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चेतना की मुँदी आँखें

chetna ki mundi ankhen

रश्मि रावत

रश्मि रावत

चेतना की मुँदी आँखें

रश्मि रावत

और अधिकरश्मि रावत

    बचपन में मुँह से कोई शब्द ग़लत निकलता तो कोई टोककर ठीक करवा लेता। हम भी अन्यों की ऐसी ग़लतियों पर उन्हें बरज देते। ऐसे निर्मल, निर्दोष त्रुटि-सुधार भाषा निखारने में सहायक होते हैं। हिंदी क्षेत्र के परिदृश्य की बात करें तो जेंडर-संवेदना का शैशव काल ही है। ऐसे में इस प्रकार के स्वस्थ, निष्कलुष उपक्रमों की ज़रूरत हमेशा बनी रहती है।

    एक बड़ी आबादी को ‘अन्य’ बनाना, फिर शेष को उसके प्रति आक्रामक बना कर दोनों को आमने-सामने कर देना, उनकी ‘अन्यता’ को इस प्रकार सहजबोध बना देना, जैसे उनके अपने कोई नागरिक हक़ नहीं, बल्कि वे ही हर समस्या का कारण हैं—ऐसे विषैले विचार ही फ़ासीवाद के बीज होते हैं। एक जेंडर-विषम समाज की पोली ज़मीन ऐसे विचारों के लिए बहुत मुफ़ीद होती है। हम अपने ही जैसे मनुष्यों की गरिमा का उल्लंघन करना बचपन से ही सीख लेते हैं। भेदभाव हमारा सहज व्यवहार बन जाता है। अपने परिवार-जनों, जिनसे हम भावनात्मक, संवेगात्मक सूत्रों से बंधे होते हैं और जिनसे हमारे हित समान होते हैं—उनके प्रति ही अन्याय स्वाभाविक हो तो अलग सांस्कृतिक पहचान के लोगों के लिए विद्वेष पालना तो और भी सहज है। पितृसत्ता फ़ासीवाद की प्राणवायु है। इसके रहते किसी प्रकार की समानता का स्वप्न नहीं देखा जा सकता। अपने आचरण की निर्मम आत्म-समीक्षा करते हुए विषमता के बीजों को पृथक करते जाना ही हमें मनुष्य बना सकता है। समानता और आज़ादी के मूल्यों के बिना लोकतंत्र का कोई अर्थ होता है, ही आधुनिकता का।

    जेंडर-बोध की दृष्टि से हिंदी साहित्य बाल्यावस्था में ही है। ऐसे में यह नितांत ज़रूरी और उपयोगी है कि भाषा और व्यवहार की ऐसी ग़लतियों पर बच्चों जैसी निर्दोष मगर पैनी नज़रों से एक-दूसरे को बरजते रहा जाए। इस दृष्टि से हिंदी के ऐसे कुछ लेखकों के लेखन से कुछ उदाहरण इस आलेख में प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिनके जीवन और लेखन में समानता और आज़ादी जीवन-मूल्यों की तरह शामिल हैं। लेकिन छुटपन से ही हम सबका सामाजिक प्रशिक्षण कमोबेश विषमतामूलक होने से यह अस्वाभाविक नहीं कि हमारी आदतों और संस्कारों की तहों में विषमता के कीटाणु छिपे हों। भाषा जिसमें हम सोचते हैं और ख़ुद को अभिव्यक्त करते हैं, वह भी जेंडर-विषम है—इसलिए अजाने भी ऐसे लेखकों की रचनाओं में भी भेदभावपरक अभिव्यक्तियाँ चली आती हैं।

    शुरु करते हैं हम सबके प्रिय अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो से। उन्हें पढ़ा होता तो स्त्री-मन या मानव-मन के कितने ही कोने-अंतरे हमारे भावबोध का हिस्सा बन पाते। स्त्री-सरोकारों के प्रति इस क़दर संवेदनशील रचनाकार इस्मत चुगताई पर लिखे अपने लेख में प्रबुद्ध और अग्रगामी लेखिका रशीद जहाँ का उल्लेख इन शब्दों में करते हैं—

    डॉक्टर रशीद जहाँ का फ़न आज कहाँ है? कुछ तो गेसुओं के साथ कटकर अलैहदा हो गया ‎और कुछ पतलून की जेबों में ठुस कर रह गया। फ़्रांस में जॉर्ज साल ने निस्वानियत का हसीन ‎मलबूस उतारकर तसन्नो की ज़िंदगी इख़्तियार की। पुलिस्तानी मूसीकार शोपीस से लहू थुकवा-थुकवा कर उसने ला’ल-ओ-गुहर ज़रूर पैदा कराए, लेकिन उसका अपना जौहर उसके बतन में ‎दम घुट के मर गया।

    मैंने सोचा औरत जंग के मैदानों में मर्दों के दोश बदोश लड़े, पहाड़ काटे, अफ़साना-निगारी करते ‎करते इस्मत चुग़ताई बन जाए लेकिन उसके हाथों में कभी-न-कभी मेंहदी रचनी ही चाहिए। ‎उसकी बाँहों से चूड़ी की खनक आनी ही चाहिए। मुझे अफ़सोस है जो मैंने उस वक़्त अपने ‎दिल में कहा, ''ये तो कमबख़्त बिल्कुल औरत निकली!”

