अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-10
निशांत
15 फरवरी 2026
नवीं कड़ी से आगे...
दस
अरुण कमल सत्तर साल से अधिक का जीवन देख चुके हैं और वरिष्ठ कवियों की सूची में भी आ चुके हैं। अरुण कमल हिंदी में प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि भी हैं। कभी रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था, ‘‘प्रसिद्धि भी किसी काल की लोक-प्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है।’’ प्रसिद्धि पाने के लिए लोग सब क्या-क्या न करते हैं! अरुण कमल ने पचास-पचपन साल से ज़्यादा उम्र तक कविताएँ लिखी-पढ़ी हैं। उनके उम्र के हिंदी-अँग्रेज़ी लिखने-पढ़ने-पढानेवाले कई लोग हैं, लेकिन वे लिख-लिखकर ‘कागद कारे’ कर रहे हैं, ‘गंदी गली में लैंप-पोस्ट’ की तरह रह रहे हैं... प्यारे बेचारे लोग!
अरुण कमल यानी सत्तर से ज़्यादा वसंत और सात से ज़्यादा कविता-संग्रह। हिंदी, भोजपुरी, अँग्रेज़ी और संस्कृत का विषद ज्ञान। एक बड़ा जीवन। अब उनके पास समय ही समय है। वह अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, लेकिन एक कवि कभी अवकाश पर नहीं जाता। एक “कवि के रूप में अरुण कमल अभी भी सृजनरत हैं और उनकी कला विकासमान है। वार्धक्य हो या अचानक बदल गया जीवन, उनके हाथ से नई वास्तविकताओं की पकड़ ढीली हुई है। परिणामस्वरूप उनकी कला में भावुकता और अमूर्तता का समावेश पहले से ज़्यादा हुआ है।” (हिंदी कविता आधी शताब्दी, पृष्ठ : 102-103)
यह मैं नहीं आलोचक अजय तिवारी कह रहे हैं और मुझे लगता है कि सही ही कह रहे हैं। अरुण कमल के यहाँ भावुकता तो बनी हुई ही है, इधर अमूर्तता बढ़ी है। कुछ परिचित शब्दों के सहारे ऐसी कविता इन दिनों अरुण कमल लिख रहे हैं। नज़ीर के तौर पर उनकी कविता ‘बैठकी’ आप भी देखें—“जब तक काम चल सकता था चला / जब अँधेरे ने ढाँप दी दरी माथा-माथे से लड़ा / सो पेट्रोमैक्स आया जो बीच में रखाया / हठात् प्रकाश में जिसके लगा सब डिगा-डिगा / और रखते ही लुझ आए कीड़े / मानो कोई भैंस ताल को हिड़ें / फिर पता नहीं कैसे बचता-बचाता / अभ्यस्त अध्यक्ष-सा मेढ़क आया ‘हंस’ता-हँसाता/ जम गई सभा सफल भई सभा / बोले वक्ता कुछ जंभा कुछ रंभा / भाषण चलता गया / गैस जलता गया / कीड़े आते गए/ मेंढक खाता गया।” ये मूर्त-अमूर्त टाइप की कविता है, चित्रकारी की तरह जहाँ दिखता तो सब है पर सब समझ में नहीं आता। कुछ आता है, कुछ छूट जाता है। लेकिन मैंने ऊपर ज़ोर देकर कहा है—एक कवि कभी अवकाश पर नहीं जाता। वह ‘हारे को हरी नाम’ नहीं है। वह आशा, उम्मीद का नाम है। वह बार-बार कविता के घर में लौटता है, वैसे भी ‘लौटना’ अरुण कमल की कविता का ‘बीज शब्द’ है। वह जीवन में लौटता है। अजय तिवारी ने इसी संभावना को आशा भरी निगाह से देखते हुए कहा है—“फिर भी ‘प्यारे ने हिम्मत नहीं हारी’। अपने सीमित औज़ारों के साथ वह नई दुनिया के अनुभवों को जाँचने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी (अरुण कमल) सबसे बड़ी ताक़त यह है कि जीवन में उनकी आस्था मृत्यु से ज़्यादा है।” (हिंदी कविता आधी शताब्दी, पृष्ठ :103) यह ‘जीने का नशा’ है जिसके नशे में अरुण कमल चूर हो घूम रहे हैं। घूम रहे हैं। यह ‘अपनी ही कविता का नशा’ है जिसमें कवि मत्त है।
