मानवीय संबंध का ज़बरदस्ती कोई नाम देना, उसके महत्व को घटा डालने वाली बात होती है।
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पत्रकार और साहित्यकार की हैसियत से लिखे गए रघुवीर सहाय के लेखों में, रघुवीर सहाय की विनोदप्रियता का भले ही कोई प्रमाण न मिलता हो—उसके साहित्य-संस्कृति-प्रेम का परिचय भरपुर मिलता है।
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अक्सर यह देखा गया है कि जिस बड़े व्यक्ति का आपको लम्बा सान्निध्य मिला हो, उसकी कोई अदा, कोई भंगिमा, कोई तक़ियाकलाम या अंदाजेबयाँ—आप चाहे-अनचाहे स्वयं भी अपना लेते हैं।
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हिंदी का कवि; हिंदी वालों से नफ़रत करने की हद तक चिढ़ता हो, तो अपने लिए मुसीबत ही मोल ले सकता है।
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गद्य में भले ही रघुवीर बारीक-बयानी के चक्कर में कहीं-कहीं 'अज्ञेय' हो जाता हो, पद्य उसने हमेशा बोलचाल की भाषा, विन्यास और लय में लिखा।
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