    इस्मत अगर बिल्कुल औरत होती तो उसके मजमूओं में भूल-भुलय्याँ, तिल, लिहाफ़ और ‎गेंदा जैसे नाज़ुक और मुलाइम अफ़साने कभी नज़र आते। ये अफ़साने औरत की मुख़्तलिफ़ ‎अदाएँ हैं। साफ़-शफ़्फ़ाफ़, हर क़िस्म के तसन्नो से पाक।

    रशीद जहाँ जैसी ख़ुदमुख़्तार, प्रखर, साहसी और विचारशील स्त्री को हमारे समय की उन्नत मेधाएँ ‘पहनावे’ के आधार पर परखती हैं और उम्मीद रखती हैं कि डॉक्टर होते हुए भी वे स्त्री-सुलभ भारतीय लिबास धारण करें—तो एक आम स्त्री के प्रति सलूक की कल्पना की जा सकती है।

    मंटो की ही कहानी ‘तीन मोटी औरतें’ में तीन बुर्जुआ या अभिजात स्त्रियों की भोगपरक आत्मकेंद्रित सतही ज़िंदगियों का उपहास (उचित ही) उड़ाते हुए वे उनकी ‘बॉडी शेमिंग’ के स्तर पर उतर आते हैं। अभिजात स्त्रियों के आत्मिक खोखलेपन की भर्त्सना करना एक बात है लेकिन इसका एक सबूत या लक्षण उनके शारीरिक मोटापे को मानते हुए उसका उपहास उड़ाना, यह एक अलग ही बात हैl मोटापे को सतहीपन या उथलापन मानकर उस पर तंज करना वर्तमान लेखन में भी आम है। यह प्रवृत्ति ख़ुद एक सतही सोच से आती है। शारीरिक मोटेपन के अनेक कारण संभव हैं और यह आत्म-अनुशासन की कमी से भी हो तो भी क्या यह अनिवार्यतः ख़ुदग़रज़ ज़िंदगी का संकेतक है? इसी मानसिकता के कारण हमारे समाज में स्त्रियों को तन्वंगी बने रहने का अतिरिक्त दवाब दिया जाता है।

    निर्मल वर्मा की पुस्तक ‘धुंध से उठती धुन’ के अंश ‘महुए की मुस्कराहट’ का शुरुआती हिस्सा और कुछ बीच की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं :

    रायपुर-बस्तर : अप्रैल 1983

    रायपुर की दोपहर : मिहिर के साथ। वह हमें शहर के भीतर गलियों की अज्ञात दुनिया में ले गए। कहते थे, मुजरा देखने चलो। ज्योति मेरे साथ हैं। कैमरा लटकाए हैं। पता नहीं, कब, कहाँ फ़ोटो खींचते हैं। उनकी उजली मुस्कान सहारा देती है।

    मुजरा, गौराबाई का। पूरी पकी हुई, परिपक्व देह। मिहिर जी उसके नंगे पेट को छूकर कहते हैं, क्या बकरी की तरह बच्चे जनती हो!

    गौराबाई हँसते हुए मिहिर जी की तोंद गुदगुदाती है।

    “इस बार किसका है?” मिहिर जी पूछते हैं

    हँसती है।

    “किस-किस के साथ करती हो...?”

    लगता है, बाई को एक मुद्दत से जानते हैं। बार-बार उसके आँचल के नीचे अँगिया को छूते हैं और वह हँसते हुए उनका हाथ पटक देती है। “क्यों अब मुझे प्यार नहीं करती?” मिहिर जी नशे में आधे लेटे हैं। आँखें मूँदी हैं। “किस-किस के साथ सोती हो?”

    “अरे तुम मुँह खुलवाओ, दूसरों के साथ फोटो खिंचवाते हो, क्या हमें नहीं मालूम है?” स्वर में कोई शिकायत नहीं। चौड़ा गोरा चेहरा। इतने बच्चे जनने के बाद भी (या शायद उसी के कारण) माँसल, गदराई देह, सेक्स अपील से अधिक लुभावनी नवाबी अंदाज़ की ठसक। अद्भुत औरत...।

    मिहिर जी नॉवलिस्ट की तरफ़ एकटक देख रहे हैं। “बस प्रेमचंद के बाद आप ही हैं।“ नॉवलिस्ट नौसिखिया बालक की तरह फैली आँखों से गौराजान को देखता हुआ नहीं अघा रहा है।

    ...मिहिर जी की बियर की बोतल खाली पड़ी है और वह नशे की धुत्त हालत में गौराबाई को मंत्रमुग्ध भाव से देख रहे हैं, फिर हाथ उसकी साड़ी के भीतर डालते हैं और वह छुड़ा देती है। “यहाँ सबके सामने क्या करते हो?”

