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कालिदास

कालिदास की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 11

अज्ञानवश डोंगी से सागर पार करने की इच्छा कर रहा हूँ।

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चोरी के माल के साथ पकड़ा हुआ चोर अब कह ही क्या सकता है?

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जब कोई पराक्रमी अपने बल से अपने शत्रुओं को जीत लेता है तो उसका प्रणाम भी उसकी कीर्ति ही बढ़ाता है।

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समुद्र के समान वह प्रतिक्षण मेरे नेत्रों को क्षण-क्षण में नया-नया-सा दिखाई पड़ रहा है।

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प्रिय जनों में बँटा हुआ दुःख सह्य हो जाता है।

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