कविता लिखना भी एक नशा है। कविता लिखकर कुछ नहीं मिलता, लेकिन हर नशे की तरह कविता का नशा भी कवि को उत्तेजना से भर देता है। उसे शक्ति (पावर) का एहसास करवाता है। कभी-कभी शक्तिशाली (पावरफ़ुल) होने का एहसास चरम सुख (ऑर्गेज्म) से भी आगे निकल जाता है। प्लेबॉय पत्रिका ने एक लंबे साक्षात्कार में जब मार्केस से अंतिम सवाल पूछा—‘‘आपकी नज़र में सर्वाधिक उत्तेजनादायी (अफ्रोटिजियक या कामौषधि) क्या है?’’ इसके जवाब में महान् लेखक मार्केस ने तुरंत कहा—‘पॉवर’, ‘सत्ता’,’ताक़त’। अरुण कमल ने कविता लिखकर उस नशे को भोगा है। आज भी अरुण कमल पावर, सत्ता, ताक़त जो साहित्य-संस्कृति की है, उसके सबसे क़रीबी कवि हैं। क्या सरकारी और ग़ैरसरकारी सत्ता केंद्र हो, हर जगह अरुण कमल की पूँछ और पूछ है। 1980 में भारत भूषण अग्रवाल से लेकर साहित्य अकादेमी और अब ज्ञानपीठ तक उनकी पूँछ पहुँचने वाली है। पहुँच तो ग्यारह लाख रुपए के इफ़को सम्मान तक भी जाती यदि अरुण कमल ने यह कह-लिख न दिया होता—“ये ख़ुद एक अश्लील घटना है कि हमारे समाज में जहाँ अधिकांश लोगों को ठीक से भोजन नहीं मिलता, वहाँ एक कवि को ग्यारह लाख की राशि इनाम के तौर पर दी जाए।” (विचार के वातायन, पृष्ठ : 176)
एक ‘प्रोगेसिव कवि’ पर ही ऐसा ‘अग्रेसिवनेस’ शोभता है। मैंने एक जगह लिखा भी है कि “कविता एक तरह से नशे या ड्रग की तरह असर करती है। जो लिखता है, उस पर सबसे ज़्यादा। जो पढ़ता है उस पर कम, पर करती है। कवि कविता का नशेड़ी हो जाता है। वह बार-बार कविता लिखता है। वह बार-बार नशा करके अपनी कविता की दुनिया में भागकर जाना चाहता है। जैसे एक ड्रग एडिक्ट अपनी दुनिया में मस्त रहता है, वहीं हमेशा खड़ा रहना चाहता है। बार-बार एक ऐसी दुनिया में जाना जहाँ जाकर आपको आराम (रिलैक्स) मिलता है। वह कल्पना की दुनिया हो सकती है। स्मृतियों की दुनिया हो सकती है। जहाँ सब कुछ अच्छा, आपके अनुसार हो। आप उसके सृष्टिकर्ता हों। आप उसके ईश्वर या मालिक हो। आप जैसा चाहे वैसा सब कुछ हो। मालिक होने का नशा भी किसी नशे से कम नहीं होता। प्रेमचंद की एक कहानी ‘नशा’ इसे अच्छे से बताती है। कविता, स्मृतियों और कल्पनाओं से मिलकर बनती हैं। एक अच्छी स्मृति, एक अच्छी कविता है। एक शानदार कल्पना, एक शानदार कविता है। और दोनों मनुष्य के स्वप्न और जिजीविषा की तरह है। एक से मनुष्य को लड़ने का हौसला मिलता है तो दूसरे से आगे बढ़ने का। लड़ना और आगे बढ़ना, मनुष्य की आदिम प्रवृतियाँ हैं। कविता बार-बार उन प्रवृतियों की तरफ़ की यात्रा है जो स्वप्न, जिजीविषा, कल्पना, स्मृति को धूप, हवा, पानी उपलब्ध करवाएँ। ‘कवि के बोल खरग हिरवानी, एक दिसी आग, एक दिसी पानी’ जब जायसी कह रहे थे तो हवा में नहीं कह रहे थे। कविता के नशे की चरमावस्था में रहे होंगे।” (कविता पाठक आलोचना, सेतु प्रकाशन, पृष्ठ :171-72)
नशा, मालिक जैसे सुख की आनंदायिनी स्थिति है, जिसमें हर नशेड़ी हमेशा मालिक, सत्ता का सिरमौर बना रहना चाहता है।
व्यक्ति का कवि होने का नशा भी बड़ा मादक होता है। जयशंकर प्रसाद ने ऐसी ही नहीं लिखा होगा—“सत्ता का नशा बड़ा मादक होता है।” कवि अपनी बनाई सत्ता के नशे का नशेड़ी होता है। कवि असंतोष करके, विद्रोह करके जहाँ शरण लेता है; वह जगह है—स्मृति और कल्पना। चाहे तो हम इसे अतीत और आशा भी कह सकते हैं। स्मृतियाँ और भविष्य भी कह सकते हैं। विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि—“गत स्मृतियों में डूबना मानसिक शांति और सुखोपभोग का सबसे सरल और निश्चित उपाय है।” किस मनुष्य को मानसिक शांति और सुखोपभोग नहीं चाहिए? हर व्यक्ति को चाहिए। इसलिए कवि की कविता हर व्यक्ति को अच्छी लगती हैं। वर्तमान के प्रति विद्रोह वही करता है जो संवेदनशील होता है। हर व्यक्ति में संवेदना है। संवेदना की घनीभूत इकाई कविता है। घनीभूत इकाई का पल्लवन आलोचना है। (वही, पृष्ठ : 171-72)