    गली के नुक्कड़ पर पहुँचकर मिहिर जी नॉवलिस्ट से कहते हैं, “मैं चाहता हूँ, आप एक बहुत बड़ी चीज़ लिखें। आपने अब तक बहुत छोटी-छोटी कहानियाँ लिखी हैं, ऐसी चीज़ों का असर नहीं होता। जी कोई बहुत बड़ी चीज़। प्रेमचंद के बाद सिर्फ़....।”

    नॉवलिस्ट मुड़कर गली के दोनों ओर झुके छज्जों को देखता है, अप्रैल की मंद धूप में चमकते हुए ...कोई बड़ी चीज़ उसे लगा, वह अभी हाथ में आते-आते कहीं छूट गई है।’’

    निर्मल वर्मा जैसे कोमल, संवेदनशील लेखक की आँखों के सामने ही एक स्त्री का, इंसानियत का घोर अपमान होता रहे फिर भी उनकी आत्मा में कोई मरोड़ उठे, भरोसा करना मुश्किल है। उनका खाली निरपेक्ष आँखों से अपलक ताक़ते रहना पाठकों को आघात देता है। यह एक प्रकार से स्त्री के अपमान में भागीदार होना ही है। ऐसा एक भी शब्द नहीं जिससे लगे कि उनके भीतर इस पर कोई विक्षोभ या ग़ुस्सा हैl ‘नॉवलिस्ट’ को इस प्रकार ‘बड़ा’ लेखक बनाने की मिहिर की कोशिशों का भी कोई प्रतिवाद नहीं आता। अगर ‘बड़ा लेखक’ इसी प्रकार बना जा सकता है, असहनीय और अकथ पीड़ाओं से घिरे वास्तविक मनुष्यों को महज़ एक दृश्य, लेखन का ‘कच्चा-माल’ समझ कर—तो यह लेखकीय नैतिकता पर भी पुनर्विचार का विषय है।

    अनेक समकालीन लेखकों की रचनाओं में भी जेंडर-दृष्टि से समस्यामूलक कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। अपनी कहानियों में पूँजीवाद और सांप्रदायिकता पर प्रहार करते आए पंकज मित्र कहानी ‘अच्छा आदमी’ में आवारा पूँजी के लिए आवारा, लुच्ची, पुँश्चली, मायाविनी, ठगिनी जैसे विशेषण इस्तेमाल करते हैं। पूँजीवाद की भर्त्सना के लिए उन शब्दों का इस्तेमाल, जो सामंतवाद स्त्रियों के शोषण और हाशियाकरण के लिए प्रयोग करता है, क्या संस्कारों में भीतर धंसे लैंगिक दुराग्रह का संकेतक नहीं? जबकि पूँजीवाद पर औचित्यपूर्ण बात कहने के लिए आधुनिक विचार-सरणियों के पास सटीक शब्द मौजूद हैं और कोई शब्द भी मिले तो उसके लिए प्रयास करना भी तो लेखकों का काम है।

    वर्तमान समय के महानगरीय बौद्धिक परिवेश पर प्रियदर्शन का उपन्यास है ‘ज़िंदगी लाइव’। उनके आलेखों और वक्तव्यों में उनकी जो स्त्री-दृष्टि दिखती है, उपन्यास के पात्र उसी के अनुरूप गढ़ने की कोशिश उन्होंने की है। रेवा एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में कार्यरत आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, बौद्धिक, स्वचेता स्त्री है। कार चलाती है, अकेली रहती है और अपने निर्णय खुद लेती है। निजी और सार्वजनिक दायित्व बख़ूबी निभाती हुई एक आकर्षक स्त्री है वह। युवा दंपत्ति इफ़्तियार और शबा उसके सहकर्मी और दोस्त हैं। हम जानते हैं कि मीडिया संस्थान भी सांप्रदायिक विद्वेष से बरी नहीं हैं। एक रोज़ इफ़्तियार के साथ दफ़्तर में अतिशय भेदभावपरक सलूक होने से उसे मर्मांतक पीड़ा होती है और वह उन पलों में ख़ुद को सँभाल पाने में समर्थ नहीं रह पाता। दोस्ताना और आत्मीय संस्पर्श से उसे भरोसा और ताक़त देने की रेवा की संजीदा कोशिशों में घटनाक्रम कुछ इस तरह का बनता है कि उनके बीच शारीरिक संसर्ग हो जाता है। दोनों ने ऐसा होने की कोई सचेत कोशिश नहीं की थी और वे इसे जारी रखना चाहते हैं। उन्हें इसका गहरा अफ़सोस भी है। इफ़्तियार पत्नी के प्रति और रेवा अपनी दोस्त शबा के प्रति विश्वासघात को लेकर, स्वाभाविक ही, लज्जित हैं। रिश्तों की प्रतिबद्धता और सीमाएँ निभाई जानी ही चाहिए और उनके उल्लंघन पर अफ़सोस होना लाजमी है। मगर रेवा की ग्लानि इतनी दूर तक चलती है और इतनी गहरी होती जाती है कि वह आत्महत्या की कोशिश में नींद की कई गोलियाँ खा लेती है। ठीक समय पर मदद मिलती तो वह ज़िंदगी से हाथ ही धो बैठती। तदनंतर उपन्यास में इतनी उथल-पुथल होती है। मगर अंत तक रेवा और इफ़्तियार के संबंध सहज नहीं हो पाते। ग्लानि की यह गहराई और व्याप्ति आधुनिक बोध में नहीं अटती। मध्यकाल के पाप-पुण्य के ढाँचे से ही रेवा के व्यवहार को समझा जा सकता है। उस एक घटना के आगे पारिवारिक-व्यावसायिक दायित्व, सामाजिक सरोकार...सब उसके लिए शून्य हो जाते हैं। यह सोचने को बाध्य करता है कि लेखकों द्वारा गढ़ी गई आधुनिक स्त्रियाँ निर्णायक पलों में सामंती आचरण क्यों करने लगती हैं? उनकी चाल अचानक उलट क्यों जाती है?

