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उसके बाद ‘फिर’

uske baad ‘phir’

रश्मि रावत

रश्मि रावत

उसके बाद ‘फिर’

रश्मि रावत

और अधिकरश्मि रावत

    साहित्य की दुनिया से शुरुआती परिचय के दिनों से ही समकालीन हिंदी आलोचना में नामवर जी की केंद्रीय भूमिका से परिचित हो चली थी अनौपचारिक चर्चाओं में भी शोधार्थी और साहित्य-सेवी अपनी बात में वजन बढ़ाने के लिए अक्सर उनकी स्वीकृति को अकाट्य तर्क के तौर पर इस्तेमाल करते नज़र आते थे और मैं हक्की-बक्की होकर देखती रहती थी। उनकी प्रखरता और प्रभाव के ऐसे सिलसिले स्वतः मुझे उनके व्याख्यानों और रचनाओं तक ले गए और फिर उनकी ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कविता के नए प्रतिमान’ से शुरू करके बाकी रचनाएँ पढ़ती गई और बीच-बीच में कुछ भाषण भी सुने। कथा साहित्य में मेरी अधिक रुचि होने के कारण ‘कहानी-नई कहानी’ ने गहरा असर डाला। उनकी स्थापनाओं और विश्लेषण पद्धति के साथ उनकी प्रखर अभिव्यक्ति से मंत्र-मुग्ध, मेरी चेतना में ‘फिर’ शब्द ख़ुब-सा गया। अब भी घर के बच्चे बालसुलभ कौतूहल से पूछते हैं कि ‘फिर क्या हुआ?’, ‘फिर?’ तो उनकी आँखों में विस्मय की चमक मुझे बेहद लुभाती है। नामवर जी की पंक्तियाँ जेहन में कौंधती हुई कहती हैं कि बच्चों को भविष्य चेतना से, इतिहास बोध से जोड़ने का काम कर रही हो, ध्यान से उत्तर देना। मैं भी बच्चों से मुख़ातिब होने से पहले उनसे पलट कर पूछ लेती हूँ कि हमने तार्किक चिंतन और इतिहास बोध की लय आप सरीखे विद्वानों से सीखी और यह ज्योति अगली पीढ़ी तक पहुँचे, इसके लिए सजग रह लेंगे, मगर ‘फिर?’ के बाद के उत्तर तो इनके अपने ही होंगे न?

    साहित्य के अलावा समाज में बौद्धिक पर्यावरण बनाने का काम जिस ऊर्जा के साथ और जिस व्यापक पैमाने पर उन्होंने किया, दुर्लभ है। देश भर में घूम-घूम कर अपने वर्तमान और समाज को संबोधित करने का नतीजा था कि साहित्य से हल्की रुचि रखने वाले दूर-दराज़ के व्यक्ति के पास भी उनकी कोई कोई स्मृति अवश्य है। प्रभावी पदों पर होने के बावजूद इतनी सहजता से उपलब्ध रहना, छोटी बात नहीं।