अरुण कमल में संवेदना तो है और कविता की कलाकारी भी। यह कलाकारी ही उन्हें सिखलाती हैं कि कवि को कैसी कविता और कैसा सामाजिक व्यवहार करना चाहिए।
ऊपर से विनम्र और अंदर से डाही और कलाकारी कवि अधिकतर समय अपने को ही केंद्र में रखते हैं। अपनी वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाते हैं। अपने शौक़ को बाक़ी लोगों से बेहतर बतलाते हैं और जब उनके बारे में कोई कुछ कठोर सत्य बोल देता हैं तो साक्षात्कार में कहते हैं—“इन चीज़ों पर वक़्त क्यों बर्बाद करते हो लीलाधर? दो पंक्तियाँ याद रखो—एक मीर की और एक कबीर की। हुज़ूर मीर कहते हैं—‘कुफ़्र कुछ चाहिए इस्लाम की रौनक़ के लिए’। कबीर साहब फ़रमाते हैं—‘श्वान रूप संसार है भूकन दे झक मार।’” (कथोपकथन, पृष्ठ : 39)
ऐसे लोग सोने की मोहर पाने वाले कवि बिहारी के शब्दों में ‘देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ तरह की सूक्ति-शैली में अपनी बात रखते हैं और कहते हैं—“मुझे ‘मीर’ और ‘कबीर’ प्रिय हैं। मैं उन्हीं की आवाज़ के परदे में अपना काम करता हूँ।” (परिकथा, अंक-26, पृष्ठ : 19)
पहली बात लीलाधर मंडलोई को बोली गई है, संदर्भ है वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल द्वारा ‘कसौटी’ के एक अंक में यह लिखना कि “ज़्यादातर कविताएँ (अरुण कमल की) निस्सार हैं और एक जगह तो बचकानी पद का प्रयोग हुआ है” लिख दिया गया है। दूसरी बात अरविंद श्रीवास्तव को बोली गई है, संदर्भ विष्णु खरे का है, जब विष्णु खरे 2009 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार पर एक लंबा लेख लिखते हैं—‘एक पुरस्कार के तीन दशक’। उस समय अरुण कमल ‘आलोचना’ के संपादक भी थे और उनके तब तक चार संग्रह प्रकाशित भी हो चुके थे। विष्णु खरे ने उनके दोनों रूपों पर लिखा—“मैं पहले (अशोक वाजपेयी / अरुण कमल : 1980) पुरस्कार से ही असहमत था। आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है, लेकिन ‘उर्वर प्रदेश’ उस वर्ष की सामान्य अच्छी कविता ही लगी थी, विशिष्ट नहीं। आज भी वह शायद इस पुरस्कार के कारण ही उल्लेख है। उनके संग्रह ‘नए इलाक़े में’ की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे, लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएँ ‘उर्वर प्रदेश’ की सामान्य अच्छी ज़मीन की ही लगती हैं। यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है।” (उर्वर प्रदेश, पृष्ठ : 377)
आगे ‘आलोचना’ के संपादन पर लिखते हैं—“कविता पर जैसा लेखन उन्होंने अधिकांशत: किया है और जिस दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से वह संपादन और सामग्री-चयन कर रहे हैं, उससे बहुत आश्वस्ति नहीं होती है।” (वही, पृष्ठ : 383) तो नंदकिशोर नवल जिन्हें अपना गुरु माना है अरुण कमल ने—“नवल जी ने मेरी बहुत मदद की। उनका निजी पुस्तकालय जो बहुत समृद्ध था मेरे लिए हमेशा खुला रहता। हिंदी-साहित्य को जानने-समझने में उनकी सहायता बहुत बड़ा प्रसाद थी। वह मेरे गुरु थे।” (तद्भव-28, पृष्ठ :187) इन नवल जी के प्रोत्साहन के बिना शायद ही अरुण कमल आलेख लिख पाते या आलोचक बन पाते (‘कविता और समय’ का आभार पृष्ठ), नंदकिशोर नवल को ‘पुतली में संसार’ समर्पित है—“आदरणीय डॉ.