    रणेंद्र जेंडर-सजग दृष्टि से ही अपने पात्र गढ़ते हैं। आदिवासी जन-जीवन से निकट परिचय शायद उनके लिए हिंदी पट्टी में मौजूद सामंती संस्कारों को तोड़ने में सहायक रहा हो। उनके स्त्री-पात्र मज़बूत और निर्णायक क्षमता से लैस होते हैं और अक्सर पुरुष किरदार उनके संसर्ग में शिष्ट और मानवीय होते जाते हैं। रचनाओं की बागडोर अमूमन स्त्री-किरदारों के द्वारा संचालित होती है और जेंडर की समाज-निर्मित गढ़न की परिधियाँ भी वहाँ पिघलती दिखाई देती हैं। ‘गूँगी कलाई का कोरस’ उपन्यास में 38 अध्याय हैं। प्रत्येक की शुरुआत चुनिंदा उत्कृष्ट काव्य-पंक्तियों से कर लेखक रचना को एक शास्त्रीय उठान देते हैं। ये पंक्तियाँ अध्याय का मर्म खोलने में भी सहायक हैं और उसे एक क्लासिकी संस्पर्श दे कर व्यापक भाव-बोध का हिस्सा बनाने का भी काम करती हैं। अफ़सोस मगर 38 में एक भी स्त्री रचित पंक्ति शामिल नहीं है। क्या स्त्री-रचनाएँ उस प्रकार लेखक के भाव-बोध का हिस्सा नहीं है कि उसमें कुछ व्यापक और उदात्त मिले? रचना के भीतर सजग, सुचिंतित प्रयास द्वारा भले ही लेखक स्त्री किरदारों को ही आलोक-वृत्त में रखता है। मगर स्त्री की रचनाओं से उसकी संवेदना-भूमि नहीं निर्मित हुई है। घटनाओं और पात्रों की जो परिणति होती है, वह प्रगतिशील दृष्टि से निसृत नहीं जान पड़ती। उपन्यास के अंतिम हिस्से में रचनाकार जहाँ उम्मीद देखता है, उसका अग्रगामी दृष्टिपथ से बाहर छिटकना और लेखक के मानस की गठन में एक जेंडर का दूसरे से अधिक स्थान छेकना, दोनों जुड़ी हुई बातें हैं। जेंडर बोध और विचारधाराओं के बीच अंतर्संबंध की समझ अभी हिंदी में ठीक से विकसित नहीं हुई है। हमें समझना होगा कि अपने भीतर की जेंडर-उदासीनता को पहचाने बिना सही निष्कर्षों तक पहुँचना संभव नहीं है। जेंडर संतुलन के बिना किसी भी वैचारिकी को सिद्धांततः भी नहीं वहन किया जा सकता। समाज में उतारना तो दूर की बात है।

    विनोद दास के उपन्यास ‘सुखी घर सोसायटी’ की शुरुआत ही इन पंक्तियों से होती है—

    “उपनगर अपने महानगर की अवैध संतान की तरह होता है जिसे वैध संतान की तरह तो प्यार, ही सुख- संपत्ति और ही नाम मिलता है।”

    बाहर से आने वाली आबादी के लिए जो भेदभाव वाला सलूक मुंबई में होता है उसके लिए आगे इस तरह की पंक्तियाँ आती हैं—“मुंबई इन्हें नाजायज़ औलाद मानती। वह जिस झुग्गी-झोपड़ी में रहते, वह ज़मीन नाजायज़ होती। पुलिस और सरकारी ओहदेदार उन्हें नाजायज़ औलाद की तरह वहाँ से कभी भी बेदखल कर देते।”

    उपनगर, ज़मीन पर लोगों के हक़ होने या छीने जाने के लिए ‘अवैध संतान’, ‘नाजायज़ औलाद’ जैसी शब्दावली मध्यकालीन बोध का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट भी यह कह चुका है कि बच्चे अवैध नहीं होते। यों भी वैधता का यह प्रश्न जिस कसौटी से आता है, अंततः वह स्त्री के दोयम दर्जे से ही बनती है। साहित्य का लोकतंत्र तो राजनीतिक लोकतंत्र से अधिक व्यापक होता है। वह व्यापकतर होता रहे, यह हम सबका साझा दायित्व है।