    किताबों से इतर उनके वक्तव्यों के प्रभाव की बात करूँ तो उनके भाषण तो पहले भी सुने थे पर उनका ख़ुद पर क्रमिक असर महसूस करने की शुरुआत हुई थी दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के लिए होने वाले नवचर्या पाठ्यक्रम के तहत उनके दिए गए व्याख्यान से। यह वर्ष 2007 या 2008 रहा होगा। मैं छात्रा थी पर सुनने की ललक के कारण शिक्षकों के साथ शामिल हो गई। चेतना में आज भी गूँजते उनके शब्दों में से चंद हैं—“साहित्य तो साहित्य की शर्तों के साथ ही आएगा और उन्हीं शर्तों से तय होगा।” और भी कई महत्वपूर्ण बातें कही थीं जैसे हिंदी को देश की अन्य भाषाओं के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, अलग-थलग नहीं। मीराबाई की दीप्ति को बहुत ओजस्वी आवाज़ में सराहा था कि कैसा ग़ज़ब आत्मविश्वास है उनका ख़ुद पर कि कहती हैं कि कृष्ण ही एकमात्र पुरुष है। कोई और पुरुष दिखता नहीं तो परदा क्या करूँ आदि, आदि। उस दिन में मेरे मन में यह प्रश्न नहीं आया था कि आख़िर पीना तो पड़ा उन्हें भी जहर का प्याला ही। उनके आत्मविश्वास के साथ समाज में जो गति होनी चाहिए थी, वह मध्यकाल में संभव नहीं थी। मीरा के समय मीरा जितने आत्मविश्वास के बल के लिए समाज के पास यही था। वर्तमान में मीरा के आत्मबल की परंपरा की स्त्रियों के लिए वर्तमान समाज के पास क्या है ? आज के लोकतांत्रिक समय में तो दोनों तरफ़ का विकास ही वांछित हो सकता है। आधुनिक काल में भी वह अकेला पुरुष हाड-माँस का सजीव प्राणी मिल सकेगा जि्से स्त्री अपने प्रेम का केंद्र और सृष्टि का एकमात्र पुरुष माने या अब भी उस अभाव को मिथकों और मूर्तियों से भरा जाना जारी रखें? बहरहाल साहित्य की शर्तों वाली बात उन्होंने इस संदर्भ में कही थी कि साहित्य में दलित और स्त्री के लिए कोई आरक्षण नहीं हो सकता। (फ़िलहाल यह बात रहने देते हैं कि साहित्य से बाहर आरक्षण पर उनके क्या विचार थे।) रचनाओं को जाँचने की साहित्य अपनी कसौटी होती है, जो उस पर खरा उतरेगा वही साहित्य कहलाएगा। जो गुरु मेरे लिए सम्मानीय थे उनके परम आदरणीय कोई बात बोलें और मैं उन्हें मंत्रवत ग्रहण करूँ, यह कैसे संभव था? मैं नतमस्तक थी उनके प्रचंड ज्ञान और वागवैदिग्ध्य पर। ( नामवर जी मुझे इसके लिए क्षमा करें कि उनसे प्राप्त वैज्ञानिक चेतना का उल्लंघन करके भक्तिकाल के मूल्यों को जीने की नादानी मुझसे हुई।)

    उन दिनों घर बैठे-बैठे पत्र-पत्रिकाओं में पते देख कर कुछ लिख कर भेज दिया करती थी। थोड़ा-बहुत कुछ पढ़ती रहती थी। यह सब सुनने के बाद साहित्य की शर्तों को ठीक-ठीक समझने की कोशिश में कई स्थापित विद्वानों को पढ़ गई। फिर जो दलित और स्त्री रचनाएँ सामने आतीं, सबको किनारे रखती जाती। वे मेरी कसौटियों पर खरी उतर ही पातीं। इस दौरान कई समीक्षाएँ लिखीं-छपीं, कई किताबों की प्रशंसक बनी और घूम-घूम कर अपने परिजनों को पढ़वाती रही। कोई इक्का-दुक्का किताब ही उनमें किसी स्त्री रचनाकार की होती। चंद महीने पहले ही सुधीश पचौरी सर ने एक इंटरव्यू में पूछा था कि दलितों और स्त्रियों की ज़िंदगी में क्या ख़ुशियों और उत्सवधर्मिता के मौक़े नहीं आते? उनकी हर रचना रुदन और शिकायतों से भरी रहती हैं। लिहाज़ा एक बनी बनाई मानसिकता के तहत किताब खोलती और दस-बीस पन्नों की शिकायतों से ही आजिज़ कर छोड़ देती। लगता जैसे वे कुछ कमतर आत्मविश्वास वाली लेखिकाएँ हैं मैं तो वस्तुनिष्ठ, न्यायप्रिय बेहतर स्त्री हूँ न। मैं तो शिकायतें, रोना-धोना और कातरता पसंद करती हूँ ऐसा व्यवहार करती हूँ। तब सर्वानुमति की परिभाषा में खरी उतरने वाली भली स्त्री मैं हुआ करती थी। (मतलब स्वत्वहीन, व्यक्तित्वहीन, चेतनाविहीन स्त्री और ज़ाहिर है उपलब्धिविहीन भी)