नंदकिशोर नवल जी को कृतज्ञतापूर्वक”। विष्णु खरे को उस्ताद कवि के रूप में याद किया गया है अपनी आत्मकथा ‘अर्थात् : औरों के बहाने’ में एवं अरुण कमल की पहली आलोचना-पुस्तक का नाम ‘कविता और समय’ विष्णु खरे का दिया हुआ है। इन दोनों महानुभावों को ‘मीर’ और ‘कबीर’ के बहाने बिहारी की तरह सलटा दिया है अरुण कमल ने जबकि गुरु और दोस्त या उस्ताद का काम होता है—शिष्य और मित्र को सही रास्ता दिखलाना या उस तरफ़ इशारा करना। अरुण कमल अपनी थोड़ी-सी भी आलोचना सहन नहीं कर पाते। दरअस्ल, अरुण कमल का लीलाधर मंडलोई या अरविंद श्रीवास्तव से यह कहना यह दिखलाता है, अरुण कमल के ही शब्दों में कि ‘कवि सब बिच्छू होते हैं।’ साथ ही साथ यह भी दिखलाता है कि लिखे का जवाब कहे से देते हैं अरुण कमल, जबकि वह अपने को एक ऐसा लेखक मानते हैं जिसका दोनों हाथ (पैर) चलता है—दायाँ भी और बायाँ भी। (‘कविता और समय’ का आभार पृष्ठ) लेकिन आलोचक अरुण कमल लिखकर जवाब नहीं देते—न दोस्त विष्णु खरे को और न गुरु नंदकिशोर नवल को।
दरअस्ल, गद्य अरुण कमल ने तब लिखा जब बड़ी पत्रिकाओं या लघु पत्रिकाओं का बड़ा और विशिष्ट अंक आने वाला हो, कहीं बुलाया गया हो और हवाई जहाज़ में बैठकर जाने-आने की व्यवस्था हो या एसी डब्बे में, अच्छे होटल हो और क्रीम संस्थान जो पैसा भी दे और भाषण भी झाड़ने को कहे। फिर उस दिए हुए भाषण को गद्य के रूप में बाद में छपवा लिया जाए और ‘कविता और समय’ जैसी आलोचना की किताब बनवा ली जाए। ‘कविता और समय’ में अधिकतर इसी तरह के भाषण हैं। पैंतीस साल का युवा भी सत्तर साल के वृद्ध को प्रभावित कर सकता है और ऐसा हो ही सकता है कि नामवर सिंह (प्रधान संपादक : ‘आलोचना’) ज़रूर अपने संपादक (‘आलोचना’) के इस विशिष्ट गुण से प्रभावित हुए होंगे और अपने भाषणों को आलोचना की किताब में रूपांतरित करवाने की स्वीकृति प्रदान की होगी।
‘कविता और समय’ जो आ(अ)लोचक अरुण कमल की पहली आलोचना-पुस्तक है, इसे देखकर समझ में आ गया कि कवि अरुण कमल ज़रूर अपने सारे कार्य ठोस योजना बनाकर करते हैं। कुछ साल पहले आए ‘कोविड काल’ में अरुण कमल ने बहुत से भाषण घर बैठे उवाचे हैं, तो उनकी योजना में यह ज़रूर होगा कि यह भी आलोचना की पुस्तक के रूप में छप जाए और प्रकाशक एवं पाठक को आलोचना की एक, दो या हो सकता हो कि तीन-चार किताबें मिल जाएँ। जैसे संसार में हर एक कार्य के पीछे प्रकृति का कार्य-कारण संबंध होता है, मुझे लगता है कि अरुण कमल बिना योजना बनाएँ रक्त-मांस के इस शरीर के लिए भी कुछ न करते होंगे। यह होगा, इसलिए यह करना है। कविता संग्रह तो पक्का वह योजना बनाकर ही छपवाते होंगे। योजना बनाकर कविता लिखते भी होंगे। उन्होंने ‘हिन्दवी’ के कार्यक्रम ‘संगत’ के साक्षात्कार में कहा भी है कि वह एक ही कविता को कई बार लिखते हैं, यह तो योजना ही है।
मैं आलोचक नंदकिशोर नवल की बात से पहले सहमत हुआ करता था कि अरुण कमल नागार्जुन की परंपरा के कवि हैं। पर अब सहमत नहीं हूँ। मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि अरुण कमल नागार्जुन की नहीं, केदारनाथ सिंह की कविता का एक्सटेंशन है। वह छोटे केदारनाथ सिंह हैं। वह बिंबों के कवि हैं। देखिए सिर्फ़ बिंबों के कंट्रास्ट से अरुण कमल कैसी कविता बना देते हैं :
जो जितना ज़्यादा लोगों का
जितना ज़्यादा नुक़सान कर सके
वो उतना ही बड़ा है।
छोटा है वो जो किसी का नुक़सान न कर सके।
उस हर बात में राजनीति है
जहाँ दो में से एक को चुनना पड़े।
कम से कम कपड़े अश्लीलता नहीं
अश्लील है ज़रूरत से ज़्यादा कपड़े।
जो सरकार ऊपर से कुछ न करे
वो अमीरों का काम सबसे अच्छा करती है।
सितारा बनने से अच्छा है
गंदी गली का लैंप-पोस्ट बनना—कवि की इच्छा है।
(मैं वो शंख महाशंख, पृष्ठ : 59)