    “आकाश को लगा कि वांशिग मशीन देख कर वसुधा की आह निकलना नाजायज़ नहीं है। जब से वे इस फ़्लैट में आए हैं, पानी की कमी के कारण वाशिंग मशीन एक परित्यक्ता की करह उदास और एकाकी पड़ी रहती है। यह बस पुराने अख़बारों या खाली थैले-थैलियाँ रखने का अड्डा बन गई है।’’ उपेक्षित पड़ी मशीन को ‘परित्यक्ता’ कहने में सामंती संस्कारों से आया लैंगिक दुराग्रह स्पष्ट है। बचपन से जो भाषा-संस्कार हमारे भीतर बन गए हैं, वे हमारी उपमाओं में जाने-अनजाने निकल पड़ते हैं। फालतूपन, उपेक्षित, तिरस्कृत चीज़ों के लिए दी जाने वाली उपमाएँ अक्सर स्त्री के किसी किसी रूप से दे दी जाती है। इन्ही तरीक़ों से स्त्री का वस्तुकरण किया जाता है।”

    अनामिका के उपन्यास ‘आईनासाज’ के दूसरे खंड ‘बैकगियर’ की किरदार सपना दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली आधुनिक युवती है। उसका दायरे में अधिकतर अकादमिक बौद्धिक लोग हैं। उसे चाहने वाले युवा शक्ति को लेकर अपना मन टटोलने पर वह सोचती है कि “वे ऋृषि भी थे तो बाल-खिल्य ऋृषि ही थे, उन पर ममता छिड़की जा सकती थी, उन्हें उस उद्दाम ममता में नहीं नहलाया जा सकता था जो शारदा माँ की छाती में परमहँस के लिए दूध उतार लाई थी। उस तरह की अगाध ममता उनका परम आत्मविश्वासी टुन्ना-मुन्ना वजूद जगा ही नहीं पाता था।” इक्कीसवीं सदी की सुशिक्षित नवयुवती का प्रेमी के लिए ऐसा तसव्वुर किंचित हैरान करता है।

    दूसरी किरदार ललिता चतुर्वेदी प्रोफ़ेसर हैं जिनके पति अजय चौधरी देश-विदेश की सर्वोच्च संस्थाओं से शिक्षाप्राप्त प्रखर बुद्धिसंपन्न हैं। युवावस्था में उनके लिए सिलिकॉन वैली समेत सफलता के परचम लहराने के अनेक रास्ते खुले हुए थे। उन दिनों समाज में बुनियादी बदलावों पर उनका भरोसा भी था और उन्होंने वही रास्ता चुना। मगर वर्तमान में वह दिग्भ्रांत जीनियस एक ग़ुस्सैल, बदतमीज़, कुंठित और बेरोजगार पुरुष हैं, जिनकी उपस्थिति से हर कोई बचता है। लेखिका का मानना है कि मार्क्सवादी क्रांति की बात करते हैं मगर ‘आत्म-क्रांति’ से मुँह चुराते हैं। मोटे तौर पर यह सच भी है। यहाँ भी चौधरी साहब हर ग़लती के लिए अन्यों को ज़िम्मेदार मानते हैं। बीबी बच्चे उनके लिए ‘पंचिग बैग’ हैं यह अनेक मध्यवर्गीय परिवारों का प्रामाणिक सत्य है। वे जेंडर संवेदी होते तो अपनी और दूसरों की समानता और आज़ादी का सम्मान करना जानते तो उनकी शिक्षा और प्रतिभा समाज के लिए उपयोगी होती और ललिता और उनके दो बच्चे भी स्वस्थ सुंदर जीवन जीते हुए समाज में अपना योगदान देते। मगर अजय के हिंसक आचरण ने सबका चैन छीना हुआ है। उनके कुंठित आचरण से तंग कर पति-पत्नी अलग घरों में रहते हैं मगर पति जब तब धमकते ही रहते हैं। ललिता शांति के चंद पल पाने के लिए लाइब्रेरी जाया करती है। वह पूजाघर और छत को स्त्रियों का ‘तीसरा फेफड़ा’ कहती है। उनके घर के कोहराम का एक दृश्य पति की चीख़ती आवाज़ में—

    “दिन भर फ़ोन पर लगी रहती है...पाख़ाने की टंकी कौन ठीक कराएगा रे...तेरा बाप जब देखो तब टेसुआ बहाता रहता है नलका तेरी तरह। तू ही है पाख़ाने की टंकी। रख, फ़ोन रख, नहीं तो अभी बताता हूँ तुझे।” कभी मार-पीट और गाली-गलौज तो कभी दमघोंटू चुप्पी के कई प्रसंग उपन्यास में आए हैं। ऐसी जीवन-विरोधी परिस्थितियों में रहने के लिए बाध्य ललिता अपने जीवन-सूत्र के रूप में अपनी युवा छात्रा सपना को जो विचार सौंपती है, उसका एक हिस्सा—

