूरत है। पाँच आदमियों में से तीन को उसने मुफ़्त में अफ़ीम की लत लगा दी और वे भी उसकी ख़ुशामद करने लगे। दो आदमी पक्के निकले।
एक दिन सरपंच ने अपने आदमियों को बुलाया और पूछा, “क्या ख़बर है?”
दो आदमी पहुँचे। तीन ग़ायब थे।
सरपंच ने पूछा, “वे तीनों कहाँ हैं?”
पहले आदमी ने अब तक की पड़ताल का पूरा ब्योरा देना शुरू किया—“मालिक! गाँव के हालात ख़राब हैं। आप कुछ दिनों के लिए क्या बाहर गए, यहाँ तो सारी चीज़ें बदल गईं। यहाँ के लोग बदल गए और मालिक यहाँ तक कि पेड़-पौधे और पशु भी मुझे बदले-बदले से लग रहे हैं। और वे तीनों भी उसी सबमें बदल गए हैं।”
सरपंच का धैर्य टूट गया। वह बोला, “ससुर के नाती, भूमिका ही बाँधेगा कि कुछ आगे भी बताएगा?”
दूसरे आदमी ने तपाक से कहा, “मालिक! गाँव के चंद पढ़े-लिखे मर्दों और बच्चों को छोड़कर, बाक़ी सारे पढ़े-लिखे और अनपढ़ मर्द, यहाँ तक कि बच्चे भी अफ़ीम के नशे में धुत रहने लगे हैं। और तो और सब उस आदमी के ख़ुशामद-टट्टू बन गए हैं। मालिक, मर्दों और बच्चों तक तो समझ में आता है, लेकिन औरतें भी उसके गुणगान गाने लगी हैं। मेरी वाली से पड़ताल कराने पर पता चला कि वह औरतों को अफ़ीम के मुनाफ़े का पैसा—यानी उनके घर का पैसा—उन्हीं को देकर ख़ुद मसीहा कहलवा रहा है।”
सरपंच ने पूछा, “कहाँ से आया है और यह सब क्यों कर रहा है, कुछ पता चला?”
पहले आदमी ने जवाब दिया, “मालिक, सब कह रहे हैं कि वह समाजसेवा का काम करता है। बीवी-बच्चे, घर-परिवार कुछ नहीं है। जो दोस्तपुर है, जहाँ के लोग बहुत पढ़े-लिखे हैं, वहाँ से उसे भगाया गया था। अभी यहीं अपना ‘मनमस्त पान भंडार’ खोला है, वह भी घंटू की ज़मीन पर।”
सरपंच ने उन्हें जाने के लिए कह दिया और ख़ुद दोलन-कुर्सी पर बैठकर सोचने लगा कि जिस आदमी के पास बीवी-बच्चे और घर-परिवार नहीं हैं, वह इतना पैसा क्यों कमा रहा है और यहाँ मुफ़्त में क्यों बाँट रहा है? समाजसेवा तो अच्छी चीज़ें बाँटकर होती है। वह बच्चों को शिक्षा दिलाता, सबको किसी न किसी काम में लगाता। यह तो सब उल्टा कर रहा है।
सरपंच पढ़ा-लिखा था और इतिहास की जानकारी भी थोड़ी-बहुत रखता था। उसने सारी चीज़ों को इतिहास से जोड़कर देखा, तो उसे अँग्रेज़ों की नीतियों और भारत पर राज करने के उनके तौर-तरीक़ों की याद आई। लेकिन फिर सरपंच का दिमाग़ फिरा और उसने सोचा कि जिस आदमी के पास परिवार और बच्चे न हों, जो फ़क़ीर हो, उसे क्या सत्ता-सुख की ज़रूरत होगी? यही सोचकर उसने सब कुछ नज़रअंदाज़ कर दिया और अपने नियमित कामों में लग गया।
देखते-देखते साल बीत गए और गाँव के हालात बिगड़ने लगे। गाँव के सभी आदमी और बच्चे दिन-रात नशे में डूबे रहते थे और औरतों की आँखें पैसों से बंद हो गई थीं। उन्हें बस मसीहा दिखाई देता था और उसकी अच्छाई सुनाई देती थी।
सरपंच अपने दो आदमियों के साथ अब सबके दुआर जाने लगा, लेकिन नशे और पैसे में डूबे लोगों के सामने कुछ कहना व्यर्थ था। गाँव की औरतों, मर्दों और बच्चों का यही हाल था। सरपंच अब परेशान रहने लगा। उसका एक आदमी आधी कहावत बोलकर चुप हो जाता, “अब पछताए होत क्या...”
सरपंच अब तरकीबें खोजने लगा कि गाँव को कैसे बचाया जाए। वह अपने दो आदमियों के साथ गाँव को अच्छे दिनों के सपने दिखाने के बजाय अच्छे दिन लाने का प्रयास करने लगा। वह तरह-तरह की तरकीबें आज़माता और अफ़ीम के धंधे को बंद कराने तथा उस आदमी को गाँव से बाहर निकालने का प्रयास करने लगा।
अफ़ीम बेचने वाला सबसे हँसकर बोलता। कोई उसे गाली देता या उसकी बुराई करता, तो भी वह बुरा नहीं मानता। हालाँकि अब ऐसे चंद लोग ही बचे थे, जो उसकी बुराई करते थे। वे भी पीठ पीछे ही ऐसा करते थे। सामने खड़े होकर उसका विरोध करने का साहस सिर्फ़ सरपंच और उसके दो आदमियों में था। धीरे-धीरे सरपंच और उसके दोनों आदमी अफ़ीम बेचने वाले के रास्ते के काँटे बनने लगे।
वह आदमी परेशान रहने लगा। अब भला अपने मसीहा को परेशान देखकर उसके चेले कैसे चुप रहते? चेले सरपंच को जहाँ देखते, उसके पीछे दौड़ने लगते। सरपंच भागता रहता। कोई आदमी आख़िर कितना भाग सकता है?
एक महीना बीत गया था। चौराहे पर भीड़ जमा थी और लोगों के बीच ख़ुशी का माहौल था। अफ़ीम बेचने वाले को आधिकारिक रूप से सरपंच घोषित कर दिया गया था।
सरपंच के दोनों आदमी ग़ायब थे। लोगों ने गाँव में यह ख़बर फैला दी कि सरपंच ने चौराहे के पेड़ पर फाँसी लगा ली थी। उसके सीने पर लटकती तख़्ती पर लिखा था—“आछे दिन पाछे गए...”
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