    साहित्य की शर्तों से डिगने वाले जो लक्षण विद्वानों से सुने थे, वे पुरुष लेखकों में भी दिखने लगे तो धीरे-धीरे समझ बनी कि सिद्धांत और आचरण का द्वैत, क्षेत्रवाद, उपभोक्तावादी प्रवृत्ति, झटपट बहुत कुछ पा लेने की हड़बड़ी, तुरत-फुरत लेखन आदि सब आधुनिक व्यक्ति के द्वंद्व हैं जिन्हें दलित और स्त्री लेखन पर ज़्यादा आरोपित किया जाता है। इसके अतिरिक्त उनका अनूठापन, नया सौंदर्यबोध जो दरअसल उनकी शक्ति थी, अपरिचय के कारण वह उनकी सीमा लगने लगता है। परिचय से तो प्रेम बढ़ता ही है। जिनका आलोचकीय विवेक इन विमर्शों की पर्याप्त व्याप्ति से पहले बन चुका था, उनका अपरिचय तो स्वाभाविक था—पर इन सबके बीच जीने वाली मैं कैसे इन उभरती ताक़तों से अनजान रह गई! जबकि व्यवस्था ने लगातार हमारे रास्ते रोके, उपेक्षित किया फिर भी व्यवस्था-पोषित विचार ही मेरी चेतना को घेरे रहे।

    नामवर जी के विचारों के आलोक में पुनर्विचार करने पर लगता है कि अगर वह इस समय के होते तो समाज को पुष्ट बनाने वाले आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रहे होते। बाद के दिनों में साहित्य में जगह बनाने वाली नवीन सामाजिक शक्तियों के लिए उनका विरोध क्रमशः ढीला पड़ता गया, विचारों में लचक आती गई। समाज की वर्तमान हलचलों का संज्ञान उनके वक्तव्यों में सुनाई देने लगा था। भीतर के संस्कार ढहने में तो ख़ैर सदियाँ लगती हैं। वे टूटते-टूटते ही टूटेंगे। मगर अगली पीढ़ी भी तो अपने सवाल उतनी मज़बूती से अपने समय के मूर्धन्य हस्ती के सामने नहीं रख पाती हैं जिनकी टकराहट से दोनों का माकूल विकास हो।

    नामवर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से यही समझी हूँ कि साहित्य की शर्तें अंततः जीवन से ही निःसृत होती हैं। वे कहीं शून्य से नहीं आतीं। वे ख़ुद अपने जीवन के उत्तरवर्ती दौर में देश और समाज की हालत से व्यथित होकर या राजनीति के तात्कालिक तक़ाज़ों के तहत अपना लिखना स्थगित कर सीधे हस्तक्षेप के इरादे से देशभर में व्याख्यान देते जाते थे तो उनके प्रशंसकों ने इसे साहित्य की शर्तों और लेखकीय भूमिका के विस्तार की तरह ही ग्रहण किया। उन्होंने उनसे वर्तमान से ठोस, सकर्मक जुड़ाव की ज़रूरत को सीखा और जुड़ाव के सही तौर-तरीक़ों की चेतना भी ग्रहण की। चेतना जब आती है तो अपने स्रोत की सीमाओं के उल्लंघन का साहस भी साथ लाती है। दुनिया के अन्य देशों में भी ऐसा हुआ है। संकटापन्न समयों में कई बार लेखकों को ज़रूरी लगा है लिखना स्थगित कर लड़ाई में ख़ुद सशरीर उतरना। स्पेनी गृहयुद्ध में दुनिया भर के लेखकों की भूमिका इसका एक उज्ज्वल उदाहरण है। उनकी वह सीधी लड़ाई उनके लेखन का ही हिस्सा थी, उनकी लेखकीय भूमिका का ही विस्तार। विद्यासागर नौटियाल जी तो कहते ही थे कि मेरा लेखन बैठे-ठाले का लेखन नहीं है। संघर्ष के मैदानों से सीधे उतरकर आया है।