‘कुछ परिभाषाएँ’ शीर्षक यह कविता तो बिंबों का कमाल है और कवि की इच्छा है—“सितारा बनने से अच्छा है गंदी गली का लैंप पोस्ट बनना”। मुझे येट्स की एक पंक्ति याद आती है, साभार अरुण कमल जू—‘लव हैज पिच्ड इट्स टेंट इन द प्लेस ऑफ़ एक्सक्रिशन’—प्रेम ने गंदी जगहों पर ही गिराया है अपना तंबू। इसी बात को ‘समकालीनता का प्रश्न और कविता’ शीर्षक आलेख में अरुण कमल जू रौ में ऐसे लिख गए है कि लगता है कि कितनी बड़ी बात यह साहित्य अकादेमी प्राप्त कवि कह रहा है—कविता अपना तंबू जीवन के सबसे गंदे स्थानों पर गाड़ती है।” (भूमंडलीकरण और समकालीन कविता का यथार्थ, पृष्ठ : 22)
कहने का लब्बोलुआब यह है कि अँग्रेज़ी, संस्कृत, भोजपुरी, उर्दू आदि भाषा की जानकारी हो और उससे भाव, सिर्फ़ भाव वह भी अरुण कमल जी की तरह आप ले सकते हैं तो साहित्य अकादेमी तो आपका पक्का है। कल अरुण कमल जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल जाए, जो कि मेरी दिली ख़्वाहिश है कि उन्हें मिले तो युवा कवियों को ज्ञानपीठ भी कविता लिखकर मिल सकता है। अरुण कमल से युवा कवि ये प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। वैसे भी आज की हिंदी कविता केदारनाथ सिंह से प्रभावित और छोटे केदारनाथ सिंह से काफ़ी कुछ ग्रहण कर रही है। दरअस्ल, “अरुण कमल जी के पास जादुई भाषा और विलक्षण आँखें हैं। वह लोगों की नाड़ियों को बहुत जल्दी और सटीकता से पकड़ और समझ लेते हैं। वह आमतौर से किसी को अपनी वाणी से आहत नहीं करते। कई लोगों का मानना है कि वह साहित्यकार कुँवर नारायण-केदारनाथ सिंह के बाद हिंदी कविता की अपनी पीढ़ी के एकमात्र अजातशत्रु कवि हैं। संबंधों के संतुलन बनाने में वह अतुल्य है। शायद संयुक्त परिवार में रहने और भिन्न-भिन्न प्रकृति के लोगों के साथ सामंजस्य बनाने के अभ्यास से यह गुण उनके भीतर स्वत: आ गया होगा। चाहे ज्ञानरंजन-अशोक वाजपेयी अथवा ज्ञानरंजन-कमला प्रसाद की तनातनी रही हो या नामवर सिंह-अशोक वाजपेयी के बीच वैचारिक मतभेद रहे हो, वे दोनों पक्षों के प्रिया रहे हैं। यहाँ तक कि एक समय में साहित्य परिसर में यह भी कानाफूसी होती थी कि वह साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के निकट हो गए हैं।” (छवि से अलग, विनोद दास, पृष्ठ : 151)।
यहाँ ‘वह लोगों की नाड़ियों को बहुत जल्दी और सटीकता से पकड़ और समझ लेते हैं’ तथा ‘संबंधों के संतुलन बनाने में वह अतुल्य है’ जैसे वाक्य जो उनके साहित्यिक मित्र-कवि विनोद दास ने लिखे हैं, वह बतलाता है कि अरुण कमल एक नट की भांति शक्ति के साथ संतुलन करना जानते हैं। शक्ति को साधना जानते हैं। विश्वनाथ तिवारी हो या कोई भी हो अरुण कमल जू तो अरुण कमल जू हैं।
मुझे यह कई बार लगता हैं कि अरुण कमल जू दो पंक्तियों की कवित्त (कविता) अचानक से बना लेते हैं या उन्हें ये दो पंक्तियों की कवित्त पहले आ जाती है उनके पास, फिर वह पूरी कविता लिखते हैं और भोज या छट्टी में जैसे कुछ मीठा अंत में मिलता हैं उसी तरह दो पंक्तियों की कवित्त को इस्तिक़बाल कर ले जाते हैं। उनकी दो कविताओं का नाम लूँगा—‘मेख’ और ‘चरख भिक्खवे चरिक’। दोनों कविताएँ शाह लतीफ़ को पढ़कर और राहुल सांकृत्यायन के यात्रा पर्यवेक्षणों को पढ़कर लिखी गई हैं, लेकिन याद रखी जाएगी इन दो पंक्तियों के लिए जिनका इस कविता से उतना ही नाता है, जितना ब्रह्मभोज में कुछ मीठा अंत में मिल जाने से होता है।
सबसे छुपा बाँधता हूँ रोज़ पट्टियाँ चुपचाप
देखता हूँ घाव अपने खोलकर हर रात।
(मेख)
मुझे एक छट्टी में जाना है
और एक श्राद्ध में!