    “हर आत्मा में कुछ ख़ास तरह की ग़लतियाँ करने की वृत्ति होती है। जो धर्म पुनर्जन्म मानते हैं, उनकी अवधारणा है कि अगर आपसे कभी किसी का ख़ून एक बार हो गया, तो अगले जन्मों में भी वह वृत्ति आपमें रहेगी और तब तक रहेगी जब तक आपने ध्यान देकर उसे निःशेष कर लिया उसकी निर्जरा कर ली...। जिस दिन यह बात समझ लो कि परिस्थिति, मनःस्थिति या कार्मिक वृत्तियों के कारण ही कोई भी व्यक्ति लगातार एक तरह की ग़लतियाँ करता जाता है तो माफ़ करना आसान हो जाता है। यह याद रखो कि कुछ आधारभूत वृत्तियाँ मेरी अपनी भी होंगी तो स्थिति और सँभल जाती है...। इस बीच परिवेश के प्रतिपक्षियों या प्रताड़कों को करुणा और धैर्य से झेलें, उनकी कुँठाओं के निवारण के लिए जो बन सकता है, करें—तब जाकर किसी क्षण घट सकता है हृदय-परिवर्तन...। अगर घर रणभूमि है भी तो रणभूमि पर पीठ नहीं करते। पढ़-लिखकर जब घर जाती हूँ तो बछड़ों की तरह वही बच्चे, वही पति मुझे देखकर रँभाने लगते हैं जिन्होंने सुबह मुझे नन्ही ढूँसियाँ मारी थीं।”

    2020 में प्रकाशित यह उपन्यास ‘घरेलू हिंसा कानून’ के बाद का है। बीते समय घरेलू मुद्दों को सार्वजनिक संस्थाओं से बाहर के दायरे का मानने वाली पितृसत्तात्मक संस्थाओं ने भी निज-सार्वजनिक के भेद में निहित कुतर्क को समझना शुरु कर दिया। लेकिन ‘नारीवादी’ रचनाकार समस्याओं की व्याख्या पिछले जन्म की वृत्तियों में और समाधान ममता और धीरज में खोज रही हैं। वे वैकल्पिक समाज का स्वप्न मातृसदन जैसी संस्थाओं में देखती हैं। भारतीय नारीवाद की एक सदी की यात्रा का क्या यही परिणाम होना है कि मातृत्व जैसे सहज स्वाभाविक भावों को अतिरेकी ढंग से गौरवांवित करने वाले संस्कार हम फिर से गढ़ना शुरु कर दें और वर्तमान दशा के कारण और समाधान धर्म और पुनर्जन्म, संगीत, सदन...आदि के भीतर खोजें? करुणा और क्षमा के बिना मनुष्यता की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन इस उपन्यास में उनका उपयोग सही जगह या सही मात्रा में नहीं किया गया है। बदलाव के उपक्रमों में भी ममता, करुणा, प्रेम, स्नेह की दरकार होती है। सफलता-असफलता, सुख-दुख, क्षति-उपलब्धि के कई पड़ाव आते हैं जो इन्हीं मानवीय भावों के साथ जिए जाते हैं और इन्हीं के सहारे पार होते हैं। मगर दिशा और गति तो आगे की तरफ़ ही हो सकती है—अन्यथा हमारा धैर्य और ममता ख़ुद हमारे ही ख़िलाफ़ जाने लगती है।

    समानता और आज़ादी का ख़्वाब देखने वाली आधुनिक विचार-सरणियों ने स्त्री को मानवीय गरिमा दी, उसे उसकी छीनी गई नागरिकता और स्वत्व लौटाया। मगर यहाँ उसकी नागरिकता फिर से जैसे किंही धुँधलकों में खो जाना चाहती है। नागरिकता का बोध खोना अथवा अपने व्यक्तित्व का केंद्र अपने से बाहर किसी को मानना औचित्य-बोध को क्षति पहुँचाता है और समाधान के सही बिंदु पर जाने से रचनाकार चूक जाते हैं। ललिता पति से जिन कुछ मुद्दों पर प्रतिवाद करके अपना निर्णय मनवा लेना अपिरहार्य समझती है। उनमें से एक है लड़-झगड़ कर बच्चों को सरकारी स्कूल से अँग्रेज़ी स्कूल में डालने का उसका निर्णय। “जब बच्चे स्कूल से गालियाँ सीखकर आने लगे, ये डर गई कि इतिहास ख़ुद को फिर से दुहरा दे। और तब उनका ऐसा दुर्गाभाव जागा कि हज़ार प्रतिकारों के बावजूद बच्चों का एडमिशन प्राइवेट स्कूल में करा के रहीं।” पति के मार-पीट, गाली-गलौज के आचरण को ललिता उनके सरकारी स्कूल में पढ़ने से जोड़कर देखती है। बच्चों को अँग्रेज़ी स्कूलों में दाख़िला देने के फैसले को प्रश्नांकित नहीं किया जा रहा है। अनेक व्यवहारिक तकाजों के कारण जो लोग भी ख़र्च वहन कर सकते हैं, कुछ अपवादों को छोड़ कर बच्चों को अँग्रेज़ी स्कूलों में ही पढ़ाते हैं। मगर सरकारी स्कूल में बच्चे गाली देना सीखते हैं, इस कारण यह निर्णय लेना उचित नहीं।