    सदियों से वंचित और दमित वर्ग संघर्ष के मैदानों में उतरे बिना क्या और कैसे लिखेगा। पन्नों तक पहुँचने में काल के जितने पन्ने लग जाते हैं पचौरी जी, वे दूसरों के हँसी-खुशी मनाने और उत्सवधर्मिता के रास्ते खोलने के निमित्त ही तो। जीवन की सारी नियामतें ख़ास दिशा और विशिष्ट घेरों में ही बही चली जाती हैं—व्यवस्था की ढलान-चढ़ाई का व्याकरण ही कुछ ऐसा है तो हँसी-हँसी में, उत्सव-उत्सव में फ़र्क़ नहीं होगा क्या? ‘इनके’ सुख-दुख, हास्य-रुदन सुन सकने के लिए ‘उन’ को कान पैदा करने होते हैं। विशेषाधिकारों की पकड़ ढीली करने होती है। ‘जलती हुई कुरुपता’ में क्या सौंदर्य नहीं होता? संघर्षरत व्यक्ति तो अक्सर अपनी कोशिकाओं को निचोड़कर ही आगे के पीढ़ी के लिए ज़िंदगी के रास्ते खोल रहा होता है क्योंकि दमित समुदाय के व्यक्ति को करना होता है यह अपने ही बूते।

    आज सोचती हूँ कि उस दिन यह सवाल मैंने नामवर जी से किया होता तो उन्हें अच्छा ही लगता। लोकलांत्रिक सवालों के साथ लैस चेतनाएँ उनके दायरे तक तक पहुँच पाए, जिनके पास जवाब हैं। इसका भी इंतजाम ज्ञान-संरचना में अंतर्निहित होता है क्या? एक सार्थक संवाद के लिए पेडेस्ट्रेल तक की पहुँच तो ज़रूरी होती ही है। हमारे बौद्धिक विकास की अगुवाई करने वाले विद्वानों को भीतर से कितनी पीड़ा होती होगी जब उनकी सीमा को हम अपनी भी सीमा बना लेते हैं। अग्रगामी जीवन-मूल्यों को जीता हुआ जो शख़्स समाज के निरंतर विकास के लिए प्रयासरत रहता है वह भविष्य की यात्रा अगली पीढ़ी के माध्यम से ही तो करेगा। इसलिए कि वर्तमान से जो हमारा संबंध हो सकता है वह पिछली पीढ़ी का नहीं। मगर हम ख़ुद उनके साथ थमकर बैठ जाते हैं। उनके सामने वाजिब चुनौतियाँ रखी जाने से समय की गति भी झटका खाती है और हमारे प्रगतिशील प्रखर पुरखों की भी गति बाधित होती है।

    वर्तमान समय में साहित्यकार की ठोस पकड़ होनी चाहिए। इस विषय पर बोलते हुए नामवर सिंह ने बताया था कि उन्होंने ‘आलोचना’ पत्रिका का संपादन जब सँभाला तब शुरू के तीन-चार अंक तत्कालीन राजनीति पर केंद्रित थे, बनिस्बत साहित्य के। यही मोहभंग के उस वक्त की ज़रूरत थी। व्यापक महत्व के उनके तमाम कामों को याद करते हुए आलोचनात्मक विवेक की निर्मिति में महती योगदान देने वाली इस शख़्सियत को आश्वस्त करना चाहती हूँ कि आपसे मिली वैज्ञानिक चेतना और इतिहास बोध जिस दिशा में लेकर जाए, हम मज़बूती से उस ओर ही बढ़ेंगे। आगे की ओर...

    स्रोत :
    • रचनाकार : रश्मि रावत
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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