(चरख भिक्खवे चरिक)
इसी तरह की एक और कविता की पंक्ति है—‘जिनके मुँह में कौर मांस का उनके मुँह में मगही पान’। दरअस्ल अरुण कमल पढ़ते बहुत हैं। तुलसीदास को भी बहुत पढ़ते हैं और संस्कृत साहित्य को भी। अँग्रेज़ी के तो प्रोफ़ेसर ही है तो अँग्रेज़ी साहित्य को तो घोलकर पी गए होंगे। इतना पढ़ने-लिखने के बाद इतनी कम कविताएँ? कम कहने का विशेष अर्थ यह है कि वह भी जानते हैं कि सात संग्रह हो जाने से कविताएँ ज़्यादा नहीं होती और यह गुलेरी जी का ज़माना भी नहीं है तो मतलब यह कि उन्हें भी पता है कि उनके पास पढ़ने के लिए पाँच से ज़्यादा कविताएँ नहीं हैं। कई यूट्यूब चैनल और कई काव्य-पाठों में उन्हें सुनने के बाद यह लगा कि वह सिर्फ़ पाँच कविता के कवि हैं और कुछ दो-दो पंक्तियों को सुनाने के लिए बाक़ी बहुत कुछ ऐसा वह सुनाते हैं कि जिसका कोई अर्थ नहीं होता। एक बार वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने तो उन्हें टोक भी दिया था—हर जगह एक ही कविता नहीं सुनाना चाहिए। कुछ नया हो तो सुनाओ।
अनुभव के चूक जाने के बाद पढ़ा-लिखा आदमी कला से कविता कहने लगता है। कालरिज जब कहता है कि कविता विशिष्ट शब्दों का विशिष्ट रखरखाव है तो अँग्रेज़ी का विद्वान् प्राध्यापक जो हिंदी का प्रख्यात कवि भी है, क्या अपने कॉलेज जीवन के दिनों से ‘अभ्यस्त काव्यरूढ़ि की सुलभता’ को नहीं जानता होगा? ज़रूर जानता होगा क्योंकि वह 1970 से प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में आने-जाने लगा था। कविता का ककहरा जानने लगा था और कालरिज की तरह कविता करने भी। इस कला से आज के समय में बहुत कुछ साधा जा सकता है। वैसे भी ज़माना रीतिकाल का नहीं है और लोकतंत्र में सच्ची श्रद्धा मार्क्सवाद जिसे हम मानववाद भी कह सकते हैं, उससे आती है इसलिए चरित्र में आप किसी भी राजनीतिक पार्टी की तरफ़ रहिए कविता तो मानवदर्दी, मानवतावादी और मार्क्सवादी ही लिखनी होगी। यही ‘अभ्यस्त काव्यरूढ़ि की सुलभता’ है। याद रखें मैं मार्क्सवादी दर्शन की बात कर रहा हूँ, मार्क्सवादी पार्टी की नहीं, जैसे गांधीवादी दर्शन और कांग्रेस पार्टी दोनों अलग है, ठीक उसी तरह। तो आदमी आप जितने भी ख़राब हो कविता तो आपको अच्छी-अच्छी लिखनी ही होगी और यह दर्शन या समझ आती है किताबें पढ़कर और पढ़े-लिखे लोगों की संगत से। पढ़ा-लिखा आदमी तर्क से फ़र्क़ पैदा कर देता है और अंत मे अपने को अंततः सही सिद्ध कर देता है तर्क द्वारा। इस बात से कोई इनकार ही नहीं कर सकता कि अरुण कमल काफ़ी पढ़े-लिखे, सुरुचि-संपन्न, सुपुरुष, काव्य कला के रसिक, ज्ञानी और स्मृति से लबरेज़ कवि हैं। अरुण कमल ने स्मृति के गलियारे से कुछ शानदार कविताएँ निकाली है। उन कविताओं को पढ़ना, सिर्फ़ अरुण कमल की निजी स्मृति को ही देखना नहीं है; बल्कि उस समय के लेखकों, कलाकारों, एक्टिविस्टों, चित्रकारों, नाटककारों को भी जानना है। इसी बहाने कुछ-कुछ इतिहास को भी जानना है कि हमारे पुरखे कैसे थे? वह समय कैसा था? उस समय यह कैसे होता था? आदि। एक छोटी पर पूरी कविता देखिए—“शहीद भगत सिंह चौक पर दिन के ग्यारह बजे सब जमा होंगे / और आकाशवाणी डाक बंगला बंदर बग़ीचा बुद्ध मार्ग होते / सचिवालय गोलंबर तक जाएँगे / देश भर के खदान मज़दूरों की हड़ताल के समर्थन और / उन पर दमन के विरोध में लेखकों की सभा और जुलूस / ख़बर हो गई सबको कानों-कान / और जमा हुए लगभग डेढ़ सौ लेखक कलाकार / आगे खगेंद्र जी कन्हैया जी और नवलजी भी छाता लिए / एक ऐसा जुलूस जिसकी अपने लिए कोई माँग न थी / एक ऐसा जुलूस जो अंत:चेतना की पुकार था / लेखकों का मज़दूरों के लिए जेठ की धूप में सड़क पर उतरना / जैसे बालकृष्ण भट्ट लखनऊ में सन उन्नीस सौ आठ / तिलक का ज़माना।” (योगफल, पृष्ठ : 57)
