1937 - 2020 | मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश
समादृत उपन्यासकार, कथाकार और नाटककार। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।
भेड़ों के रेवड़ के पीछे गड़रिये को लाठी लिए चलते देखकर मृणाल बाबू को हँसी आ रही थी। गड़रिया उनको इकट्ठा करने के लिए मुँह से अजीब-अजीब बोलियाँ निकाल रहा था। कभी अपनी लाठी को ज़मीन पर दे मारता था, भेड़ें बेचारी डर के मारे एक-दूसरे से सट जाती थीं। जमादार
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