    संभवतः आधुनिक भावबोध से कटकर ‘ममता’ जैसे भावों पर अत्यधिक निर्भर होने का नतीजा हो कि पति के दुर्व्यवहार की जड़ उसके मर्दवाद को मानने की बजाए उसकी साधनविहीन परवरिश को वह कारण मानती है। नारीवादी चिंतन से विचलन सवर्ण-बोध की तरफ़ ले जाता है। आईनासाज और कई रचनाओं में अग्रगामी मूल्यों से अधिक भरोसा पीछे छूट गए मूल्यों पर दिखाया गया है। वही, जिन पर अमल करते हुए हम हज़ारों वर्ष जीते आए हैं। अगर समाधान उन्हीं मूल्यों में निहित होते तो अभी तक चीज़ें हल चुकी होतीं।

    किरण सिंह की कहानी ‘कथा सावित्री सत्यवान की’ का अंश—

    “धंधे वाली को रंडी कहा जाए तो वह भी चक्कू-चिमटा जो हाथ में आए, लेकर खड़ी हो जाएगी। यह तो एक लेखिका को बदचलन लिख देने का मामला था।”

    स्त्री की प्रतिरोधी भूमिका के लिए जानी जाने वाली किरण यहाँ स्त्रियों के एक समुदाय के लिए अपमानजनक शब्दों का भी इस्तेमाल करती हैं और उनका वर्गबोध (विशिष्टता-बोध) भी यहाँ उजागर है। उनके अनुसार लेखिका को अकथनीय तकलीफ़ें झेलती अन्य स्त्रियों से, जो लेखिकाएँ नहीं, अधिक सम्मान मिलना ही स्वाभाविक है।

    ट्रांसजेंडर के जीवन-संघर्षों पर आधारित ‘संझा’ कहानी में समाज का बहुपरतीय यथार्थ आता है। जब पहचान छिपा कर रहने के सभी उपायों के बावजूद संझा के ट्रांसजेंडर होने का सच सबके सामने जाता है और वह हिंसा और अपमान का शिकार बनती है तो वह समाज की ऊपरी चिकनी सतह के नीचे के बदबूदार सच उगल देती है।

    “एक पर सौ, तुम सब मर्द हो? ये ललिता महराज आदमी है और मैं हिंजड़ा? ये कनाई जो अपनी प्रेमिका की थुंभी नहीं बन सकता? वो बसुकि का चचेरा भाई जो उसके साथ रोज़ ज़बरदस्ती करता था, जिसे डर था कि बसुकि कनाई के साथ भाग जाए, वो बड़ा मर्द है। मैं गर्भपात की औषधि लेकर रोज़ रात को बैठूँ तो तुम मर्दों के मारे चौबासे की लड़कियों को नदी में कूदने के सिवाए क्या रास्ता है? तुम सबों की मर्दानगी-जनानगी के किस्से नाम लेकर सुनाऊँ क्या? उस रात जब मैं सोमंती के तीन बच्चों को दवा देने आई थी...सोमंती ने ही अपने बच्चों को जहर दिया था अपने प्रेमी के साथ मिलकर...उन्नीस साल की कुनाकी, जिसने झँझट ख़त्म करने के लिए अपना गर्भाशय निकलवा दिया...उसका आदमी ख़ुद उसे लेकर क़स्बे के साहबों के पास जाता था....जब ख़ून नहीं रुक रहा था तब रोती हुई मेरे पास आई...चौगाँव के एक-एक आदमी की जन्मकुँडली है मेरे पास।”

    मर्दों पर उसका प्रहार उचित ही है। स्त्री और अन्य जेंडर अस्मिताएँ मर्दवाद से ही पीड़ित हैं और सबका साझा प्रतिरोध पितृसत्ता के ख़िलाफ़ होना ही चाहिए। वह जानती है कि सच सामने आने पर पितृसत्ता की चट्टान तले जीवन बचाना संभव नहीं रहेगा। फिर भी वह गाँव की कुछ स्त्रियों के राज सबके सामने उगल देती है, जो वह वैद्य होने की हैसियत से जानती थी। ऐसा करना उसके व्यवसाय की नैतिकता और और जेंडर चेतना दोनों के औचित्य के दायरे से बाहर है। स्त्रियों के प्रेम-संबंध और गर्भस्थ होने का सच जानने के बाद घरवालों ने उनका क्या हश्र किया होगा, अनुमान लगाना कठिन नहीं। स्त्री-प्रतिरोध का सचेत स्वर किरण सिंह की रचनाओं में बुलंदी से मिलता है, इसलिए उनकी रचनाओं से यह प्रबल अपेक्षा जगती है कि वहाँ स्त्री-सरोकारों का उल्लंघन हो। संझा को एहसास है कि उसके साथ कभी भी यह नौबत सकती है इसलिए उसने अथक श्रम और जड़ी-बूटी पहचानने की प्रतिभा के बल पर ख़ुद को गाँव वालों के लिए अपरिहार्य बना लिया है। मगर घरों की सड़ांध उघाड़ने के क्रम में उसने जिन स्त्रियों के नाम लिए, उनका जीवन नारकीय हो जाना...क्या एक स्त्री-संवेदी लेखक को इससे कोई सरोकार नहीं होना चाहिए?

