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पिंडली वर्णन (नखशिख)

ath pi.nDurii varnana.n

अब्दुर्रहमान 'प्रेमी'

अब्दुर्रहमान 'प्रेमी'

पिंडली वर्णन (नखशिख)

अब्दुर्रहमान 'प्रेमी'

केवरा कैसी कली लव कै मन भोर सुभाव रलै झटपावै।

कै कदली तरु छोरन उत्तम काम गइंद लघै लपटावै

सोने के डंड छै डांड वे को मन जो वनराज सो कोन छुडावै।

पींडुरी कामिन की किधों मेन के वेलन पुरियै प्रीत बढावै॥

केवड़ा की कली के समान नायिका की पिंडली देखकर मन लालायित हो जाता है और झूमता हुआ उसकी और झपटता है। केले के पेड़ को छीनने के लिए काम रूपी हाथी उसी ओर लपकता है। सोने का डंड जब वनराज को मिल गया है तो उसने कौन भिड़ सकता है? प्रेयसी की पिंडली काम का वेतन है जो प्रीत को बढ़ाती है।

स्रोत :
  • पुस्तक : नख-शिख (पृष्ठ 76)
  • संपादक : इक़बाल अहमद
  • रचनाकार : अब्दुर्रहमान 'प्रेमी'
  • प्रकाशन : महात्मा गांधी मेमोरियल पब्लिकेशन, हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई-2
  • संस्करण : 1972

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