‘लेखकों ने जुलूस निकाला’ यह छोटी-सी कविता उसी स्मृति के गलियारे से निकली है जिसके लिए अरुण कमल जाने जाते हैं। यहाँ वह सब है जो अरुण कमल को अरुण कमल बनाता है।
इसके अतिरिक्त ढेर सारी कविताएँ हैं जो स्मृतियों को, लोगों को, कवियों-कलाकारों पर हैं। ये सिर्फ़ कविताएँ ही नहीं है, ये इतिहास को जीवंत कर देने की कला है। अरुण कमल को कला को बरतना तो आता है और छोटी कविताओं के तो वह मास्टर है। हाँ, लंबी कविताएँ उनसे सध नहीं पातीं। ‘योगफल’ की अंतिम कविता ‘प्रलय’ जो ‘तद्भव’ में लंबी कविता के रूप में छपी या ‘रंगसाज़ की रसोई’ की ‘कविता कथरी’ यह भी उसी तद्भव में लंबी कविता के रूप में छपी लेकिन यह लंबी कविता पढ़ने जैसा तनाव, प्रबंधात्मकता, गति और भावोनोकुलता पैदा नहीं कर पाती। हर कवि का अपना शिल्प-कला और लिखने का ढंग होता है। और एक बात जो अरुण कमल कहते हैं कि जो देखा-भोगा, अनुभव किया हूँ; वही तो लिखूँगा। इस बात के आलोक में जब उनकी जीवनी ‘अर्थात् औरों की कथा’ पढ़ा तब समझ में आया कि जेल-जीवन पर ये सांद्र कविताएँ अरुण कमल को शिक्षक-आंदोलन में कुछ दिन जेल में रहने के कारण मिली हैं। उसी तरह रेल-यात्रा की कविताएँ भी उन्हें रेलयात्रा करते हुए मिली है। पहले संग्रह ‘अपनी केवल धार’ में दूसरी ही कविता है ‘यात्रा’ जो शुरू होती है—“रात के अँधेरे में दौड़ती जाती है पंजाब मेल”। इस कविता के बाद बहुत सारी रेलयात्रा पर कविताएँ अरुण कमल ने लिखी। 2012 में प्रकाशित ‘मैं वो शंख महाशंख’ में एक छोटी कविता है—“’रेल में बात’ जहाँ बातचीत हो रही है कि “आदमी कहाँ से कहाँ पहुच गया”, हारी-बीमारी, जीने-मरने से ऊपर उठ गया है तभी एक यात्री कह उठता है—“हमको तो बस साफ़ पानी चाहिए भाई जी!” और कविता ख़त्म हो जाती है। इसी तरह ‘उधर के मुसाफ़िर’ कविता में रेलवे के एक साधारण डब्बे में एक आदमी उठता है और दूसरा उसे बैठने नहीं देता। कविता अंत में कुकडू कू... से ख़त्म होती है। इसी तरह यात्रा की ढेर सारी कविताएँ हैं उनके पास। ये कविताएँ स्मृति और यात्रा-अनुभव की कविताएँ हैं। वैसे भी अरुण कमल स्मृतियों के कवि हैं। कहीं घूमने जाते हैं तो ढेर सारी कविताएँ घूमकर आने के बाद लिख डालते हैं। कुछ कविताएँ—गया, मोतिहारी, दूसरा आँगन जिसमें नौ कविताएँ जो पाकिस्तान घूमने पर हैं, सेवाग्राम से चार कविताएँ, नामवर पर एक कविता ‘आलोचना पर निबंध’, ‘रंगसाज़ की रसोई’ जो मनीष पुष्कले के स्टूडियो की याद में लिखी गई है, ‘गरुड़’ जो रोजा लक्जमबर्ग के लिए लिखी गई है, ‘एक बुलडोजर की गाथा’ जो विजय कुमार के लिए लिखी गई है, इक़बाल और बहादुर शाह जफ़र की मज़ार पर, नागार्जुन पर, स्कूल के सहपाठी पर ‘पोस्टमार्टम’, ‘खेल’ जो बोरिस बेकर पर है, ‘प्रगतिशील लेखक संघ के एलबम से’ (दस स्मृतियों पर आधारित कविताएँ), ‘घाटशिला : विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के घर’, रिल्के के प्रति आभार सहित आदि तमाम कविताएँ हैं जो बताती हैं कि अरुण कमल हर उस स्मृति पर कविता लिख सकते हैं जिस पर लिखना चाहे। स्मृति के वैभव के गुणगान के कवि हैं—अरुण कमल।