    हंस के फरवरी 2022 अंक में प्रकाशित ‘मानवीय संस्पर्श की तरलता’ आलेख में रश्मि रावत गीता श्री की कहानी ‘मत्स्यगंधा’ का नीचे दिया गया हिस्सा उद्धृत करती हैं और फिर उसके बाद अपना विश्लेषण देती हैं। मगर कहानी में प्रयुक्त प्रेमभाषा को प्रश्नांकित नहीं करतीं कि स्त्री को यौन-निष्क्रिय दिखाया गया है। पुरुष को मछली और स्त्री को नदी जैसी प्रेम की उपमाएँ देने पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है। वैचारिकी की पुस्तकों पर भी इस पर पर्याप्त सामग्री है और हिंदी में जेंडर लेंस से इन उपमाओं को नकारे जाने वाले आलेख भी ख़ूब लिखे गए हैं। समृद्ध परंपरा के होने पर भी बाद के आलोचक अगर उस ज्ञान को अपने लेखन का हिस्सा बनाएँ तो आलोचना का विकास बाधित होगा। जेंडर-चेतना की स्पष्ट समझ और अतीत में हुए कामों के अध्ययन-मनन के बिना आलोचना लिखने के लोभ से नए आने वाले आलोचकों को बचना चाहिए। पूर्वतैयारी के बाद ही इस विधा में सक्रिय होना श्रेयस्कर है। पुस्तकाकार में आने से पहले वे अपनी इस भूल को सुधार भी लें तो भी मासिक स्तंभ के रूप में पत्रिका में इस तरह लेख का छपना इस बात का प्रमाण तो है ही कि आजकल आलोचनात्मक आलेख किंचित जल्दबाज़ी में लिखे जाते हैं और सजग रहने पर हमारे भीतर के संस्कार अक्सर परंपरा के पक्ष में ही काम करते हैं। लिहाज़ा आधुनिक सरणियों से प्राप्त कसौटियों पर अपने निष्कर्षों को बार-बार कर कस कर देखने की सजगता आलोचना-लेखन के लिए ज़रूरी शर्त है।

    “आज बतहू को फूलों की गंध नहीं आई, आज मछली की गंध से महक रही थी बतहू की साँवली नदी। बतहू कुछ देर ठिठक कर उस साँवली नदी को देखता रहा, फिर एक छलाँग लगाकर उस साँवली नदी में कूद गया। कूद गया कभी लौट कर शहर जाने के लिए। मत्स्यगंधा साँवली नदी भी धीरे-धीरे ज़िंदा हो रही थी।” (पृ-34, मत्स्यगंधा, हंस, जुलाई 2021) इन शब्दों के साथ कहानी यह जताते हुई ख़त्म होती है कि जीवन में श्रम और प्रेम लौटने के बाद अब उसे स्वार्थांध शहर का रुख़ करना है और लोगों के अंधविश्वास-जनित डर को कमाई का साधन बनाना है।”

    कहा जा चुका है कि हिंदी क्षेत्र में जेंडर न्यायबोध अभी बचपन में है। हिंदी जेंडर-विषम भाषा है इसलिए भी समानतामूलक अभिव्यक्ति मुश्किल जान पड़ती है। इसीलिए जेंडरमूलक समस्याओं से ग्रस्त रचनाओं की भरमार है। इस आलेख का उद्देश्य उन्हें समेटना या नामोल्लेख करना नहीं, वरन जेंडर दुराग्रहों को उभारना है। समाज को सुंदर और बेहतर बनाने वाली कोई भी कार्रवाई जेंडर-विकलांगता से उभरे बिना सफल नहीं हो सकती। सार्वजनिक महत्व के किसी भी उपक्रम का सफल होना तभी संभव है जब ‘जेंडर-न्याय’ हमारी ज्ञानात्मक संवेदना का अभिन्न अंग हो। एक-दूसरे की रचनाओं में ऐसे विचलनों पर उंगली रखना हम सब लेखकों का ज़रूरी कार्यभार है। इस तरह के अनेक आलेख लिखे जाएँ और हम स्वयं भी आत्म-समीक्षा करें तो ही एक अनुकूल साहित्यिक परिवेश निर्मित हो सकेगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने भीतर और बाहर उठी ये उंगलियाँ ‘छिद्रान्वेषण’ के लिए है ही दोषारोपण के लिए। ये अपनी और एक-दूसरे की चेतना में रंध्र खोलने वाली उँगलियाँ हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रश्मि रावत
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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