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भोर तैं साँझ लौं कानन ओर

bhor tain sanjh laun kanan or

घनानंद

घनानंद

भोर तैं साँझ लौं कानन ओर

घनानंद

भोर तैं साँझ लौं कानन ओर निहारति बाबरी नैकु हारति।

साँझ तैं भोर लौं तारिन ताकिबौ तारनि सों इकतार टारति॥

जौ कहूँ भावतो दीठि परै घनआनंद आँसुनि औसर गारति।

मोहन सोंहन जोहन की लगियै रहै आँखिन कें उर आरति॥

विरहिणी नायिका बावली होकर प्रातःकाल से सायंकाल तक जंगल की ओर ही देखती रहती है और तनिक भी नहीं थकती है। संध्या से प्रातःकाल तक वह अपनी आँखों को एकटक तारागणों को देखना नहीं छोड़ती है अर्थात् तारों को एकटक निहारती हुई ही वह संपूर्ण रात्रि को व्यतीत कर देती है। कवि कहता है कि यदि कहीं प्रिय दिखाई पड़ जाता है तो निरंतर अश्रु-प्रवाह के कारण उसके दर्शन-लाभ के सुअवसर को भी वह खो देती है। इस प्रकार उस विरहिणी नायिका की आँखों के हृदय में प्रियतम को सदैव देखने की लालसा बनी ही रहती है।

स्रोत :
  • पुस्तक : घनानंद कवित्त (प्रथम आनन) (पृष्ठ 71)
  • संपादक : चंद्रशेखर मिश्र ‘शास्त्री’
  • रचनाकार : घनानंद
  • प्रकाशन : वाणी वितान
  • संस्करण : 1972

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