वह स्मृति को ही नहीं लिखते, वह समय की नब्ज़ को भी भाँप लेते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या अरुण कमल इतने भक्ति में लीन रहने वाले व्यक्ति हैं कि भक्ति की पुकार आत्मा से उठने लगी और अरुण कमल ‘पूर्वग्रह’ में ‘अनुनय-विनय’ जो नए संग्रह में ‘भक्त की पुकार’ शीर्षक से छपी है, लिखने लगे या पूर्वग्रह जो ख़ास रंग की सरकारी पत्रिका है या केंद्र में उसी रंग की सरकार है और अरुण कमल जैसा कवि जो ‘उड़ती चिड़िया के पर भाँप लेता है’ भाँप कर भक्तिपरक कविताएँ लिखने लगा। कविता रूपी ढेले से कोई बड़ी चिड़िया मारने का इरादा तो नहीं! या जैसे हर कवि की इच्छा होती है कि वह निराला-तुलसीदास बन जाए, पर वह तो हो नहीं सकता। इसलिए वह उन कवियों की कविताओं की तरह की कविताएँ लिखता है। साहित्य जब धर्म के चोले में आता है और कवि भक्त के चोले में तो वह अमरता की तरफ़ बढ़ा हुआ पहला क़दम होता है या सत्ता की तरफ़। हर कवि अमर होने की इच्छा से अभिशप्त होता है या कुछ पाने का आकांक्षी चाहे जनता दे या सत्ता। नहीं तो वह कविता नहीं लिखता और न उसमें इतना दिमाग़ खपाता। अरुण कमल की एक कविता है—‘अमरता की खोज’, इसमें कवि जिसे बड़ा समझता है उसके पास जाता है और उसे रात में खाँसी आ जाती है। उसकी नींद टूट जाती है डर से कि कहीं ‘बिग बॉस’ न सुन ले। कवि देखता है कि इतना रुसूख़दार आदमी भी डरता है। तो वह दूसरे दिन उस ‘बिग बॉस’ के पास चला जाता है, फिर वही घटना घटती है, रात में खाँसी आ जाती है। वह भी डर जाता है। इस तरह कवि अंत में जनता के पास ही आता है। तो जनता का बल सबसे बड़ा बल है कवि समझ जाता है। दरअस्ल जनता ही है—‘बिग बॉस’। क्या अरुण कमल समझ-बूझकर जनता तक पहुँचने के लिए भक्ति की चाशनी में कविता लिख रहे हैं। इतना तो हम सभी जानते हैं (उनको पढ़ने-सुनने से) कि अरुण कमल की धर्म में कितनी श्रद्धा-भक्ति है! और एक बात अभी भी धर्म इस देश की जनता की नसों में बहता रहता है और चालाक नेता इसे दुहकर कहाँ से कहाँ पहुँच चुके हैं, यह हम सब जानते हैं। तो क्या समझदार कवि उस नस को दुहने की कोशिश कर रहा है? वो सफल हो, असफल हो—की फरक पैंदा! आप कुछ बोलेंगे तो फिर वह (अरुण कमल) यह डायलॉग फ़िल्मी स्टाइल में झाड़ देता है—“हमें निको लगी सो करी हमने, तुम्हें निको लगी न लगी न लगे”। (कथोपकथन, पृष्ठ :15)
यह चौदह कविताएँ पहले मुक्तछंद में लिखी गई थी, फिर इन्हें गद्य में और नए तरह का पद कहकर प्रकाशित किया गया। यह बिना योजना के हो ही नहीं सकता।
अरुण कमल की एक कविता की दो पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद हैं—“पत्थर डूबे तो आवाज़ होती है/ आदमी इस दुनिया में बेआवाज़ डूब जाता है।” (सबूत, पृष्ठ : 44) ऐसा लगता है अरुण कमल अपनी नहीं, लाखों-करोड़ों, शंख-महाशंख लोगों की बातें कितनी सहजता से कर जाते हैं। उनकी थोड़ी कम लोकप्रिय कविताएँ मुझे शंख- महाशंख लोगों को जिसमें अरुण कमल भी हैं, समझने में ज़्यादा मदद करती हैं। दो छोटी कविताएँ आप भी देखें। पहली है ‘प्रधान की अनिद्रा’। कविता है :
जब अपने प्रधान विदेश गए
तो एक राजधानी के महापौर ने
एक भव्य समारोह में उन्हें नगर-कोष की
स्वर्ण-कुंजी भेंट की सम्मान में
अपने प्रधान रात भर सो नहीं पाए
यही सोचें यही सोचें कि कुंजी तो दी
पर यह तो बताया ही नहीं की ख़ज़ाना है कहाँ।
और दूसरी कविता है ‘हासिल’। वैसे हासिल शब्द सुनते ही राजेंद्र यादव की कहानी ‘हासिल’ की याद आने लगती है, वह भी इसी उम्र के आस-पास, इसी तरह की मानसिकता में शायद लिखी गई थी। फ़िलहाल कविता देखें :
नोंक महीन से महीन
करने की ज़िद में इतना
छीलता गया पेंसिल
कि अंत में हासिल रहा
ठूँठ।
मुझे लगता है अरुण कमल की यह छोटी-सी पर पूर्ण कविता, कितनी अच्छी व्याख्या कविता के माध्यम से उन्हीं की कविता की कर रही है कि अंत में बचा ठूँठ।
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अरुण कमल की कविताएँ यहाँ पढ़िए : अरुण कमल का रचना-संसार
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